कर्ण पर्व के बारे में
कर्ण के सेनापतित्व के दो दिन, शल्य उनके सारथि — महाभयंकर द्वन्द्व, और अन्ततः कर्ण एवं अर्जुन का नियति-युद्ध, जिसमें कर्ण का रथ-चक्र धरती में धँस जाता है और वे मारे जाते हैं।
पाठ कैसे करें
कर्ण पर्व नीचे उसकी मूल संस्कृत में (देवनागरी में), अध्याय और श्लोक क्रम से दिया गया है। श्लोक-दर-श्लोक पढ़ें; महाभारत परम्परा से इतिहास-श्रवण के रूप में सुना जाता है, धर्म और विवेक हेतु।
मूल पाठ
श्लोक और अर्थ
[व] ततॊ दरॊणे हते राजन दुर्यॊधनमुखा नृपाः भृशम उद्विग्नमनसॊ दरॊणपुत्रम उपागमन
वैशम्पायन ने कहा राजन, द्रोण के मारे जाने पर दुर्योधन आदि राजा अत्यंत व्याकुल मन से द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा के पास आए।
ते दरॊणम उपशॊचन्तः कश्मलाभिहतौजसः पर्युपासन्त शॊकार्तास ततः शारद्वती सुतम
द्रोण के लिए शोक करते हुए और दुःख से बल खोए हुए वे शारद्वती-पुत्र कृप के पास शोकाकुल होकर बैठ गए।
मुहूर्तं ते समाश्वास्य हेतुभिः शास्त्रसंमितैः रात्र्यागमे महीपालाः सवानि वेश्मानि भेजिरे
शास्त्रसम्मत युक्तियों से कुछ देर सांत्वना पाकर रात होने पर सभी राजा अपने-अपने निवास को गए।
विशेषतः सूतपुत्रॊ राजा चैव सुयॊधनः दुःशासनॊ ऽथ शकुनिर न निद्राम उपलेभिरे
विशेष रूप से सूतपुत्र कर्ण, राजा सुयोधन, दुःशासन और शकुनि को नींद नहीं आई।
ते वेश्मस्व अपि कौरव्य पृथ्वीशा नाप्नुवन सुखम चिन्तयन्तः कषयं तीव्रं निद्रां नैवॊपलेभिरे
हे कौरव्य, अपने-अपने महलों में भी वे राजा सुख नहीं पा सके; भीषण विनाश का चिंतन करते हुए उन्हें नींद नहीं आई।
सहितास ते निशायां तु दुर्यॊधन निवेशने अतिप्रचण्डाद विद्वेषात पाण्डवानां महात्मनाम
उस रात दुर्योधन के निवास में एकत्र होकर, महात्मा पांडवों के प्रति तीव्र द्वेष से भरे हुए,
यत तद दयूतपरिक्लिष्टां कृष्णाम आनिन्यिरे सभाम तत समरन्तॊ ऽनवतप्यन्त भृशम उद्विग्नचेतसः
वे यह स्मरण करते हुए कि किस प्रकार द्यूत में पीड़ित द्रौपदी को सभा में घसीट लाए थे, अत्यंत व्याकुल मन से भीतर ही भीतर संतप्त हो रहे थे।
चिन्तयन्तश च पार्थानां तान कलेशान दयूतकारितान कृच्छ्रेण कषणदां राजन निन्युर अब्द शतॊपमाम
पृथापुत्रों को द्यूत से हुए कष्टों का स्मरण करते हुए, हे राजन, उन्होंने वह रात कठिनाई से मानो सौ वर्ष के समान बिताई।
ततः परभाते विमले सथिता दिष्टस्य शासने चक्रुर आवश्यकं सर्वे विधिदृष्टेन कर्मणा
फिर स्वच्छ प्रभात होने पर, विधि के निर्देश में स्थित हो, उन सबने विधिपूर्वक अपने प्रातःकालीन कर्तव्य पूरे किए।
ते कृत्वावश्य कार्याणि समाश्वस्य च भारत यॊगम आज्ञापयाम आसुर युद्धाय च विनिर्ययुः
हे भारत, आवश्यक कार्य पूर्ण कर और सांत्वना पाकर उन्होंने सेना को व्यूह रचने का आदेश दिया और युद्ध के लिए निकल पड़े।
कर्णं सेनापतिं कृत्वा कृतकौतुक मङ्गलाः वाचयित्वा दविजश्रेष्ठान दधि पात्रघृताक्षतैः
कर्ण को सेनापति बनाकर, मंगल कृत्य संपन्न कर, उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मणों से दधि, घृत-पात्र और अक्षत द्वारा आशीर्वाद कहलवाया।
निष्कैर गॊभिर हिरण्येन वासॊभिश च महाधनैः वर्ध्यमाना जयाशीर्भिः सूतमागधबन्दिभिः
उन्हें स्वर्ण-मुद्राओं, गायों, हिरण्य और बहुमूल्य वस्त्रों से सम्मानित किया गया, तथा सूत-मागध और वंदीजन विजय की आशीषें उच्चारते रहे।
तथैव पाण्डवा राजन कृतसर्वाह्णिक करियाः शिबिरान निर्ययू राजन युद्धाय कृतनिश्चयाः
उसी प्रकार, हे राजन, पांडवों ने भी अपने दैनिक कृत्य पूर्ण कर युद्ध का निश्चय करके शिविर से प्रस्थान किया।
ततः परववृते युद्धं तुमुलं रॊमहर्षणम कुरूणां पाण्डवानां च परस्परवधैषिणाम
तब कुरुओं और पांडवों के बीच परस्पर वध की इच्छा से रोमांचकारी तुमुल युद्ध आरंभ हुआ।
तयॊर दवे दिवसे युद्धं कुरुपाण्डवसेनयॊः कर्णे सेनापतौ राजन्न अभूद अद्भुतदर्शनम
हे राजन, कर्ण के सेनापतित्व में कुरु-पांडव सेनाओं के बीच दो दिनों तक अद्भुत दृश्य वाला युद्ध हुआ।
ततः शत्रुक्षयं कृत्वा सुमहान्तं रणे वृषः पश्यतां धार्तराष्ट्राणां फल्गुनेन निपातितः
फिर रणभूमि में शत्रुओं का महान संहार करने के पश्चात वृषभ समान कर्ण को धृतराष्ट्र-पुत्रों के देखते-देखते फल्गुन (अर्जुन) ने गिरा दिया।
ततस तत संजयः सर्वं गत्वा नागाह्वयं पुरम आचख्यौ धृतराष्ट्राय यद्वृत्तं कुरुजाङ्गले
तब संजय हस्तिनापुर नगर जाकर धृतराष्ट्र को कुरुजांगल में जो कुछ घटित हुआ था, वह सब बता आए।
[ज] आपगेयं हतं शरुत्वा दरॊणं च समरे परैः यॊ जगाम पराम आर्तिं वृद्धॊ राजाम्बिका सुतः
जनमेजय ने कहा गंगापुत्र भीष्म और द्रोण के शत्रुओं द्वारा युद्ध में मारे जाने की बात सुनकर, वृद्ध अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र को जो गहरी वेदना हुई—
स शरुत्वा निहतं कर्णं दुर्यॊधनहितैषिणम कथं दविज वरप्राणान अधारयत दुःखितः
दुर्योधन के हितैषी कर्ण के मारे जाने का समाचार सुनकर, हे द्विजश्रेष्ठ, वह दुःखी राजा किस प्रकार अपने प्राणों को टिका सका?
यस्मिञ जयाशां पुत्राणाम अमन्यत स पार्थिवः तस्मिन हते स कौरव्यः कथं पराणान अधारयत
जिस कर्ण में उस राजा ने अपने पुत्रों की विजय की आशा रखी थी, उसके मारे जाने पर वह कौरव किस प्रकार जीवित रह सका?
दुर्मरं बत मन्ये ऽहं नृषां कृच्छ्रे ऽपि वर्तताम यत्र कर्णं हतं शरुत्वा नात्यजज जीवितं नृपः
मैं तो मानता हूँ कि विपत्ति में भी मनुष्य का मरना कठिन ही है, क्योंकि कर्ण की मृत्यु सुनकर भी राजा ने प्राण नहीं त्यागे।
तथा शांतनवं वृद्धं बरह्मन बाह्लिकम एव च दरॊणं च सॊमदत्तं च भूरिश्रवसम एव च
इसी प्रकार वृद्ध शांतनव भीष्म, बाह्लीक, द्रोण, सोमदत्त और भूरिश्रवा की मृत्यु सुनकर भी—
तथैव चान्यान सुहृदः पुत्रपौत्रांश च पातितान शरुत्वा यन नाजहात पराणांस तन मन्ये दुष्करं दविज
तथा अन्य मित्रों, पुत्रों और पौत्रों के गिरने की बात सुनकर भी, हे द्विज, उसका प्राण न त्यागना मैं अत्यंत कठिन मानता हूँ।
एतन मे सर्वम आचक्ष्व विस्तरेण तपॊधन न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश चरितं महत
हे तपोधन, मुझे यह सब विस्तार से बताइए, क्योंकि अपने पूर्वजों का यह महान चरित सुनते हुए भी मेरी तृप्ति नहीं होती।
[व] हते कर्णे महाराज निशि गावल्गणिस तदा दीनॊ ययौ नागपुरम अश्वैर वातसमैर जवे
वैशम्पायन ने कहा हे महाराज, कर्ण के मारे जाने पर गावल्गणि संजय उसी रात दुःखी होकर वायु के समान वेगवाले घोड़ों से हस्तिनापुर की ओर चले।
स हास्तिनपुरं गत्वा भृशम उद्विग्नमानसः जगाम धृतराष्ट्रस्य कषयं परक्षीणबान्धवम
अत्यंत उद्विग्न मन से हस्तिनापुर पहुँचकर वे धृतराष्ट्र के महल में गए, जिनके बांधव अब अत्यंत क्षीण हो चुके थे।
स समुद्वीक्ष्य राजानं कश्मलाभिहतौजसम ववन्दे पराञ्जलिर भूत्वा मूर्ध्ना पादौ नृपस्य ह
राजा को शोक से टूटा हुआ देखकर संजय ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और सिर झुकाकर राजा के चरणों का वंदन किया।
संपूज्य च यथान्यायं धृतराष्ट्रं महीपतिम हा कष्टम इति चॊक्त्वा स ततॊ वचनम आददे
राजा धृतराष्ट्र का यथोचित सम्मान कर उन्होंने 'हाय, यह कैसा कष्ट है!' कहकर फिर बोलना आरंभ किया।
संजयॊ ऽहं कषितिपते कच चिद आस्ते सुखं भवान सवदॊषेणापदं पराप्य कच चिन नाद्य विमुह्यसि
'हे क्षितिपते, मैं संजय हूँ। क्या आप कुशल से हैं? अपने ही दोष से इस विपत्ति को पाकर, कहीं आप अब मोहग्रस्त तो नहीं हैं?'
हितान्य उक्तानि विदुर दरॊण गाङ्गेय केशवैः अगृहीतान्य अनुस्मृत्य कच चिन न कुरुषे वयथाम
'विदुर, द्रोण, भीष्म और कृष्ण के दिए गए हितकर वचनों को, जिन्हें ग्रहण नहीं किया गया, स्मरण कर कहीं आप व्यथित तो नहीं हो रहे?'
राम नारद कण्वैश च हितम उक्तं सभा तले न गृहीतम अनुस्मृत्य कच चिन न कुरुषे वयथाम
'सभा में राम, नारद और कण्व द्वारा कहे गए हितकर वचन, जो स्वीकार नहीं किए गए, स्मरण कर कहीं आप व्यथित तो नहीं हो रहे?'
सुहृदस तवद्धिते युक्तान भीष्मद्रॊणमुखान परैः निहतान युधि संस्मृत्य कच चिन न कुरुषे वयथाम
'आपके हितैषी भीष्म-द्रोण आदि, जो आपके कल्याण में लगे थे, शत्रुओं द्वारा युद्ध में मारे गए—यह स्मरण कर कहीं आप व्यथित तो नहीं हो रहे?'
तम एवं वादिनं राजा सूतपुत्रं कृताञ्जलिम सुदीर्घम अभिनिःश्वस्य दुःखार्त इदम अब्रवीत
इस प्रकार हाथ जोड़कर बोलते हुए सूतपुत्र संजय से राजा ने गहरी सांस लेकर दुःख से पीड़ित होकर यह वचन कहा।
गाङ्गेये निहते शूरे दिव्यास्त्रवति संजय दरॊणे च परमेष्वासे भृशं मे वयथितं मनः
'हे संजय, दिव्यास्त्रधारी शूर गंगेय भीष्म और महान धनुर्धर द्रोण दोनों के मारे जाने से मेरा मन अत्यंत व्यथित है।'
यॊ रथानां सहस्राणि दंशितानां दशैव हि अहन्य अहनि तेजस्वी निजघ्ने वसु संभवः
'जो तेजस्वी वसुसंभव द्रोण प्रतिदिन दस हजार कवचधारी रथों का संहार करते थे—'
स हतॊ यज्ञसेनस्य पुत्रेणेह शिखण्डिना पाण्डवेयाभिगुप्तेन भृशं मे वयथितं मनः
'वही द्रोण यहाँ पांडवों द्वारा संरक्षित यज्ञसेन-पुत्र शिखंडी के हाथों मारे गए; मेरा मन अत्यंत व्यथित है।'
भार्गवः परददौ यस्मै परमास्त्रं महात्मने साक्षाद रामेण यॊ बाल्ये धनुर्वेद उपाकृतः
'जिन्हें महात्मा भार्गव परशुराम ने स्वयं परम अस्त्र प्रदान किया था और जिन्हें बाल्यकाल में साक्षात राम ने धनुर्वेद सिखाया था—'
यस्य परसादात कौन्तेया राजपुत्रा महाबलाः महारथत्वं संप्राप्तास तथान्ये वसुधाधिपाः
'जिनकी कृपा से कुंती के महाबली पुत्र और अन्य राजा महारथी पद को प्राप्त हुए—'
तं दरॊणं निहतं शरुत्वा धृष्टद्युम्नेन संयुगे सत्यसंधं महेष्वासं भृशं मे वयथितं मनः
'उन्हीं सत्यनिष्ठ महाधनुर्धर द्रोण को धृष्टद्युम्न द्वारा युद्ध में मारा गया सुनकर मेरा मन अत्यंत व्यथित है।'
तरैलॊक्ये यस्य शास्त्रेषु न पुमान विद्यते समः तं दरॊणं निहतं शरुत्वा किम अकुर्वत मामकाः
'तीनों लोकों में शस्त्रविद्या में उनके समान कोई पुरुष नहीं था; द्रोण के मारे जाने का समाचार सुनकर मेरे लोगों ने क्या किया?'
संशप्तकानां च बले पाण्डवेन महात्मना धनंजयेन विक्रम्य गमिते यमसादनम
'जब महात्मा पांडव धनंजय ने अपने पराक्रम से संशप्तकों की सेना को यमलोक भेज दिया—'
नारायणास्त्रे निहते दरॊणपुत्रस्य धीमतः हतशेषेष्व अनीकेषु किम अकुर्वत मामकाः
'तथा जब बुद्धिमान द्रोणपुत्र ने नारायणास्त्र से शेष रह गई सेनाओं का संहार किया, तब मेरे लोगों ने क्या किया?'
विप्रद्रुतान अहं मन्ये निमग्नः शॊकसागरे परवमानान हते दरॊणे सन्ननौकान इवार्णवे
'मुझे लगता है द्रोण के गिरने पर मेरी सेना शोकसागर में डूबकर इधर-उधर भाग गई होगी, मानो प्रचंड समुद्र में डूबती नौकाएँ।'
दुर्यॊधनस्य कर्णस्य भॊजस्य कृतवर्मणः मद्रराजस्य शल्यस्य दरौणेश चैव कृपस्य च
'दुर्योधन, कर्ण, भोज, कृतवर्मा, मद्रराज शल्य, द्रोणपुत्र और कृप—'
मत पुत्र शेषस्य तथा तथान्येषां च संजय विप्रकीर्णेष्व अनीकेषु मुखवर्णॊ ऽभवत कथम
'तथा मेरे शेष पुत्रों और अन्य लोगों के मुख का रंग बिखरी हुई सेनाओं में कैसा हो गया था, हे संजय?'
एतत सर्वं यथावृत्तं तत्त्वं गावल्गणे रणे आचक्ष्व पाण्डवेयानां मामकानां च सर्वशः
'हे गावल्गणे, यह सब यथार्थ रूप से रणभूमि में जो हुआ, पांडवों और मेरे लोगों दोनों का, विस्तार से बताइए।'
[स] पाण्डवेयैर हि यद्वृत्तं कौरवेयेषु मारिष तच छरुत्वा मा वयथां कार्षीद इष्टे न वयथते मनः
संजय ने कहा हे माननीय, पांडवों के हाथों कौरवों के साथ जो कुछ हुआ, उसे सुनकर आप व्यथित न हों; जिसकी नियति निश्चित है उसका मन विचलित नहीं होता।
यस्माद अभावी भावी वा भवेद अर्थॊ नरं परति अप्राप्तौ तस्य वा पराप्तौ न कश चिद वयथते बुधः
जिस वस्तु का न होना या होना मनुष्य के लिए निश्चित है, उसकी प्राप्ति या अप्राप्ति पर बुद्धिमान कभी व्यथित नहीं होता।
[धृ] न वयथा शृण्वतः का चिद विद्यते मम संजय दिष्टम एतत पुरा मन्ये कथयस्व यथेच्छकम
धृतराष्ट्र ने कहा हे संजय, सुनते हुए मुझे कोई व्यथा नहीं है; मैं मानता हूँ यह पहले से ही विधाता द्वारा निश्चित था — जैसा उचित लगे, कहिए।
[स] हते दरॊणे महेष्वासे तव पुत्रा महारथाः बभूवुर आश्वस्त मुखा विषण्णा गतचेतसः
संजय ने कहा जब महाधनुर्धर द्रोण मारे गए, तब आपके पुत्र, वे महारथी, मुख से सांत्वना का भाव दिखाते हुए भी मन से विषण्ण और चिंतामग्न हो गए।
अवाङ्मुखाः शस्त्रभृतः सर्व एव विशां पते अप्रेक्षमाणाः शॊकार्ता नाभ्यभाषन परस्परम
हे विशांपते, सभी शस्त्रधारी नीचा मुख किए, शोकाकुल होकर एक-दूसरे की ओर देखे बिना, आपस में कुछ नहीं बोले।
तान दृष्ट्वा वयथिताकारान सैन्यानि तव भारत ऊर्ध्वम एवाभ्यवेक्षन्त दुःखत्रस्तान्य अनेकशः
हे भारत, उन्हें व्यथित देखकर आपकी सेनाएँ भी बार-बार ऊपर की ओर देखने लगीं, वे स्वयं दुःख से व्याकुल थीं।
शस्त्राण्य एषां च राजेन्द्र शॊणिताक्तान्य अशेषतः पराभ्रश्यन्त कराग्रेभ्यॊ दृष्ट्वा दरॊणं निपातितम
हे राजेन्द्र, द्रोण के गिरने को देखकर उनके रक्त से सने हुए शस्त्र उनकी उँगलियों के अग्रभाग से छूटकर गिरने लगे।
तानि बद्धान्य अनिष्टानि लम्बमानानि भारत अदृश्यन्त महाराज नक्षत्राणि यथा दिवि
हे भारत, हे महाराज, वे बंधे हुए और लटकते अशुभ शस्त्र आकाश के नक्षत्रों के समान प्रतीत हो रहे थे।
तथार्तं सतिमितं दृष्ट्वा गतसत्त्वम इव सथितम सवं बलं तन महाराज राजा दुर्यॊधनॊ ऽबरवीत
हे महाराज, अपनी सेना को इस प्रकार शोकाकुल, स्तब्ध और मानो निष्प्राण देखकर राजा दुर्योधन ने उससे कहा।
भवतां बाहुवीर्यं हि समाश्रित्य मया युधि पाण्डवेयाः समाहूता युद्धं चेदं परवर्तितम
'तुम्हारी भुजाओं के पराक्रम का सहारा लेकर ही मैंने पांडवों को युद्ध के लिए ललकारा और यह युद्ध छेड़ा।'
तद इदं निहते दरॊणे विषण्णम इव लक्ष्यते युध्यमानाश च समरे यॊधा वध्यन्ति सर्वतः
'अब द्रोण के गिरने पर यह सेना विषण्ण-सी दिखाई दे रही है; परंतु युद्ध में लड़ने वाले योद्धा तो सब ओर से मारे ही जाते हैं।'
जयॊ वापि वधॊ वापि युध्यमानस्य संयुगे भवेत किम अत्र चित्रं वै युध्यध्वं सर्वतॊ मुखाः
'युद्ध में लड़ने वाले के लिए विजय हो या वध, इसमें आश्चर्य ही क्या है? सब दिशाओं की ओर मुख करके लड़ो!'
पश्यध्वं च महात्मानं कर्णं वैकर्तनं युधि परचरन्तं महेष्वासं दिव्यैर अस्त्रैर महाबलम
'रणभूमि में दिव्यास्त्रों से युक्त महाबली महाधनुर्धर वैकर्तन कर्ण को देखो, जो विचरण कर रहे हैं।'
यस्य वै युधि संत्रासात कुन्तीपुत्रॊ धनंजयः निवर्तते सदामर्षात सिंहात कषुद्रमृगॊ यथा
'जिनके भय से युद्ध में कुंतीपुत्र धनंजय क्रोध होते हुए भी पीछे हट जाते हैं—मानो सिंह से छोटा मृग।'
येन नागायुत पराणॊ भीमसेनॊ महाबलः मानुषेणैव युद्धेन ताम अवस्थां परवेशितः
'जिन्होंने दस हजार हाथियों के बल वाले महाबली भीमसेन को साधारण मानवीय युद्ध में ही उस दशा में पहुँचा दिया।'
येन दिव्यास्त्रविच छूरॊ मायावी स घटॊत्कचः अमॊघया रणे शक्त्या निहतॊ भैरवं नदन
'जिन्होंने दिव्यास्त्रविद् वीर मायावी घटोत्कच को भीषण गर्जना करते हुए भी अमोघ शक्ति से युद्ध में मार गिराया।'
तस्य दुष्पार वीर्यस्य सत्यसंधस्य धीमतः बाह्वॊर दरविणम अक्षय्यम अद्य दरक्ष्यथ संयुगे
'आज युद्ध में उस दुष्पार पराक्रमी, सत्यप्रतिज्ञ, बुद्धिमान कर्ण की भुजाओं का अक्षय बल तुम देखोगे।'
दरॊणपुत्रस्य विक्रान्तं राधेयस्यैव चॊभयॊः पाण्डुपाञ्चाल सैन्येषु दरक्ष्यथापि महात्मनॊः
'द्रोणपुत्र और राधेय कर्ण, इन दोनों महात्माओं का पराक्रम भी तुम पांडु-पांचाल सेनाओं में देखोगे।'
सर्व एव भवन्तश च शूराः पराज्ञाः कुलॊद्गताः शीलवन्तः कृतास्त्राश च दरक्ष्यथाद्य परस्परम
'तुम सब शूरवीर, प्राज्ञ, कुलीन, शीलवान और अस्त्रकुशल हो; आज तुम एक-दूसरे का पराक्रम देखोगे।'
एवम उक्ते महाराज कर्णॊ वैकर्तनॊ नृपः सिंहनादं विनद्यॊच्चैः परायुध्यत महाबलः
हे महाराज, दुर्योधन के ऐसा कहने पर राजा वैकर्तन कर्ण ने ऊँचे स्वर में सिंहनाद करते हुए महाबल से युद्ध किया।
स सृञ्जयानां सर्वेषां पाञ्चालानां च पश्यताम केकयानां विदेहानाम अकरॊत कदनं महत
सभी सृंजयों, पांचालों, केकयों और विदेहवासियों के देखते-देखते उन्होंने उनका भारी संहार किया।
तस्येषु धाराः शतशः परादुरासञ शरासनात अग्रे पुङ्खे च संसक्ता यथा भरमरपङ्क्तयः
उनके धनुष से सैकड़ों बाणों की धाराएँ, अग्रभाग और पुंख से जुड़ी हुई, भ्रमरों की पंक्तियों के समान निकल पड़ीं।
स पीडयित्वा पाञ्चालान पाण्डवांश च तरस्विनः हत्वा सहस्रशॊ यॊधान अर्जुनेन निपातितः
वेगवान पांचालों और पांडवों को पीड़ित कर तथा सहस्रों योद्धाओं को मारकर अंततः कर्ण अर्जुन द्वारा गिरा दिए गए।
[वै] एतच छरुत्वा महाराज धृतराष्ट्रॊ ऽमबिका सुतः शॊकस्यान्तम अपश्यन वै हतं मत्वा सुयॊधनम विह्वलः पतितॊ भूमौ नष्टचेता इव दविपः
वैशम्पायन ने कहा हे महाराज, यह सुनकर अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्र शोक का अंत न देखकर, सुयोधन को मरा हुआ मानकर, मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े, मानो चेतनाहीन हाथी।
तस्मिन निपतिते भूमौ विह्वले राजसत्तमे आर्तनादॊ महान आसीत सत्रीणां भरतसत्तम
हे भरतश्रेष्ठ, उस श्रेष्ठ राजा के मूर्च्छित होकर भूमि पर गिरने पर स्त्रियों का महान आर्तनाद गूँज उठा।
स शब्दः पृथिवीं सर्वां पूरयाम आस सर्वशः शॊकार्णवे महाघॊरे निमग्ना भरत सत्रियः
वह ध्वनि सारी पृथ्वी को चारों ओर से भर गई; भरतवंश की स्त्रियाँ महाभयंकर शोकसागर में डूब गईं।
राजानं च समासाद्य गान्धारी भरतर्षभ निःसंज्ञा पतिता भूमौ सर्वाण्य अन्तःपुराणि च
हे भरतर्षभ, राजा के पास पहुँचकर गांधारी सहित अंतःपुर की सभी स्त्रियाँ बेसुध होकर भूमि पर गिर पड़ीं।
ततस ताः संजयॊ राजन समाश्वासयद आतुराः मुह्यमानाः सुबहुशॊ मुञ्चन्त्यॊ वारि नेत्रजम
हे राजन, तब संजय ने उन दुःखी स्त्रियों को सांत्वना दी, जो बार-बार मूर्च्छित होकर अश्रुधारा बहा रही थीं।
समाश्वस्ताः सत्रियस तास तु वेपमाना मुहुर मुहुः कदल्य इव वातेन धूयमानाः समन्ततः
सांत्वना पाकर भी वे स्त्रियाँ बार-बार काँप रही थीं, मानो चारों ओर से वायु से हिलते केले के वृक्ष।
राजानं विदुरश चापि परज्ञा चक्षुषम ईश्वरम आश्वासयाम आस तदा सिञ्चंस तॊयेन कौरवम
तब विदुर ने भी प्रज्ञाचक्षु राजा को जल से सींचते हुए सांत्वना दी।
स लब्ध्वा शनकैः संज्ञां ताश च दृष्ट्वा सत्रियॊ नृप उन्मत्त इव राजा स सथितस तूष्णीं विशां पते
हे नृप, धीरे-धीरे चेतना पाकर और उन स्त्रियों को देखकर राजा उन्मत्त के समान चुपचाप बैठे रहे, हे विशांपते।
ततॊ धयात्वा चिरं कालं निःश्वसंश च पुनः पुनः सवान पुत्रान गर्हयाम आस बहु मेने च पाण्डवान
फिर बहुत देर तक विचार करते हुए, बार-बार निःश्वास लेते हुए, उन्होंने अपने पुत्रों को दोष दिया और पांडवों की बहुत प्रशंसा की।
गर्हयित्वात्मनॊ बुद्धिं शकुनेः सौबलस्य च धयात्वा च सुचिरं कालं वेपमानॊ मुहुर मुहुः
अपनी बुद्धि और सुबल-पुत्र शकुनि को दोष देते हुए, बहुत देर तक विचारमग्न रहकर, बार-बार काँपते हुए,
संस्तभ्य च मनॊ भूयॊ राजा धैर्यसमन्वितः पुनर गावल्गणिं सूतं पर्यपृच्छत संजयम
फिर मन को संयत कर, धैर्यशाली राजा ने पुनः गावल्गणि संजय से प्रश्न किया।
यत तवया कथितं वाक्यं शरुतं संजय तन मया कच चिद दुर्यॊधनः सूत न गतॊ वै यमक्षयम बरूहि संजय तत्त्वेन पुनर उक्तां कथाम इमाम
एवम उक्तॊ ऽबरवीत सूतॊ राजानं जनमेजय हतॊ वैकर्तनॊ राजन सह पुत्रैर महारथैः भरातृभिश च महेष्वासैः सूतपुत्रैस तनुत्यजैः
दुःशासनश च निहतः पाण्डवेन यशस्विना पीतं च रुधिरं कॊपाद भीमसेनेन संयुगे
[वै] एतच छरुत्वा महाराज धृतराष्ट्रॊ ऽमबिका सुतः अब्रवीत संजयं सूतं शॊकव्याकुल चेतनः
दुष्प्रणीतेन मे तात मनसाभिप्लुतात्मनः हतं वैकर्तनं शरुत्वा शॊकॊ मर्माणि कृन्तति
कृतास्त्र परमाः शल्ये दुःखपारं तितीर्षवः कुरूणां सृञ्जयानां च के नु जीवन्ति के मृताः
[स] हतः शांतनवॊ राजन दुराधर्षः परतापवान हत्वा पाण्डव यॊधानाम अर्बुदं दशभिर दिनैः
ततॊ दरॊणॊ महेष्वासः पाञ्चालानां रथव्रजान निहत्य युधि दुर्धर्षः पश्चाद रुक्मरथॊ हतः
हतशिष्टस्य भीष्मेण दरॊणेन च महात्मना अर्धं निहत्य सैन्यस्य कर्णॊ वैकर्तनॊ हतः
विविंशतिर महाराज राजपुत्रॊ महाबलः आनर्तयॊधाञ शतशॊ निहत्य निहतॊ रणे
अथ पुत्रॊ विकर्णस ते कषत्रव्रतम अनुस्मरन कषीणवाहायुधः शूरः सथितॊ ऽभिमुखतः परान
घॊररूपान परिक्लेशान दुर्यॊधनकृतान बहून परतिज्ञां समरता चैव भीमसेनेन पातितः
विन्दानुविन्दाव आवन्त्यौ राजपुत्रौ महाबलौ कृत्वा न सुकरं कर्म गतौ वैवस्वतक्षयम
सिन्धुराष्ट्रमुखानीह दश राष्ट्राणि यस्य वै वशे तिष्ठन्ति वीरस्य यः सथितस तव शासने
अक्षौहिणीर दशैकां च निर्जित्य निशितैः शरैः अर्जुनेन हतॊ राजन महावीर्यॊ जयद्रथः
तथा दुर्यॊधन सुतस तरस्वी युद्धदुर्मदः वर्तमानः पितुः शास्त्रे सौभद्रेण निपातितः
तथा दौःशासनिर वीरॊ बाहुशाली रणॊत्कटः दरौपदेयेन विक्रम्य गमितॊ यमसादनम
किरातानाम अधिपतिः सागरानूपवासिनाम देवराजस्य धर्मात्मा परियॊ बहुमतः सखा
भगदत्तॊ महीपालः कषत्रधर्मरतः सदा धनंजयेन विक्रम्य गमितॊ यमसादनम
तथा कौरव दायादः सौमदत्तिर महायशाः हतॊ भूरिश्रवा राजञ शूरः सात्यकिना युधि
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
महाभारत का कर्ण पर्व किस विषय में है?
कर्ण के सेनापतित्व के दो दिन, शल्य उनके सारथि — महाभयंकर द्वन्द्व, और अन्ततः कर्ण एवं अर्जुन का नियति-युद्ध, जिसमें कर्ण का रथ-चक्र धरती में धँस जाता है और वे मारे जाते हैं।
महाभारत क्या है?
महाभारत महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महान संस्कृत इतिहास (महाकाव्य) है, जो कुरुवंश और कुरुक्षेत्र में पाण्डवों तथा कौरवों के युद्ध की कथा कहता है। इसके अठारह पर्वों में श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णुसहस्रनाम और धर्म का विशाल भण्डार है, और यह पंचम वेद के रूप में पूजित है।
अपने नाम से पाठ या सेवा अर्पित करें
शांति और स्पष्टता हेतु अपने नाम-गोत्र में गीता पाठ या सेवा करवाएँ। सेवा बुक करें, या सनातन साहित्य में आगे पढ़ें।








