लंका काण्ड के बारे में
वानर सेना समुद्र पर सेतु बाँधती है और महायुद्ध आरंभ होता है। रावण के भाई कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाद मारे जाते हैं; अंततः राम ब्रह्मास्त्र से रावण का वध करते हैं। विभीषण लंका के राजा बनते हैं, और अग्नि-परीक्षा में शुद्ध सिद्ध हुई सीता का राम से पुनर्मिलन होता है।
पाठ कैसे करें
लंका काण्ड का पाठ उसकी मूल अवधी में (नीचे देवनागरी में) किया जाता है। धीरे-धीरे, पद-दर-पद पढ़ें; विशेषकर सुंदरकांड का पाठ साहस और रक्षा हेतु किया जाता है।
मूल पाठ
श्लोक और अर्थ
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्। मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्।।1।। शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्। काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम्।।2।। यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्। खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे।।3।।
मैं श्री राम को नमन करता हूँ, जिनकी सेवा शिव भी करते हैं, जो संसार के भय को हरने वाले, काल रूपी मत्त हाथी के लिए सिंह, योगियों के स्वामी, ज्ञान से प्राप्त होने वाले, गुणों के भंडार, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, माया से परे, देवताओं के स्वामी, दुष्टों का वध करने में सदा तत्पर तथा वेदों और मुनियों के एकमात्र देव हैं; मैं उन कमल-सदृश उज्ज्वल, कमलनयन, पृथ्वी के राजा के रूप में प्रकट प्रभु को प्रणाम करता हूँ। मैं शंकर को नमन करता हूँ, जिनका शरीर शंख और चंद्रमा के समान अति सुंदर है, जो व्याघ्रचर्म धारण करते हैं, काल रूपी भयंकर सर्पों को आभूषण बनाते हैं, जिन्हें गंगा और चंद्रमा प्रिय हैं, जो काशी के स्वामी, कलियुग के पापों का नाश करने वाले, कल्याण के कल्पवृक्ष, गिरिजा के पति, गुणों के भंडार और कामदेव के नाशक हैं। जो शंभु सज्जनों को दुर्लभ मोक्ष तक प्रदान करते हैं और दुष्टों को दंड देते हैं, वे शंकर मुझे कल्याण दें।
लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड। भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड।। सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ। अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु।। सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह। नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरिहिं।।
लव, निमेष, परमाणु, युग, वर्ष और कल्प - ये सब प्रचंड काल के बाण हैं; हे मन, तू उन राम को क्यों नहीं भजता जिनका धनुष स्वयं काल है? समुद्र के वचन सुनकर श्री राम ने मंत्रियों को बुलाकर कहा - 'अब विलंब किस बात का? सेतु बनाओ जिससे सेना पार उतर जाए।' जामवंत ने हाथ जोड़कर कहा - 'हे सूर्यवंश के ध्वज, सुनिए; हे नाथ, आपका नाम ही सेतु है जिस पर चढ़कर मनुष्य भवसागर तर जाते हैं।'
यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा।। प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी।। तब रिपु नारी रुदन जल धारा। भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा।। सुनि अति उकुति पवनसुत केरी। हरषे कपि रघुपति तन हेरी।। जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई।। राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं।। बोलि लिए कपि निकर बहोरी। सकल सुनहु बिनती कछु मोरी।। राम चरन पंकज उर धरहू। कौतुक एक भालु कपि करहू।। धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा।। सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा।।
'इस छोटे-से समुद्र को पार करने में कितनी देर?' यह सुनकर हनुमान ने फिर कहा - 'प्रभु का प्रताप भारी बड़वानल है, जिसने पहले तो समुद्र का सारा जल सोख लिया; फिर शत्रुओं की रोती हुई स्त्रियों के आँसुओं की धारा से यह भर गया, इसी से यह खारा हो गया।' हनुमान की यह अति चतुर उक्ति सुनकर वानर प्रभु के मुख को देखकर हर्षित हुए। जामवंत ने नल और नील दोनों भाइयों को बुलाकर सारी बात बताई - 'मन में राम का प्रताप स्मरण कर सेतु बनाओ, इसमें कुछ परिश्रम नहीं है।' फिर उन्होंने वानरों के समूह को बुलाकर कहा - 'सब मेरी एक विनती सुनो; राम के चरणकमल हृदय में धारण करो और भालू-वानर एक कौतुक करो। हे भयंकर वानर-दलो, दौड़ो और पेड़ों तथा पर्वतों के समूह ले आओ।' यह सुनकर वानर और भालू 'रघुवीर के प्रताप की जय' कहते हुए हूह करते हुए चल पड़े।
अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ। आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ।।1।।
वे बहुत ऊँचे पर्वतों और वृक्षों को खेल ही खेल में उठा लेते हैं, और लाकर नल-नील को देते हैं, जो उनसे सेतु बनाते जाते हैं।
सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं।। देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना।। परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी।। करिहउँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना।। सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए।। लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा।। सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।। संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।
वानर विशाल शिलाएँ ला-लाकर देते हैं और नल-नील उन्हें गेंद की भाँति लेते हैं। सेतु की अति सुंदर रचना देखकर कृपानिधान श्री राम हँसकर बोले - 'यह भूमि अत्यंत रमणीय और उत्तम है; इसकी अपार महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता। यहाँ मैं शंभु की स्थापना करूँगा, मेरे हृदय की यही परम कामना है।' यह सुनकर वानरराज सुग्रीव ने बहुत दूत भेजे, जो सब श्रेष्ठ मुनियों को बुला लाए। विधिपूर्वक शिवलिंग की स्थापना और पूजा कर राम बोले - 'शिव के समान मुझे और कोई प्रिय नहीं। जो शिव का द्रोही होकर मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्न में भी मुझे नहीं पाता। जो शंकर से विमुख होकर मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी और अल्पबुद्धि मूर्ख है।'
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास। ते नर करहि कलप भरि धोर नरक महुँ बास।।2।।
'जो शंकर का प्रिय होकर मेरा द्रोही है, और जो शिव का द्रोही होकर मेरा दास कहलाता है, वे मनुष्य कल्प भर घोर नरक में वास करते हैं।'
जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं।। जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि।। होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि।। मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।। राम बचन सब के जिय भाए। मुनिबर निज निज आश्रम आए।। गिरिजा रघुपति कै यह रीती। संतत करहिं प्रनत पर प्रीती।। बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर।। बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई। भए उपल बोहित सम तेई।। महिमा यह न जलधि कइ बरनी। पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी।।
'जो रामेश्वर का दर्शन करेंगे, वे शरीर त्यागकर मेरे लोक को जाएँगे। जो गंगाजल लाकर चढ़ाएगा, वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पाएगा। जो निष्काम होकर, छल त्यागकर शिव की सेवा करेगा, उसे शंकर मेरी भक्ति देंगे। जो मेरे बनाए सेतु का दर्शन करेगा, वह बिना परिश्रम के भवसागर तर जाएगा।' राम के वचन सबके मन को भाए, और श्रेष्ठ मुनि अपने-अपने आश्रम लौट गए। हे गिरिजा, रघुपति की यह रीति है कि वे शरणागत पर सदा प्रेम करते हैं। चतुर नल-नील ने सेतु बाँधा, और राम की कृपा से उनका यश उजागर हो गया। जो पत्थर दूसरों को डुबाते और बोरते हैं, वे ही जहाज के समान (तैरते) हो गए। यह महिमा न समुद्र की है, न पत्थरों के गुण की, और न वानरों की करनी की है।
श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान। ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन।।3।।
श्री रघुवीर के प्रताप से पत्थर समुद्र पर तैर गए। वे ही मंदबुद्धि हैं जो राम को छोड़कर किसी दूसरे स्वामी को भजते हैं।
बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा।। चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जहिं मर्कट भट समुदाई।। सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई। चितव कृपाल सिंधु बहुताई।। देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा। प्रगट भए सब जलचर बृंदा।। मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला।। अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं।। प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे।। तिन्ह की ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी।। चला कटकु प्रभु आयसु पाई। को कहि सक कपि दल बिपुलाई।।
सेतु को अत्यंत दृढ़ बनाकर उसे देखना कृपानिधान प्रभु के मन को भाया। सेना चली, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता; वानर योद्धाओं के समूह गरजने लगे। सेतुबंध के पास चढ़कर रघुराज ने दयालु समुद्र की विशालता को देखा। करुणा के कंद प्रभु को देखने के लिए सब जलचरों के समूह प्रकट हो गए - मगर, घड़ियाल, नाना प्रकार की मछलियाँ और सर्प, जिनके शरीर सौ योजन विशाल थे। ऐसे भी कुछ थे जो इन्हें खा जाते, और कुछ ऐसे जिनसे ये भी डरते। वे प्रभु को देखते रहे, हटाने पर भी नहीं हटते; सब मन में हर्षित और सुखी हो गए। उनकी ओट में जल दिखाई नहीं देता था; वे हरि के रूप को निहारते हुए मग्न हो गए। प्रभु की आज्ञा पाकर सेना चली; वानर-दल की विशालता को कौन कह सकता है?
सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं। अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं।।4।।
सेतुबंध पर बहुत भीड़ हो गई; कुछ वानर आकाश-मार्ग से उड़ जाते हैं, और कुछ जलचरों के ऊपर चढ़-चढ़कर पार जाते हैं।
अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई।। सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा।। सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा।। खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए।। सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी।। खाहिं मधुर फल बटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं।। जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं।। दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना।। जिन्ह कर नासा कान निपाता। तिन्ह रावनहि कही सब बाता।। सुनत श्रवन बारिधि बंधाना। दस मुख बोलि उठा अकुलाना।।
ऐसा कौतुक देखकर दोनों भाई, दयालु रघुराज और लक्ष्मण, हँसते हुए चले। रघुवीर सेना सहित पार उतरे; वानर सेनापतियों की भीड़ कही नहीं जा सकती। समुद्र के पार प्रभु ने डेरा किया और सब वानरों को आज्ञा दी - 'जाकर सुंदर फल-मूल खाओ।' यह सुनते ही भालू-वानर जहाँ-तहाँ दौड़े। सब वृक्ष राम के लिए फल गए, ऋतु-कुऋतु और काल की गति को छोड़कर। वे मीठे फल खाते और पेड़ों को हिलाते, और लंका की ओर पर्वत-शिखर फेंकते हैं। जहाँ कहीं घूमते हुए राक्षस मिलते, उन्हें घेरकर खूब नाच नचाते हैं। दाँतों से उनकी नाक-कान काटकर, और प्रभु का सुयश कहलाकर छोड़ देते हैं। जिनकी नाक-कान काटे गए, उन्होंने रावण को सारी बात कही। समुद्र के बँधने की बात सुनते ही दशमुख रावण घबराकर उठ खड़ा हुआ और बोला।
बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस। सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस।।5।।
रावण अपनी व्याकुलता में समुद्र के अनेक नाम बड़बड़ाने लगा - 'उसने वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, वारीश को बाँध दिया! सचमुच तोयनिधि बँध गया; उदधि, पयोधि, नदीश (समुद्र) काँप रहा है।'
निज बिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी।। मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो।। कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी।। चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा।। नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों।। तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा।। अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत संघारे।। जेहिं बलि बाँधि सहजभुज मारा। सोइ अवतरेउ हरन महि भारा।। तासु बिरोध न कीजिअ नाथा। काल करम जिव जाकें हाथा।।
अपनी व्याकुलता पर विचार कर रावण भय को छिपाकर हँसते हुए अपने महल चला गया। मंदोदरी ने सुना कि प्रभु आ गए हैं और उन्होंने खेल ही खेल में समुद्र बँधवा लिया है। पति का हाथ पकड़कर वह उन्हें अपने भवन में लाई और अत्यंत मनोहर वाणी में बोली। चरणों में सिर नवाकर और आँचल फैलाकर उसने कहा - 'हे प्रिय, क्रोध त्यागकर मेरे वचन सुनिए। हे नाथ, वैर उसी से करना चाहिए जिसे बुद्धि और बल से जीता जा सके। आप में और रघुपति में क्या अंतर है? निश्चय ही जैसे जुगनू और सूर्य में। जिन्होंने बलवान मधु-कैटभ को मारा और दिति के महान वीर पुत्रों का संहार किया, जिन्होंने बलि को बाँधा और सहस्रबाहु का वध किया, वही पृथ्वी का भार हरने के लिए अवतरित हुए हैं। हे नाथ, उनसे विरोध मत कीजिए, जिनके हाथ में काल, कर्म और जीव सब हैं।'
रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ। सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ।।6।।
'जानकी को राम को सौंपकर और उनके चरणकमलों में सिर नवाकर, पुत्र को राज्य देकर, वन जाकर रघुनाथ को भजिए।'
नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई।। चाहिअ करन सो सब करि बीते। तुम्ह सुर असुर चराचर जीते।। संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेंपन जाइहि नृप कानन।। तासु भजन कीजिअ तहँ भर्ता। जो कर्ता पालक संहर्ता।। सोइ रघुवीर प्रनत अनुरागी। भजहु नाथ ममता सब त्यागी।। मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी। भूप राजु तजि होहिं बिरागी।। सोइ कोसलधीस रघुराया। आयउ करन तोहि पर दाया।। जौं पिय मानहु मोर सिखावन। सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन।।
'हे नाथ, रघुराज दीनों पर दयालु हैं; बाघ भी सामने जाने पर (शरणागत को) नहीं खाता। जो करना चाहिए था, वह सब आप कर चुके; आपने देवता, असुर और चराचर सबको जीत लिया। हे दशानन, संत ऐसी नीति कहते हैं कि चौथेपन में राजा को वन चला जाना चाहिए। हे स्वामी, वहाँ उनका भजन कीजिए जो कर्ता, पालक और संहर्ता हैं। वही रघुवीर शरणागतवत्सल हैं; हे नाथ, समस्त ममता त्यागकर उन्हें भजिए। जिनके लिए श्रेष्ठ मुनि यत्न करते हैं, और राजा राज्य त्यागकर विरागी हो जाते हैं, वही कोसलपति रघुराज आप पर दया करने आए हैं। हे प्रिय, यदि आप मेरी सीख मानें, तो तीनों लोकों में आपका अति पावन सुयश होगा।'
अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात। नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात।।7।।
ऐसा कहकर, आँखों में आँसू भरकर और शरीर काँपते हुए, उसने उनके चरण पकड़ लिए - 'हे नाथ, रघुनाथ को भजिए, जिससे मेरा सुहाग अटल रहे।'
तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई।। सुनु तै प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना।। बरुन कुबेर पवन जम काला। भुज बल जितेउँ सकल दिगपाला।। देव दनुज नर सब बस मोरें। कवन हेतु उपजा भय तोरें।। नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई।। मंदोदरीं हदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना।। सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेंहि बूझा। करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा।। कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा। बार बार प्रभु पूछहु काहा।। कहहु कवन भय करिअ बिचारा। नर कपि भालु अहार हमारा।।
तब रावण ने माया की पुत्री मंदोदरी को उठाया, और दुष्ट अपनी प्रभुता बखानने लगा - 'सुन प्रिये, तू व्यर्थ ही भय मान रही है; जगत में मेरे समान कौन योद्धा है? वरुण, कुबेर, पवन, यम और काल, मैंने भुजबल से सब दिक्पालों को जीत लिया। देवता, दानव और मनुष्य सब मेरे वश में हैं; तुझे किस कारण भय उत्पन्न हुआ?' अनेक प्रकार से उसने उसे समझाया, फिर जाकर सभा में बैठ गया। मंदोदरी ने हृदय में जान लिया कि यह अभिमान काल के वश होने से उत्पन्न हुआ है। सभा में आकर रावण ने मंत्रियों से पूछा - 'शत्रु से किस विधि से युद्ध करें?' मंत्री बोले - 'हे राक्षसराज, सुनिए; हे प्रभु, बार-बार क्या पूछते हैं? कहिए किस भय का विचार करें? मनुष्य, वानर और भालू तो हमारा आहार हैं।'
सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि। निति बिरोध न करिअ प्रभु मत्रिंन्ह मति अति थोरि।।8।।
सबके वचन सुनकर प्रहस्त ने हाथ जोड़कर कहा - 'हे प्रभु, नीति विरोध करने से मना करती है; मंत्रियों की बुद्धि बहुत थोड़ी है।'
कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती।। बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा।। छुधा न रही तुम्हहि तब काहू। जारत नगरु कस न धरि खाहू।। सुनत नीक आगें दुख पावा। सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा।। जेहिं बारीस बँधायउ हेला। उतरेउ सेन समेत सुबेला।। सो भनु मनुज खाब हम भाई। बचन कहहिं सब गाल फुलाई।। तात बचन मम सुनु अति आदर। जनि मन गुनहु मोहि करि कादर।। प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहहीं।। बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे।। प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती।।
'मूर्ख मंत्री स्वामी को प्रसन्न करने वाली चापलूसी ही करते हैं; हे नाथ, इस प्रकार काम पूरा नहीं होता। समुद्र लाँघकर एक ही वानर आया था; उसके पराक्रम को सबने मन ही मन सराहा। तब क्या तुम में से किसी को भूख नहीं रही? जब वह नगर जला रहा था, तब क्यों न उसे पकड़कर खा लिया? यह सुनने में तो अच्छा लगता है पर आगे दुख देता है; फिर भी मंत्रियों ने प्रभु को ऐसी ही सलाह सुनाई। जिसने खेल ही खेल में समुद्र बँधवाया और सेना सहित सुबेल पर्वत पर उतर आया, हे भाई, उस सूर्य-सदृश मनुष्य को क्या हम खा लेंगे? सब गाल फुलाकर डींग हाँकते हैं। हे तात, मेरे वचन अति आदर से सुनिए, और मुझे मन में कायर न समझिए। जो प्रिय वचन ही सुनते-कहते हैं, ऐसे मनुष्य जगत में बहुत हैं; परंतु जो सुनने में कठोर पर परम हितकारी वचन कहते-सुनते हैं, हे प्रभु, ऐसे मनुष्य थोड़े हैं। पहले दूत भेजिए, यह नीति सुनिए; सीता को देकर फिर प्रीति कीजिए।'
नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि। नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि।।9।।
'यदि स्त्री पाकर वे लौट जाएँ, तो कलह न बढ़ाइए; और यदि नहीं, तो हे तात, हठपूर्वक रणभूमि में सम्मुख युद्ध कीजिए।'
यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा।। सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई।। अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयहु घमोई।। सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा।। हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें।। संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा।। लंका सिखर उपर आगारा। अति बिचित्र तहँ होइ अखारा।। बैठ जाइ तेही मंदिर रावन। लागे किंनर गुन गन गावन।। बाजहिं ताल पखाउज बीना। नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना।।
'हे प्रभु, यदि आप मेरा यह मत मानें, तो दोनों प्रकार से जगत में आपका सुयश होगा।' क्रोधित होकर दशकंठ रावण ने उससे कहा - 'हे मूर्ख, तुझे किसने ऐसी बुद्धि सिखाई? अब मेरे हृदय में संशय उत्पन्न होता है; तू बाँस की जड़ में उगने वाले घमोई (खरपतवार) के समान अपने ही कुल का नाशक हो गया।' पिता के अत्यंत कठोर और घोर वचन सुनकर प्रहस्त भी कठोर वचन कहता हुआ घर चला गया। रावण को हितकारी सलाह नहीं भाती, जैसे काल के वश हुए मनुष्य को औषधि नहीं भाती। संध्या का समय जानकर दशमुख अपनी बीस भुजाओं को निहारता हुआ महल को चला। लंका के शिखर पर एक अति विचित्र महल था जहाँ नृत्य-अखाड़ा होता था। रावण उस महल में जाकर बैठा, और किन्नर उसके गुणों का गान करने लगे। ताल, पखावज और वीणा बजने लगे, और प्रवीण अप्सराएँ नृत्य करने लगीं।
सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास। परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास।।10।।
सैकड़ों इंद्रों के समान वह निरंतर विलास करता है; और यद्यपि परम प्रबल शत्रु सिर पर खड़ा है, फिर भी उसे न चिंता है न भय।
इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा।। सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी।। तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए।। ता पर रूचिर मृदुल मृगछाला। तेहीं आसान आसीन कृपाला।। प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा।। दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना।। बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना।। प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन।।
यहाँ सुबेल पर्वत पर रघुवीर सेना सहित उतरे, जो अत्यंत विशाल भीड़ थी। उन्होंने एक बहुत ऊँचा शिखर देखा, जो परम रमणीय, समतल और विशेष रूप से श्वेत था। वहाँ लक्ष्मण ने अपने हाथों से सुंदर कोमल पत्ते और फूल सजाकर बिछाए; उन पर एक सुंदर मुलायम मृगछाला थी, और उसी आसन पर कृपालु राम बैठे। प्रभु ने वानरराज सुग्रीव की गोद में सिर रखा, और उनके बाएँ-दाएँ धनुष तथा तरकश थे। वे अपने दोनों करकमलों से बाणों को सुधार रहे थे, और विभीषण उनके कान में मंत्रणा कह रहे थे। अंगद और हनुमान बड़भागी थे, जो नाना प्रकार से उनके चरणकमल दबा रहे थे। प्रभु के पीछे लक्ष्मण वीरासन में बैठे थे, कमर में तरकश और हाथ में धनुष-बाण लिए।
एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन। धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन।।11(क)।। पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मंयक। कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक।।11(ख)।।
इस प्रकार कृपा, रूप और गुण के धाम राम विराजमान थे; धन्य हैं वे मनुष्य जो सदा इस ध्यान में लीन रहते हैं। पूर्व दिशा की ओर देखकर प्रभु ने उदय होते चंद्रमा को देखा और सबसे कहा - 'देखो, चंद्रमा सिंह के समान निर्भय है।'
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी।। मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी।। बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा।। कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई।। कह सुग़ीव सुनहु रघुराई। ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई।। मारेउ राहु ससिहि कह कोई। उर महँ परी स्यामता सोई।। कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा।। छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं। तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं।। प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा। अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा।। बिष संजुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवंत नर नारी।।
'पूर्व दिशा की पर्वत-गुफा में निवास करने वाला, परम प्रताप, तेज और बल का पुंज, चंद्रमा रूपी सिंह अंधकार रूपी मत्त हाथी के कुंभ को फाड़कर आकाश रूपी वन में विचर रहा है। आकाश में बिखरे तारे मोतियों के समान हैं, जो रात्रि रूपी सुंदरी का श्रृंगार हैं।' प्रभु ने कहा - 'चंद्रमा में यह श्यामता (धब्बा) क्या है? हे भाइयो, अपनी-अपनी बुद्धि से बताओ।' सुग्रीव ने कहा - 'हे रघुराज, सुनिए; चंद्रमा में पृथ्वी की छाया प्रकट होती है।' किसी ने कहा - 'राहु ने चंद्रमा को मारा, वही श्यामता उसके हृदय पर पड़ी है।' कोई कहता है - 'जब ब्रह्मा ने रति का मुख बनाया, तो चंद्रमा से सार भाग हरण कर लिया; वह छिद्र चंद्रमा के हृदय में प्रकट हो गया, और उसी मार्ग से आकाश की परछाईं दिखाई देती है।' प्रभु ने कहा - 'चंद्रमा विष का भाई है; उसने अपने अति प्रिय विष को अपने हृदय में बसा लिया। विष से युक्त किरणों को फैलाकर वह विरही स्त्री-पुरुषों को जलाता है।'
कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास। तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास।।12(क)।। पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान। दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान।।12(ख)।।
हनुमान ने कहा - 'हे प्रभु, सुनिए; चंद्रमा आपका प्रिय दास है। चंद्रमा के हृदय में आपकी मूर्ति बसती है, वही श्यामता के रूप में दिखाई देती है।' पवनपुत्र के वचन सुनकर सुजान राम मुस्कुराए। दक्षिण दिशा की ओर देखकर कृपानिधान प्रभु बोले।
देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घंमड दामिनि बिलासा।। मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा।। कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला।। लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंघर देख अखारा।। छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी।। मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका।। बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा।। प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना।।
'हे विभीषण, दक्षिण दिशा को देखो, बादलों का घुमड़ना और बिजली की चमक। मेघ धीरे-धीरे मधुर गरजते हैं; कहीं कठोर ओले न बरसें।' विभीषण ने कहा - 'हे कृपालु, सुनिए; यह न बिजली है न मेघमाला। लंका के शिखर पर एक महल है जहाँ दशकंठ रावण नृत्य देखता है। सिर पर काला मेघडंबर छत्र धारण किए वह मानो बहुत काली घटा-सा है। हे प्रभु, मंदोदरी के कान के ताटंक मानो चमकती बिजली हैं। अनुपम ताल और मृदंग बजते हैं, हे देवराज, वही मधुर ध्वनि आप सुन रहे हैं।' प्रभु रावण के अभिमान को समझकर मुस्कुराए, और धनुष चढ़ाकर बाण संधान किया।
छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान। सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान।।13(क)।। अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग। रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग।।13(ख)।।
तब उन्होंने एक ही बाण से छत्र, मुकुट और ताटंक को गिरा दिया; सबके देखते-देखते वे भूमि पर गिर पड़े, फिर भी किसी ने रहस्य नहीं जाना। ऐसा कौतुक करके राम का बाण लौटकर तरकश में आ समाया। अपने रस-भंग को देखकर रावण की सारी सभा भयभीत हो उठी।
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा।। सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी।। दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई।। सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही।। सयन करहु निज निज गृह जाई। गवने भवन सकल सिर नाई।। मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ।। सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी।। कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ मन धरहू।।
न पृथ्वी काँपी, न कोई विशेष वायु चली; आँखों ने कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं देखा। सब अपने हृदय में सोचने लगे - 'बड़ा भयंकर अपशकुन हुआ।' सभा को भयभीत देखकर रावण हँसकर, युक्ति बनाकर बोला - 'जिसके सिर निरंतर गिरते रहते हैं, वह सदा शुभ है; फिर मेरे लिए मुकुट गिर जाना कैसा अपशकुन? अपने-अपने घर जाकर सो जाओ।' सब सिर नवाकर अपने भवनों को गए। जब से ताटंक भूमि पर गिरा, तभी से मंदोदरी के हृदय में चिंता बस गई। आँखों में आँसू भरकर, हाथ जोड़कर वह बोली - 'हे प्राणनाथ, मेरी विनती सुनिए। हे कंत, राम से विरोध त्यागिए; उन्हें मनुष्य समझकर मन में हठ न धारण कीजिए।'
बिस्वरुप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु। लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु।।14।।
'वे विश्वरूप हैं, रघुवंश के मणि हैं; उनके वचन पर विश्वास कीजिए। वेद उनके अंग-अंग में समस्त लोकों की कल्पना करते हैं।'
पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा।। भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला।। जासु घ्रान अस्विनीकुमारा। निसि अरु दिवस निमेष अपारा।। श्रवन दिसा दस बेद बखानी। मारुत स्वास निगम निज बानी।। अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला।। आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा।। रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा।। उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना।।
'पाताल-लोक उनके चरण हैं, ब्रह्मा का धाम उनका सिर है, और अन्य लोक उनके भिन्न-भिन्न अंगों में विश्राम करते हैं। उनकी भौंहों का विलास भयंकर काल है; उनके नेत्र सूर्य हैं, केश मेघमाला हैं। उनकी नासिका अश्विनीकुमार हैं; रात और दिन उनका अनंत निमेष (पलक झपकना) हैं। दस दिशाएँ उनके कान हैं, ऐसा वेद बखानते हैं; वायु उनकी श्वास है, वेद उनकी अपनी वाणी है। लोभ उनका अधर (नीचे का होंठ) है, यम भयंकर दाँत हैं; माया उनकी हँसी है, और दिक्पाल उनकी भुजाएँ हैं। अग्नि उनका मुख है, वरुण उनकी जीभ है; उत्पत्ति, पालन और प्रलय उनकी चेष्टा है। उनके रोमों का समूह समस्त वनस्पति है; पर्वत उनकी हड्डियाँ और नदियाँ उनकी नसों का जाल हैं। समुद्र उनका उदर है, नीचे के नरक उनके अधोभाग हैं; प्रभु स्वयं जगत्स्वरूप हैं, फिर उनकी और क्या कल्पना की जाए?'
अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान। मनुज बास सचराचर रुप राम भगवान।।15(क)।। अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ। प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ।।15(ख)।।
'अहंकार शिव हैं, बुद्धि ब्रह्मा हैं, मन चंद्रमा है, और चित्त महत्तत्त्व है; समस्त चराचर के बीच मनुष्य रूप में विराजमान भगवान राम ही हैं। हे प्राणनाथ, ऐसा विचार कर सुनिए: प्रभु से वैर त्यागकर रघुवीर के चरणों में प्रीति कीजिए, जिससे मेरा सुहाग न जाए।'
बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना।। नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं।। साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया।। रिपु कर रुप सकल तैं गावा। अति बिसाल भय मोहि सुनावा।। सो सब प्रिया सहज बस मोरें। समुझि परा प्रसाद अब तोरें।। जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई। एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई।। तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि। समुझत सुखद सुनत भय मोचनि।। मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ। पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ।।
पत्नी के वचन सुनकर रावण हँसा - 'अहो, मोह की महिमा कितनी बलवान है! लोग ठीक ही स्त्री का स्वभाव कहते हैं: आठ अवगुण सदा उनके हृदय में रहते हैं - साहस, असत्य, चपलता, माया, भय, अविवेक, अशौच और निर्दयता। तूने शत्रु का रूप बहुत विशाल बताया और मुझे अति भयंकर भय सुनाया; पर हे प्रिये, वह सब मेरे सहज वश में है, यह अब तेरी कृपा से समझ में आया। हे प्रिये, मैं तेरी चतुराई जान गया; इस प्रकार तो तू मेरी ही प्रभुता का बखान कर रही है। हे मृगनयनी, तेरी बात गूढ़ है, समझने में सुखद और सुनने में भय से मुक्त करने वाली है।' मंदोदरी ने मन में ठान लिया कि पति की बुद्धि काल के वश होकर भ्रमित हो गई है।
एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध। सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध।।16(क)।। फूलह फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद। मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम।।16(ख)।।
इस प्रकार बहुत विनोद करते हुए, प्रात:काल दशकंठ रावण प्रकट हुआ; स्वभाव से निर्भय और मद में अंधा लंकापति सभा में गया। यद्यपि मेघ अमृत बरसाएँ, फिर भी बेंत में न फूल आते हैं न फल; उसी प्रकार मूर्ख का हृदय ब्रह्मा के समान गुरु मिलने पर भी नहीं चेतता।
इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई।। कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई।। सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी।। मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा।। नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना।। बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा।। बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ।। काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई।।
यहाँ प्रात:काल रघुराज जागे और सब मंत्रियों को बुलाकर उनकी सम्मति पूछी - 'शीघ्र कहो, क्या उपाय करें?' जामवंत ने चरणों में सिर नवाकर कहा - 'हे सर्वज्ञ, सबके हृदय में बसने वाले, बुद्धि, बल, तेज, धर्म और गुणों के भंडार, सुनिए। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार मंत्रणा कहता हूँ: बालि के पुत्र अंगद को दूत बनाकर भेजिए।' यह अच्छी सलाह सबके मन को भाई, और कृपानिधान ने अंगद से कहा - 'हे बालिपुत्र, बुद्धि, बल और गुण के धाम, हे तात, मेरे कार्य के लिए लंका जाओ। तुम्हें बहुत क्या समझाऊँ? मैं जानता हूँ तुम परम चतुर हो। शत्रु से वही बात कहना जो हमारा काम बने और उसका भी हित हो।'
प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ। सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु।।17(क)।। स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ। अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ।।17(ख)।।
प्रभु की आज्ञा सिर पर धारण कर और चरणों की वंदना कर अंगद उठे; वही गुणों का सागर और स्वामी होता है जिस पर राम कृपा करते हैं। 'मेरे सब कार्य स्वयं सिद्ध हैं, क्योंकि प्रभु ने मुझे आदर दिया।' ऐसा विचारकर युवराज अंगद का शरीर पुलकित हो उठा और हृदय हर्षित हुआ।
बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई।। प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका।। पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भैंटा।। बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई।। तेहि अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई।। निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी।। एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं।। भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहीं जारी।। अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा।। बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई।।
चरणों की वंदना कर, प्रभु की प्रभुता को हृदय में धारण कर, अंगद सबको सिर नवाकर चले। हृदय में प्रभु का प्रताप लिए, स्वभाव से निर्भय, रणबाँकुरा बालिपुत्र नगर में प्रवेश करते समय - वहाँ रावण का बेटा खेल रहा था, उससे भेंट हो गई। बात ही बात में तकरार बढ़ आई, क्योंकि दोनों अतुल बलवान और फिर तरुण अवस्था में थे। जब उसने अंगद पर लात उठाई, तो अंगद ने उसका पैर पकड़कर, घुमाकर भूमि पर पटक दिया। मजबूत योद्धा को देखकर राक्षसों का समूह जहाँ-तहाँ भागा, पुकार भी न सका। उन्होंने एक-दूसरे से भेद नहीं कहा; उसकी मृत्यु समझकर चुप रह गए। नगर में कोलाहल मच गया - 'वही वानर जिसने लंका जलाई थी, फिर आ गया।' 'अब कर्ता (विधाता) क्या करेगा?' सब अत्यंत भयभीत होकर विचार करने लगे। बिना पूछे ही वे उसे मार्ग दिखा देते हैं; जो भी उसे देखता है, वही भय से सूख जाता है।
गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज। सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज।।18।।
तब राम के चरणकमलों का स्मरण कर अंगद सभा-दरबार में गए; सिंह की चाल से वे इधर-उधर देखते हैं, धैर्य, वीरता और बल के पुंज।
तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा।। सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा।। आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए।। अंगद दीख दसानन बैंसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें।। भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना।। मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना।। गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा। बालितनय अतिबल बाँकुरा।। उठे सभासद कपि कहुँ देखी। रावन उर भा क्रौध बिसेषी।।
तुरंत रावण ने एक राक्षस भेजा जिसने उसे समाचार दिया। सुनते ही दशमुख हँसकर बोला - 'बुलाकर लाओ; वह वानर कहाँ है?' आज्ञा पाकर बहुत दूत दौड़े और वानरश्रेष्ठ अंगद को बुला लाए। अंगद ने दशानन रावण को बैठे देखा, मानो प्राण सहित कज्जल का पर्वत हो, उसकी भुजाएँ वृक्षों के समान, सिर पर्वत-शिखरों के समान, रोमावली अनेक लताओं के समान, और मुख, नासिका, नेत्र तथा कान पर्वत की कंदराओं और खोहों के समान थे। अत्यंत बलवान, रणबाँकुरा बालिपुत्र सभा में गया, उसका मन तनिक भी नहीं मुड़ा। वानर को देखकर सभासद उठ खड़े हुए, और रावण के हृदय में बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ।
जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ। राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ।।19।।
जैसे मत्त हाथियों के झुंड में सिंह चला जाता है, वैसे ही अंगद मन में राम का प्रताप स्मरण कर, सिर नवाकर सभा में बैठ गया।
कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर।। मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई।। उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती।। बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा।। नृप अभिमान मोह बस किंबा। हरि आनिहु सीता जगदंबा।। अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा।। दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजन सहित संग निज नारी।। सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें।।
रावण ने पूछा, "तू कौन है, बंदर?" अंगद ने कहा, "मैं श्री राम का दूत हूँ, हे रावण। तुम्हारे और मेरे पिता के बीच मित्रता थी, इसलिए तुम्हारे भले के लिए मैं आया हूँ, भाई। तुम पुलस्त्य के उत्तम कुल के, उनके नाती हो; तुमने शिव और ब्रह्मा को अनेक प्रकार से पूजा, वरदान पाए और सब काम सिद्ध किए, तथा लोकपालों और सब राजाओं को जीता। फिर भी, चाहे राजोचित अभिमान से या मोहवश, तुम जगत की माता सीता को हर लाए। अब मेरी शुभ बात सुनो: प्रभु तुम्हारे सब अपराध क्षमा कर देंगे। दाँतों में तिनका और गले में कुल्हाड़ी धरकर, अपने परिजनों और स्त्रियों सहित, और आदरपूर्वक सीता को आगे करके, सब भय त्यागकर इसी प्रकार उनके पास चलो।"
प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि। आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि।।20।।
"कहो: 'हे शरणागतों के रक्षक, रघुवंश के मणि, अब मेरी रक्षा करो, रक्षा करो!' ऐसी आर्त और दीन वाणी सुनते ही प्रभु तुम्हें अभय कर देंगे।"
रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी।। कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नातें मानिऐ मिताई।। अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेटा।। अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना।। अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक।। गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापस दूत कहायहु।। अब कहु कुसल बालि कहँ अहई। बिहँसि बचन तब अंगद कहई।। दिन दस गएँ बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई।। राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई।। सुनु सठ भेद होइ मन ताकें। श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें।।
रावण ने कहा, "अरे कपिशावक, सँभालकर बोल! मूर्ख, क्या तू मुझ देवशत्रु को नहीं जानता? अपना और अपने पिता का नाम बता, भाई — किस नाते से मैं यह मित्रता मानूँ?" अंगद ने कहा, "मेरा नाम अंगद है, बालि का पुत्र; क्या कभी उनसे तुम्हारी भेंट हुई थी?" यह सुनकर रावण सकुचाया और बोला, "बालि नाम का एक बंदर था, उसे मैं जानता था।" (फिर ताना मारा) "तो तू बालि का बालक अंगद है — अपने ही कुल को जलाने वाली आग-सा जन्मा। तू गर्भ में नष्ट न हुआ, व्यर्थ ही जन्मा, और अपने मुँह से खुद को तपस्वी का दूत कहलाता है। अब बता, बालि आजकल कहाँ है?" हँसकर अंगद बोला, "दस दिन बाद बालि के पास जाकर, मित्र को गले लगाकर उसका कुशल पूछना। राम से बैर करने में जो कुशल होती है, वह सब वही तुम्हें बता देगा। सुन मूर्ख, ऐसे भेद के भाव उसी के मन में उठते हैं जिसके हृदय में श्री राम नहीं हैं।"
हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस। अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस।।21।
"हाँ, हमारा कुल सचमुच कुलघातक है, और तुम, हे दशमुख, कुल के रक्षक हो! ऐसी बात तो अंधा-बहरा भी न कहे — और तुम्हारे तो बीस नेत्र और बीस कान हैं (फिर भी ऐसा मूर्खतापूर्ण बोलते हो)।"
सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई।। तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा।। सुनि कठोर बानी कपि केरी। कहत दसानन नयन तरेरी।। खल तव कठिन बचन सब सहऊँ। नीति धर्म मैं जानत अहऊँ।। कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी।। देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी।। कान नाक बिनु भगिनि निहारी। छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी।। धर्मसीलता तव जग जागी। पावा दरसु हमहुँ बड़भागी।।
"शिव, ब्रह्मा और सारे देवता-मुनि जिनके चरणों की सेवा चाहते हैं, उन्हीं प्रभु का दूत होकर हमने अपना कुल डुबो दिया? ऐसी बात से भी क्या तुम्हारा हृदय नहीं फटता?" बंदर की कठोर वाणी सुनकर रावण आँखें तरेरकर बोला, "दुष्ट, तेरे सब कठोर वचन मैं सह रहा हूँ, क्योंकि मैं नीति और धर्म जानता हूँ।" अंगद ने कहा, "तुम्हारी धर्मशीलता हमने भी सुनी है — तुमने पराई स्त्री चुराई! रखवाले के रूप में मैंने आँखों से देखा; तुम लाज से डूब क्यों न मरे, हे व्रतधारी? नाक-कान कटी अपनी बहन को देखकर तुमने धर्म का विचार कर ऐसी 'क्षमा' की! तुम्हारी धर्मशीलता जगत में प्रसिद्ध है; तुम्हारा दर्शन पाकर हम भी बड़भागी हुए।"
जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु। लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु।।22(क)।। पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास। सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास।।22(ख)।।
रावण ने कहा, "मत बको, जड़ प्राणी; मूर्ख बंदर, मेरी भुजाएँ देख! लोकपालों का विपुल बल ग्रसने के लिए ये सब राहु के समान हैं जो चंद्रमा को ग्रसता है। और जब आकाश-रूपी सरोवर में मेरी भुजाएँ कमलों पर टिकीं, तो हंसों के समान शोभा पाईं — अर्थात जब मैंने शिव सहित कैलास को उठाया।"
तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद।। तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना।। तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ। अनुज हमार भीरु अति सोऊ।। जामवंत मंत्री अति बूढ़ा। सो कि होइ अब समरारूढ़ा।। सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला।। आवा प्रथम नगरु जेंहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा।। सत्य बचन कहु निसिचर नाहा। साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा।। रावन नगर अल्प कपि दहई। सुनि अस बचन सत्य को कहई।। जो अति सुभट सराहेहु रावन। सो सुग्रीव केर लघु धावन।। चलइ बहुत सो बीर न होई। पठवा खबरि लेन हम सोई।।
रावण ने कहा, "सुन अंगद — बता, तेरी सेना में कौन योद्धा मुझसे भिड़ेगा? तेरा स्वामी राम स्त्री के वियोग से बलहीन है; उसका छोटा भाई लक्ष्मण उसी दुख में दुखी और उदास है। तू और सुग्रीव दोनों नदी-किनारे के पेड़ (सहज उखड़ने वाले) हो, और मेरा अपना छोटा भाई (विभीषण) भी बड़ा कायर है। मंत्री जाम्बवान बहुत बूढ़ा है — वह अब युद्ध में कैसे चढ़ेगा? नल और नील केवल शिल्पकर्म जानते हैं। एक बंदर बड़ा बलवान है जो पहले आकर नगर जला गया।" यह सुनकर अंगद बोला, "सच बता, हे निशाचरराज — क्या सचमुच बंदर ने नगर जलाया? एक तुच्छ बंदर ने बलवान रावण का नगर जला दिया — ऐसी बात सुनकर उसे सच कौन कहेगा? जिसे तुम इतना बड़ा योद्धा सराह रहे हो, वह तो सुग्रीव का छोटा-सा हरकारा है; वह बहुत दौड़ता-भागता है, पर वीर नहीं — हमने तो उसे बस खबर लेने भेजा था।"
सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ। फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ।।23(क)।। सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह। कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह।।23(ख)।। प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि। जौं मृगपति बध मेड़ुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि।।23(ग)।। जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष। तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष।।23(घ)।। बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस। प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस।।23(ङ)।। हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक। जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक।।23(छ)।।
रावण ने कहा, "सच में बंदर ने स्वामी की आज्ञा बिना नगर जलाया; इसीलिए वह सुग्रीव के पास नहीं गया, बल्कि उसी भय से छिप गया।" अंगद बोला, "तुम सब सच कहते हो, रावण; सुनकर मुझे कुछ क्रोध नहीं आता। सचमुच हमारी सेना में कोई ऐसा तुच्छ नहीं जिसे तुमसे लड़ना शोभा दे। प्रीति या बैर बराबरी वाले से ही करना चाहिए — यही नीति है; यदि सिंह मेंढकों को मारे, तो क्या कोई उसे भला कहेगा? यद्यपि यह राम के लिए छोटापन है, और तुम्हें मारना उन पर बड़ा दोष होगा, फिर भी सुनो रावण — क्षत्रिय जाति का क्रोध कठोर होता है।" टेढ़ी-तीखी उक्ति के धनुष और वचनों के बाणों से शत्रु बंदर ने रावण का हृदय जला डाला; उसके प्रत्युत्तर मानो सँड़सी थे जिनसे वह बलवान रावण को नोच-नोचकर निकाल रहा था। तब हँसकर दशमुख बोला, "बंदर में एक बड़ा गुण है: जो उसे पालता है, उसी का हित वह अनेक उपायों से करता है।"
धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा।। नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई।। अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती।। मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना।। कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई।। बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा।। सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई।। देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा।। जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हँसा दससीसा।। पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही। अबहीं समुझि परा कछु मोही।। बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउँ न तोहि अधम अभिमानी।। कहु रावन रावन जग केते। मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते।। बलिहि जितन एक गयउ पताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला।। खेलहिं बालक मारहिं जाई। दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई।। एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा।। कौतुक लागि भवन लै आवा। सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा।।
(रावण फिर बोला) "धन्य है वह बंदर जो स्वामी के काम के लिए लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाचता है; नाच-कूदकर लोगों को रिझाता और स्वामी की सेवा करता है — इस धर्म में निपुण है। अंगद, तेरी जाति स्वामिभक्त है; तू अपने स्वामी के गुण ऐसे क्यों न गाए? मैं गुणों का बड़ा जानकार हूँ; तेरी कड़वी बकबक पर कान नहीं देता।" अंगद बोला, "तुम्हारी गुण-ग्राहकता — सच में पवनपुत्र (हनुमान) ने मुझे बताई! उसने तुम्हारा उपवन उजाड़ा, पुत्र मारा और नगर जलाया, फिर भी तुमने उसका कुछ न बिगाड़ा! तुम्हारे उसी सुहावने स्वभाव को सोचकर, हे रावण, मैंने ढिठाई की; आकर देख लिया — यह बंदर जो भी कहे, तुम्हें न लाज, न क्रोध, न बुरा लगता है।" रावण बोला, "यदि ऐसी बुद्धि है, बंदर, तो तूने अपने पिता को खिलवा दिया," और हँसते हुए बोला, "तेरे पिता को खाकर फिर तुझे भी खा लेता — पर अब कुछ समझ में आया। तुझे बालि के निर्मल यश का पात्र जानकर मैं तुझे नहीं मारता, अधम अभिमानी। बता — जगत में कितने रावण हैं? जितने मैंने अपने कानों से सुने, सुन: एक पाताल में राजा बलि को जीतने गया और घुड़साल में बाँध दिया गया, जहाँ बच्चे खेल में उसे मारते थे, तब बलि ने दया कर छोड़ दिया; दूसरे को सहस्रबाहु ने देखा, जो दौड़कर उसे किसी विचित्र जंतु-सा पकड़कर खेल के लिए घर ले आया, तब पुलस्त्य मुनि ने जाकर छुड़ाया।"
एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि की काँख। इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख।।24।।
"एक और (रावण) का जिक्र करते मुझे बड़ी लाज आती है — वह बालि की काँख में दबा रहा। इन सबमें, रावण, तुम कौन हो? माख छोड़कर सच बताओ।"
सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला।। जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई।। सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी।। भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला।। जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउँ जाइ बरिआई।। जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे।। जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी।। सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी।।
रावण बोला, "सुन मूर्ख — वह बलवान रावण मैं ही हूँ, जिसकी भुजाओं की लीला शिव का पर्वत कैलास जानता है। मेरा पराक्रम स्वयं शिव जानते हैं, जिन्हें मैंने सिरों पर फूल चढ़ाकर पूजा। अपने हाथों से अपने कमल-समान सिर उतारकर मैंने त्रिपुरारि (शिव) को अगणित बार पूजा। मेरी भुजाओं का बल दिक्पाल जानते हैं, जिनके हृदय में वह आज भी काँटे-सा सालता है, मूर्ख। दिग्गज मेरी छाती की कठोरता जानते हैं, जब-जब मैं बलपूर्वक उनसे भिड़ा — उनके भयंकर दाँत उसमें गड़े तक नहीं, बल्कि छाती से टकराते ही मूली-से टूट गए। जिसके चलने पर धरती वैसे ही डोलती है जैसे मतवाले हाथी के चढ़ने पर छोटी नाव। वही जगत-प्रसिद्ध प्रतापी रावण मैं हूँ — क्या तूने कानों से उसका नाम नहीं सुना, झूठे बकवादी?"
तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान। रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान।।25।।
"उसी रावण को तू छोटा कहता है, और एक साधारण मनुष्य (राम) की प्रशंसा करता है! अरे गँवार, बौने, दुष्ट बंदर — अब तेरी बुद्धि का पूरा हाल मैं जान गया!"
सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु सँभारि अधम अभिमानी।। सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा।। जासु परसु सागर खर धारा। बूड़े नृप अगनित बहु बारा।। तासु गर्ब जेहि देखत भागा। सो नर क्यों दससीस अभागा।। राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा।। पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा। अन्न दान अरु रस पीयूषा।। बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन।। सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा।।
यह सुनकर अंगद ने क्रोध से कहा, "सँभालकर बोल, अधम अभिमानी! अगणित भुजाओं के वन वाला सहस्रबाहु, जिसका फरसा सब कुछ भस्म करने वाली आग-सा था — जिसका फरसा तीखी लहरों का समुद्र था, जिसमें अनगिनत राजा बार-बार डूबे — उसी योद्धा का घमंड राम को देखते ही भाग गया; फिर वे मनुष्य कैसे हुए, अभागे रावण? राम को साधारण मनुष्य तू कैसे कहता है, टेढ़े मूर्ख? वे धनुर्धरों में कामदेव और नदियों में गंगा हैं; पशुओं में कामधेनु और वृक्षों में कल्पवृक्ष हैं; दानों में अन्नदान और रसों में अमृत हैं; पक्षियों में गरुड़ और सर्पों में सहस्रफन शेष हैं; पत्थरों में चिंतामणि हैं, हे रावण। समझ मंदबुद्धि: सब लोकों में क्या बैकुंठ के समान कोई लाभ है, या राम की अखंड भक्ति के समान कोई प्राप्ति है?"
सेन सहित तब मान मथि बन उजारि पुर जारि।। कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि।।26।।
"तब तुम्हारी सेना सहित, तुम्हारा मान मथकर, उपवन उजाड़कर और नगर जलाकर — हे मूर्ख रावण, तुम्हारे पुत्र को मारकर हनुमान बंदर आखिर कैसे निकल गया?"
सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई।। जौ खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही।। मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला।। तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें।। ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलहहिं भालु कीस चौगाना।। जबहिं समर कोपहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक।। तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा।। सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा।।
अंगद बोला, "सुन रावण, चतुराई छोड़ — तू कृपासिंधु राम को क्यों नहीं भजता? यदि तू राम का विरोधी बना, तो ब्रह्मा और शिव भी तुझे नहीं बचा सकते। मूर्ख, व्यर्थ गाल मत बजा; राम से बैर का यह हाल होगा: राम के बाणों से बिंधे तेरे सिर बंदरों के आगे धरती पर गिरेंगे, और भालू-बंदर उन अनेक सिरों को गेंद की तरह चौगान में खेलेंगे। जब रघुनाथ युद्ध में क्रुद्ध होकर अति भयंकर बाण छोड़ेंगे, तब क्या तेरी यह डींग बचेगी? यह सोचकर उदार राम को भज।" ये वचन सुनते ही रावण जल उठा, मानो प्रचंड आग में घी पड़ गया हो।
कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि। मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि।।27।।
रावण ने कहा, "कुम्भकर्ण जैसा मेरा भाई है, और मेरा प्रसिद्ध पुत्र (मेघनाद) तो इंद्र को जीतने वाला है; क्या तूने मेरा पराक्रम नहीं सुना — मैंने चराचर सारे जगत को जीत लिया है!"
सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई।। नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा।। मम भुज सागर बल जल पूरा। जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा।। बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा।। दिगपालन्ह मैं नीर भरावा। भूप सुजस खल मोहि सुनावा।। जौं पै समर सुभट तव नाथा। पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा।। तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा।। हरगिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू।।
रावण बोला, "मूर्ख! बंदरों की सहायता जोड़कर राम ने समुद्र बाँध लिया — क्या यही उसकी प्रभुता है? अनेक पक्षी समुद्र लाँघ जाते हैं, पर इससे वे शूर नहीं होते; सुनो सब बंदरो। मेरी भुजाएँ बल के जल से भरा समुद्र हैं, जिनमें बहुत-से देवता, मनुष्य और शूर डूब गए। मेरी बीस भुजाएँ अथाह-अपार बीस समुद्र हैं — कौन वीर है जो इनका पार पाए? मैंने दिक्पालों से दास की तरह पानी भरवाया; और तू दुष्ट मुझे राजा का यश सुनाता है! यदि युद्ध में तेरा स्वामी इतना बड़ा योद्धा है, जिसकी गुण-गाथा तू बार-बार कहता है, तो वह दूत क्यों भेजता है? शत्रु से मित्रता करते उसे लाज नहीं आती? मेरी वे भुजाएँ देख जिन्होंने शिव का पर्वत मथा — फिर मूर्ख बंदर, अपने स्वामी की प्रशंसा करता रह!"
सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस। हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस।।28।।
रावण बोला, "रावण जैसा कौन शूर है, जिसने अपने ही हाथों अपने सिर काटकर, बड़े हर्ष से, अनेक बार अग्नि में हवन कर दिए — स्वयं शिव इसके साक्षी हैं!"
जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला।। नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची।। सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें।। आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागे।। कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं।। लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ।। सिर अरु सैल कथा चित रही। ताते बार बीस तैं कही।। सो भुजबल राखेउ उर घाली। जीतेहु सहसबाहु बलि बाली।। सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा।। इंद्रजालि कहु कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा।।
(रावण फिर बोला) "जब मेरी खोपड़ियाँ जल रही थीं, तब मैंने अपने ही माथे पर विधाता के लिखे अंक देखे। वहाँ मैंने मनुष्य के हाथों अपनी मृत्यु पढ़ी, और विधाता की वाणी को झूठी जानकर हँस दिया। उसे याद कर भी मुझे भय नहीं; ब्रह्मा ने वह बुढ़ापे में मंद, भूली बुद्धि से लिखा। और तू मूर्ख, लाज-मान छोड़कर बार-बार मेरे सामने दूसरे योद्धा का बल बखानता है।" अंगद बोला, "जगत के लज्जाशीलों में, रावण, तुम्हारे समान कोई नहीं! लज्जा तुम्हारा सहज स्वभाव है — तुम अपने मुँह से अपने गुण कभी नहीं कहते! सिर और पर्वत की कथा तुम्हारे मन में बसी रही, इसीलिए तुमने उसे बीस बार कहा! और वह भुजबल जो तुमने हृदय में छिपा रखा है — जिससे तुमने सहस्रबाहु, राजा बलि और बालि को 'जीता'! समझ मंदबुद्धि, और अब बस कर — क्या अपना सिर काट लेने से कोई शूर हो जाता है? इंद्रजाल दिखाने वाला, भाई, वीर नहीं कहलाता — वह भी अपना सारा शरीर काट डालता है (केवल छलावा)!"
जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद। ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद।।29।।
"पतंगे मोहवश जल मरते हैं, और गधों के झुंड भारी बोझ ढोते हैं — फिर भी वे शूर नहीं कहलाते। इसे समझकर देख, मंदबुद्धि।"
अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही।। दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ।। बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सृकाला।। मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे।। नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा।। जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी।। तैं निसिचर पति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता।। जौं न राम अपमानहि डरउँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ।।
अंगद बोला, "अब दुष्ट, बात मत बढ़ा; मेरी बात सुन और अभिमान छोड़। रावण, मैं दूत बनकर नहीं आया; कुछ और सोचकर रघुवीर ने मुझे भेजा। बार-बार कृपालु प्रभु कहते हैं, 'सिंह के गीदड़ को मारने में कोई यश नहीं।' प्रभु के वचन मन में समझकर, मूर्ख, मैंने तेरे कठोर वचन सहे। नहीं तो तेरा मुँह तोड़कर मैं सीता को जबरन ले जाता! मैं तेरा बल जानता हूँ, अधम देवशत्रु — तू सूनी, अरक्षित जगह से ही पराई स्त्री हरता है। तू अभिमान से भरा निशाचरराज है; मैं तो रघुपति के सेवक का दूत हूँ। यदि मुझे राम का अपमान होने का डर न होता, तो तेरी आँखों के सामने ऐसा कौतुक कर दिखाता:"
तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ। तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ।।30।।
"तुझे धरती पर पटककर, तेरी सेना नष्ट कर, तेरा नगर चौपट कर, और — मूर्ख — तेरी युवतियों समेत जनकपुत्री सीता को ले जाता!"
जौ अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई।। कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा।। सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमूख श्रुति संत बिरोधी।। तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवन सव सम चौदह प्रानी।। अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही।। सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा।। रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी।। कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें।।
अंगद बोला, "ऐसा करूँ भी तो उसमें कोई बड़ाई नहीं; मरे हुए को मारने में कोई मर्दानगी नहीं। नीच तांत्रिक, कामवश, कंजूस, महामूर्ख, अति दरिद्र, अपयशी, अति बूढ़ा, सदा रोगी, सदैव क्रोधी, विष्णु से विमुख, वेद और संतों का विरोधी, केवल देह पोषने वाला, निंदक, पाप की खान — ये चौदह, जीते हुए भी, मुर्दे के समान हैं। यह सोचकर, दुष्ट, मैं तुझे नहीं मारता; अब मेरा क्रोध मत भड़का।" यह सुनकर निशाचरराज होंठ दाँतों से दबाकर, हाथ मलते हुए क्रोध से बोला, "अधम बंदर! अब तू मरना चाहता है — छोटे मुँह बड़ी बात कहता है। तू कड़वा बकता है, जड़ बंदर, जिसके बल पर तू भरोसा करता है (राम) उसमें न बल, न पराक्रम, न बुद्धि, न तेज है।"
अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास। सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास।।31(क)।। जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक। खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक।।31(ख)।।
रावण बोला, "गुण और मान से रहित जानकर उसके अपने पिता ने राम को वनवास दिया; वह दुख, युवा पत्नी का वियोग, और ऊपर से दिन-रात मेरा भय (उसे सताते हैं)। जिनके बल पर तू इतना घमंड करता है, ऐसे मनुष्यों को निशाचर दिन-रात अनेक खा जाते हैं! यह समझ, मूर्ख, और अपनी हठ छोड़।"
जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा।। हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना।। कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी।। डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे।। गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर।। कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे।। आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे।। की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए।। कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू।। ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे।।
जब रावण ने इस प्रकार राम की निंदा की, तो कपिश्रेष्ठ (अंगद) अत्यंत क्रुद्ध हुए — क्योंकि विष्णु या शिव की निंदा कानों से सुनना गोहत्या के समान पाप है। बलवान बंदर ने दाँत पीसकर दोनों भुजाओं से क्रोधपूर्वक धरती पीटी; धरती डोल उठी, सभासद आसनों से गिर पड़े, और भय की आँधी में घिरकर भाग चले। गिरते-गिरते सँभलकर रावण उठा, पर उसके सुंदर मुकुट धरती पर गिर पड़े। कुछ को उसने बटोरकर सिरों पर सँवारा; कुछ अंगद ने प्रभु (राम) की ओर फेंके। मुकुट आते देख बंदर भाग चले, मानो विधाता ने दिन में ही उल्काएँ गिराई हों। "क्या रावण ने क्रोध में फेंके हैं? चार वज्र वेग से आ रहे हैं!" (वे बोले)। प्रभु ने हँसकर कहा, "हृदय में मत डरो — ये न उल्का हैं, न वज्र, न केतु, न राहु; ये तो दशमुख रावण के मुकुट हैं, जो बालिपुत्र (अंगद) के फेंके आ रहे हैं।"
तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास। कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास।।32(क)।। उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ। धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ।।32(ख)।।
उछलकर पवनपुत्र (हनुमान) ने मुकुटों को हाथों में पकड़ लिया और प्रभु के पास रख दिया; भालू और बंदर उस दृश्य को देखते रहे, मुकुट सूर्य के समान चमक रहे थे। उधर लंका में क्रुद्ध रावण सबसे क्रोध से बोला, "बंदर को पकड़ो! पकड़कर मार डालो!" — यह सुनकर अंगद केवल मुस्कुरा दिया।
एहि बिधि बेगि सूभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु।। मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई।। पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा।। मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती।। रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी।। सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा।। याको फलु पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें।। रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी।। गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं।।
(रावण ने आज्ञा दी) "इस प्रकार मेरे सब वीर तुरंत दौड़ो! भालू-बंदर जहाँ-जहाँ मिलें, खा जाओ! जाकर धरती को बंदरों से रहित कर दो, पर उन दोनों तपस्वी भाइयों (राम और लक्ष्मण) को जीवित पकड़ो!" तब युवराज (अंगद) क्रोध से बोला, "केवल गाल बजाते तुझे लाज नहीं आती? मर — अपना गला काट, निर्लज्ज कुलघाती! मेरा बल देखकर तेरी छाती नहीं फटती? स्त्री-चोर, कुमार्गगामी, दुष्ट, मल-राशि, मंदबुद्धि कामी! तू सन्निपात के रोगी-सा दुर्वचन बकता है; तू काल के वश में आ गया, दुष्ट मनुष्यभक्षी! इसका फल तू आगे पाएगा, जब भालू-बंदर तुझे थप्पड़ मारने लगेंगे! तू 'राम मनुष्य है' ऐसी बात कहता है — तेरी जीभ नहीं गिरती, अभिमानी? निःसंदेह गिरेगी — तेरे सिरों समेत, रणभूमि में!"
सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर। बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़।।33(क)।। तब सोनित की प्यास तृषित राम सायक निकर। तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम।।33(ख)।।
(अंगद बोला) "वह मनुष्य कैसा है, हे रावण, जिसने एक ही बाण से बालि को मार डाला? तेरे बीसों नेत्र (मानो) अंधे हैं! धिक्कार है तेरे जन्म को, नीच जाति के मूर्ख! राम के बाणों का समूह पहले से ही तेरे रक्त का प्यासा है; केवल उसी के भय से मैं तुझे छोड़ता हूँ, हे कड़वा बकने वाले अधम निशाचर!"
मै तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक।। असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं।। गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका।। मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा।। जुगति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई।। बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा।। साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा।। समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा।। जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी।। सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा।। इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना।। झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई।। पुनि उठि झपटहीं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती।। पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी।।
अंगद बोला, "मैं तेरे दाँत तोड़ने में समर्थ हूँ, पर रघुनाथ ने आज्ञा नहीं दी। इतना क्रोध है कि तेरे दसों सिर तोड़ दूँ, लंका को पकड़कर समुद्र में डुबो दूँ! तेरी लंका गूलर के फल-सी है, और तुम प्राणी उसमें निश्चिंत बसते हो; मैं बंदर उस फल को खाते देर न लगाऊँ — पर उदार राम ने आज्ञा नहीं दी।" यह युक्ति सुनकर रावण मुस्कुराया, "मूर्ख, इतना झूठ कहाँ सीखा? बालि ने कभी ऐसी डींग नहीं मारी — तपस्वियों से मिलकर तू झूठा हो गया।" (अंगद बोला) "सचमुच मैं झूठा हूँ, और मेरी दोनों भुजाएँ झूठी हैं, यदि मैं तेरी दस जीभें न उखाड़ूँ!" राम का प्रताप याद कर बंदर क्रुद्ध हुआ; सभा के बीच प्रण करके उसने अपना पैर जमा दिया: "यदि तू मेरा पैर हिला सके, मूर्ख, तो राम लौट जाएँगे और मैं सीता को हारा मान लूँगा।" रावण ने सब योद्धाओं से कहा, "बंदर का पैर पकड़कर धरती पर पटक दो!" इंद्रजीत आदि बलवान, और यहाँ-वहाँ के अनेक योद्धा उत्साह से उठे। वे पूरे बल और अनेक उपायों से झपटते हैं, पर पैर नहीं हिलता; सिर झुकाकर बैठ जाते हैं। फिर उठकर झपटते हैं, ये देवशत्रु, पर बंदर का पैर तनिक भी नहीं टलता — जैसे कोई झूठा योगी मोह के वृक्ष को नहीं उखाड़ सकता।
कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ। झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ।।34(क)।। भूमि न छाँडत कपि चरन देखत रिपु मद भाग।। कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग।।34(ख)।।
करोड़ों मेघनाद के समान बलवान योद्धा हर्षित होकर उठे; वे झपटते हैं, पर बंदर का पैर नहीं हिलता, और फिर सिर झुकाकर बैठ जाते हैं। बंदर का पैर धरती नहीं छोड़ता, यह देखकर शत्रु का अभिमान चला जाता है — जैसे करोड़ों विघ्नों पर भी संतों का मन नीति (धर्ममार्ग) को नहीं त्यागता।
कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे।। गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा।। गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई।। भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई।। सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई।। जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा।। उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा।। तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई।। पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना।। रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो।। हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई।। प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा।। जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी।।
बंदर का बल देखकर सब भीतर से हार गए; तब स्वयं रावण बंदर की ललकार पर उठा। रावण ने ज्यों ही उसका पैर पकड़ा, बालिपुत्र बोला, "मेरा पैर पकड़ने से तेरा उद्धार नहीं होगा। जाकर राम के चरण क्यों नहीं पकड़ता, मूर्ख?" यह सुनकर रावण अत्यंत सकुचाकर लौट गया। वह तेजहीन हो गया, सारी शोभा जाती रही, मानो दोपहर का मंद चंद्रमा हो। वह सिर झुकाकर सिंहासन पर बैठ गया, मानो सारी संपत्ति गँवा दी हो। राम जगत की आत्मा और सबके प्राणपति हैं; उनसे विमुख होकर कोई विश्राम कैसे पाए? (शिव कहते हैं) उमा, राम की भौंह के इशारे मात्र से विश्व उत्पन्न होता और फिर नाश पाता है; वे तिनके को वज्र और वज्र को तिनका कर देते हैं — फिर उनके दूत का प्रण कैसे टलता? तब बंदर ने अनेक प्रकार से नीति समझाई, पर रावण ने नहीं मानी, क्योंकि उसका काल निकट आ गया था। शत्रु का मद मथकर और प्रभु का सुयश सुनाकर, राजा बालि का पुत्र यह कहकर चल दिया, "बार-बार खेलाकर भी मैं तुझे रणभूमि में नहीं मारता — अब तुझ जैसे को मारकर क्यों अपनी बड़ाई करूँ?" पहले बंदर (हनुमान) ने उसका पुत्र मारा था, और यह सब सुनकर रावण दुखी हुआ। अंगद का प्रण (सफल) देखकर सब राक्षस भय से विशेष व्याकुल हो गए।
रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज। पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज।।35(क)।। साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ। मंदोदरी रावनहि बहुरि कहा समुझाइ।।(ख)।।
शत्रु का बल मथकर, बालिपुत्र, वह बल का पुंज, हर्षित हुआ; रोमांचित शरीर और आँसू भरे नेत्रों से उसने राम के चरणकमल पकड़ लिए। संध्या जानकर रावण उदास होकर अपने भवन गया, और मंदोदरी ने फिर उसे समझाकर सलाह दी।
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही।। रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई।। पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा।। कौतुक सिंधु नाघी तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका।। रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा।। जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा।। अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु।। पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुल बल जानहु।। बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा।। जनक सभाँ अगनित भूपाला। रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला।। भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही।। सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा।। सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी।।
(मंदोदरी बोली) "प्रियतम, मन में समझो और कुमति छोड़ो; युद्ध में तुम रघुपति की बराबरी के नहीं हो। राम के छोटे भाई ने एक छोटी रेखा खींची, उसे भी तुम न लाँघ सके — क्या यही तुम्हारी मर्दानगी है? प्रिय, जिसके दूत मात्र ने ऐसे काम किए, उसे तुम युद्ध में जीतोगे? खेल-खेल में बंदर समुद्र लाँघकर, सिंह की तरह निडर तुम्हारी लंका आया; रखवालों को मारकर उपवन उजाड़ा, और तुम्हारी आँखों के सामने अक्ष को मारा। सारा नगर जलाकर राख कर दिया — तब तुम्हारे बल का घमंड कहाँ था? अब, पति, झूठी डींग मत हाँको; मेरी बात हृदय में थोड़ा विचारो। रघुपति को केवल राजा मत समझो, पति; उन्हें चराचर जगत का स्वामी, अतुल बल वाला जानो। उनके बाण का प्रताप मारीच जानता था — पर तुमने उसकी बात न मानी, हे नीच। जनक की सभा में अगणित राजा थे, और तुम भी अपने विशाल अतुल बल के साथ वहाँ थे; जब धनुष तोड़कर उन्होंने सीता को ब्याहा, तब तुमने उन्हें युद्ध में क्यों न जीता? इंद्र-पुत्र ने उनका बल थोड़ा जाना — राम ने उसे जीवित छोड़ा, केवल एक आँख पकड़कर फोड़ी। तुमने शूर्पणखा की दशा देखी, फिर भी तुम्हारे हृदय में कोई विशेष लाज नहीं।"
बधि बिराध खर दूषनहि लींलाँ हत्यो कबंध। बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध।।36।।
(मंदोदरी बोली) "विराध, खर और दूषण को मारकर, और लीला से कबंध को मारकर, उन्होंने एक ही बाण से बालि को गिरा दिया — उन्हीं राम को जानो, हे रावण!"
जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला।। कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू।। सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरूथ महुँ मृगपति जथा।। अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके।। तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू।। अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा।। काल दंड गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा।। निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं।।
(मंदोदरी बोली) "जिन्होंने खेल-खेल में जलनाथ (समुद्र) को बँधवाया, और सेना सहित सुबेल पर्वत पर उतरे — करुणामय, सूर्यवंश के ध्वज, उन्होंने तुम्हारे ही भले के लिए दूत भेजा। जिन्होंने तुम्हारी ही सभा में तुम्हारा बल मथा, भीड़ में सिंह की तरह विचरते हुए — जिनके सेवक अंगद और हनुमान हैं, रण में अत्यंत बाँके, वीर योद्धा — उन्हें, प्रिय, तुम बार-बार साधारण मनुष्य कहते हो! तुम व्यर्थ मान, ममता और मद में बहे जा रहे हो। हाय पति, तुमने राम से बैर किया; काल के वश होकर तुम्हारे मन में बोध नहीं उपजता। काल दंड लेकर किसी को नहीं मारता — निकट आता काल पहले मनुष्य का धर्म, बल, बुद्धि और विवेक हर लेता है। जिसका काल निकट आता है, स्वामी, उसे तुम्हारी ही तरह भ्रम हो जाता है।"
दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु। कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु।।37।।
(मंदोदरी बोली) "तुम्हारे दो पुत्र मर गए, नगर जल गया; अब भी, प्रिय, सब सँभाल लो। कृपासिंधु रघुनाथ को भजो, स्वामी, और निर्मल यश पाओ।"
नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना।। बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली।। इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा।। अति आदर सपीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी।। बालितनय कौतुक अति मोही। तात सत्य कहु पूछउँ तोही।।। रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका।। तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहहु तात कवनी बिधि पाए।। सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप गुन चारी।। साम दान अरु दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा।। नीति धर्म के चरन सुहाए। अस जियँ जानि नाथ पहिं आए।।
पत्नी के वचन उसे बाणों-से लगे, और पौ फटते ही वह उठकर सभा में गया। वह अति अभिमान से सिंहासन पर फूलकर बैठ गया, सब भय भूलकर। इधर (राम के शिविर में) राम ने अंगद को बुलाया, जिसने आकर प्रभु के चरणकमलों में सिर नवाया। बड़े आदर से पास बिठाकर, खर के संहारक कृपालु ने हँसकर कहा, "बालिपुत्र, मैं बहुत प्रसन्न हूँ; प्यारे, जो पूछता हूँ सच बताओ। रावण राक्षस कुल का तिलक है, जिसका अतुल भुजबल जगत में प्रसिद्ध है; तुमने उसके चार मुकुट गिराए — बताओ प्यारे, किस उपाय से पाए?" (अंगद बोला) "सुनो सर्वज्ञ प्रभु, शरणागतों को सुख देने वाले — वे मुकुट न थे, राजा के चार गुण थे। साम, दान, दंड और भेद राजा के हृदय में बसते हैं, हे प्रभु, ऐसा वेद कहते हैं; ये नीति और धर्म के सुंदर चरण हैं — यह मन में जानकर मैं (इन्हें लेकर) आपके पास आया।"
धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस। तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस।।38(((क)।। परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार। समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार।।38(ख)।।
(अंगद ने कहा) "चूँकि रावण धर्महीन है, प्रभु के चरणों से विमुख है, और काल के वश में है, इसलिए वे गुण उसे छोड़कर (आपके पास) आ गए; यह सुनिए, हे कोसलाधीश।" यह परम चतुराई सुनकर उदार राम मुस्कुराए; फिर बालिपुत्र ने उन्हें गढ़ (लंका) के सब समाचार कह सुनाए।
रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए।। लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा।। तब कपीस रिच्छेस बिभीषन। सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन।। करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा।। जथाजोग सेनापति कीन्हे। जूथप सकल बोलि तब लीन्हे।। प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए। सुनि कपि सिंघनाद करि धाए।। हरषित राम चरन सिर नावहिं। गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं।। गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा। जय रघुबीर कोसलाधीसा।। जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका।। घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी। मुखहिं निसान बजावहीं भेरी।।
जब राम को शत्रु का समाचार मिला, उन्होंने सब मंत्रियों को पास बुलाया। "लंका के चार बाँके द्वार हैं; किस प्रकार धावा बोला जाए, यह विचार करो।" तब कपिराज सुग्रीव, ऋक्षराज जाम्बवान और विभीषण ने, सूर्यवंश के भूषण (राम) को हृदय में स्मरण कर, विचारकर योजना दृढ़ की; बंदर सेना को चार टुकड़ियों में बाँटा। यथायोग्य सेनापति नियुक्त किए, फिर सब यूथपतियों को बुलाया। प्रभु का प्रताप कहकर सबको समझाया, और यह सुनकर बंदर सिंहनाद करते हुए दौड़े। हर्षित होकर वे राम के चरणों में सिर नवाते हैं, और पर्वत-शिखर पकड़कर सब वीर दौड़ते हैं; भालू-बंदर गरजते-ललकारते हैं, "रघुवीर कोसलाधीश की जय!" यद्यपि वे लंका को अत्यंत दुर्गम किला जानते हैं, प्रभु के प्रताप से बंदर निडर होकर चलते हैं। घटाटोप बनाकर चारों ओर से घेर लेते हैं, आगे रणभेरी और नगाड़े बजाते हैं।
जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव। गर्जहिं सिंघनाद कपि भालु महा बल सींव।।39।।
"राम की जय, लक्ष्मण की जय, कपिराज सुग्रीव की जय!" महान बल की पराकाष्ठा वे बंदर और भालू प्रचंड सिंहनाद से गरजते हैं।
लंकाँ भयउ कोलाहल भारी। सुना दसानन अति अहँकारी।। देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई। बिहँसि निसाचर सेन बोलाई।। आए कीस काल के प्रेरे। छुधावंत सब निसिचर मेरे।। अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा। गृह बैठे अहार बिधि दीन्हा।। सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू। धरि धरि भालु कीस सब खाहू।। उमा रावनहि अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना।। चले निसाचर आयसु मागी। गहि कर भिंडिपाल बर साँगी।। तोमर मुग्दर परसु प्रचंडा। सुल कृपान परिघ गिरिखंडा।। जिमि अरुनोपल निकर निहारी। धावहिं सठ खग मांस अहारी।। चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा। तिमि धाए मनुजाद अबूझा।।
लंका में बड़ा कोलाहल मचा, जिसे अत्यंत अहंकारी रावण ने सुना। वह हँसकर बोला, इन वानरों की ढिठाई तो देखो, और उसने अपनी राक्षस सेना को बुलाया: ये वानर अपने काल की प्रेरणा से आए हैं; मेरे सब राक्षस भूखे हैं, यह तो विधाता ने घर बैठे ही आहार दे दिया है। ऐसा कहकर उस दुष्ट ने अट्टहास किया और आज्ञा दी: हे वीरो, चारों दिशाओं में जाओ और पकड़-पकड़कर सब भालुओं और वानरों को खा जाओ। हे उमा, रावण को ऐसा अभिमान था जैसे टिटिहरी पक्षी पैर ऊपर करके सोता है (मानो आकाश को थाम लेगा)। राक्षस आज्ञा पाकर हाथों में उत्तम भिंडिपाल, साँग, तोमर, मुद्गर, प्रचंड फरसे, शूल, कृपाण, परिघ और पर्वत के टुकड़े लेकर चल पड़े। जैसे मांसाहारी मूर्ख पक्षी लाल पत्थरों के ढेर को मांस समझकर उस पर झपटते हैं और चोंच टूटने का दुख नहीं सोचते, वैसे ही ये नासमझ राक्षस दौड़ पड़े।
नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर। कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर।।40।।
अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र, बाण और धनुष धारण किए हुए बलवान और वीर राक्षस योद्धा किले की चारदीवारी के कंगूरों पर चढ़ गए। करोड़ों-करोड़ों रणधीर योद्धा वहाँ जा डटे।
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे।। बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ।। बाजहिं भेरि नफीरि अपारा। सुनि कादर उर जाहिं दरारा।। देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा। अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा।। धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा।। कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं।। उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई।। निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं।।
किले के कंगूरों पर योद्धा ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो सुमेरु पर्वत की चोटियों पर बादल बैठे हों। युद्ध के ढोल और नगाड़े बज रहे थे, जिनकी ध्वनि सुनकर योद्धाओं के मन में उत्साह भर आता था। अपार भेरियाँ और नफीरियाँ बज रही थीं, जिन्हें सुनकर कायरों के हृदय दरक जाते थे। राक्षसों ने वानरों की सेना देखी—विशाल शरीर वाले भालू जैसे बड़े योद्धा, जो कठिन घाटियों की परवाह न करते हुए दौड़ते और पर्वतों को फोड़कर राह बनाते थे। करोड़ों योद्धा दाँत किटकिटाते, गरजते, ओठ काटते और बड़े क्रोध से ललकारते थे। उधर रावण की और इधर राम की जय-जयकार हो रही थी; युद्ध में जय-जय की पुकार मच गई। राक्षस पर्वतों की चोटियों के समूह ढहाते और वानर उन्हें उछलकर पकड़कर वापस फेंक देते थे।
धरि कुधर खंड प्रचंड कर्कट भालु गढ़ पर डारहीं। झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं।। अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए। कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए।।
भालू और वानर पर्वतों के प्रचंड टुकड़े हाथों में लेकर किले पर डालने लगे। वे झपटकर राक्षसों को पैरों से पकड़कर धरती पर पटक देते, और भाग जाने पर फिर से उन्हें ललकारते। अत्यंत चंचल और तरुण प्रताप से भरे वे उछलते और तमककर किले पर चढ़ते चले गए। महलों पर चढ़कर वानर-भालू जहाँ-तहाँ श्रीराम का यश गाने लगे।
एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ। ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ।।41।।
एक-एक वानर एक-एक राक्षस को पकड़कर फिर दौड़ चले। योद्धा ऊपर-नीचे होकर धरती पर आ गिरते थे।
राम प्रताप प्रबल कपिजूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा।। चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर। जय रघुबीर प्रताप दिवाकर।। चले निसाचर निकर पराई। प्रबल पवन जिमि घन समुदाई।। हाहाकार भयउ पुर भारी। रोवहिं बालक आतुर नारी।। सब मिलि देहिं रावनहि गारी। राज करत एहिं मृत्यु हँकारी।। निज दल बिचल सुनी तेहिं काना। फेरि सुभट लंकेस रिसाना।। जो रन बिमुख सुना मैं काना। सो मैं हतब कराल कृपाना।। सर्बसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना।। उग्र बचन सुनि सकल डेराने। चले क्रोध करि सुभट लजाने।। सन्मुख मरन बीर कै सोभा। तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा।।
श्रीराम के प्रबल प्रताप से वानरों के दल राक्षस योद्धाओं के समूहों को मसलने लगे। वानर जहाँ-तहाँ किले पर चढ़ गए और सूर्य समान प्रतापी रघुवीर की जय बोलने लगे। राक्षसों के झुंड ऐसे भाग चले जैसे प्रबल पवन से बादलों के समूह। नगर में भारी हाहाकार मच गया; बालक और व्याकुल स्त्रियाँ रोने लगीं। सब मिलकर रावण को गाली देने लगे: राज करते हुए इसी ने यह मृत्यु बुलाई है। अपनी सेना को विचलित हुआ सुनकर लंकापति रावण क्रोधित होकर योद्धाओं को लौटाने लगा: जिसे मैं रण से विमुख हुआ सुनूँगा, उसे अपनी भयंकर कृपाण से मार डालूँगा। मेरा सर्वस्व खाकर, नाना भोग भोगकर, अब समरभूमि में तुम्हें अपने प्राण प्यारे हो गए हैं। इस उग्र वचन को सुनकर सब डर गए और लजाकर क्रोध करके लौट पड़े। शत्रु के सम्मुख मरना वीर की शोभा है, तब उन्होंने प्राणों का लोभ त्याग दिया।
बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि। ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारी।।42।।
अनेक आयुध धारण किए सब योद्धा बार-बार ललकारकर भिड़ने लगे। उन्होंने परिघ और त्रिशूलों से मारकर भालुओं और वानरों को व्याकुल कर दिया।
भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे।। कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता। कहँ नल नील दुबिद बलवंता।। निज दल बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना।। मेघनाद तहँ करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई।। पवनतनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा।। कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा।। भंजेउ रथ सारथी निपाता। ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता।। दुसरें सूत बिकल तेहि जाना। स्यंदन घालि तुरत गृह आना।।
भय से व्याकुल होकर वानर भागने लगे, यद्यपि हे उमा, अंत में वे ही जीतेंगे। कोई पुकारता—अंगद कहाँ हैं, हनुमान कहाँ हैं; बलवान नल, नील और द्विविद कहाँ हैं? जब हनुमान ने अपने दल को विकल सुना—वे बलवान पश्चिम द्वार पर थे, जहाँ मेघनाद युद्ध कर रहा था और अत्यंत कठिनाई से भी वह द्वार टूट नहीं रहा था। पवनपुत्र के मन में अत्यंत क्रोध हुआ और वे काल के समान प्रबल योद्धा गरजे। वे कूदकर लंका के किले पर आ गए और पर्वत लेकर मेघनाद की ओर दौड़े। उन्होंने रथ तोड़ डाला, सारथी को गिरा दिया और मेघनाद के हृदय में लात मारी। दूसरे सारथी ने उसे विकल जानकर तुरंत रथ में डालकर घर पहुँचा दिया।
अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल। रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल।।43।।
अंगद ने सुना कि पवनपुत्र अकेले ही किले पर चले गए। रण के बाँके वीर बालिपुत्र अंगद वानरों के खेल की भाँति उछलकर किले पर चढ़ गए।
जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर।। रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहि कोसलाधीस दोहाई।। कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा।। नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुइ कपि आए उतपाती।। कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं।। पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा।। गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी।। काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू।।
दोनों वानर क्रोधित और युद्ध के लिए उत्सुक होकर, हृदय में श्रीराम का प्रताप स्मरण कर, कोसलाधीश की दुहाई देते हुए दौड़कर रावण के भवन पर चढ़ गए। कलश सहित भवन को पकड़कर उन्होंने ढहा दिया, यह देखकर राक्षसपति भयभीत हुआ। स्त्रियों के झुंड हाथों से छाती पीटने लगे—अब दो उत्पाती वानर आ गए। वे वानरलीला करके उन्हें डराते और श्रीरामचंद्र का सुयश सुनाते। फिर सोने का खंभा हाथ में लेकर उन्होंने कहा—उत्पात आरंभ करें! गरजकर वे शत्रु सेना में जा पड़े और भुजबल से राक्षसों को मसलने लगे। किसी को लात, किसी को थप्पड़ मारते—राम को न भजने का यह फल पाओ!
एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड। रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड।।44।।
वे एक-एक को मसलते और उनके सिर तोड़कर फेंकते, जो रावण के आगे ऐसे गिरते मानो दही के मटके फूट रहे हों।
महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं।। कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा।। खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी।। उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर।। देहिं परम गति सो जियँ जानी। अस कृपाल को कहहु भवानी।। अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी।। अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा।। लंकाँ द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहि सिंधु दुइ मंदर जैसें।।
जब भी वे बड़े-बड़े मुखियाओं को पकड़ते, उन्हें पैरों से पकड़कर प्रभु के पास फेंक देते। विभीषण उनके नाम बताते और राम उन्हें भी अपना धाम देते। दुष्ट राक्षस, ब्राह्मणों के मांस का भोग करने वाले, वह गति पा गए जिसे योगी माँगते हैं। हे उमा, राम इतने कोमल हृदय और करुणा के सागर हैं कि जो राक्षस बैरभाव से भी उन्हें स्मरण करते थे, उन्हें भी हृदय में जानकर परम गति देते हैं। हे भवानी, कहो, ऐसा कृपालु कौन है? ऐसे प्रभु को सुनकर भी जो भ्रम त्यागकर उन्हें नहीं भजता, वह मंदबुद्धि मनुष्य परम अभागा है। अवधेश राम ने कहा—अंगद और हनुमान ने इस प्रकार किले में प्रवेश किया है। लंका में दोनों वानर ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो दो मंदराचल समुद्र को मथ रहे हों।
भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत। कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत।।45।।
भुजबल से शत्रु सेना को मसल-मलकर, दिन का अंत होते देख, दोनों बिना किसी थकान के कूदकर जहाँ भगवान थे वहाँ आ गए।
प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए।। राम कृपा करि जुगल निहारे। भए बिगतश्रम परम सुखारे।। गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना।। जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई।। निसिचर अनी देखि कपि फिरे। जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे।। द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी। लरत सुभट नहिं मानहिं हारी।। महाबीर निसिचर सब कारे। नाना बरन बलीमुख भारे।। सबल जुगल दल समबल जोधा। कौतुक करत लरत करि क्रोधा।। प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे।। अनिप अकंपन अरु अतिकाया। बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया।। भयउ निमिष महँ अति अँधियारा। बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा।।
उन्होंने प्रभु के चरणकमलों में सिर नवाया, और उन वीरों को देखकर रघुपति मन में प्रसन्न हुए। श्रीराम ने कृपा करके दोनों को निहारा और वे थकानरहित होकर परम सुखी हो गए। अंगद-हनुमान को गया जानकर अनेक भालू-वानर योद्धा लौट पड़े। राक्षस संध्या के बल का सहारा पाकर दशशीश की दुहाई देते हुए दौड़े। राक्षस सेना देखकर वानर लौटे और जहाँ-तहाँ दाँत किटकिटाकर योद्धा भिड़ गए। दोनों प्रबल दल बार-बार ललकारकर लड़ते, योद्धा हार नहीं मानते थे। सब राक्षस महावीर और काले थे, तथा बलवान वानर अनेक रंगों के भारी थे। दोनों दल बलवान और समान बल के योद्धा थे, क्रोध करके कौतुक-सा करते हुए लड़ते थे। वे ऐसे लड़ते मानो वर्षा और शरद के घने बादल वायु की प्रेरणा से टकरा रहे हों। सेनापति अकंपन और अतिकाय ने अपनी सेना को विचलित होते देख माया रची। पल भर में घना अँधेरा हो गया और रक्त, पत्थर तथा राख की वर्षा होने लगी।
देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार। एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार।।46।।
दसों दिशाओं में घना अँधेरा देखकर वानर-दल घबरा गया। एक-दूसरे को कोई देख न पाता था और जहाँ-तहाँ पुकार करते थे।
सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना।। समाचार सब कहि समुझाए। सुनत कोपि कपिकुंजर धाए।। पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा।। भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं।। भालु बलीमुख पाइ प्रकासा। धाए हरष बिगत श्रम त्रासा।। हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे।। भागत पट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी।। गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं।।
रघुनाथ ने सारा मर्म जान लिया और अंगद-हनुमान को बुलाया। उन्होंने सारा समाचार कहकर समझाया, जिसे सुनकर कपिकुंजर क्रोधित होकर दौड़े। फिर कृपालु प्रभु ने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरंत अग्निबाण चलाया। सर्वत्र प्रकाश हो गया, कहीं अँधेरा न रहा—जैसे ज्ञान के उदय से संशय मिट जाते हैं। भालू-वानर प्रकाश पाकर हर्ष से, थकान और भय से रहित होकर दौड़े। हनुमान और अंगद रण में गरजे, जिनकी हाँक सुनते ही राक्षस भाग गए। भागते हुए राक्षसों को भालू-वानर पकड़कर धरती पर पटक देते और अद्भुत करनी करते। पैरों से पकड़कर समुद्र में डाल देते, जहाँ मगर, साँप और मछलियाँ उन्हें पकड़-पकड़कर खा जातीं।
कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ। गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ।।47।।
कुछ मारे गए, कुछ घायल हुए और कुछ भागकर किले पर चढ़ गए। शत्रु सेना का बल विचलित करके भालू-वानर गरजने लगे।
निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी।। राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगतश्रम बानर तबही।। उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे।। आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहहु बेगि का करिअ बिचारा।। माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर।। बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन।। जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी।। बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो।।
रात हुई जानकर वानरों की चारों सेनाएँ जहाँ कोसलाधीश थे वहाँ आ गईं। श्रीराम ने कृपा करके सबकी ओर देखा और तभी वानर थकानरहित हो गए। उधर रावण ने मंत्रियों को बुलाया और सबसे कहा कि कौन-कौन योद्धा मारे गए: वानरों ने आधी सेना संहार कर दी; शीघ्र कहो, क्या विचार करें। माल्यवंत, अत्यंत बूढ़ा राक्षस, रावण का नाना और श्रेष्ठ मंत्री, अत्यंत पवित्र नीति के वचन बोला: हे तात, मेरी कुछ सीख सुनो। जब से तुमने सीता को हरकर लाया है, तब से अवर्णनीय अपशकुन हो रहे हैं। जिसका यश वेद-पुराण गाते हैं, राम से विमुख होकर किसी ने सुख नहीं पाया।
हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान। जेहि मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान।।48(क)।। कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध। सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध।।48(ख)।।
अपने भाई (हिरण्यकशिपु) सहित बलवान हिरण्याक्ष, और बलशाली मधु-कैटभ—जिसने इन्हें मारा, वही कृपासिंधु भगवान अब (राम रूप में) अवतरित हुए हैं। वे दुष्टों के लिए कालरूप हैं, पाप के वन को जलाने वाली अग्नि हैं, गुणों के भंडार और अपार ज्ञानस्वरूप हैं। जिन्हें शिव और ब्रह्मा भी सेवते हैं, उनसे कैसा विरोध?
परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही।। ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे।। बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही।। तेहि अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना।। सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा।। कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा।। सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा।। करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा।। कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा।। बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए।।
बैर त्यागकर सीता को लौटा दो; कृपानिधि और परम स्नेही प्रभु को भजो। ये वचन रावण को बाणों के समान लगे, और वह बोला—अरे अभागे, मुँह काला करके निकल जा! तू बूढ़ा है, नहीं तो तुझे मार डालता; अब मुझे अपना मुख न दिखाना। माल्यवंत ने अपने मन में सोचा—यह कृपानिधान (राम) इसे मारना चाहते हैं। वह उठकर दुर्वचन कहता हुआ चला गया, तब क्रोधित मेघनाद बोला: प्रातः मेरा कौतुक देखिएगा; बहुत करूँगा, थोड़ा क्या कहूँ। पुत्र के वचन सुनकर रावण को भरोसा हुआ और उसने प्रेम से उसे गोद में बैठाया। विचार करते-करते भोर हो गया, और वानर फिर चारों द्वारों पर लग गए। क्रोध करके वानरों ने दुर्गम किले को घेर लिया और नगर में बड़ा कोलाहल मच गया। अनेक आयुध धारण किए राक्षस दौड़े और किले से पर्वतों की चोटियाँ ढहाने लगे।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
रामचरितमानस का लंका काण्ड किस विषय में है?
वानर सेना समुद्र पर सेतु बाँधती है और महायुद्ध आरंभ होता है। रावण के भाई कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाद मारे जाते हैं; अंततः राम ब्रह्मास्त्र से रावण का वध करते हैं। विभीषण लंका के राजा बनते हैं, और अग्नि-परीक्षा में शुद्ध सिद्ध हुई सीता का राम से पुनर्मिलन होता है।
रामचरितमानस क्या है?
रामचरितमानस संत-कवि गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी) द्वारा अवधी में रचित रामायण है, जो उत्तर भारत में सर्वाधिक प्रिय और पठित ग्रंथों में से एक है। यह सात काण्डों में विभाजित है: बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुंदर, लंका और उत्तर।
अपने नाम से राम/सुंदरकांड पाठ अर्पित करें
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