वट सावित्री ज्येष्ठ मास की अमावस्या अथवा पूर्णिमा को मनाया जाता है। सुहागिन स्त्रियाँ वट (बरगद) वृक्ष के चारों ओर पावन धागा बाँधकर पति की दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं। वट वृक्ष त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) का प्रतीक है।
परिचय
वट सावित्री ज्येष्ठ मास की अमावस्या अथवा पूर्णिमा को मनाया जाता है। सुहागिन स्त्रियाँ वट (बरगद) वृक्ष के चारों ओर पावन धागा बाँधकर अपने पति की दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं। वट वृक्ष त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु और शिव — का प्रतीक माना गया है।
व्रत कथा
सावित्री एक राजकुमारी थी। उसने सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना — यद्यपि वह वन में रहने वाला निर्धन लकड़हारा था और जिसकी एक वर्ष में मृत्यु पूर्व-निश्चित थी।
मृत्यु के निर्धारित दिन सावित्री सत्यवान के साथ वन में गई। लकड़ी काटते समय सत्यवान को चक्कर आया और वह मूर्छित हो गया। यमराज उसकी आत्मा लेने पधारे।
सावित्री ने यमराज का अनुसरण किया। यमराज ने उसे लौट जाने को कहा, किंतु उसने इनकार किया — “पत्नी का स्थान अपने पति के साथ है।” उसकी बुद्धि और भक्ति से प्रभावित होकर यमराज ने उसे तीन वरदान देने का वचन दिया — किंतु सत्यवान के जीवन की याचना की अनुमति नहीं थी।
- प्रथम वर में सावित्री ने अपने अंधे श्वसुर के लिए दृष्टि माँगी। स्वीकृत। - द्वितीय में अपने श्वसुर का खोया राज्य माँगा। स्वीकृत। - तृतीय में सावित्री ने कुशलता से माँगा — “प्रभु, मुझे सौ पुत्रों का आशीर्वाद दें।”
यमराज ने “तथास्तु” कह दिया। फिर उन्हें अपनी भूल का बोध हुआ — सावित्री के पति के बिना पुत्र असंभव थे! अपने वचन से बँधकर यमराज को सत्यवान की आत्मा लौटानी पड़ी। सत्यवान गहरी निद्रा से जागने की भाँति वट वृक्ष के नीचे उठ बैठा।
निष्कर्ष
वट वृक्ष की पूजा इसलिए होती है कि यह घटना इसी की छाया में घटित हुई। यह कथा प्रतीक है कि एक समर्पित पत्नी अपने पति के लिए मृत्यु पर भी विजय पा सकती है।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
पूजा विधि
यह पूजा कैसे करें
चरण 1
प्रातः स्नान कर सुहाग-वस्त्र धारण करें और श्रृंगार करें।
चरण 2
वट वृक्ष के समक्ष अथवा घर में चित्र-वृक्ष के समक्ष जल, रोली, अक्षत, पुष्प और चना-गुड़ अर्पित करें।
चरण 3
कच्चा सूत का धागा वृक्ष के चारों ओर बाँधकर 7, 11 अथवा 108 परिक्रमा करें।
चरण 4
वट सावित्री कथा पढ़ें अथवा सुनें और सत्यवान-सावित्री की मूर्ति/चित्र की पूजा करें।
चरण 5
निर्जल अथवा फलाहार व्रत का पालन करें और संध्या समय पारण करें।
सामग्री
व्रत के लिए सामग्री
मंत्र
Savitri mantra
Om Savitryai Namah
Chant while praying for marital strength, long life, and dharmic commitment.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
सावधानी
इन भूलों से बचें
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
यह व्रत कब पड़ता है?
ज्येष्ठ मास की अमावस्या को — उत्तर भारत की परंपरा; कुछ क्षेत्रों में ज्येष्ठ पूर्णिमा को।
क्या निर्जल व्रत अनिवार्य है?
परंपरागत रूप से निर्जल व्रत श्रेष्ठ है; स्वास्थ्य अनुसार जल अथवा फलाहार ली जा सकती है।
यदि वट वृक्ष न मिले तो?
घर में वट वृक्ष का चित्र अथवा तुलसी/पीपल वृक्ष के समक्ष श्रद्धा से पूजा की जा सकती है।
क्या आप यह पूजा अपने संकल्प के साथ करवाना चाहते हैं?
अनुभवी पंडित आपको सही सेवा की ओर मार्गदर्शन देंगे।







