विद्यार्थियों, कलाकारों और ज्ञान के साधकों के लिए सम्पूर्ण सरस्वती चालीसा, अर्थ व लाभ सहित।
वीणा-धारिणी, हंस-वाहिनी चतुर्भुज देवी माँ सरस्वती को विद्या, वाणी, बुद्धि और कला की अधिष्ठात्री माना जाता है। भक्त रामसागर द्वारा रचित सरस्वती चालीसा में माँ द्वारा महान ऋषियों-कवियों को प्रेरणा देने, दुर्गा रूप में धर्म की रक्षा करने और भक्तों के मन से अज्ञान दूर करने की महिमा का वर्णन है।
सम्पूर्ण सरस्वती चालीसा (देवनागरी)
जनक जननि पद कमल रज, निज मस्तक पर धारि। बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥ पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु। रामसागर के पाप को, मातु तुही अब हन्तु॥
जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनासी॥ जय जय जय वीणाकर धारी। करती सदा सुहंस सवारी॥
रूप चतुर्भुजधारी माता। सकल विश्व अन्दर विख्याता॥ जग में पाप बुद्धि जब होती। जबहि धर्म की फीकी ज्योती॥
तबहि मातु ले निज अवतारा। पाप हीन करती महि तारा॥ बाल्मीकि जी थे बहम ग्यानी। तव प्रसाद जानै संसारा॥
रामायण जो रचे बनाई। आदि कवी की पदवी पाई॥ कालिदास जो भये विख्याता। तेरी कृपा दृष्टि से माता॥
तुलसी सूर आदि विद्धाना। भये और जो ज्ञानी नाना॥ तिन्हहिं न और रहेउ अवलम्बा। केवल कृपा आपकी अम्बा॥
करहु कृपा सोइ मातु भवानी। दुखित दीन निज दासहि जानी॥ पुत्र करै अपराध बहूता। तेहि न धरइ चित सुन्दर माता॥
राखु लाज जननी अब मेरी। विनय करूं बहु भांति घनेरी॥ मैं अनाथ तेरी अवलंबा। कृपा करउ जय जय जगदंबा॥
मधु कैटभ जो अति बलवाना। बाहुयुद्ध विष्णू ते ठाना॥ समर हजार पांच में घोरा। फिर भी मुख उनसे नहिं मोरा॥
मातु सहाय भई तेहि काला। बुद्धि विपरीत करी खलहाला॥ तेहि ते मृत्यु भई खल केरी। पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥
चंड मुण्ड जो थे विख्याता। छण महुं संहारेउ तेहि माता॥ रक्तबीज से समरथ पापी। सुर-मुनि हृदय धरा सब कांपी॥
काटेउ सिर जिम कदली खम्बा। बार बार बिनवउं जगदंबा॥ जग प्रसिद्ध जो शुंभ निशुंभा। छिन में बधे ताहि तू अम्बा॥
भरत-मातु बुधि फेरेउ जाई। रामचंद्र बनवास कराई॥ एहि विधि रावन वध तुम कीन्हा। सुर नर मुनि सब कहुं सुख दीन्हा॥
को समरथ तव यश गुन गाना। निगम अनादि अनंत बखाना॥ विष्णु रूद्र अज सकहिं न मारी। जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥
रक्त दन्तिका और शताक्षी। नाम अपार है दानव भक्षी॥ दुर्गम काज धरा पर कीन्हा। दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥
दुर्ग आदि हरनी तू माता। कृपा करहु जब जब सुखदाता॥ नृप कोपित जो मारन चाहै। कानन में घेरे मृग नाहै॥
सागर मध्य पोत के भंगे। अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥ भूत प्रेत बाधा या दुःख में। हो दरिद्र अथवा संकट में॥
नाम जपे मंगल सब होई। संशय इसमें करइ न कोई॥ पुत्रहीन जो आतुर भाई। सबै छांड़ि पूजें एहि माई॥
करै पाठ नित यह चालीसा। होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा॥ धूपादिक नैवेद्य चढावै। संकट रहित अवश्य हो जावै॥
भक्ति मातु की करै हमेशा। निकट न आवै ताहि कलेशा॥ बंदी पाठ करें शत बारा। बंदी पाश दूर हो सारा॥
करहु कृपा भवमुक्ति भवानी। मो कहं दास सदा निज जानी॥
माता सूरज कान्ति तव, अंधकार मम रूप। डूबन ते रक्षा करहु, परूं न मैं भव-कूप॥ बल बुद्धि विद्या देहुं मोहि, सुनहु सरस्वति मातु। अधम रामसागरहिं तुम, आश्रय देउ पुनातु॥
अर्थ
प्रारम्भिक दोहा: भक्त माता-पिता के चरणों की रज को मस्तक पर धारण कर माँ सरस्वती को प्रणाम करता है, बुद्धि-बल की याचना करता है, उनकी अनंत महिमा को स्वीकारते हुए रामसागर के पापों को हरने की प्रार्थना करता है।
चरण 1-5: सरस्वती को समस्त बुद्धि-बल की राशि, सर्वज्ञ, अविनाशी और हंस पर सुशोभित वीणाधारिणी कहकर नमन किया गया है। जब-जब पृथ्वी पर पापबुद्धि फैलती है और धर्म की ज्योति फीकी पड़ती है, तब-तब वे अवतार लेकर संसार को शुद्ध करती हैं — जैसे वाल्मीकि ऋषि को उनकी कृपा से आदि कवि की पदवी प्राप्त हुई और उन्होंने रामायण रची। कालिदास भी उन्हीं की कृपादृष्टि से विख्यात हुए, तथा तुलसी, सूर आदि विद्वान भी केवल उनकी कृपा के सहारे रहे।
चरण 6-9: भक्त स्वयं को अपराधी संतान मानते हुए माँ की करुणा की याचना करता है और अपनी लाज रखने की प्रार्थना करता है। स्मरण किया गया है कि मधु-कैटभ नामक बलशाली दैत्यों ने विष्णु से पाँच हजार वर्षों तक घोर युद्ध किया, तब माँ सरस्वती ने उनकी बुद्धि विपरीत कर उनका वध सम्भव बनाया — यह भक्त की अपनी प्रार्थना का ही उत्तर था।
चरण 10-14: चालीसा में दुर्गा रूप में चंड-मुंड व रक्तबीज के संहार, तथा शुंभ-निशुंभ के वध का वर्णन है, जिनके भय से मुनि भी काँप उठते थे। भरत की माता (कैकेयी) की बुद्धि फेरकर राम को वनवास कराने और अंततः रावण-वध का उल्लेख है, जिससे देव-नर-मुनि सभी सुखी हुए। विष्णु, रुद्र या ब्रह्मा भी उन्हें पराजित नहीं कर सकते जिनकी वे रक्षा करती हैं। रक्तदंतिका व शताक्षी रूप में उन्होंने अनगिनत दानवों का नाश किया, और पृथ्वी पर दुर्गम कार्य करने से उनका नाम दुर्गा पड़ा, जो संसार भर में पूजित है।
चरण 15-19: वे सभी दुर्गम कष्ट हरने वाली हैं — चाहे राजा का क्रोध हो, वन में हिंसक पशु का भय, समुद्र में तूफान से टूटता जहाज़, अथवा भूत-प्रेत, दरिद्रता या संकट। उनका नाम जपने मात्र से मंगल होता है, इसमें संशय नहीं; पुत्रहीन भक्त जो सब त्यागकर उन्हें पूजते हैं, उन्हें सुंदर व गुणवान संतान का सुख मिलता है। नित्य धूप-नैवेद्य सहित चालीसा-पाठ करने वाला संकट-मुक्त हो जाता है; निरंतर भक्ति करने वाले के निकट क्लेश नहीं आता, और सौ बार पाठ करने वाले बंदी भी बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
महत्व एवं लाभ
सरस्वती चालीसा विशेष रूप से विद्यार्थियों, शिक्षकों, लेखकों, संगीतकारों तथा अध्ययन व सृजनात्मक कार्य में संलग्न सभी के लिए अत्यंत प्रिय है। श्रद्धापूर्वक पाठ करने से माना जाता है कि:
परीक्षा, साक्षात्कार अथवा महत्वपूर्ण प्रस्तुति से पूर्व स्मरण-शक्ति, एकाग्रता और अभिव्यक्ति में स्पष्टता आती है।
भ्रम, आत्म-संदेह और मानसिक धुंधलापन दूर होकर स्थिर एकाग्रता आती है।
कला व संगीत साधना में आशीर्वाद मिलता है, क्योंकि सरस्वती वीणा, स्वर और सभी ललित कलाओं की अधिष्ठात्री हैं।
ज्ञान-साधना में विनम्रता व अनुशासन का भाव जगता है, यह स्मरण कराते हुए कि सच्चा ज्ञान कृपा से मिलता है, अहंकार से नहीं।
पाठ विधि व शुभ समय
शुभ दिन: बसंत पंचमी सरस्वती-पूजन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिन है; विद्यार्थी प्रतिदिन, विशेषकर परीक्षा से पूर्व, तथा बुधवार या शुक्रवार प्रातः भी पाठ करते हैं।
शुभ समय: स्नान के पश्चात प्रातःकाल, पूर्व दिशा की ओर मुख करके, शांत अध्ययन अथवा पूजा-स्थल में।
तैयारी: माँ सरस्वती का चित्र या छोटी मूर्ति स्थापित करें, श्वेत या पीले पुष्प और अक्षत अर्पित करें, तथा यथासंभव पुस्तकें, कलम या वाद्य-यंत्र समीप रखें ताकि उन्हें भी आशीर्वाद मिले।
विधि: पूर्ण एकाग्रता से एक या कई बार पाठ करें; विद्यार्थी महत्वपूर्ण परीक्षा से पूर्व 21 या 40 दिनों तक प्रतिदिन पाठ कर सकते हैं, मन शांत रखते हुए, चिंतामुक्त होकर।
अंत में हाथ जोड़कर नमन करें और अपने प्रयास व विद्या को उनकी कृपा को समर्पित करें।
करणीय व अकरणीय बातें
पुस्तकें, कॉपियाँ और अध्ययन-स्थल स्वच्छ व व्यवस्थित रखें — कहा जाता है कि माँ सरस्वती को व्यवस्था प्रिय है।
नित्य पाठ को निरंतर, ईमानदार अध्ययन के साथ जोड़ें; चालीसा प्रयास की सहायक है, विकल्प नहीं।
परीक्षा की घबराहट में जल्दबाज़ी से न पढ़ें, शांत व स्थिर मन से पाठ करें।
यथासंभव उपकरणों की व्यस्तता अथवा शोरगुल वाले वातावरण में पाठ न करें।
इसे बिना वास्तविक तैयारी के सफलता का शॉर्टकट न समझें।
महात्म्य
मान्यता है कि वाल्मीकि, कालिदास, तुलसीदास और सूरदास जैसे महान कवि-विद्वान भी अपनी असाधारण प्रतिभा केवल माँ सरस्वती की कृपा से ही पा सके, केवल अपने प्रयास से नहीं — यह स्मरण कराता है कि सच्ची विद्या विनम्रतापूर्वक ग्रहण करने की वस्तु है। भारत भर में परिवार बसंत पंचमी के दिन बच्चों का अक्षराभ्यास माँ सरस्वती की सरल प्रार्थना के साथ आरंभ कराते हैं, जिसे आजीवन विद्या-आशीर्वाद की परंपरा माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सरस्वती चालीसा किसने रची? परंपरागत स्रोतों के अनुसार इसकी रचना भक्त कवि रामसागर ने की, जिनका नाम समापन दोहे में आता है।
पाठ आरंभ करने के लिए कौन-सा दिन उत्तम है? बसंत पंचमी सर्वाधिक शुभ मानी जाती है, हालाँकि विद्यार्थी सामान्यतः किसी भी बुधवार या परीक्षा से पूर्व भी आरंभ करते हैं।
क्या इसे विद्यार्थियों के अतिरिक्त अन्य लोग भी पढ़ सकते हैं? हाँ। लेखक, संगीतकार, शिक्षक तथा अपने कार्य में स्पष्ट सोच व अभिव्यक्ति चाहने वाला कोई भी व्यक्ति समान श्रद्धा से इसका पाठ कर सकता है।
क्या माला अनिवार्य है? कोई माला अनिवार्य नहीं है। अधिकांश भक्तों के अनुसार प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक एक बार पाठ पर्याप्त है; माला से गिनती करना व्यक्तिगत भक्ति-भाव है।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Saraswati mantra
Om Aim Saraswatyai Namah
Chant before study, writing, music, or any work that needs clarity.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
सरस्वती चालीसा किसने रची?
परंपरागत स्रोतों के अनुसार भक्त कवि रामसागर ने, जिनका नाम समापन दोहे में आता है।
पाठ हेतु कौन-सा दिन उत्तम है?
बसंत पंचमी सर्वाधिक शुभ है, साथ ही बुधवार व परीक्षा से पूर्व का समय भी उपयुक्त है।
क्या विद्यार्थियों के अतिरिक्त अन्य भी पढ़ सकते हैं?
हाँ, लेखक, संगीतकार, शिक्षक व स्पष्टता चाहने वाला कोई भी समान श्रद्धा से पढ़ सकता है।
क्या माला आवश्यक है?
नहीं, प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक एक बार पाठ पर्याप्त है; माला से गिनती व्यक्तिगत भक्ति-भाव है।
पवित्र पूजा द्वारा माँ सरस्वती की कृपा पाएँ
हमारे पंडितजी आपके नाम से संकल्पपूर्वक पारंपरिक सरस्वती पूजा सम्पन्न करेंगे, जो परीक्षा, नई विद्या अथवा कला-आरंभ के लिए उत्तम है।








