मार्गशीर्ष मास के गुरुवारों को रखा जाने वाला महालक्ष्मी व्रत घर में शांति, धन और समृद्धि का प्रबल आह्वान है। राजा भद्रश्रवा, रानी सुरतचंद्रिका और राजकुमारी शांबला की गाथा इस व्रत का मूल है।
परिचय
मार्गशीर्ष महालक्ष्मी व्रत, पावन मार्गशीर्ष मास के गुरुवारों को रखा जाने वाला एक अत्यंत शुभ व्रत है। मान्यता है कि यह कथा सुनने अथवा पढ़ने से परिवार में शांति, धन और समृद्धि आती है।
व्रत कथा
बहुत समय पूर्व सौराष्ट्र देश में राजा भद्रश्रवा और उनकी रानी सुरतचंद्रिका निवास करते थे। वे अत्यंत धनी थे और ऐश्वर्य-पूर्ण जीवन जी रहे थे। किंतु रानी अपने वैभव के कारण अत्यंत अहंकारी हो गई थी।
एक दिन माँ लक्ष्मी ने रानी की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने एक वृद्ध, दुर्बल स्त्री का रूप धारण किया और महल के द्वार पर पहुँचीं।
रानी ने वृद्धा को देखा तो क्रुद्ध हो गई — “तू यहाँ क्यों आई है?” उसने डाँटा। जल अथवा भोजन देने के स्थान पर उसने वृद्धा का अपमान कर उसे भगा दिया।
किंतु राजा की पुत्री राजकुमारी शांबला अत्यंत कोमल-हृदय थी। वृद्धा को जाते देख वह दौड़ी और अत्यंत सम्मान के साथ उससे वार्ता कर भोजन का निवेदन किया। राजकुमारी की भक्ति से प्रसन्न होकर वृद्धा (माँ लक्ष्मी) ने उसे मार्गशीर्ष महालक्ष्मी व्रत की गुप्त विधि सिखाई। गुरुवार को व्रत रखकर आशीर्वाद प्राप्त करने का मार्ग समझाया।
भाग्य का परिवर्तन
राजकुमारी शांबला ने पूर्ण भक्ति से व्रत आरंभ किया। शीघ्र ही उसका विवाह एक धनी राजकुमार से हो गया और वह सुख-समृद्धि के साथ दूसरे राज्य में रहने लगी।
वहीं सौराष्ट्र में रानी के अहंकार के कारण राजा-रानी दोनों अपना राज्य और सम्पत्ति खो बैठे। वे भोजन के लिए भी संघर्ष करने लगे।
समृद्धि की पुनर्स्थापना
पुत्री की सुख-स्थिति सुनकर रानी सहायता के लिए शांबला से भेंट करने पहुँची। शांबला ने अपनी माँ का प्रेम-पूर्वक स्वागत किया और उसकी दीन दशा देखी। उसने माँ को कोमलता से विनम्रता और भक्ति का महत्व स्मरण कराया।
शांबला ने अपनी माँ को वही व्रत सिखाया जो वृद्धा ने उसे सिखाया था। रानी को अपनी भूल का बोध हुआ। वह घर लौटी और गुरुवारों को मार्गशीर्ष महालक्ष्मी व्रत का विधिपूर्वक पालन किया।
उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर माँ लक्ष्मी ने उसे क्षमा किया। राजा-रानी को अपना राज्य और सम्पत्ति पुनः प्राप्त हुई, और उन्होंने शेष जीवन शांति व आनंद में व्यतीत किया।
निष्कर्ष
यह कथा सिखाती है कि अहंकार पतन लाता है, जबकि विनम्रता और भक्ति माँ लक्ष्मी के आशीर्वाद का मार्ग खोलती है।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
पूजा विधि
यह पूजा कैसे करें
चरण 1
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा-स्थल पर कलश-स्थापना करें।
चरण 2
कलश के समक्ष माँ लक्ष्मी की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें।
चरण 3
हल्दी, कुंकुम, अक्षत, पीले पुष्प और दूर्वा अर्पित करें।
चरण 4
श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र अथवा लक्ष्मी स्तुति का पाठ करें।
चरण 5
व्रत कथा सुनकर, सुहागिनों को भोजन कराकर व्रत का उद्यापन करें।
सामग्री
व्रत के लिए सामग्री
मंत्र
Lakshmi mantra
Om Shreem Mahalakshmyai Namah
Chant on Friday or during Lakshmi puja for prosperity, grace, and sattvic abundance.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
सावधानी
इन भूलों से बचें
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
यह व्रत कब रखें?
मार्गशीर्ष (अगहन) मास के प्रत्येक गुरुवार को रखा जाता है।
कितने गुरुवार व्रत रखें?
मार्गशीर्ष मास के सभी चार अथवा पाँच गुरुवार रखने का संकल्प किया जाता है।
उद्यापन कब होता है?
अंतिम गुरुवार पर सुहागिनों को भोजन कराकर और चढ़ाया गया प्रसाद बाँटकर उद्यापन करते हैं।
क्या आप यह पूजा अपने संकल्प के साथ करवाना चाहते हैं?
अनुभवी पंडित आपको सही सेवा की ओर मार्गदर्शन देंगे।







