अक्षय तृतीया अर्थात् “जिसका क्षय न हो” — वह दिन जब किया गया पुण्य, दान और नया आरंभ अक्षय फल देते हैं। सुदामा-कृष्ण प्रसंग और द्रौपदी के अक्षय पात्र की कथा इस पर्व का मूल है।
परिचय
अक्षय तृतीया का अर्थ है “जिसका क्षय न हो।” वैशाख शुक्ल तृतीया का यह पर्व ऐसे दिन के रूप में प्रसिद्ध है जब नया कार्य आरंभ करना, स्वर्ण-क्रय और दान अक्षय फल देता है।
व्रत कथा
अक्षय तृतीया से अनेक पौराणिक प्रसंग जुड़े हैं — गंगा का अवतरण और त्रेतायुग का आरंभ भी इसी दिन माना जाता है। किंतु सबसे प्रिय प्रसंग है सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता का।
सुदामा, एक निर्धन ब्राह्मण और भगवान श्रीकृष्ण के बाल-मित्र, इसी दिन द्वारिका पहुँचे। लज्जावश वे अपनी दरिद्रता का निवेदन नहीं कर सके और भेंट के रूप में केवल एक मुट्ठी पोहा साथ लाए।
श्रीकृष्ण ने उसे अत्यंत प्रेम से स्वीकार किया। एक मुट्ठी पोहा खाते ही सुदामा की दरिद्रता पल में विलीन हो गई। जब वे घर लौटे तो उनकी कुटिया महल में परिवर्तित हो चुकी थी और पात्र स्वर्ण व अन्न से भरे हुए थे — कभी समाप्त न होने वाले (अक्षय)।
एक अन्य प्रसंग के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के वनवास में द्रौपदी को अक्षय पात्र प्रदान किया था, जिससे कभी भूख न सताए।
निष्कर्ष
अक्षय तृतीया पर किया गया दान और श्रद्धा अक्षय आशीर्वाद देता है — जो कभी समाप्त नहीं होते। यह दिन सिखाता है कि ईश्वर के समक्ष भाव ही सबसे बड़ा धन है।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
पूजा विधि
यह पूजा कैसे करें
चरण 1
प्रातः स्नान कर संकल्प लें और विष्णु-लक्ष्मी का पूजन करें।
चरण 2
श्रद्धानुसार स्वर्ण अथवा नवीन सामग्री घर लाएँ और उसे पूजा-स्थल पर स्थापित करें।
चरण 3
अक्षय तृतीया कथा पढ़ें अथवा सुनें और जल-अर्पण कर प्रार्थना करें।
चरण 4
यथाशक्ति अन्न, जल, वस्त्र अथवा द्रव्य का दान करें — अक्षय फल की भावना से।
सामग्री
व्रत के लिए सामग्री
मंत्र
Lakshmi mantra
Om Shreem Mahalakshmyai Namah
Chant on Friday or during Lakshmi puja for prosperity, grace, and sattvic abundance.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
सावधानी
इन भूलों से बचें
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
अक्षय तृतीया पर क्या दान करना चाहिए?
जल-पात्र, अन्न, वस्त्र, छाता अथवा यथाशक्ति स्वर्ण — आवश्यकता के अनुसार किया गया दान अक्षय फलदायी होता है।
क्या इस दिन स्वर्ण खरीदना अनिवार्य है?
अनिवार्य नहीं, किंतु पारंपरिक रूप से यह शुभ माना जाता है। सच्ची भक्ति और दान ही मुख्य हैं।
अक्षय तृतीया कब मनाई जाती है?
वैशाख शुक्ल तृतीया को — प्रायः अप्रैल अथवा मई में।
क्या आप यह पूजा अपने संकल्प के साथ करवाना चाहते हैं?
अनुभवी पंडित आपको सही सेवा की ओर मार्गदर्शन देंगे।







