जिस कथा के लिए आप व्रत रखते हैं, सोलह सोमवार, करवा चौथ, सत्यनारायण, संतोषी माता, और अन्य।
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व्रत कथामहाकाल की प्रचंड कृपा और राहु की गूढ़ ऊर्जा का संयुक्त आह्वान विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करता है। अमावस्या/शनिवार को रखा जाने वाला यह व्रत वैवाहिक सौहार्द्र और समय-सिद्ध विवाह का द्वार खोलता है।
विवाह आशीर्वाद, बाधा-निवारण और सौहार्द्र
व्रत कथामार्गशीर्ष मास के गुरुवारों को रखा जाने वाला महालक्ष्मी व्रत घर में शांति, धन और समृद्धि का प्रबल आह्वान है। राजा भद्रश्रवा, रानी सुरतचंद्रिका और राजकुमारी शांबला की गाथा इस व्रत का मूल है।
धन, समृद्धि, शांति और विनम्रता
व्रत कथासोलह सोमवार व्रत हिन्दू धर्म के सबसे प्रबल व्रतों में से एक है, जो भगवान शिव को समर्पित है। मान्यता है कि शुद्ध हृदय से यह व्रत करने पर कोई भी कामना — विशेषकर विवाह और स्वास्थ्य-संबंधी — पूर्ण हो सकती है।
विवाह, स्वास्थ्य, संतान और सर्व-मनोकामना सिद्धि
व्रत कथामाँ संतोषी व्रत 16 लगातार शुक्रवारों तक रखा जाता है। स्त्रियाँ पति की कुशलता और पारिवारिक सौहार्द्र के लिए यह व्रत श्रद्धा से करती हैं। सबसे महत्वपूर्ण नियम — इस दिन खट्टी वस्तुओं (नींबू, इमली) का सेवन अथवा स्पर्श नहीं।
पारिवारिक शांति, संतोष और पति की समृद्धि
व्रत कथासत्यनारायण पूजा हिन्दू घरों में पूर्णिमा अथवा गृह-प्रवेश/विवाह जैसे शुभ अवसरों पर किया जाने वाला सबसे सामान्य और पूज्य अनुष्ठान है। यह भगवान विष्णु के “सत्य के स्वरूप” का पूजन है।
गृह-मंगल, पारिवारिक सौहार्द्र और शुभ कार्य-आरंभ
व्रत कथासंकष्टी चतुर्थी प्रत्येक मास की पूर्णिमा के चौथे दिन आती है। “संकष्टी” अर्थात् “संकट से मुक्ति”। भक्त सूर्योदय से चंद्रोदय तक व्रत रखते हैं। माना जाता है कि गणेश जी इस व्रत करने वाले भक्तों की समस्त बाधाओं (विघ्न) का हरण करते हैं।
संकट-निवारण, विघ्न-हरण, बुद्धि और संतान-कल्याण
व्रत कथाएकादशी को “व्रतों का राजा” कहा गया है। वर्ष की 24 एकादशियों में उत्पन्ना एकादशी विशेष है — यह स्वयं देवी एकादशी के प्राकट्य (उत्पत्ति) का दिन है। यह प्रायः नवंबर या दिसंबर में पड़ती है।
पाप-क्षय, मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति
व्रत कथाकरवा चौथ उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध पर्व है, जिसे सुहागिन स्त्रियाँ अपने पतियों की दीर्घायु और सुरक्षा के लिए रखती हैं। रानी वीरावती की पावन गाथा इस व्रत का मूल है।
पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और वैवाहिक सुख
व्रत कथाहरतालिका तीज सुहागिन स्त्रियाँ वैवाहिक सुख और अविवाहित कन्याएँ उत्तम वर की प्राप्ति हेतु रखती हैं। “हरतालिका” अर्थात् “सखी ने हर लिया” — पार्वती की सखी द्वारा उन्हें अनिच्छित विवाह से बचाने की पावन कथा इसका मूल है।
वैवाहिक सुख, पति की दीर्घायु और उत्तम वर प्राप्ति
व्रत कथाअहोई अष्टमी दीपावली से 8 दिन पूर्व मनाई जाती है। माताएँ अपनी संतानों की दीर्घायु और कल्याण हेतु यह कठोर व्रत रखती हैं और संध्या में तारों के दर्शन के पश्चात ही पारण करती हैं।
संतान की दीर्घायु, रक्षा और कल्याण
व्रत कथावट सावित्री ज्येष्ठ मास की अमावस्या अथवा पूर्णिमा को मनाया जाता है। सुहागिन स्त्रियाँ वट (बरगद) वृक्ष के चारों ओर पावन धागा बाँधकर पति की दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं। वट वृक्ष त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) का प्रतीक है।
पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और अकाल-मृत्यु से रक्षा
व्रत कथाऋषि पंचमी गणेश चतुर्थी के पाँचवें दिन आती है। यह व्रत धन अथवा विवाह की सामान्य कामनाओं के लिए नहीं, बल्कि विशेष रूप से अनजाने में किए गए पाप-कर्मों — परंपरागत रूप से मासिक-शुद्धि संबंधी नियमों — के क्षमायाचन हेतु पालन किया जाता है।
पाप-शुद्धि, मासिक-धर्म दोष निवारण और आत्मा का परिष्कार32 भक्तिपूर्ण मार्गदर्शिकाएँ

व्रत कथामहाकाल की प्रचंड कृपा और राहु की गूढ़ ऊर्जा का संयुक्त आह्वान विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करता है। अमावस्या/शनिवार को रखा जाने वाला यह व्रत वैवाहिक सौहार्द्र और समय-सिद्ध विवाह का द्वार खोलता है।
विवाह आशीर्वाद, बाधा-निवारण और सौहार्द्र
व्रत कथामार्गशीर्ष मास के गुरुवारों को रखा जाने वाला महालक्ष्मी व्रत घर में शांति, धन और समृद्धि का प्रबल आह्वान है। राजा भद्रश्रवा, रानी सुरतचंद्रिका और राजकुमारी शांबला की गाथा इस व्रत का मूल है।
धन, समृद्धि, शांति और विनम्रता
व्रत कथासोलह सोमवार व्रत हिन्दू धर्म के सबसे प्रबल व्रतों में से एक है, जो भगवान शिव को समर्पित है। मान्यता है कि शुद्ध हृदय से यह व्रत करने पर कोई भी कामना — विशेषकर विवाह और स्वास्थ्य-संबंधी — पूर्ण हो सकती है।
विवाह, स्वास्थ्य, संतान और सर्व-मनोकामना सिद्धि
व्रत कथामाँ संतोषी व्रत 16 लगातार शुक्रवारों तक रखा जाता है। स्त्रियाँ पति की कुशलता और पारिवारिक सौहार्द्र के लिए यह व्रत श्रद्धा से करती हैं। सबसे महत्वपूर्ण नियम — इस दिन खट्टी वस्तुओं (नींबू, इमली) का सेवन अथवा स्पर्श नहीं।
पारिवारिक शांति, संतोष और पति की समृद्धि
व्रत कथासत्यनारायण पूजा हिन्दू घरों में पूर्णिमा अथवा गृह-प्रवेश/विवाह जैसे शुभ अवसरों पर किया जाने वाला सबसे सामान्य और पूज्य अनुष्ठान है। यह भगवान विष्णु के “सत्य के स्वरूप” का पूजन है।
गृह-मंगल, पारिवारिक सौहार्द्र और शुभ कार्य-आरंभ
व्रत कथासंकष्टी चतुर्थी प्रत्येक मास की पूर्णिमा के चौथे दिन आती है। “संकष्टी” अर्थात् “संकट से मुक्ति”। भक्त सूर्योदय से चंद्रोदय तक व्रत रखते हैं। माना जाता है कि गणेश जी इस व्रत करने वाले भक्तों की समस्त बाधाओं (विघ्न) का हरण करते हैं।
संकट-निवारण, विघ्न-हरण, बुद्धि और संतान-कल्याण
व्रत कथाएकादशी को “व्रतों का राजा” कहा गया है। वर्ष की 24 एकादशियों में उत्पन्ना एकादशी विशेष है — यह स्वयं देवी एकादशी के प्राकट्य (उत्पत्ति) का दिन है। यह प्रायः नवंबर या दिसंबर में पड़ती है।
पाप-क्षय, मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति
व्रत कथाकरवा चौथ उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध पर्व है, जिसे सुहागिन स्त्रियाँ अपने पतियों की दीर्घायु और सुरक्षा के लिए रखती हैं। रानी वीरावती की पावन गाथा इस व्रत का मूल है।
पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और वैवाहिक सुख
व्रत कथाहरतालिका तीज सुहागिन स्त्रियाँ वैवाहिक सुख और अविवाहित कन्याएँ उत्तम वर की प्राप्ति हेतु रखती हैं। “हरतालिका” अर्थात् “सखी ने हर लिया” — पार्वती की सखी द्वारा उन्हें अनिच्छित विवाह से बचाने की पावन कथा इसका मूल है।
वैवाहिक सुख, पति की दीर्घायु और उत्तम वर प्राप्ति
व्रत कथाअहोई अष्टमी दीपावली से 8 दिन पूर्व मनाई जाती है। माताएँ अपनी संतानों की दीर्घायु और कल्याण हेतु यह कठोर व्रत रखती हैं और संध्या में तारों के दर्शन के पश्चात ही पारण करती हैं।
संतान की दीर्घायु, रक्षा और कल्याण
व्रत कथावट सावित्री ज्येष्ठ मास की अमावस्या अथवा पूर्णिमा को मनाया जाता है। सुहागिन स्त्रियाँ वट (बरगद) वृक्ष के चारों ओर पावन धागा बाँधकर पति की दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं। वट वृक्ष त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) का प्रतीक है।
पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और अकाल-मृत्यु से रक्षा
व्रत कथाऋषि पंचमी गणेश चतुर्थी के पाँचवें दिन आती है। यह व्रत धन अथवा विवाह की सामान्य कामनाओं के लिए नहीं, बल्कि विशेष रूप से अनजाने में किए गए पाप-कर्मों — परंपरागत रूप से मासिक-शुद्धि संबंधी नियमों — के क्षमायाचन हेतु पालन किया जाता है।
पाप-शुद्धि, मासिक-धर्म दोष निवारण और आत्मा का परिष्कार
व्रत कथाप्रदोष व्रत शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों की त्रयोदशी को रखा जाता है। प्रदोष अर्थात् गोधूलि समय — इस वेला में भगवान शिव कैलाश पर्वत पर ब्रह्मांडीय नृत्य (तांडव) करते हैं। इस व्रत से नकारात्मक कर्म कटते और सफलता मिलती है।
कर्म-शुद्धि, सफलता, बाधा-निवारण और संतान-कल्याण
व्रत कथागुरुवार का व्रत देवगुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु को समर्पित है। भक्त पीले वस्त्र धारण कर पीला (नमक-रहित) आहार लेते हैं — विवेक, शिक्षा और धन के लिए यह व्रत विख्यात है।
विवेक, शिक्षा, धन और वैवाहिक सौख्य
व्रत कथारविवार सूर्य देव को समर्पित दिन है। यह व्रत त्वचा-रोगों के निवारण, स्वास्थ्य-प्राप्ति और समाज में मान-सम्मान हेतु रखा जाता है। भक्त सूर्यास्त से पूर्व एक समय — गेहूँ-गुड़ से बना नमक-रहित — भोजन ग्रहण करते हैं।
त्वचा-रोग निवारण, स्वास्थ्य, मान-सम्मान और करियर-स्पष्टता
व्रत कथामंगलवार हनुमान जी का दिन है। यह व्रत बल, साहस, रक्षा और पुत्र-प्राप्ति के इच्छुक भक्तों द्वारा रखा जाता है। हनुमान जी के एक परम भक्त दम्पति और “मंगल” नामक पुत्र की पावन गाथा इस व्रत का मूल है।
बल, साहस, रक्षा, पुत्र-प्राप्ति और गृह-कलह निवारण
व्रत कथाबुधवार का व्रत बुध ग्रह की शांति और गणेश जी की कृपा के लिए रखा जाता है। इससे बुद्धि, व्यापार में सफलता और बाधा-निवारण होता है। भक्त हरे वस्त्र धारण कर मूँग-दाल का भोजन लेते हैं।
बुद्धि, व्यापार सफलता, बाधा-निवारण और गृह-शांति
व्रत कथाशनि देव न्याय के देवता हैं। भक्त उनसे भयभीत रहते हैं, किंतु वे केवल बुरे कर्मों को ही दंड देते हैं और धैर्य को पुरस्कृत करते हैं। यह व्रत साढ़े साती अथवा शनि दोष के प्रभाव को कम करने हेतु रखा जाता है।
साढ़े साती, शनि दोष और कर्म-शुद्धि
व्रत कथाबिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल की माताओं द्वारा संतान की सुरक्षा हेतु रखा जाने वाला यह कठोर निर्जल व्रत जीवित-पुत्रिका (जितिया) कहलाता है। चील और सियार की गाथा इसका मूल है।
संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और रक्षा
व्रत कथाछठ एक प्रबल पर्व है जहाँ भक्त जल में खड़े होकर उदय और अस्त होते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। यह परिवार के स्वास्थ्य और दीर्घायु हेतु पालन किया जाता है — राजा प्रियव्रत और छठी मैया की गाथा इसका मूल है।
परिवार का स्वास्थ्य, दीर्घायु और संतान कल्याण
व्रत कथादीपावली के अगले दिन मनाई जाने वाली गोवर्धन पूजा उस पावन घटना की स्मृति है जब भगवान कृष्ण ने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को उठाया था।
अन्नकूट, प्रकृति-पूजन और पशुधन कल्याण
व्रत कथाइस दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता। लोग “बासोड़ा” (एक दिन पूर्व बना ठंडा भोजन) ग्रहण करते हैं। यह व्रत परिवार को शीतला अथवा चेचक जैसे ताप-जन्य रोगों से रक्षित रखने हेतु पालन किया जाता है।
चेचक, ताप-रोग निवारण और परिवार का स्वास्थ्य
व्रत कथागणगौर राजस्थान का रंग-बिरंगा पर्व है। “गण” अर्थात् शिव और “गौर” अर्थात् गौरी। स्त्रियाँ यह व्रत अपने पति की दीर्घायु हेतु पालन करती हैं — माँ पार्वती के भक्त-जन-प्रिय आशीर्वादों की गाथा इसका मूल है।
सुहाग की रक्षा, पति की दीर्घायु और वैवाहिक सौख्य
व्रत कथानाग पंचमी पर सर्पों को दूध अर्पित कर पूजा की जाती है। यह श्रावण मास में पड़ती है और माना जाता है कि इससे सर्प-दंश का भय तथा काल सर्प दोष दूर होता है।
सर्प-भय निवारण, काल सर्प दोष और परिवार-वंश रक्षा
व्रत कथाभाई दूज भाई-बहन के अटूट प्रेम का पर्व है — दीपावली के दूसरे दिन बहनें भाइयों को तिलक कर दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं। यमराज और यमुना की पावन गाथा इस पर्व का मूल है।
भाई की दीर्घायु, रक्षा और भाई-बहन का प्रेम
व्रत कथामहाशिवरात्रि “शिव की महान रात्रि” है। इस दिन व्रत रखना भगवान शिव को प्रसन्न करने का सर्वाधिक प्रबल मार्ग माना गया है। सुस्वर नामक शिकारी की गाथा इस व्रत का मूल है।
पाप-क्षमा, मोक्ष, पति की दीर्घायु और अविवाहित कन्याओं के लिए उत्तम वर
व्रत कथासोमवती अमावस्या पितृ दोष के शमन और पति की दीर्घायु के लिए अत्यंत प्रबल दिन मानी जाती है। सुहागिन स्त्रियाँ व्रत रखकर पीपल वृक्ष की 108 परिक्रमा करती हैं और पावन धागा बाँधती हैं।
पति की दीर्घायु, पितृ दोष निवारण और पारिवारिक मंगल
व्रत कथाअक्षय तृतीया अर्थात् “जिसका क्षय न हो” — वह दिन जब किया गया पुण्य, दान और नया आरंभ अक्षय फल देते हैं। सुदामा-कृष्ण प्रसंग और द्रौपदी के अक्षय पात्र की कथा इस पर्व का मूल है।
अक्षय धन, दान, शुभारंभ और समृद्धि
व्रत कथातुलसी विवाह वर्षा ऋतु के समापन और हिन्दू विवाह-ऋतु के आरंभ का प्रतीक है। यह तुलसी-पौधे और शालिग्राम (भगवान विष्णु) के पावन विवाह-अनुष्ठान का पर्व है। वृंदा और जालंधर की कथा इसका मूल है।
गृह-मंगल, कन्यादान-पुण्य और विवाह-ऋतु का आरंभ
व्रत कथागणेश चतुर्थी के दस दिन पश्चात मनाया जाने वाला अनंत चतुर्दशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। भक्त 14 गाँठों वाला अनंत-सूत्र धारण करते हैं — अनंत की कृपा और अहंकार के त्याग की सीख।
समृद्धि, मान-सम्मान की पुनर्स्थापना और अहंकार का त्याग
व्रत कथानवरात्रि नौ दिनों का महापर्व है जिसमें माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना होती है। व्रत कथा मुख्यतः महिषासुर-मर्दिनी की विजय-गाथा है — भय और अहंकार के राक्षसों पर शक्ति की विजय का प्रतीक।
शक्ति, रक्षा, विजय और आंतरिक शुद्धि
व्रत कथादेवी व्रत कथा शाक्त भक्ति की सबसे हृदयस्पर्शी परंपराओं में से एक है। सम्पूर्ण कथा, विधि और सामग्री — माँ के साथ अटूट संवाद के रूप में निभाया जाने वाला यह व्रत।
शाक्त भक्ति, रक्षा, आंतरिक स्पष्टता और माँ-संवाद