आश्रमवासिक पर्व के बारे में
धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती तपस्या हेतु वन को प्रस्थान करते हैं; व्यास शोकग्रस्त को नदी से प्रकट हुए दिवंगत योद्धाओं का दर्शन कराते हैं; और तीनों वृद्धजन अन्ततः वनाग्नि में देह त्यागते हैं।
पाठ कैसे करें
आश्रमवासिक पर्व नीचे उसकी मूल संस्कृत में (देवनागरी में), अध्याय और श्लोक क्रम से दिया गया है। श्लोक-दर-श्लोक पढ़ें; महाभारत परम्परा से इतिहास-श्रवण के रूप में सुना जाता है, धर्म और विवेक हेतु।
मूल पाठ
श्लोक और अर्थ
[ज] पराप्य राज्यं महाभागाः पाण्डवा मे पितामहाः कथम आसन महाराजे धृतराष्ट्रे महात्मनि
जनमेजय ने पूछा कि राज्य पुनः प्राप्त करने के बाद मेरे महाभाग पितामह पांडव महाराज धृतराष्ट्र के साथ किस प्रकार रहे।
स हि राजा हतामात्यॊ हतपुत्रॊ नराश्रयः कथम आसीद धतैश्वर्यॊ गान्धारी च यशस्विनी
जिसके मंत्री और पुत्र मारे जा चुके थे और जो अब दूसरों पर आश्रित था, वह राजा तथा यशस्विनी गांधारी अपने वैभव के नष्ट हो जाने पर कैसे रहे।
कियन्तं चैव कालं ते पितरॊ मम पूर्वकाः सथिता राज्ये महात्मानस तन मे वयाख्यातुम अर्हसि
मेरे महात्मा पूर्वज पांडव कितने समय तक राज्य में स्थित रहे, यह मुझे बताने की कृपा करें।
[वै] पराप्य राज्यं महात्मानः पाण्डवा हतशत्रवः धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य पृथिवीं पर्यपालयन
वैशम्पायन ने कहा कि शत्रुओं का नाश कर राज्य प्राप्त करने के बाद महात्मा पांडवों ने धृतराष्ट्र को आगे रखकर पृथ्वी का पालन किया।
धृतराष्ट्रम उपातिष्ठद विदुरः संजयस तथा युयुत्सुश चापि मेधावी वैश्यापुत्रः स कौरवः
विदुर, संजय तथा वैश्यापुत्र कौरव मेधावी युयुत्सु — ये सब धृतराष्ट्र की सेवा में उपस्थित रहते थे।
पाण्डवः सर्वकार्याणि संपृच्छन्ति सम तं नृपम चक्रुस तेनाभ्यनुज्ञाता वर्षाणि दश पञ्च च
पांडव सब कार्यों में उस राजा से पूछते थे और उसकी अनुमति से पंद्रह वर्षों तक कार्य करते रहे।
सदा हि गत्वा ते वीराः पर्युपासन्त तं नृपम पादाभिवन्दनं कृत्वा धर्मराज मते सथिताः ते मूर्ध्नि समुपाघ्राताः सर्वकार्याणि चक्रिरे
वे वीर सदा जाकर धर्मराज की आज्ञा से राजा की सेवा में उपस्थित होते, चरणवंदन करते और वह उनके मस्तक को सूँघकर आशीर्वाद देता, इस प्रकार वे सब कार्य करते थे।
कुन्तिभॊजसुता चैव गन्धारीम अन्ववर्तत दरौपदी च सुभद्रा च याश चान्याः पाण्डव सत्रियः समां वृत्तिम अवर्तन्त तयॊः शवश्रॊर यथाविधि
कुंती गांधारी की सेवा करती थी, और द्रौपदी, सुभद्रा तथा अन्य पांडव-पत्नियाँ अपनी दोनों सासों के प्रति विधिपूर्वक समान वृत्ति रखती थीं।
शयनानि महार्हाणि वासांस्य आभरणानि च राजार्हाणि च सर्वाणि भक्ष्यभॊज्यान्य अनेकशः युधिष्ठिरॊ महाराज धृतराष्ट्रे ऽभयुपाहरत
हे महाराज, युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र के लिए बहुमूल्य शय्याएँ, वस्त्र, आभूषण तथा राजा के योग्य अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थ भेंट किए।
तथैव कुन्ती गान्धार्यां गुरुवृत्तिम अवर्तत विदुरः संजयश चैव युयुत्सुश चैव कौरवः उपासते सम तं वृद्धं हतपुत्रं जनाधिपम
इसी प्रकार कुंती गांधारी की गुरुजनोचित सेवा करती थी, और विदुर, संजय तथा कौरव युयुत्सु उस वृद्ध, पुत्रहीन राजा की सेवा में लगे रहते थे।
सयालॊ दरुणस्य यश चैकॊ दयितॊ बराह्मणॊ महान स च तस्मिन महेष्वासः कृपः समभवत तदा
द्रोण के प्रिय साले और महान ब्राह्मण, महाधनुर्धर कृपाचार्य भी उस समय राजा के साथ थे।
वयासस्य भगवान नित्यं वासं चक्रे नृपेण ह कथाः कुर्वन पुराणर्षिर देवर्षिनृप रक्षसाम
भगवान व्यास, वह पुरातन ऋषि, सदा राजा के साथ निवास करते हुए देवताओं, ऋषियों, राजाओं और राक्षसों की कथाएँ सुनाते थे।
धर्मयुक्तानि कार्याणि वयवहारान्वितानि च धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातॊ विदुरस तान्य अकारयत
धृतराष्ट्र की अनुमति से विदुर धर्मानुकूल कार्यों और शासन-व्यवहार का संचालन करते थे।
सामन्तेभ्यः परियाण्य अस्य कार्याणि सुगुरूण्य अपि पराप्यन्ते ऽरथैः सुलघुभिः परभावाद विदुरस्य वै
विदुर के प्रभाव से सामंतों से अनुकूल और कठिन कार्य भी बहुत थोड़े व्यय से सिद्ध हो जाते थे।
अकरॊद बन्धमॊक्षांश च वध्यानां मॊक्षणं तथा न च धर्मात्मजॊ राजा कदा चित किं चिद अब्रवीत
उन्होंने बंदियों को मुक्त कराया तथा वध्य पुरुषों को भी छुड़ाया, और धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर ने कभी इस पर कुछ नहीं कहा।
विहारयात्रासु पुनः कुरुराजॊ युधिष्ठिरः सर्वान कामान महातेजाः परददाव अम्बिका सुते
विहार-यात्राओं में महातेजस्वी कुरुराज युधिष्ठिर अंबिकापुत्र धृतराष्ट्र की सभी इच्छाएँ पूर्ण करते थे।
आरालिकाः सूपकारा रागखाण्डविकास तथा उपातिष्ठन्त राजानं धृतराष्ट्रं यथा पुरा
रसोइए और मिष्ठान्न बनाने वाले राजा धृतराष्ट्र की सेवा में पहले की भाँति उपस्थित रहते थे।
वासांसि च महार्हाणि माल्यानि विविधानि च उपाजह्रुर यथान्यायं धृतराष्ट्रस्य पाण्डवाः
पांडवों ने विधिपूर्वक धृतराष्ट्र को बहुमूल्य वस्त्र तथा विविध प्रकार की मालाएँ भेंट कीं।
मैरेयं मधु मांसानि पानकानि लघूनि च चित्रान भक्ष्यविकारांश च चक्रुर अस्य यथा पुरा
पहले की भाँति वे उसके लिए मैरेय, मधु, मांस, हल्के पेय पदार्थ तथा नाना प्रकार के व्यंजन उपलब्ध कराते थे।
ये चापि पृथिवीपालाः समाजग्मुः समन्ततः उपातिष्ठन्त ते सर्वे कौरवेन्द्रं यथा पुरा
चारों ओर से आए हुए सभी राजा भी पहले की भाँति कुरुराज की सेवा में उपस्थित होते थे।
कुन्ती च दरौपदी चैव सात्वती चैव भामिनी उलूपी नागकन्या च देवी चित्र अङ्गदा तथा
कुंती, द्रौपदी, सुंदरी सात्वती, नागकन्या उलूपी तथा देवी चित्रांगदा — सब उसकी सेवा करती थीं।
धृष्टकेतॊश च भगिनी जरा सन्धस्य चात्मजा किंकराः समॊपतिष्ठन्ति सर्वाः सुबलजां तथा
धृष्टकेतु की बहन, जरासंध की पुत्री तथा सुबलजा (गांधारी) की सभी दासियाँ भी उसकी सेवा में रहती थीं।
यथा पुत्र वियुक्तॊ ऽयं न किं चिद दुःखम आप्नुयात इति राजन वशाद भरातॄन नित्यम एव युधिष्ठिरः
हे राजन, युधिष्ठिर अपने भाइयों को सदा अपने वश में रखते थे ताकि पुत्रवियुक्त धृतराष्ट्र को कोई दुःख न पहुँचे।
एवं ते धर्मराजस्य शरुत्वा वचनम अर्थवत सविशेषम अवर्तन्त भीमम एकं विना तदा
धर्मराज की सार्थक बात सुनकर सब भाई विशेष आदर से उसकी सेवा करते थे, केवल भीम को छोड़कर।
न हि तत तस्य वीरस्य हृदयाद अपसर्पति धृतराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर यद्वृत्तं दयूतकारितम
क्योंकि उस वीर भीम के हृदय से दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र द्वारा कराए गए द्यूत-कांड की स्मृति कभी नहीं मिटती थी।
[वै] एवं संपूजितॊ राजा पाण्डवैर अम्बिका सुतः विजहार यथापूर्वम ऋषिभिः पर्युपासितः
वैशम्पायन ने कहा कि इस प्रकार पांडवों द्वारा सम्मानित राजा अंबिकापुत्र धृतराष्ट्र ऋषियों से घिरे रहकर पूर्ववत् समय बिताते थे।
बरह्म देयाग्र हारांश च परददौ स कुरूद्वहः तच च कुन्तीसुतॊ राजा सर्वम एवान्वमॊदत
कुरुवंशी राजा ने ब्राह्मणों को भूमिदान और अग्रहार दिए, और कुंतीपुत्र युधिष्ठिर ने इस सबका अनुमोदन किया।
आनृशंस्य परॊ राजा परीयमाणॊ युधिष्ठिरः उवाच स तदा भरातॄन अमात्यांश च महीपतिः
अत्यंत दयालु और प्रसन्न राजा युधिष्ठिर ने तब अपने भाइयों और मंत्रियों से कहा।
मया चैव भवद्भिश च मान्य एष नराधिपः निदेशे धृतराष्ट्रस्य यः सथास्यति स मे सुहृत विपरीतश च मे शत्रुर निरस्यश च भवेन नरः
उन्होंने कहा कि यह राजा मेरे और आप सबके द्वारा सम्मानित होने योग्य है; जो धृतराष्ट्र की आज्ञा में स्थित रहेगा वह मेरा मित्र है, और जो इसके विपरीत करेगा वह मेरा शत्रु और त्याज्य है।
परिदृष्टेषु चाहःसु पुत्राणां शराद्धकर्मणि ददातु राजा सर्वेषां यावद अस्य चिकीर्षितम
पुत्रों के श्राद्ध-कर्म के निश्चित दिनों में राजा जितना चाहें उतना सबको दान दें।
ततः स राजा कौरव्यॊ धृतराष्ट्रॊ महामनाः बराह्मणेभ्यॊ महार्हेभ्यॊ ददौ वित्तान्य अनेकशः
तब महामना कौरव राजा धृतराष्ट्र ने योग्य और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बहुत सा धन दिया।
धर्मराजश च भीमश च सव्यसाची यमाव अपि तत सर्वम अन्ववर्तन्त धृतराष्ट्र वयपेक्षया
धर्मराज, भीम, अर्जुन तथा दोनों जुड़वाँ भाई — सबने धृतराष्ट्र के प्रति सम्मान से यह सब अनुमोदित किया।
कथं नु राजा वृद्धः सन पुत्रशॊकसमाहतः शॊकम अस्मत कृतं पराप्य न मरियेतेति चिन्त्यते
वे चिंतित रहते थे कि कहीं पुत्रशोक से पीड़ित वृद्ध राजा उनके कारण हुए शोक से मृत्यु को प्राप्त न हो जाए।
यावद धि कुरुमुख्यस्य जीवत पुत्रस्य वै सुखम बभूव तद अवाप्नॊतु भॊगांश चेति वयवस्थिताः
उन्होंने निश्चय किया कि कुरुमुख्य को अपने पुत्र के जीवित रहते जो सुख प्राप्त था, वही सुख-भोग अब भी उसे मिलता रहे।
ततस ते सहिताः सर्वे भरातरः पञ्च पाण्डवाः तथा शीलाः समातस्थुर धृतराष्ट्रस्य शासने
इस प्रकार पाँचों पांडव भाई एकसाथ, समान स्वभाव से, धृतराष्ट्र के अनुशासन में रहते थे।
धृतराष्ट्रश च तान वीरान विनीतान विनये सथितान शिष्यवृत्तौ सथितान नित्यं गुरुवत पर्यपश्यत
और धृतराष्ट्र सदा उन विनम्र, विनय में स्थित वीरों को गुरु के प्रति समर्पित शिष्यों की भाँति देखते थे।
गान्धारी चैव पुत्राणां विविधैः शराद्धकर्मभिः आनृष्यम अगमत कामान विप्रेभ्यः परतिपाद्य वै
गांधारी ने ब्राह्मणों को दान देकर पुत्रों के विविध श्राद्ध-कर्मों द्वारा ऋण से मुक्त होकर अपनी इच्छाएँ पूर्ण कीं।
एवं धर्मभृतां शरेष्ठॊ धर्मराजॊ युधिष्ठिरः भरातृभिः सहितॊ धीमान पूजयाम आस तं नृपम
इस प्रकार धर्मरक्षकों में श्रेष्ठ बुद्धिमान युधिष्ठिर ने अपने भाइयों सहित उस राजा का सम्मान किया।
[वै] स राजा सुमहातेजा वृद्धः कुरुकुलॊद्वहः नापश्यत तदा किं चिद अप्रियं पाण्डुनन्दने
वैशम्पायन ने कहा कि वह महातेजस्वी, वृद्ध कुरुकुल-श्रेष्ठ राजा पांडु के पुत्रों से कोई अप्रिय बात कभी नहीं देखता था।
वर्तमानेषु सद्वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु परीतिमान अभवद राजा धृतराष्ट्रॊ ऽमबिका सुतः
महात्मा पांडवों की इस उत्तम वृत्ति को देखकर अंबिकापुत्र राजा धृतराष्ट्र प्रेम से भर गए।
सौबलेयी च गान्धारी पुत्रशॊकम अपास्य तम सदैव परीतिम अत्यासीत तनयेषु निजेष्व इव
सुबलपुत्री गांधारी अपने पुत्रों के शोक को त्यागकर पांडवों के प्रति सदा वैसा ही स्नेह रखती थीं मानो वे उनके अपने पुत्र हों।
परियाण्य एव तु कौरव्यॊ नाप्रियाणि कुरूद्वह वैचित्रवीर्ये नृपतौ समाचरति नित्यदा
कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर विचित्रवीर्य के पुत्र धृतराष्ट्र के प्रति सदा प्रिय कार्य ही करते थे, अप्रिय कभी नहीं।
यद यद बरूते च किं चित सा धृतराष्ट्रॊ नराधिपः गुरु वा लघु वा कार्यं गान्धारी च यशस्विनी
हे महाराज, धृतराष्ट्र या यशस्विनी गांधारी जो भी माँगते, चाहे वह बड़ा कार्य हो या छोटा—
तत स राजा महाराज पाण्ण्डवानां धुरंधरः पूजयित्वा वचस तत तद अकार्षीत परवीरहा
पांडवों में श्रेष्ठ, शत्रुवीरनाशक राजा उस वचन का सम्मान कर उसे पूरा करते थे।
तेन तस्याभवत परीतॊ वृत्तेन स नराधिपः अन्वतप्यच च संस्मृत्य पुत्रं मन्दम अचेतसम
इस आचरण से प्रसन्न राजा को अपने मंदमति, अचेत पुत्र का स्मरण होते ही पश्चाताप भी होता था।
सदा च परातर उत्थाय कृतजप्यः शुचिर नृपः आशास्ते पाण्डुपुत्राणां समरेष्व अपराजयम
प्रतिदिन प्रातः उठकर जप करके वह पवित्र राजा पांडु-पुत्रों की युद्धों में विजय की कामना करते थे।
बराह्मणान वाचयित्वा च हुत्वा चैव हुताशनम आयुष्यं पाण्डुपुत्राणाम आशास्ते स नराधिपः
ब्राह्मणों से पाठ करवाकर और अग्नि में हवन कर राजा पांडु-पुत्रों की दीर्घायु की कामना करते थे।
न तां परीतिं मराम आप पुत्रेभ्यः स महीपतिः यां परीतिं पाण्डुपुत्रेभ्यः समवाप तदा नृपः
राजा को अपने पुत्रों के प्रति भी उतनी प्रीति नहीं थी जितनी वह तब पांडु-पुत्रों के प्रति अनुभव करते थे।
बराह्मणानां च वृद्धानां कषत्रियाणां च भारत तथा विट शूद्र संघानाम अभवत सुप्रियस तदा
हे भारत, वह तब वृद्ध ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्य-शूद्र समुदायों को भी अत्यंत प्रिय हो गए।
यच च किं चित पुरा पापं धृतराष्ट्र सुतैः कृतम अकृत्वा हृदि तद राजा तं नृपं सॊ ऽनववर्तत
धृतराष्ट्र के पुत्रों ने पहले जो भी पाप किए थे, राजा ने उन्हें हृदय से निकालकर उनका स्मरण करना छोड़ दिया।
यश च कश चिन नरः किं चिद अप्रियं चाम्बिका सुते कुरुते दवेष्यताम एति स कौन्तेयस्य धीमतः
जो कोई भी अंबिकापुत्र धृतराष्ट्र के प्रति अप्रिय आचरण करता, वह बुद्धिमान कुंतीपुत्र युधिष्ठिर की घृणा का पात्र बनता था।
न राज्ञॊ धृतराष्ट्रस्य न च दुर्यॊधनस्य वै उवाच दुष्कृतं किं चिद युधिष्ठिर भयान नरः
युधिष्ठिर के भय से कोई भी राजा धृतराष्ट्र या दुर्योधन के विषय में कोई बुरी बात नहीं कहता था।
धृत्या तुष्टॊ नरेन्द्रस्य गान्धारी विदुरस तथा शौचेन चाजात शत्रॊर न तु भीमस्य शत्रुहन
राजा युधिष्ठिर की धृति, गांधारी और विदुर की पवित्रता तथा युधिष्ठिर की निर्दोषता से प्रसन्न थे, परंतु शत्रुहंता भीम से नहीं।
अन्ववर्तत भीमॊ ऽपि निष्टनन धर्मजं नृपम धृतराष्ट्रं च संप्रेक्ष्य सदा भवति दुर्मनाः
भीम भी बार-बार आह भरते हुए धर्मपुत्र राजा का अनुसरण करते थे, परंतु धृतराष्ट्र को देखकर उनका मन सदा उदास हो जाता था।
राजानम अनुवर्तन्तं धर्मपुत्रं महामतिम अन्ववर्तत कौरव्यॊ हृदयेन पराङ्मुखः
कौरव भीम राजा की सेवा करते हुए महामति धर्मपुत्र का अनुसरण करते थे, किंतु उनका हृदय धृतराष्ट्र से विमुख ही रहता था।
[वै] युधिष्ठिरस्य नृपतेर दुर्यॊधन पितुस तथा नान्तरं ददृशू राजन पुरुषाः परणयं परति
वैशम्पायन ने कहा कि हे राजन, लोगों को राजा युधिष्ठिर और दुर्योधन के पिता के प्रति स्नेह में कभी कोई भेद दिखाई नहीं देता था।
यदा तु कौरवॊ राजा पुत्रं सस्मार बालिशम तदा भीमं हृदा राजन्न अपध्याति स पार्थिवः
परंतु जब कभी कौरव राजा अपने मूर्ख पुत्र को स्मरण करते, हे राजन, तब वह हृदय से भीम के प्रति क्षुब्ध हो उठते थे।
तथैव भीमसेनॊ ऽपि धृतराष्ट्रं जनाधिपम नामर्षयत राजेन्द्र सदैवातुष्टवद धृदा
इसी प्रकार भीमसेन भी, हे राजेंद्र, राजा धृतराष्ट्र को कभी क्षमा नहीं कर पाते थे और सदा हृदय से असंतुष्ट रहते थे।
अप्रकाशान्य अप्रियाणि चकारास्य वृकॊदरः आज्ञां परत्यहरच चापि कृतकैः पुरुषैः सदा
वृकोदर गुप्त रूप से उसे अप्रिय कार्य करते थे और अपने साधे हुए पुरुषों द्वारा राजा की आज्ञा को भी टाल देते थे।
अथ भीमः सुहृन्मध्ये बाहुशब्दं तथाकरॊत संश्रवे धृतराष्ट्रस्य गान्धार्याश चाप्य अमर्षणः
तब असहनशील भीम अपने मित्रों के बीच अपनी भुजाओं का शब्द इस प्रकार करते थे कि धृतराष्ट्र और गांधारी सुन लें।
समृत्वा दुर्यॊधनं शत्रुं कर्ण दुःशासनाव अपि परॊवाचाथ सुसंरब्धॊ भीमः स परुषं वचः
अपने शत्रु दुर्योधन को कर्ण और दुःशासन सहित स्मरण करके अत्यंत क्रोधित भीम कठोर वचन कहते थे।
अन्धस्य नृपतेः पुत्रा मया परिघबाहुना नीता लॊकम अमुं सर्वे नानाशस्त्रात्त जीविताः
वे कहते थे कि अंधे राजा के सभी पुत्रों को मैंने अपनी परिघ-सी भुजाओं से अनेक शस्त्रों द्वारा प्राणहीन कर उस लोक भेज दिया।
इमौ तौ परिघप्रख्यौ भुजौ मम दुरासदौ ययॊर अन्तरम आसाद्य धार्तराष्ट्राः कषयं गताः
मेरी ये दोनों परिघ जैसी, दुर्जय भुजाएँ ही वे हैं जिनके बीच पड़कर धृतराष्ट्र के पुत्रगण नाश को प्राप्त हुए।
ताव इमौ चन्दनेनाक्तौ वन्दनीयौ च मे भुजौ याभ्यां दुर्यॊधनॊ नीतः कषयं ससुत बान्धवः
मेरी ये चंदन-चर्चित भुजाएँ वंदनीय हैं, क्योंकि इन्हीं से दुर्योधन अपने पुत्रों और बांधवों सहित विनाश को प्राप्त हुआ।
एताश चान्याश च विविधाः शल्य भूता जनाधिपः वृकॊदरस्य ता वाचः शरुत्वा निर्वेदम आगमत
वृकोदर के इन तथा अन्य अनेक बाणों जैसी चुभने वाली बातों को सुनकर राजा अत्यंत उद्विग्न हो जाते थे।
सा च बुद्धिमती देवी कालपर्याय वेदिनी गान्धारी सर्वधर्मज्ञा तान्य अलीकानि शुश्रुवे
और वह बुद्धिमती, कालचक्र की गति जानने वाली, सर्वधर्मज्ञ देवी गांधारी भी उन कटु वचनों को सुनती थीं।
ततः पञ्चदशे वर्षे समतीते नराधिपः राजा निर्वेदम आपेदे भीम वाग बाणपीडितः
फिर पंद्रह वर्ष बीत जाने पर भीम के बाणतुल्य वचनों से पीड़ित राजा अत्यंत उद्विग्न हो गए।
नान्वबुध्यत तद राजा कुन्तीपुत्रॊ युधिष्ठिरः शवेताश्वॊ वाथ कुन्ती वा दरौपदी व यशस्विनी
कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिर को इसका ज्ञान कभी नहीं हुआ, न ही अर्जुन, कुंती अथवा यशस्विनी द्रौपदी को।
माद्रीपुत्रौ च भीमस्य चित्तज्ञाव अन्वमॊदताम राज्ञस तु चित्तं रक्षन्तौ नॊचतुः किं चिद अप्रियम
भीम का मन समझने वाले माद्री के दोनों पुत्र उसका अनुमोदन करते थे, किंतु राजा की भावना की रक्षा करते हुए स्वयं कभी अप्रिय बात नहीं कहते थे।
ततः समानयाम आस धृतराष्ट्रः सुहृज्जनम बाष्पसंदिग्धम अत्यर्थम इदम आह वचॊ भृशम
तब धृतराष्ट्र ने अपने हितैषियों को बुलाया और अश्रुओं से रुँधे स्वर में उनसे यह अत्यंत गंभीर वचन कहा।
[धृ] विदितं भवताम एतद यथावृत्तः कुरु कषयः ममापराधात तत सर्वम इति जञेयं तु कौरवाः
धृतराष्ट्र ने कहा कि आप सब जानते हैं कि कुरुवंश का विनाश किस प्रकार हुआ; हे कौरवो, यह जान लीजिए कि यह सब मेरे ही अपराध से हुआ।
यॊ ऽहं दुष्टमतिं मूढं जञातीनां भयवर्धनम दुर्यॊधनं कौरवाणाम आधिपत्ये ऽभयषेचयम
क्योंकि मैंने ही उस दुष्टबुद्धि, मूढ़, ज्ञातियों के भय को बढ़ाने वाले दुर्योधन को कौरवों का अधिपति बनाया।
यच चाहं वासुदेवस्य वाक्यं नाश्रौषम अर्थवत वध्यतां साध्व अयं पापः सामात्य इति दुर्मतिः
और यह भी मेरी ही दुर्बुद्धि थी कि मैंने वासुदेव के इस सार्थक वचन को नहीं सुना कि इस पापी को उसके सहायकों सहित वध कर देना चाहिए।
पुत्रस्नेहाभिभूतश च हितमुक्तॊ मनीषिभिः विदुरेणाथ भीष्मेण दरॊणेन च कृपेण च
पुत्रस्नेह से अभिभूत मैंने विदुर, भीष्म, द्रोण और कृप द्वारा बार-बार दिए गए हितकारी परामर्श का पालन नहीं किया,
पदे पदे भगवता वयासेन च महात्मना संजयेनाथ गान्धार्या तद इदं तप्यते ऽदय माम
न ही भगवान महात्मा व्यास, संजय अथवा गांधारी के बार-बार दिए गए परामर्श का—और यही आज मुझे संताप दे रहा है।
यच चाहं पाण्डुपुत्रेण गुणवत्सु महात्मसु न दत्तवाञ शरियं दीप्तां पितृपैतामहीम इमाम
और क्योंकि मैंने अपने पितरों और पितामहों से प्राप्त इस देदीप्यमान राजलक्ष्मी को गुणवान महात्मा पांडु-पुत्र को नहीं सौंपा—
विनाशं पश्यमानॊ हि सर्वराज्ञां गदाग्रजः एतच छरेयः स परमम अमन्यत जनार्दनः
सभी राजाओं के विनाश को देखते हुए गदाग्रज जनार्दन ने पांडवों को राज्य सौंपना ही सर्वश्रेष्ठ मानते हुए यह परामर्श दिया था।
सॊ ऽहम एतान्य अलीकानि निवृत्तान्य आत्मनः सदा हृदये शल्य भूतानि धारयामि सहस्रशः
इस प्रकार मैं अपने हृदय में उन हजारों गलतियों को कांटे के समान चुभाए हुए धारण करता हूँ जो अब मेरे पास लौट आई हैं।
विशेषतस तु दह्यामि वर्षं पञ्चदशं हि वै अस्य पापस्य शुद्ध्य अर्थं नियतॊ ऽसमि सुदुर्मतिः
विशेषतः इस पंद्रहवें वर्ष में मैं इस पाप की शुद्धि के लिए नियम पालन करते हुए भी अत्यंत दुर्बुद्धि होकर जलता रहा हूँ।
चतुर्थे नियते काले कदा चिद अपि चाष्टमे तृष्णा विनयनं भुञ्जे गान्धारी वेद तन मम
चौथे दिन और कभी-कभी आठवें दिन भी मैं केवल तृष्णा शांत करने भर जल लेकर भोजन करता हूँ—यह गांधारी को ज्ञात है।
करॊत्य आहारम इति मां सर्वः परिजनः सदा युधिष्ठिर भयाद वेत्ति भृशं तप्यति पाण्डवः
धृतराष्ट्र ने कहा, "मेरे सारे परिजन सदा मेरे लिए भोजन तैयार करते हैं, किंतु मैं युधिष्ठिर के भय से ही उसे खाता हूँ; पांडुपुत्र इससे बहुत दुखी रहता है।"
भूमौ शये जप्यपरॊ दर्भेष्व अजिन संवृतः नियमव्यपदेशेन गान्धारी च यशस्विनी
वह भूमि पर लेटकर जप में लीन रहते, कुश और मृगचर्म से आच्छादित; और यशस्विनी गांधारी भी उसी नियम-व्रत का पालन करती थीं।
हतं पुत्रशतं शूरं संग्रामेष्व अपलायिनम नानुतप्यामि तच चाहं कषत्रधर्मं हि तं विदुः इत्य उक्त्वा धर्मराजानम अभ्यभाषत कौरवः
"मुझे इस बात का शोक नहीं कि युद्ध में कभी न भागने वाले मेरे सौ शूरवीर पुत्र मारे गए, क्योंकि यही तो क्षत्रिय-धर्म माना जाता है," ऐसा कहकर उस कौरव ने धर्मराज से पुनः कहा।
भद्रं ते यादवी मातर वाक्यं चेदं निबॊध मे सुखम अस्म्य उषितः पुत्र तवया सुपरिपालितः
"हे यादवी-पुत्र, तुम्हारा कल्याण हो, मेरी यह बात सुनो — हे पुत्र, तुमने मेरी भली-भाँति सेवा की है और मैं यहाँ सुखपूर्वक रहा हूँ।"
महादानानि दत्तानि शराद्धानि च पुनः पुनः परकृष्टं मे वयः पुत्र पुण्यं चीर्णं यथाबलम गान्धारी हतपुत्रेयं धैर्येणॊदीक्षते च माम
"बहुत बड़े दान दिए गए और बार-बार श्राद्ध किए गए हैं; हे पुत्र, मेरी आयु बहुत आगे बढ़ चुकी है और मैंने अपनी शक्ति भर पुण्य-कर्म किए हैं, और यह पुत्रहीन गांधारी धैर्यपूर्वक मेरी देखभाल कर रही है।"
दरौपद्या हय अपकर्तारस तव चैश्वर्यहारिणः समतीता नृशंसास ते धर्मेण निहता युधि
"जिन क्रूर लोगों ने द्रौपदी का अपकार किया और तुम्हारा राज्य छीना था, वे सब बीत गए, धर्मपूर्वक युद्ध में मारे गए।"
न तेषु परतिकर्तव्यं पश्यामि कुरुनन्दन सर्वे शस्त्रजिताँल लॊकान गतास ते ऽभिमुखं हताः
"हे कुरुनन्दन, अब मुझे उनके विरुद्ध कुछ और करने योग्य नहीं दिखता; वे सब शस्त्र से जीते हुए लोकों को प्राप्त करके सम्मुख युद्ध में मारे गए।"
आत्मनस तु हितं मुख्यं परतिकर्तव्यम अद्य मे गान्धार्याश चैव राजेन्द्र तदनुज्ञातुम अर्हसि
"हे राजेन्द्र, अब मेरे लिए मुख्य कर्तव्य अपना ही हित साधना है; कृपया मुझे और गांधारी को इसकी अनुमति दो।"
तवं हि धर्मभृतां शरेष्ठः सततं धर्मवत्सलः राजा गुरुः पराणभृतां तस्माद एतद बरवीम्य अहम
"तुम धर्मधारियों में श्रेष्ठ हो, सदा धर्मवत्सल हो, समस्त प्राणियों के राजा और गुरु हो — इसीलिए मैं तुमसे यह कहता हूँ।"
अनुज्ञातस तवया वीर संश्रयेयं वनान्य अहम चीरवल्कल भृद राजन गान्धार्या सहितॊ ऽनया तवाशिषः परयुञ्जानॊ भविष्यामि वनेचरः
"हे वीर, तुम्हारी अनुमति से मैं वल्कल और छाल धारण कर, हे राजन, इस गांधारी के साथ वनों की शरण लूँगा, तुम्हारे आशीर्वाद से वनवासी बनकर रहूँगा।"
उचितं नः कुले तात सर्वेषां भरतर्षभ पुत्रेष्व ऐश्वर्यम आधाय वयसॊ ऽनते वनं नृप
"हे तात, हे भरतश्रेष्ठ, हमारे कुल में यह सबके लिए उचित है कि हे राजन, पुत्रों को राज्य सौंपकर जीवन के अंत में वन को जाएँ।"
तत्राहं वायुभक्षॊ वा निराहारॊ ऽपि वा वसन पत्न्या सहानया वीर चरिष्यामि तपः परम
"हे वीर, वहाँ वायु मात्र का आहार करते हुए अथवा बिना आहार के भी, इस पत्नी के साथ मैं परम तपस्या करूँगा।"
तवं चापि फलभाक तात तपसः पार्थिवॊ हय असि फलभाजॊ हि राजानः कल्याणस्येतरस्य वा
"हे तात, तुम भी राजा होने के कारण इस तप के फल के भागी बनोगे, क्योंकि राजा लोग शुभ और अशुभ दोनों के फल में भागीदार होते हैं।"
[य] न मां परीणयते राज्यं तवय्य एवं दुःखिते नृप धिन माम अस्तु सुदुर्बुद्धिं राज्यसक्तं परमादिनम
युधिष्ठिर ने कहा: "हे राजन्, जब तक तुम इस प्रकार दुखी हो, यह राज्य मुझे प्रसन्न नहीं करता; राज्य में आसक्त और प्रमादी, ऐसी दुर्बुद्धि मुझे धिक्कार है।"
यॊ ऽहं भवन्तं दुःखार्तम उपवासकृशं नृप यताहारं कषितिशयं नाविन्दं भरातृभिः सह
"हे राजन्, जब तुम दुःख से पीड़ित, उपवास से कृश, नियमित आहार लेने वाले और भूमि पर सोने वाले थे, तब मैं अपने भाइयों के साथ तुम्हें नहीं ढूँढ़ पाया —"
अहॊ ऽसमि वञ्चितॊ मूढॊ भवता गूढबुद्धिना विश्वासयित्वा पूर्वं मां यद इदं दुःखम अश्नुथाः
"हाय, मैं मूर्ख छला गया हूँ तुम्हारे द्वारा, जिसकी बुद्धि छिपी हुई थी, जिसने पहले मुझे विश्वास दिलाया और फिर यह दुःख सहा।"
किं मे राज्येन भॊगैर वा किं यज्ञैः किं सुखेन वा यस्य मे तवं महीपाल दुःखान्य एतान्य अवाप्तवान
"हे महीपाल, मुझे राज्य से, भोगों से, यज्ञों से या सुख से क्या लाभ, जिसके लिए तुमने ये सारे दुःख सहे हैं?"
पीडितं चापि जानामि राज्यम आत्मानम एव च अनेन वचसा तुभ्यं दुःखितस्य जनेश्वर
"हे जनेश्वर, मैं जानता हूँ कि यह राज्य और मैं स्वयं भी, तुम्हारे प्रति कहे गए इन शब्दों से हुए इस दुःख से पीड़ित हैं।"
भवान पिता भवान माता भवान नः परमॊ गुरुः भवता विप्रहीणा हि कव नु तिष्ठामहे वयम
"तुम ही हमारे पिता हो, तुम ही हमारी माता हो, तुम ही हमारे परम गुरु हो; तुम्हारे बिना हम कहाँ ठहरेंगे?"
औरसॊ भवतः पुत्रॊ युयुत्सुर नृपसत्तम अस्तु राजा महाराज यं चान्यं मन्यते भवान
"हे नृपश्रेष्ठ, तुम्हारा औरस पुत्र युयुत्सु राजा बने, हे महाराज, अथवा जिसे तुम उचित समझो वह बने।"
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
महाभारत का आश्रमवासिक पर्व किस विषय में है?
धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती तपस्या हेतु वन को प्रस्थान करते हैं; व्यास शोकग्रस्त को नदी से प्रकट हुए दिवंगत योद्धाओं का दर्शन कराते हैं; और तीनों वृद्धजन अन्ततः वनाग्नि में देह त्यागते हैं।
महाभारत क्या है?
महाभारत महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महान संस्कृत इतिहास (महाकाव्य) है, जो कुरुवंश और कुरुक्षेत्र में पाण्डवों तथा कौरवों के युद्ध की कथा कहता है। इसके अठारह पर्वों में श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णुसहस्रनाम और धर्म का विशाल भण्डार है, और यह पंचम वेद के रूप में पूजित है।
अपने नाम से पाठ या सेवा अर्पित करें
शांति और स्पष्टता हेतु अपने नाम-गोत्र में गीता पाठ या सेवा करवाएँ। सेवा बुक करें, या सनातन साहित्य में आगे पढ़ें।








