उत्तर काण्ड के बारे में
राम, सीता और लक्ष्मण विजयी होकर अयोध्या लौटते हैं, जहाँ अंततः राम का राज्याभिषेक होता है — राम-राज्य का स्वर्ण-युग आरंभ होता है। काण्ड का समापन भक्ति और धर्म के दिव्य प्रसंगों से होता है, जिनमें काकभुशुण्डि-संवाद और राम-नाम की महिमा सम्मिलित है।
पाठ कैसे करें
उत्तर काण्ड का पाठ उसकी मूल अवधी में (नीचे देवनागरी में) किया जाता है। धीरे-धीरे, पद-दर-पद पढ़ें; विशेषकर सुंदरकांड का पाठ साहस और रक्षा हेतु किया जाता है।
मूल पाठ
श्लोक और अर्थ
केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्। पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्।।1।। कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ। जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसड्गिनौ।।2।। कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्। कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनंगमोचनम्।।3।।
उत्तर काण्ड के मंगलाचरण के श्लोक। मैं जानकी के स्वामी, रघुकुल श्रेष्ठ श्रीराम को नमन करता हूँ, जो मोर के कंठ जैसे नीले वर्ण के हैं, जिनके चरण-कमलों पर ब्राह्मण का चिह्न है, जो सुंदरता और पीतांबर से सुशोभित, कमल-नयन और सदा प्रसन्न हैं, हाथ में धनुष-बाण लिए, वानरों के समूह से घिरे, भाई से सेवित और पुष्पक विमान पर आरूढ़ हैं। मैं कोसलनाथ के कोमल-सुंदर चरण-कमलों को प्रणाम करता हूँ, जिन्हें ब्रह्मा और महेश वंदन करते हैं, जो सीता के करकमलों से दुलारे जाते हैं और भक्त के मन-रूपी भ्रमर के सदा साथी हैं। मैं शंकर को नमन करता हूँ, जो कुंद, चंद्र और शंख के समान गौर-सुंदर हैं, अम्बिका के पति, इच्छित सिद्धि देने वाले, करुणामय और कमल-नयन हैं तथा कामदेव को जीतने वाले मुक्तिदाता हैं।
रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग। जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग।। सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर। प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर।। कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ। आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोइ।। भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार। जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार।।
चौदह वर्ष की अवधि का केवल एक दिन शेष था और नगर के लोग अत्यंत व्याकुल थे; जहाँ-तहाँ स्त्री-पुरुष राम के वियोग में दुबले शरीर से शोक कर रहे थे। तब सुंदर शुभ शकुन होने लगे और सबका मन प्रसन्न हो गया, मानो प्रभु के आगमन की सूचना देने के लिए नगर चारों ओर से रमणीय हो उठा। कौसल्या आदि सब माताओं के मन में ऐसा आनंद हुआ, मानो अभी कोई आकर कहेगा कि प्रभु सीता और छोटे भाई सहित आ गए हैं। भरत की आँख और दाहिनी भुजा बार-बार फड़कने लगी; इसे शुभ शकुन जानकर उनका मन अत्यंत हर्षित हुआ और वे विचार करने लगे।
रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा।। कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।। अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी।। कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा।। जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।। जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ।। मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई।। बीतें अवधि रहहि जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना।।
भरत ने सोचा: अवधि का केवल एक दिन शेष है, और यह सोचते ही उनके मन में अपार दुःख भर गया। क्या कारण है कि प्रभु नहीं आए? कहीं मुझे कुटिल जानकर उन्होंने मुझे भुला तो नहीं दिया। अहा! लक्ष्मण धन्य और बड़भागी हैं, जो राम के चरण-कमलों के अनुरागी हैं; प्रभु ने मुझे कपटी-कुटिल जान लिया, इसीलिए साथ नहीं ले गए। यदि प्रभु मेरे कर्मों को विचारें तो सौ करोड़ कल्पों में भी मेरा निस्तार नहीं होगा। पर प्रभु सेवक के अवगुण कभी नहीं मानते; वे दीनबंधु और अत्यंत कोमल स्वभाव के हैं। मेरे हृदय में यही दृढ़ विश्वास है कि राम मुझसे अवश्य मिलेंगे और शकुन शुभ हैं। पर यदि अवधि बीत जाने पर भी मेरे प्राण रह गए, तो जगत में मेरे समान अधम कौन होगा।
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत। बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जनु पोत।।1(क)।। बैठि देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात। राम राम रघुपति जपत स्त्रवत नयन जलजात।।1(ख)।।
भरत का मन राम के वियोग-सागर में डूब रहा था, तभी पवनपुत्र हनुमान ब्राह्मण का रूप धारण कर मानो नाव बनकर वहाँ आ पहुँचे। हनुमान ने देखा कि भरत कुश के आसन पर बैठे हैं, जटाओं का मुकुट बनाए, दुबले शरीर वाले, 'राम-राम रघुपति' जपते हुए, और उनके कमल-नयनों से आँसू बह रहे हैं।
देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ।। मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।। जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती।। रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।। रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत।। सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा।। को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए।। मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना।। दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर।। मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता।। कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते।। बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता।। एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।। नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।। तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा।। कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं।।
भरत को देखकर हनुमान अत्यंत हर्षित हुए, शरीर पुलकित हो उठा और नेत्रों से आँसू बरसने लगे, और मन में बहुत सुख मानकर उन्होंने कानों को अमृत-समान वाणी कही: "जिनके वियोग में आप दिन-रात शोक करते हैं, जिनके गुणों को निरंतर रटते हैं, वे रघुकुल-तिलक, सज्जनों को सुख देने वाले, देवताओं और मुनियों के रक्षक कुशलपूर्वक आ गए हैं। शत्रु को रण में जीतकर देवता उनका सुयश गाते हैं; प्रभु सीता और छोटे भाई सहित आ रहे हैं।" यह सुनते ही भरत के सब दुःख भूल गए, जैसे प्यासे को अमृत मिल जाए, और उन्होंने पूछा, "तुम कौन हो, तात? कहाँ से आए हो? तुमने मुझे परम प्रिय वचन सुनाए।" "हे कृपानिधान, मैं पवनपुत्र वानर हनुमान हूँ, मेरा नाम सुनो। दीनबंधु रघुपति का किंकर हूँ।" यह सुनकर भरत उठकर आदरपूर्वक उनसे गले मिले, प्रेम हृदय में नहीं समाता था, नेत्रों से जल बहता और शरीर पुलकित था। "वानर, तुम्हारे दर्शन से मेरे सब दुःख बीत गए; आज मुझे प्रिय राम मिल गए," ऐसा कह उन्होंने बार-बार कुशल पूछी। "भाई, मैं तुम्हें क्या दूँ? विचार कर देखा तो जगत में इस संदेश के समान कुछ नहीं; मैं तुम्हारे ऋण से उऋण नहीं हो सकता। अब मुझे प्रभु का चरित्र सुनाओ।" तब हनुमान ने चरणों में सिर नवाकर रघुपति के सब गुणों की कथा कही। भरत ने पूछा, "हे वानर, कहो, क्या कृपालु प्रभु कभी मुझे अपने दास के समान स्मरण करते हैं?"
निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर् यो। सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकित तन चरनन्हि पर् यो।। रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो। काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो।।
हनुमान ने कहा, "रघुवंश के भूषण आपको अपने दास के समान स्मरण करते हैं।" भरत के अत्यंत विनीत वचन सुनकर वानर पुलकित हो उठे और उनके चरणों पर गिर पड़े। जिनके गुणों को स्वयं रघुवीर अपने मुख से कहते हैं, जो चराचर जगत के स्वामी हैं, वे भला विनम्र, परम पवित्र और सद्गुणों के सागर क्यों न हों।
राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात। पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात।।2(क)।। भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं। कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि।।2(ख)।।
हनुमान ने कहा, "हे नाथ, राम आपको प्राणों के समान प्रिय हैं; मेरे वचन सत्य हैं, तात।" भरत से बार-बार मिलते और यह सुनते हुए उनका हर्ष हृदय में नहीं समा रहा था। भरत के चरणों में सिर नवाकर वानर तुरंत राम के पास गए; जाकर हर्षपूर्वक सब कुशल-समाचार कहे, तब प्रभु हर्षित होकर विमान पर चढ़े।
हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए।। पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई।। सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई।। समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए।। दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला।। भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी।। जे जैसेहिं तैसेहिं उटि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं।। एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई।। अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी।। बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा।।
भरत हर्षित होकर अयोध्या आए और गुरु को सब समाचार सुनाए, फिर महल में यह बात जनाई कि रघुराई नगर में कुशलपूर्वक आ रहे हैं। यह सुनते ही सब माताएँ उठकर दौड़ीं, और भरत ने प्रभु की कुशल कहकर उन्हें समझाया। नगरवासियों को समाचार मिला तो स्त्री-पुरुष सब हर्षित होकर दौड़ पड़े, दही, दूब, रोचन, फल, फूल और मंगल की जड़ नए तुलसीदल लेकर। हाथी-सी चाल वाली सुंदरियाँ सोने के थाल भर-भरकर गाती हुई चलीं; जो जैसे थी वैसे ही उठकर दौड़ी, बालक और वृद्धों को साथ नहीं लाई। एक-दूसरे से पूछती, "भाई, क्या तुमने दयालु रघुराई को देखा?" प्रभु को अयोध्या आता जानकर वह नगरी शोभा की खान बन गई; सुहावनी शीतल-मंद-सुगंध त्रिविध वायु बहने लगी और सरयू का जल अत्यंत निर्मल हो गया।
हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत। चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत।।3(क)।। बहुतक चढ़ी अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान। देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान।।3(ख)।। राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान। बढ़यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान।।3(ग)।।
हर्षित होकर, गुरु, कुटुम्ब, छोटे भाइयों और ब्राह्मणों के समूह सहित भरत बड़े प्रेम से कृपा के धाम श्रीराम के सम्मुख चले। बहुत-से लोग अटारियों पर चढ़कर आकाश में विमान को देखने लगे; उसे देख मधुर स्वर में हर्षित होकर सुंदर मंगलगान करने लगे। रघुपति-रूपी पूर्णिमा के चंद्र को देखकर नगर-रूपी समुद्र हर्षित हुआ और कोलाहल बढ़ गया, मानो स्त्री-रूपी तरंगें उमड़ पड़ीं।
इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर।। सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा।। जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना।। अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।। जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।। जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा।। अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी।। हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी।।
यहाँ, सूर्यकुल-कमल के सूर्य श्रीराम वानरों को मनोहर नगर दिखाने लगे: "हे सुग्रीव, अंगद और लंकेश, सुनो, यह पवित्र पुरी और रुचिर देश है। यद्यपि वेद-पुराण वैकुण्ठ की महिमा कहते हैं और सारा जगत जानता है, फिर भी वह वैकुण्ठ भी अयोध्या के समान प्रिय नहीं; इस रहस्य को कोई विरला ही जानता है। यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है, और इसके उत्तर दिशा में पावन सरयू बहती है, जिसमें स्नान से मनुष्य बिना परिश्रम मेरे समीप वास पाते हैं। यहाँ के निवासी मुझे अत्यंत प्रिय हैं; मेरी यह पुरी मुझे धाम देने वाली और सुख की राशि है।" प्रभु की वाणी सुनकर सब वानर हर्षित हुए: "धन्य है वह अयोध्या, जिसकी राम स्वयं बड़ाई करते हैं।"
आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान। नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान।।4(क)।। उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु। प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु।।4(ख)।।
सब लोगों को आते देख कृपासिंधु भगवान ने विमान को नगर के निकट प्रेरित किया और वह पृथ्वी पर उतर आया। उतरकर प्रभु ने पुष्पक से कहा, "तुम कुबेर के पास जाओ।" राम की प्रेरणा से वह चला, उसे सेवा का हर्ष भी था और वियोग का अत्यंत दुःख भी।
आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा।। बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक।। धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह।। भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया।। सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा।। गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज।। परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए।। स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े।।
भरत सब लोगों के साथ आए, जिनके शरीर श्रीरघुवीर के वियोग से दुबले हो गए थे। वामदेव, वसिष्ठ और मुनियों के नायकों को देखकर प्रभु ने धनुष-बाण भूमि पर रख दिए, और छोटे भाई सहित दौड़कर गुरु के चरण-कमल पकड़ लिए, शरीर पुलकित हो उठा। गले मिलकर मुनिराज ने कुशल पूछी: "आपकी दया से हम कुशल हैं।" फिर धर्मधुरंधर रघुकुलनाथ ने सब ब्राह्मणों को सिर नवाया। तब भरत ने प्रभु के चरण-कमल पकड़े, जिन्हें देवता, मुनि, शंकर और ब्रह्मा नमन करते हैं; वे भूमि पर गिर पड़े और उठाने पर भी न उठे, तब कृपासिंधु ने बलपूर्वक उठाकर हृदय से लगा लिया। उनके श्याम शरीर के रोम खड़े हो गए और नए कमल-से नेत्रों में जल भर आया।
राजीव लोचन स्त्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी। अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी।। प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही। जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही।।1।। बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई। सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई।। अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो। बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो।।2।।
कमल-नेत्रों से जल बहाते हुए, सुंदर शरीर पर पुलकावली सजी हुई, त्रिभुवन के स्वामी प्रभु ने अत्यंत प्रेम से छोटे भाई को हृदय से लगाकर उससे भेंट की। प्रभु का भाई से मिलना ऐसा शोभित हुआ कि मुझसे उपमा नहीं कही जाती, मानो प्रेम और श्रृंगार शरीर धारण कर मिले और परम शोभा को प्राप्त हुए। कृपानिधि ने भरत से कुशल पूछी, पर भावना से वचन शीघ्र नहीं आ रहे थे; हे पार्वती, वह सुख वचन और मन से परे है, उसे तो जो पाए वही जान सकता है। भरत ने कहा, "अब सब कुशल है; अपने सेवक को आर्त जानकर कोसलनाथ ने दर्शन दिए; वियोग के समुद्र में डूबते हुए मुझे कृपानिधान ने हाथ पकड़कर उबार लिया।"
पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ। लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ।।5।।
तब प्रभु ने हर्षित होकर शत्रुघ्न को हृदय से लगाकर गले लगाया, और फिर लक्ष्मण तथा भरत, दोनों भाई परम प्रेम से आपस में मिले।
भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे।। सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा।। प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी।। प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी।। अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथाजोग मिले सबहि कृपाला।। कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी।। छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना।। एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा।। कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई।।
तब लक्ष्मण भरत के छोटे भाई शत्रुघ्न से मिले, और दुःसह वियोग से उत्पन्न दुःख मिट गया। भरत ने सीता के चरणों में सिर नवाया और छोटे भाई सहित परम सुख पाया। प्रभु को देखकर नगरवासी हर्षित हुए और वियोग से उत्पन्न सारी विपत्ति नष्ट हो गई। सब लोगों को प्रेम में आतुर देखकर खरारि कृपालु ने अनोखी लीला की: उन्होंने उसी क्षण असंख्य रूप प्रकट किए और यथायोग्य सबसे मिले। रघुवीर ने कृपादृष्टि से देखकर सब स्त्री-पुरुषों को शोकरहित कर दिया; क्षण भर में भगवान सबसे मिल गए, हे उमा, यह मर्म किसी ने न जाना। इस प्रकार सबको सुखी करके शील और गुण के धाम राम आगे चले, और कौसल्या आदि सब माताएँ ऐसे दौड़ीं जैसे बछड़े के लिए गाय।
जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं। दिन अंत पुर रुख स्त्रवत थन हुंकार करि धावत भई।। अति प्रेम सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे। गइ बिषम बियोग भव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे।।
जैसे गाएँ अपने छोटे बछड़ों को घर छोड़कर विवश होकर वन में चरने गई हों और दिन के अंत में थनों से दूध बहाते हुए नगर की ओर हुंकार करती दौड़ पड़ती हैं, वैसे ही सब माताएँ अत्यंत प्रेम से राम से मिलीं और अनेक प्रकार के कोमल वचन कहे। उनका विषम वियोग और संसार का दुःख जाता रहा और उन्होंने अगणित हर्ष और सुख पाए।
भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि। रामहि मिलत कैकेई हृदयँ बहुत सकुचानि।।6(क)।। लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ। कैकेइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ।।6।।
सुमित्रा अपने पुत्र लक्ष्मण से मिलीं, उन्हें राम के चरणों में प्रीति वाला जानकर। राम के मिलने पर कैकेयी हृदय में बहुत सकुचाईं। लक्ष्मण सब माताओं से मिले और आशीष पाकर हर्षित हुए; वे कैकेयी से बार-बार मिले, फिर भी उनके मन का क्षोभ दूर न हुआ।
सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही।। देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता।। सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं।। कनक थार आरति उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं।। नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं।। कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।। हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा।। अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे।।
सीता सब सासुओं से मिलीं, चरणों में लगकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ; कुशल पूछकर उन्होंने आशीष दी, "तुम्हारा सुहाग अचल हो।" सब रघुपति के मुख-कमल को निहारतीं और मंगल जानकर नेत्रों के जल को रोके रहीं; सोने के थाल में आरती उतारतीं और बार-बार प्रभु के शरीर को देखतीं। वे अनेक प्रकार से न्योछावर करतीं और हृदय को परमानंद-हर्ष से भर लेतीं, और कौसल्या बार-बार कृपासिंधु, रणधीर रघुवीर को निहारतीं। वे बार-बार हृदय में विचारतीं, "किस प्रकार इसने लंकापति को मारा? मेरे दोनों बालक अत्यंत सुकुमार हैं और राक्षस बड़े बलवान महायोद्धा थे।"
लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु। परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु।।7।।
माता लक्ष्मण और सीता सहित प्रभु को निहारती रहीं, उनका मन परमानंद में मग्न था और शरीर बार-बार पुलकित होता था।
लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।। हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा।। भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा।। देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहि प्रभु पद प्रीती।। पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए।। गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे।। ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे।। मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।। सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमिष निमिष उपजत सुख नए।।
लंकापति (विभीषण), सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान, सुशील अंगद, हनुमान आदि सब वानर वीरों ने मनोहर मनुष्य-शरीर धारण किए, और उन्होंने अत्यंत प्रेम और आदर से भरत के स्नेह, शील, व्रत और नियमों का वर्णन किया। नगरवासियों की रीति देखकर सब प्रभु के चरणों की प्रीति की सराहना करने लगे। फिर रघुपति ने सब मित्रों को बुलाकर सिखाया कि वे मुनि वसिष्ठ के चरणों में लगें: "गुरु वसिष्ठ हमारे कुल के पूज्य हैं, और इनकी कृपा से ही रण में राक्षस मारे गए। हे मुनि, सुनिए, ये सब मेरे सखा हैं; ये युद्ध-रूपी सागर के लिए बेड़ा बने। मेरे हित के लिए इन्होंने अपने प्राण तक हार दिए, और ये मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं।" प्रभु के वचन सुनकर सब मग्न हो गए, और क्षण-क्षण नया सुख उपजने लगा।
कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।। आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ।।8(क)।। सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद। चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद।।8(ख)।।
फिर उन्होंने कौसल्या के चरणों में सिर नवाया, और उन्होंने हर्षित होकर आशीष दी, "तुम मुझे रघुनाथ के समान प्रिय हो।" आकाश पुष्पवृष्टि से भर गया और सुख के कंद राम भवन की ओर चले, तथा स्त्री-पुरुषों के समूह नगर देखने के लिए अटारियों पर चढ़ गए।
कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे।। बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू।। बीथीं सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराई।। नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे।। जहँ तहँ नारि निछावर करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं।। कंचन थार आरती नाना। जुबती सजें करहिं सुभ गाना।। करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें।। पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना।। तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं।।
सबने अपने-अपने द्वार पर विचित्र रूप से सजाए हुए सोने के कलश रखे; सबने मंगल के लिए बंदनवार, पताका और ध्वजाएँ बनाईं। सब गलियाँ सुगंध से सींची गईं और गजमुक्ताओं से अनेक चौक पुराए गए; अनेक प्रकार के सुंदर मंगल सजे और हर्षित नगर में बहुत से नगाड़े बजे। जहाँ-तहाँ स्त्रियाँ न्योछावर करतीं और हृदय में हर्ष भरकर आशीष देतीं, और सोने के थाल में आरती लिए सजी हुई युवतियाँ शुभ गान करतीं। वे आर्तिहर, रघुकुल-कमल-वन के सूर्य श्रीराम की आरती करतीं। नगर की शोभा, संपत्ति और कल्याण का वर्णन वेद, शेष और सरस्वती करते हैं, फिर भी वे इस चरित्र को देखकर ठगे रह जाते हैं; हे उमा, तब मनुष्य उनके गुण कैसे कह सकते हैं।
नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस। अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस।।9(क)।। होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान। पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान।।9(ख)।।
स्त्रियाँ अयोध्या-रूपी सरोवर की कुमुदिनियाँ थीं और रघुपति का वियोग सूर्य था जो उन्हें बंद किए था; अब वह सूर्य अस्त हो जाने पर वे राम-रूपी पूर्ण चंद्र को देखकर खिल उठीं। अनेक प्रकार के शुभ शकुन हुए और आकाश में नगाड़े बजे, और नगर के स्त्री-पुरुषों को सनाथ करके भगवान भवन की ओर चले।
प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।। ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।। कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए।। गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई।। सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन।। मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए।। कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका।। अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे। महाराज कहँ तिलक करीजै।।
कैकेयी को लज्जित जानकर प्रभु पहले उनके घर गए, हे भवानी, और उन्हें समझाकर बहुत सुख दिया; फिर हरि ने अपने भवन को गमन किया। जब कृपासिंधु महल में गए, तो नगर के सब स्त्री-पुरुष सुखी हो गए। गुरु वसिष्ठ ने ब्राह्मणों को बुलाकर कहा, "आज सुघड़ी और शुभ दिनों का समूह है; हे ब्राह्मणो, हर्षित होकर आज्ञा दो कि रामचंद्र सिंहासन पर बैठें।" वसिष्ठ मुनि के सुहावने वचन सुनकर सब ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न हुए, और अनेक ब्राह्मण कोमल वचन बोले, "राम का अभिषेक जगत को आनंद देने वाला है; अब हे मुनिवर, विलंब न कीजिए, महाराज का तिलक कीजिए।"
तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ। रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ।।10(क)।। जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ। हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ।।10(ख)।।
तब मुनि ने सुमंत्र से कहा, जो सुनते ही हर्षित होकर चल पड़े और तुरंत अनेक रथ तथा बहुत-से घोड़े और हाथी सजवा लिए। इधर-उधर दौड़ने वाले भेजकर उन्होंने मंगल-द्रव्य मँगवाए, और फिर हर्ष सहित आकर वसिष्ठ के चरणों में सिर नवाया।
अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।। राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई।। सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए।। पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे।। अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई।। भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई।। पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए।। करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे।।
अयोध्या अत्यंत सुंदर बनाई गई और देवताओं ने पुष्पवृष्टि की झड़ी लगा दी। राम ने सेवकों को बुलाकर कहा, "पहले जाकर मेरे सखाओं को स्नान कराओ," और यह सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़े और तुरंत सुग्रीव आदि को स्नान कराया। फिर करुणानिधि ने भरत को बुलाकर अपने हाथों से भरत की जटा सुलझाई, और भक्तवत्सल कृपालु रघुराई ने तीनों भाइयों को स्नान कराया। भरत के भाग्य और प्रभु की कोमलता को सौ करोड़ शेष भी नहीं गा सकते। फिर राम ने अपनी जटा खोली और गुरु की आज्ञा माँगकर स्नान किया; स्नान कर प्रभु ने आभूषण सजाए, और उनके अंग देखकर सौ कामदेव लज्जित हो गए।
सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ। दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ।।11(क)।। राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि। देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि।।11(ख)।। सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद। चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद।।11(ग)।।
सासुओं ने आदरपूर्वक सीता को तुरंत स्नान कराया और उनके अंग-अंग में दिव्य वस्त्र तथा उत्तम आभूषण सजाए। राम की बाईं ओर वे लक्ष्मी-सी रूप और गुण की खान शोभित हुईं, और यह देखकर सब माताएँ अपने जन्म को सफल मानकर हर्षित हुईं। हे गरुड़, सुनो: उस समय ब्रह्मा, शिव और मुनियों के समूह, सब देवता विमान पर चढ़कर सुख के कंद राम को देखने आए।
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा।। रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई।। जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई।। बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे।। प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा।। सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी।। बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे।। सिंघासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं।।
प्रभु को देखकर मुनियों के मन प्रेम से भर गए, और तुरंत दिव्य सिंहासन मँगाया गया, जिसका सूर्य-सा तेज वर्णन नहीं किया जा सकता; ब्राह्मणों को सिर नवाकर राम उस पर बैठे। जनकनंदिनी सीता सहित रघुराई को देखकर मुनियों का समुदाय अत्यंत प्रहर्षित हुआ, और ब्राह्मणों ने वेदमंत्र उच्चारे तथा आकाश में देवता-मुनि 'जय-जयकार' पुकारने लगे। पहले वसिष्ठ मुनि ने तिलक किया, फिर सब ब्राह्मणों को आज्ञा दी; माता ने पुत्र को देखकर हर्षित होकर बार-बार आरती उतारी। ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान दिए गए और सब याचकों को ऐसा कर दिया कि उन्हें फिर माँगना न पड़े; सिंहासन पर त्रिभुवन के स्वामी को देखकर देवताओं ने दुंदुभी बजाईं।
नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं। नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं।। भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते। गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते।।1।। श्री सहित दिनकर बंस बूषन काम बहु छबि सोहई। नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई।। मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे। अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे।।2।।
आकाश में बहुत-सी दुंदुभियाँ बजीं, गंधर्व और किन्नर गाने लगे, अप्सराओं के समूह नाचने लगे, और देवता-मुनि परमानंद पाने लगे। भरत आदि भाई, विभीषण, अंगद, हनुमान आदि सहित छत्र, चँवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिए शोभित हो रहे थे। श्री (सीता) सहित सूर्यवंश-भूषण अनेक कामदेवों की छवि से शोभित थे; उनका नए मेघ-सा सुंदर शरीर और पीला वस्त्र देवताओं के मन को मोह रहा था। मुकुट, बाजूबंद आदि विचित्र आभूषण अंग-अंग में सजे थे; धन्य हैं वे मनुष्य जो उनके कमल-नेत्र, विशाल वक्षस्थल और भुजाओं को निहारते हैं।
वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस। बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस।।12(क)।। भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम। बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम।। 12(ख)।। प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान। लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान।।12(ग)।।
हे गरुड़, वह शोभा, वह समाज और वह सुख कहते नहीं बनता; सरस्वती, शेष और वेद उसका वर्णन करते हैं, पर उस रस को केवल महेश ही जानते हैं। भिन्न-भिन्न स्तुति करके देवता अपने-अपने धाम को चले गए; तब वेद बंदी (भाट) के वेश में जहाँ श्रीराम थे वहाँ आए। सर्वज्ञ कृपानिधान प्रभु ने उनका अत्यंत आदर किया, और किसी ने कुछ भी मर्म न जाना जब वे उनके गुणगान करने लगे।
जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने। दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने।। अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे। जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे।।1।। तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे। भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे।। जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे। भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे।।2।। जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी।। बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे। जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे।।3।। जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी। नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी।। ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे। पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।।4।। अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने। षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने।। फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे। पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे।।5।। जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं। ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं।। करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं। मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।।6।।
वेदों ने स्तुति की: सगुण-निर्गुण रूप वाले, अनुपम रूप, राजाओं के शिरोमणि आपकी जय हो, जिन्होंने भुजबल से रावण और प्रचंड दुष्ट राक्षसों को मारा; मनुष्य-अवतार लेकर आपने संसार का भार हरा और घोर दुःखों को भस्म किया, इसलिए हे शरणागत के रक्षक, कृपालु प्रभु, अपनी शक्ति सहित हम आपको नमन करते हैं। आपकी विषम माया से देवता, असुर, नाग, मनुष्य और चराचर जीव मोहित हैं, काल और कर्म के बंधनों से भरे अगणित दिन-रात संसार-पथ पर भटकते हैं; जिन्हें आप करुणा से देखते हैं वे तीनों तापों से पार हो जाते हैं, इसलिए हे भव-दुःख काटने में दक्ष राम, हमारी रक्षा कीजिए, हम नमन करते हैं। जो ज्ञान के मद में उन्मत्त होकर भव-नाशिनी भक्ति का आदर नहीं करते, वे देवदुर्लभ पद से भी गिरते हुए हमने देखे हैं, हे हरि; पर जो विश्वास कर, सब आशा छोड़कर आपके दास बने रहते हैं, वे आपका नाम जपकर बिना श्रम संसार तर जाते हैं, उसी को हम स्मरण करते हैं। जिन चरणों को शिव और ब्रह्मा पूजते हैं, जिनकी पवित्र रज ने ऋषिपत्नी अहल्या का उद्धार किया, जिनके नख से मुनि-वंदित, त्रिलोक-पावन, त्रिपथगा सुरसरी (गंगा) निकली, जो ध्वज-वज्र-अंकुश-कमल के चिह्नों से युक्त हैं और वन में विचरते हुए काँटों के घाव सहे, मुकुंद, रमापति राम के उन युगल चरण-कमलों को हम नित्य भजते हैं। जिस संसार-वृक्ष का मूल अव्यक्त और अनादि है, जिसकी छाल को निगम-आगम चार वेद कहते हैं, जिसके छह स्कंध, पच्चीस शाखाएँ, घने पत्ते और फूल हैं, जो कटु-मधुर दो फल देता है और जिस पर अकेली माया-लता आश्रित है, जो नित नया पल्लवित-पुष्पित होता है, उस संसार-वृक्ष को हम नमन करते हैं। जो आपको अजन्मा, अद्वैत, अनुभवगम्य और मन से परे ब्रह्म रूप में ध्याते हैं, उन्हें, हे नाथ, हम न कह सकते हैं न जानते हैं; हम तो सदा आपके सगुण यश को गाते हैं। हे करुणा के धाम, सद्गुणों की खान, हम यही वर माँगते हैं: मन, वचन और कर्म के विकार त्यागकर हम आपके चरणों में अनुराग करें।
सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार। अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार।।13(क)।। बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर। बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर।।13(ख)।।
सबके देखते-देखते वेदों ने उदार विनती की और फिर अंतर्धान होकर ब्रह्मलोक को चले गए। हे विनतापुत्र गरुड़, सुनो, शंभु कहते हैं: तब स्वयं शिव वहाँ आए जहाँ रघुवीर थे, गद्गद वाणी से और पुलकित शरीर से विनती करते हुए।
जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।। अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।। दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।। रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।। महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।। मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।। मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।। हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।। बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।। भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।। अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।। अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।। नहिं राग न लोभ न मान मदा।।तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।। एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।। करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।। सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।। मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।। तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9।। गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।। रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।
शिव ने स्तुति की: रमा को आनंद देने वाले, दुःखों को शांत करने वाले राम की जय हो; भव के ताप और भय से व्याकुल अपने सेवक की रक्षा कीजिए। हे अवधेश, सुरेश, रमेश, विभु, मैं शरणागत माँगता हूँ, हे प्रभु, मेरी रक्षा कीजिए। बीस भुजाओं वाले दशमुख रावण के नाशक, आपने पृथ्वी का महान और अपार रोग दूर किया; राक्षसों के समूह पतंगों की भाँति आपके बाणों की प्रचंड अग्नि और तेज से जल गए। पृथ्वीमंडल के अति सुंदर आभूषण, उत्तम बाण, धनुष और तरकश धारण किए हुए, मद-मोह और महान ममता रात्रि का अंधकार-पुंज है और आप सूर्य की किरणों की सेना हैं। मन से उत्पन्न किरात (काम) मृग-समान लोगों के हृदय में कुभोग के बाणों से प्रहार करता है; हे नाथ, उसे मार गिराइए और अनाथों की रक्षा कीजिए, हे हरि, जो पामर विषयों के वन में भूल पड़े हैं। लोग अनेक रोगों और वियोगों से हत हैं, ये आपके चरणों के निरादर के फल हैं; जो आपके चरण-कमलों में प्रेम नहीं करते वे अगाध भव-सागर में पड़ते हैं। जिनके हृदय में आपके चरण-कमलों की प्रीति नहीं वे सदा अत्यंत दीन, मलिन और दुखी हैं; पर जिनका आधार आपकी कथा है, उन्हें नित्य संत सदा प्रिय हैं। उनमें न राग है, न लोभ, न मान, न मद, और उन्हें वैभव तथा विपत्ति समान है; इससे वे प्रसन्नता से आपके सेवक बनते हैं, और मुनि योग त्यागकर सदा आप पर भरोसा रखते हैं। निरंतर प्रेम और नियम धारण कर शुद्ध हृदय से आपके चरण-कमल सेवते हैं, निरादर और आदर को समान मानते हैं, और ऐसे सब संत पृथ्वी पर सुखी विचरते हैं। हे मुनियों के मन-कमल के भ्रमर, मैं आपको भजता हूँ, हे महारणधीर, अजेय रघुवीर; मैं आपका नाम जपता और नमन करता हूँ, हे हरि, आप भव-रोग की महाऔषधि और मान के शत्रु हैं। गुण, शील और कृपा के परम धाम, मैं नित्य श्रीराम को प्रणाम करता हूँ; हे रघुनंदन, द्वंद्वों के समूह को नष्ट कीजिए और, हे महीपाल, इस दीन जन को देखिए।
बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग। पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग।।14(क)।। बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास। तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास।।14(ख)।।
शिव ने कहा, "मैं बार-बार वर माँगता हूँ; हे श्रीरंग, हर्षित होकर दीजिए: आपके चरण-कमलों में अटल भक्ति और सदा सत्संग।" इस प्रकार राम के गुणों का वर्णन कर उमापति हर्षित होकर कैलास लौट गए; तब प्रभु ने वानरों को सब प्रकार से सुखदायक निवास दिलाया।
सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी।। महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका।। जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं।। सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं।। सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।। खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी।। बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी।। नित नव मंगल कौसलपुरी। हरषित रहहिं लोग सब कुरी।। नित नइ प्रीति राम पद पंकज। सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज।। मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए।।
हे पक्षिराज, सुनो: यह कथा पवित्र है, तीनों तापों और भव-भय को नष्ट करने वाली। महाराज के शुभ अभिषेक को सुनकर मनुष्य वैराग्य और विवेक पाते हैं; जो सकाम मनुष्य इसे सुनते या गाते हैं वे अनेक प्रकार के सुख-संपत्ति पाते हैं, और जगत में देवदुर्लभ सुख भोगकर अंतकाल में रघुपति के धाम को जाते हैं। जो मुक्त, विरक्त और विषयी इसे सुनते हैं, वे क्रमशः भक्ति, मुक्ति और नई संपत्ति पाते हैं। हे पक्षिराज, मैंने अपनी बुद्धि के विलास से राम की कथा कही, जो भय और दुःख हरने वाली है; यह वैराग्य, विवेक और भक्ति को दृढ़ करती है और मोह-नदी के लिए सुंदर नाव है। अयोध्या में नित नया मंगल था और सब कुल के लोग हर्षित रहते थे; सबमें राम के चरण-कमलों के प्रति नित नई प्रीति थी, जिन चरणों को शिव, मुनि और ब्रह्मा नमन करते हैं। बहुत से याचकों को वस्त्र पहनाए गए और ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान मिले।
ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति। जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति।।15।।
सब वानर ब्रह्मानंद में मग्न थे, प्रभु के चरणों की प्रीति से भरे हुए; उन्हें दिन बीतने का पता ही न चला, और यों उनके छह मास व्यतीत हो गए।
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही।। तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए।। परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे।। तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई।। ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे।। अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही।। सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना।। सब के प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती।।
वे अपने घर भूल गए और स्वप्न में भी उनकी सुधि न रही, जैसे संत के मन में परद्रोह का भाव नहीं होता। तब रघुपति ने सब सखाओं को बुलाया, और वे आकर आदरपूर्वक सिर नवाए; परम प्रेम से पास बैठाकर भक्तों को सुख देने वाले प्रभु ने कोमल वचन कहे: "तुमने मेरी बड़ी सेवा की; मैं तुम्हारे मुख पर किस प्रकार बड़ाई करूँ? इसीलिए तुम मुझे अत्यंत प्रिय लगे, तुमने मेरे हित के लिए घर और सुख त्याग दिए। छोटा भाई, राज्य, संपत्ति, सीता, शरीर, घर, परिवार और स्नेही, ये सब मुझे प्रिय हैं, पर कोई तुम्हारे समान नहीं, और मैं झूठ नहीं कहता; यह मेरा स्वभाव है। सबको सेवक प्रिय होता है, यह नीति है, पर मुझे दास पर अधिक प्रीति है।"
अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम। सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम।।16।।
"अब हे सखाओ, सब घर जाओ, और दृढ़ नियम से मुझे भजो; मुझे सदा सर्वत्र व्यापक और सबका हित करने वाला जानकर अत्यंत प्रेम करो।"
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए।। एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे।। परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा।। प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं।। तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए।। सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए।। प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए।। अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला।।
प्रभु के वचन सुनकर सब ऐसे मग्न हुए कि अपने को भूल गए, "हम कौन हैं और कहाँ हैं"। वे हाथ जोड़े आगे एकटक खड़े रहे, प्रेम में विभोर होकर कुछ कह न सके। उनका परम प्रेम देखकर प्रभु ने उन्हें अनेक प्रकार का विशेष ज्ञान कहा, फिर भी वे प्रभु के सम्मुख कुछ न कह पाते और बार-बार उनके चरण-कमलों को निहारते रहे। तब प्रभु ने अनेक रंगों के अनुपम और सुंदर आभूषण-वस्त्र मँगवाए; पहले सुग्रीव को पहनाए, भरत ने अपने हाथ से वस्त्र सजाए, और प्रभु की प्रेरणा से लक्ष्मण ने लंकापति को पहनाए, जो रघुपति के मन को भाया। अंगद बैठे रहे और नहीं हिले, और उनका प्रेम देखकर प्रभु ने उन्हें (जाने को) नहीं कहा।
जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ। हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ।।17(क)।। तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि। अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि।।17(ख)।।
रघुनाथ ने जाम्बवान, नील आदि सबको वस्त्र पहनाए, और हृदय में राम का रूप धारण कर सब चरणों में सिर नवाकर चले। तब अंगद उठे, सिर नवाया, और सजल नेत्रों से हाथ जोड़कर अत्यंत विनीत वचन बोले, मानो प्रेम-रस में डूबे हुए।
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो।। मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली।। असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी।। मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता।। तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा।। बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना।। नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ।। अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही।।
अंगद ने विनती की: 'हे सर्वज्ञ, कृपा और सुख के सागर, दीनों पर दया करने वाले, दुखियों के बंधु, सुनिए। हे नाथ, मरते समय मेरे पिता बालि मुझे आपकी गोद और शरण में सौंप गए थे। शरणहीन के शरण होने का अपना विरद याद करके, हे भक्तों के हितकारी, मुझे मत त्यागिए। मेरे लिए तो आप ही स्वामी, गुरु, पिता और माता हैं; आपके चरण-कमल छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ? हे नरनाथ, स्वयं विचार कर कहिए — प्रभु को छोड़कर घर पर मेरा क्या काम है? मैं तो बालक हूँ, ज्ञान, बुद्धि और बल से हीन; हे नाथ, इस दीन जन को अपनी शरण में रखिए। मैं घर की सब नीच सेवा करूँगा और आपके चरण-कमल देखकर भवसागर तर जाऊँगा।' ऐसा कहकर वे प्रभु के चरणों में गिर पड़े: 'मेरी रक्षा कीजिए; अब, हे नाथ, मुझे घर जाने को मत कहिए।'
अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव। प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव।।18(क)।। निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ। बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ।।18(ख)।।
अंगद के विनम्र वचन सुनकर करुणा की सीमा श्रीरघुनाथ ने राजकुमार को उठाकर हृदय से लगा लिया और उनके कमल-नयन आँसुओं से भर गए। फिर भगवान ने अपने हृदय की माला, वस्त्र और मणि बालि के पुत्र को पहनाई और अनेक प्रकार से समझा-बुझाकर उन्हें विदा किया।
भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता।। अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा।। बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा।। राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी।। प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी।। अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए।। तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना।। दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा।। पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा।। अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता।।
भक्तवत्सल प्रभु अपने छोटे भाई भरत और सुमित्रानंदन लक्ष्मण के साथ उन्हें पहुँचाने चले। अंगद के हृदय में प्रेम कम न था; वे बार-बार श्रीराम की ओर देखते थे। बार-बार दंडवत प्रणाम करते और मन में चाहते कि राम मुझे रुकने को कह दें। राम की चितवन, बोली और चाल को बार-बार याद करके, मिलन का स्मरण कर मन ही मन सोचते और मुस्कुराते। प्रभु का रुख देखकर बहुत विनती कर, चरण-कमलों को हृदय में रखकर वे चले। बड़े आदर से सब वानरों को पहुँचाया; फिर भाइयों सहित भरत लौट आए। तब सुग्रीव ने हनुमान के चरण पकड़कर अनेक प्रकार से विनती की: 'दस दिन रघुनाथ के चरणों की सेवा करके, हे देव, फिर मैं आपके चरण देखूँगा। हे पवनकुमार, आप पुण्य की राशि हैं; जाकर कृपा के धाम की सेवा कीजिए।' ऐसा कहकर सब वानर तुरंत चल पड़े; तब अंगद ने कहा, 'हे हनुमान, सुनिए।'
कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि। बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि।।19(क)।। अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत। तासु प्रीति प्रभु सन कहि मगन भए भगवंत।।!9(ख)।। कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि। चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि।।19(ग)।।
'प्रभु से मेरा दंडवत कहिए — मैं आपसे हाथ जोड़कर कहता हूँ। बार-बार रघुनाथ को मेरी याद दिलाइएगा।' ऐसा कहकर बालिपुत्र चले गए, और हनुमान लौटकर आए, और अंगद के प्रेम को प्रभु से कहकर भगवान भी उसमें मग्न हो गए। वज्र से भी अधिक कठोर और फूल से भी अधिक कोमल — हे पक्षिराज गरुड़, कहिए, राम के हृदय को किसकी उपमा दें?
पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।। जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू।। तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।। बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी।। चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा।। रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी।। राम राज बैंठें त्रेलोका। हरषित भए गए सब सोका।। बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई।।
फिर कृपालु प्रभु ने निषादराज (गुह) को बुलाया और उन्हें आभूषण और वस्त्र उपहार में दिए। 'घर जाओ और मेरा स्मरण करना; मन, वचन और कर्म से धर्म का पालन करना। तुम मेरे मित्र हो, भरत के समान भाई हो; सदा नगर में आते-जाते रहना।' ये वचन सुनते ही उनके मन में बड़ा सुख उपजा; वे नेत्रों में जल भरकर चरणों में गिर पड़े। चरण-कमलों को हृदय में धारण कर वे घर आए और परिवार को प्रभु का स्वभाव सुनाया। रघुनाथ के चरित देखकर नगरवासी बार-बार कहते, 'यह सुख की राशि धन्य है!' राम के राजगद्दी पर विराजने से तीनों लोक हर्षित हो गए और सब शोक जाते रहे। कोई किसी से बैर नहीं करता था; राम के प्रताप से सारी विषमता मिट गई।
बरनाश्रम निज निज धरम बनिरत बेद पथ लोग। चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग।।20।।
वेद के मार्ग पर चलते हुए लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के धर्म में सदा लगे रहते; इसी प्रकार चलते हुए वे सदा सुख पाते, और वहाँ न भय था, न शोक, न रोग।
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।। सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।। चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं।। राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी।। अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।। नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।। सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी।। सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।
राम-राज्य में किसी को भी दैहिक, दैविक और भौतिक — तीनों प्रकार के ताप नहीं व्यापते थे। सब लोग परस्पर प्रेम करते और अपने धर्म में लगे रहकर वेद की नीति पर चलते। धर्म संसार में अपने चारों चरणों से पूर्ण रूप से विद्यमान था, और स्वप्न में भी पाप न था। राम की भक्ति में लगे नर-नारी सभी परम गति के अधिकारी थे। न किसी की अल्पमृत्यु होती थी, न कोई पीड़ा थी; सबके शरीर सुंदर और नीरोग थे। न कोई दरिद्र था, न दुखी, न दीन; न कोई मूर्ख था, न लक्षणहीन। सब निष्कपट, धर्म में रत और पवित्र थे; नर और नारी सब चतुर और गुणी थे। सब गुणों के आदर करने वाले, पंडित और ज्ञानी थे, सब कृतज्ञ थे, कोई कपटी-चतुर न था।
राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।। काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं।।21।।
हे पक्षिराज गरुड़, सुनिए: राम-राज्य में चराचर जगत में किसी को काल, कर्म, स्वभाव और गुणों से उत्पन्न कोई दुख नहीं था।
भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।। भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू।। सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी।। सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरी एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी।। सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला।। राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा।। सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी।। एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी।।
सात समुद्रों की मेखला वाली सात द्वीपों की पृथ्वी का एक ही राजा था — कोसल के रघुनाथ। परंतु जिनके एक-एक रोम में अनेक ब्रह्मांड बसते हैं, उनके लिए यह प्रभुता कुछ बहुत नहीं है। प्रभु की सच्ची महिमा को विचारने पर, इस राज्य का वर्णन उसकी बहुत हीनता है। हे गरुड़, जिन्होंने वह महिमा जान ली, वे भी लौटकर इस चरित में प्रीति करने लगे। उस महिमा को जानने का फल यही लीला है — ऐसा दमशील महामुनि कहते हैं। राम-राज्य के सुख-संपदा को शेषनाग और सरस्वती भी वर्णन नहीं कर सकते। सब उदार और परोपकारी थे; नर-नारी ब्राह्मणों के चरणों की सेवा करते थे। सब एक ही पति-पत्नी के व्रत में लगे रहते और मन, वचन, कर्म से अपने साथी का हित चाहते।
दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज। जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज।।22।।
रामचंद्र के राज्य में 'दंड' केवल संन्यासियों के पास (उनका दंड) था, 'भेद' केवल नर्तकों के नृत्य-समाज में था, और 'जीत' के नाम पर केवल मन को जीतने की ही बात सुनाई देती थी।
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहि एक सँग गज पंचानन।। खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।। कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।। सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गूंजत अलि लै चलि मकरंदा।। लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं।। ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी।। प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी।। सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी।। सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं।। सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा।।
वन के वृक्ष सदा फूलते और फलते रहते, और हाथी तथा सिंह एक साथ रहते। पक्षी और पशु अपना स्वाभाविक बैर भुलाकर आपस में प्रेम बढ़ाते। पक्षी कूजते और पशुओं के अनेक झुंड निर्भय होकर वन में विचरते और आनंद करते। शीतल, सुगंधित, मंद पवन बहता, और भौंरे मकरंद लेकर गुंजार करते। लता और वृक्ष माँगने पर मधु टपकाते, और गाएँ मनचाहा दूध देतीं। पृथ्वी सदा धन-धान्य से संपन्न रहती; त्रेता में सत्ययुग जैसी करनी हो गई। पर्वतों में विविध मणियों की खानें प्रकट हुईं, क्योंकि जगत के आत्मा (राम) ही जगत के राजा जाने गए। सब नदियाँ श्रेष्ठ जल से बहतीं — शीतल, निर्मल, स्वादिष्ट और सुखकारी। समुद्र अपनी मर्यादा में रहते और किनारों पर रत्न डालते, जिन्हें लोग पा लेते। सब तालाब कमलों से भरे थे और दसों दिशाएँ अत्यंत प्रसन्न थीं।
बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज। मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र के राज।।23।।
चंद्रमा अपनी किरणों से पृथ्वी को पूर्ण कर देता, और सूर्य केवल उतना ही तपता जितने काम के लिए आवश्यक होता; और बादल माँगने पर जल देते — ऐसा रामचंद्र का राज्य था।
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।। श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर।। पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता।। जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई।। जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी।। निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई।। जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ।। कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं।। उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता।।
प्रभु ने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किए और ब्राह्मणों को अनेक दान दिए। वे वेद-मार्ग के रक्षक, धर्म के धुरंधर, गुणों से परे, और भोग में इंद्र के समान थे। सीता सदा अपने स्वामी के अनुकूल रहतीं — शोभा की खान, सुशील और विनम्र। वे कृपासागर प्रभु की प्रभुता जानती थीं और मन लगाकर उनके चरण-कमलों की सेवा करती थीं। यद्यपि घर में बहुत से सेवक और सेविकाएँ थे, जो सदा सेवा की विधि में निपुण थे, फिर भी वे अपने हाथों से घर की सेवा करतीं और रामचंद्र की आज्ञा का पालन करतीं। जिस प्रकार कृपासागर प्रभु सुख मानते, श्री (सीता) वही करतीं, क्योंकि वे सेवा की विधि जानती थीं। घर में कौसल्या आदि सासों के बीच वे सबकी सेवा बिना किसी मान-मद के करतीं। जिन्हें उमा, रमा (लक्ष्मी), ब्रह्मा आदि वंदना करते हैं — वे जगदंबा, सदा निंदा-रहित —
जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ। राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ।।24।।
जिनकी कृपा-कटाक्ष की देवता भी चाहत रखते हैं, पर जो उनकी ओर देखती तक नहीं — वही (सीता) अपने स्वभाव को छोड़कर राम के चरण-कमलों में प्रीति करती हैं।
सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।। प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।। राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती।। हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा।। अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं।। दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए।। दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर।। दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे।।
सब भाई अनुकूल होकर सेवा करते, राम के चरणों में उनका प्रेम अत्यधिक बढ़ता जाता। वे प्रभु के मुख-कमल को देखते रहते, इस आशा में कि कृपालु हमसे कुछ कहें। राम भाइयों पर प्रेम करते और अनेक प्रकार से नीति सिखाते। नगर के लोग हर्षित रहते और देवताओं को भी दुर्लभ भोग भोगते। दिन-रात वे विधाता को मनाते और श्रीरघुवीर के चरणों में प्रीति चाहते। सीता ने लव और कुश नामक दो सुंदर पुत्रों को जन्म दिया, जिनका वेद-पुराणों में गान है। दोनों विजयी, विनम्र और गुणों के धाम थे, मानो हरि (राम) के अत्यंत सुंदर प्रतिबिंब हों। सब भाइयों के भी दो-दो पुत्र हुए, जो रूप, गुण और शील में बड़े बढ़-चढ़कर थे।
ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार। सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार।।25।।
जो ज्ञान, वाणी और इंद्रियों से परे, अजन्मा, माया, मन और गुणों से परे हैं — वही सच्चिदानंदघन (सत्-चित्-आनंद का घन) उदार मानवीय चरित करते हैं।
प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन।। बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं।। अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं।। भरत सत्रुहन दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई।। बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा।। सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं।। सब कें गृह गृह होहिं पुराना। रामचरित पावन बिधि नाना।। नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं।।
प्रातःकाल सरयू में स्नान करके राम ब्राह्मणों और सज्जनों के साथ सभा में बैठते। वसिष्ठ वेद-पुराण बखानते, और राम सुनते, यद्यपि वे सब जानते हैं। वे भाइयों के साथ भोजन करते, जिसे देखकर सब माताएँ सुख से भर जातीं। भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई हनुमान के साथ उपवन जाते। वहाँ बैठकर राम के गुणों की कथा पूछते, और सुमति हनुमान उनमें गहरे उतरकर बखानते। निर्मल गुण सुनकर वे अत्यंत सुख पाते और बार-बार विनती कर उन्हें कहलवाते। सबके घर-घर में राम-चरित की अनेक प्रकार की पावन कथाएँ होतीं। नर-नारी राम के गुण गाते और दिन-रात बीत जाते, पर उन्हें पता न चलता।
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज। सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज।।26।।
अयोध्या के निवासियों के सुख, संपदा और समृद्धि को — जहाँ राजा राम विराजते हैं — हज़ार शेषनाग भी वर्णन नहीं कर सकते।
नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा।। दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं।। जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं।। पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर।। नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई।। महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा।। धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत।। बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं।।
नारद आदि और सनकादि मुनीश्वर प्रतिदिन कोसलाधीश के दर्शन के लिए समूची अयोध्या में आते। नगर को देखकर वे अपना वैराग्य भी भूल जाते। सोने और मणियों से बनी अटारियाँ थीं, और अनेक रंगों की सुंदर पक्की फर्शें ढली हुई थीं। नगर के चारों ओर अत्यंत सुंदर परकोटा था, जिसमें रंग-बिरंगे उत्तम कँगूरे बने थे। मानो नवग्रहों के समूह ने सेना बनाकर अमरावती को घेर लिया हो। भूमि बहुरंगी काँच जैसी पक्की फर्श से बनी थी, जिसे देखकर मुनियों के मन नाच उठते। श्वेत महल ऊपर आकाश को चूमते थे, और उनके कलश मानो सूर्य-चंद्र की कांति की निंदा करते थे। अनेक मणियों से बने झरोखे शोभा पाते, और घर-घर में मणि-दीप जगमगाते।
मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची। मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची।। सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे। प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे।।
मणि-दीप जगमगाते और महल चमकते, जिनकी देहरियाँ मूँगे की बनी थीं। ब्रह्मा (विरंचि) के रचे हुए मणियों के खंभे और दीवारें सोने, मणि और मरकत से जड़ी थीं। सुंदर, मनोहर और विशाल महलों के आँगन स्फटिक के बने सुहावने थे। हर दरवाज़े पर सोने के किवाड़ थे, जो अनेक हीरों से जड़े और बनाए गए थे।
चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ। राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ।।27।।
हर घर में सुंदर चित्रशाला बनी थी, जिसमें चित्र बनाकर सजाए गए थे; जो मुनि वहाँ राम-चरित को देखते हैं, वे मन ही चुरा लिए जाते हैं।
सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई।। लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बंसत कि नाई।। गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर।। नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए।। मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत।। जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं।। सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक।। राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रूचिर बजारू।।
सबने पुष्प-वाटिकाएँ लगाई थीं, अनेक प्रकार के यत्न कर सुंदर बनाई थीं। अनेक जातियों की सुंदर लताएँ मानो सदा वसंत की भाँति फूलती रहतीं। भौंरे मीठा और मनोहर गुंजार करते, और शीतल-मंद-सुगंध तीनों प्रकार का पवन सदा सुंदर बहता। बच्चों के पाले हुए अनेक पक्षी मीठा बोलते और सुंदर उड़ते। मोर, हंस, सारस और कबूतर घरों पर अत्यंत शोभा पाते। जहाँ-तहाँ अपनी परछाईं देखकर वे अनेक प्रकार से कूजते और नाचते। बच्चे तोते और मैनाओं को सिखाते: 'राम कहो, रघुपति कहो, जनपालक कहो!' राजद्वार सब प्रकार से सुंदर था, और गलियाँ, चौराहे तथा बाज़ार मनोहर थे।
बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए। जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए।। बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते। सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे।।
वह सुंदर बाज़ार वर्णन नहीं बनता, जहाँ बिना दाम दिए ही वस्तुएँ मिल जाती हैं। जहाँ राजा स्वयं रमानिवास (लक्ष्मी के धाम राम) हों, वहाँ की संपदा कैसे गाई जाए? बजाज, सराफ और अनेक बनिये वहाँ मानो कुबेर के समान बैठे हैं। सब सुखी और सदाचारी हैं — सुंदर स्त्री, पुरुष, बच्चे और बूढ़े सभी।
उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर। बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर।।28।।
उत्तर दिशा में सरयू बहती है, जिसका जल निर्मल और गहरा है; उसके बँधे हुए घाट मनोहर हैं और किनारे पर कीचड़ बहुत थोड़ा है।
दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।। पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना।। राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।। तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर।। कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी।। तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई।। पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई।। देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा।।
दूर हटकर वह सुंदर घाट है, जहाँ घोड़े और हाथी झुंड-के-झुंड जल पीते हैं। अनेक पनघट अत्यंत मनोहर हैं, जहाँ पुरुष स्नान नहीं करते। राजघाट सब प्रकार से सुंदर और श्रेष्ठ है, जहाँ चारों वर्ण के लोग स्नान करते हैं। किनारे-किनारे देवताओं के मंदिर हैं, और चारों ओर उनके सुंदर उपवन हैं। कहीं-कहीं नदी-तट पर उदासीन होकर ज्ञान में रत मुनि और संन्यासी बसते हैं। किनारे-किनारे सुहावनी तुलसी हैं, जिन्हें अनेक मुनियों ने झुंड-के-झुंड लगाया है। नगर की शोभा कुछ वर्णन नहीं की जा सकती, और नगर के बाहर भी अत्यंत रमणीयता थी। नगरी को देखते ही सब पाप भाग जाते हैं — उसके वन, उपवन, बावली और तालाब।
बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं। सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं।। बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं। आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं।।
बावली, तालाब और अनुपम कुएँ, मनोहर और विशाल, सुंदर लगते हैं; उनकी सुंदर सीढ़ियाँ और निर्मल जल देखकर देवता और मुनि भी मोहित हो जाते हैं। अनेक रंगों के कमल और अनेक पक्षी कूजते, तथा भौंरे गुंजार करते। रमणीय बागों में कोयल आदि पक्षियों का कलरव मानो पथिकों को बुला रहा हो।
रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ। अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ।।29।।
वह नगरी जहाँ रमानाथ (राम) राजा हैं — क्या उसका वर्णन किया जा सकता है? अणिमा आदि सिद्धियों के सुख और संपदा सारी अयोध्या में छाई हुई थीं।
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं।। भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि।। जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि।। धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि।। काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि।। लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि।। संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि।। जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि।। बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि।। मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि।।
जहाँ-तहाँ लोग रघुनाथ के गुण गाते, और आपस में बैठकर एक-दूसरे को यही सिखाते: 'शरणागत के रक्षक राम को भजो, जो शोभा, शील, रूप और गुण के धाम हैं; कमल-नयन, श्यामल शरीर वाले, जो पलक जैसे नेत्रों की, वैसे अपने सेवकों की रक्षा करते हैं; जो सुंदर बाण, धनुष और तरकश धारण करते हैं; जो संतों के कमल-वन के लिए सूर्य और रण में धीर हैं; जो काल रूपी भयंकर सर्प के लिए गरुड़ हैं, जिन्हें निष्काम जन नमन करते हैं और जो ममता को नष्ट करते हैं; जो लोभ और मोह रूपी मृगों के झुंड के लिए किरात (शिकारी) और काम रूपी हाथी के लिए सिंह हैं, तथा भक्तों को सुख देने वाले हैं; जो संशय और शोक रूपी घने अंधकार के लिए सूर्य और राक्षस रूपी घने वन के लिए अग्नि हैं; जो जानकी सहित रघुवीर हैं — भवभय को तोड़ने वाले उन्हें क्यों न भजो? जो बहुत-सी वासनाओं रूपी मच्छरों के लिए हिम-राशि हैं, सदा एकरस, अजन्मा और अविनाशी हैं; मुनियों को आनंद देने वाले, पृथ्वी का भार हरने वाले — तुलसीदास के उदार प्रभु।'
एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान। सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान।।30।।
इस प्रकार नगर के नर-नारी राम के गुण गाते; और कृपानिधान राम सदा सब पर अनुकूल बने रहते।
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा।। पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका।। जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी।। अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने।। बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ।। मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा।। धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना।। सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका।।
हे गरुड़, जब से राम के प्रताप रूपी अत्यंत प्रबल सूर्य का उदय हुआ, उसका प्रकाश तीनों लोकों में भर गया — बहुतों को सुख हुआ और बहुतों के मन में शोक। जिन्हें शोक हुआ, उन्हें मैं बखानकर कहता हूँ। पहले अविद्या रूपी रात नष्ट हुई। पाप रूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गए; काम और क्रोध रूपी कुमुद सकुचा गए। विविध कर्म, गुण, काल और स्वभाव — ये चकोर कभी सुख नहीं पाते। मत्सर, मान, मोह और मद — इन चोरों का हुनर किसी ओर काम न आया। परंतु धर्म रूपी तालाब, तथा ज्ञान और विज्ञान — ये कमल अनेक प्रकार से खिल उठे। सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक — ये अनेक चकवे शोक-रहित हो गए।
यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास। पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास।।31।।
यह प्रताप रूपी सूर्य जब जिसके हृदय में प्रकाश करता है — बाद में कहे गए (धर्म, ज्ञान, संतोष आदि) बढ़ते हैं और पहले कहे गए (अविद्या, पाप, काम, क्रोध आदि) नष्ट हो जाते हैं।
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा।। सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए।। जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए।। ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना।। रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा।। आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।। तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी।। राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी।।
एक बार राम, भाइयों सहित और अपने परम प्रिय पवनकुमार (हनुमान) के साथ, एक सुंदर उपवन देखने गए, जहाँ सब वृक्ष नए पत्तों सहित फूले हुए थे। समय जानकर सनकादि आए — तेज के पुंज, गुण और शील से सुहावने। वे सदा ब्रह्मानंद में लीन रहते, दिखने में बालक पर बहुत पुरानी अवस्था के थे। मानो चारों वेदों ने रूप धारण किया हो — समदर्शी मुनि, सब भेदों से रहित। उनकी बस यही 'लत' थी, दिशाएँ ही जिनका वस्त्र थीं (अर्थात् दिगंबर): जहाँ रघुनाथ के चरित होते, वहाँ वे सुनने जाते। हे भवानी, सनकादि वहाँ रहे थे, जहाँ घटसंभव (अगस्त्य) ज्ञानी मुनिवर रहते थे। मुनिवर ने राम-कथा बहुत बखानी थी, जो ज्ञान रूपी अग्नि की जननी अरणी के समान है।
देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह। स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह।।32।।
मुनियों को आते देख राम ने हर्षित होकर दंडवत प्रणाम किया; और कुशल पूछकर प्रभु ने अपना पीला वस्त्र उन्हें बैठने के लिए बिछा दिया।
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।। मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी।। स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन।। एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं।। तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा।। कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे।। आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा।। बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा।।
तीनों भाइयों ने हनुमान सहित बड़े सुख से दंडवत प्रणाम किया। मुनि रघुनाथ की अतुलनीय छवि देखकर मन में मग्न हो गए और स्वयं को रोक न सके। श्यामल शरीर, कमल-नयन, सुंदरता के धाम और भव से मुक्त करने वाले। वे एकटक देखते रहे, पलक तक न गिरने देते, और हाथ जोड़कर प्रभु को सिर नवाते। उनकी दशा देखकर रघुवीर के नेत्रों से जल बहने लगा और शरीर रोमांचित हो गया। प्रभु ने हाथ पकड़कर मुनिवरों को बैठाया और परम मनोहर वचन कहे: 'आज मैं धन्य हूँ — हे मुनीश्वरों, सुनिए — आपके दर्शन से पाप नष्ट हो जाते हैं। बड़े भाग्य से सत्संग मिलता है, जिससे बिना प्रयास ही भव-बंधन टूट जाते हैं।'
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ। कहहि संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ।।33।।
संतों का संग मोक्ष देने वाला है, जबकि कामी लोगों का संग संसार का मार्ग है — ऐसा संत, कवि, विद्वान तथा वेद, पुराण और सद्ग्रंथ कहते हैं।
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी।। जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय।। जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर।। जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर।। ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद।। तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन।। सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय।। द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। ह्रदि बसि राम काम मद गंजय।।
प्रभु के वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित हुए और रोमांचित शरीर से स्तुति करने लगे: 'जय हो, हे भगवंत — अनंत, रोग-रहित, निष्पाप, अनेक होकर भी एक, करुणामय। जय हो निर्गुण की, जय हो, जय हो गुण-सागर की; सुख के धाम, सुंदर और अत्यंत चतुर। जय हो इंदिरा (लक्ष्मी) के प्रियतम की, जय हो भूधर की — अनुपम, अजन्मा, अनादि, शोभा के आगार। ज्ञान के निधान, मान-रहित होकर भी मान देने वाले, जिनका पावन सुयश पुराण और वेद कहते हैं। सब जानने वाले, किए को पहचानने वाले, अज्ञान के नाशक; अनेक नाम वाले होकर भी नाम-रहित, निरंजन। आप सर्व हैं, सर्वव्यापी हैं, सबके हृदय में बसते हैं; सदा वहाँ बसकर हमारी पालना करें। द्वंद्व, विपत्ति और भव-बंधन को तोड़िए; हृदय में बसकर, हे राम, काम और मद को नष्ट कीजिए।'
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम। प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम।।34।।
हे परमानंद, कृपा के धाम, जिनकी हर कामना सदा पूर्ण है — हे श्रीराम, हमें अटल प्रेम-भक्ति दीजिए।
देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि।। प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु।। भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक।। मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय।। आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक।। भूप मौलि मन मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी।। मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर।। रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक।। तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन।।
'हे रघुनाथ, हमें वह अत्यंत पावन भक्ति दीजिए जो तीनों तापों और संसार की जलन को नष्ट करती है। आप शरणागतों की कामनाओं के लिए कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं; हे प्रभु, प्रसन्न होकर यह वर दीजिए। हे रघुनायक, आप भवसागर के लिए घटसंभव (अगस्त्य) हैं, सेवा से सुलभ और सब सुखों के दाता। मन से उपजे भयंकर दुख को काट दीजिए; हे दीनबंधु, समता का विस्तार कीजिए। आशा, भय और ईर्ष्या आदि के निवारक; विनय, विवेक और वैराग्य के विस्तारक। राजाओं के मुकुटमणि, मन के मंडन, पृथ्वी के आभूषण — हमें भक्ति दीजिए, जो संसृति रूपी नदी को पार करने की नाव है। हे मुनियों के मन रूपी मानसरोवर के निरंतर हंस, जिनके चरण-कमलों की ब्रह्मा और शंकर वंदना करते हैं। रघुकुल के ध्वज, वेदों के रक्षक (सेतु), काल, कर्म, स्वभाव और गुणों के भक्षक। तारने वाली नाव, सब दोषों के हरने वाले — तुलसीदास के प्रभु, तीनों लोकों के आभूषण।'
बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ। ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ।।35।।
बार-बार प्रेम सहित स्तुति करके और सिर नवाकर, सनकादि अपना अत्यंत मनचाहा वर पाकर ब्रह्मलोक को चले गए।
सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए।। पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं।। सुनि चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी।। अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना।। जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता।। नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं।। तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ।। सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना।।
जब सनकादि ब्रह्मलोक को चले गए, तो भाइयों ने राम के चरणों में सिर नवाया। सब प्रभु से पूछने में सकुचाते और हनुमान की ओर देखते। वे प्रभु के मुख की वह वाणी सुनना चाहते थे, जिसे सुनकर सारा भ्रम मिट जाए। अंतर्यामी प्रभु सब जान गए और बोले, 'कहो हनुमान, क्या बात है?' तब हनुमान ने हाथ जोड़कर कहा, 'हे दीनदयाल भगवंत, सुनिए। हे नाथ, भरत कुछ पूछना चाहते हैं, पर प्रश्न करते हुए मन सकुचाता है। हे प्रभु, आप मेरा स्वभाव जानते हैं — कि भरत और मुझमें कभी कोई अंतर नहीं रहा।' प्रभु के वचन सुनकर भरत ने चरण पकड़ लिए: 'हे नाथ, शरणागतों की पीड़ा हरने वाले, सुनिए।'
नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह। केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह।।36।।
हे नाथ, मुझे कुछ भी संदेह नहीं है और स्वप्न में भी मुझे न शोक होता है न मोह। हे कृपा और आनंद के भंडार प्रभु, यह सब केवल आपकी ही कृपा है।
करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई।। संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई।। श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई।। सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन।। संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई।। संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता।। संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी।। काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई।।
भरत कहते हैं: हे कृपानिधि, मैं एक ढिठाई करता हूँ, क्योंकि मैं सेवक हूँ और आप भक्तों को सुख देने वाले हैं। हे रघुनाथ, संतों की महिमा वेद-पुराणों ने अनेक प्रकार से गाई है, और आपने भी अपने श्रीमुख से उनकी बड़ाई की है तथा कहा है कि प्रभु का उन पर विशेष प्रेम है। हे कृपासिंधु, गुण और ज्ञान में निपुण प्रभु, मैं उन संतों के लक्षण सुनना चाहता हूँ। हे शरणागत के रक्षक, संत और असंत का भेद अलग करके मुझे समझाकर कहिए। श्रीराम कहते हैं: हे भाई, संतों के लक्षण सुनो, जो असंख्य श्रुतियों और पुराणों में प्रसिद्ध हैं। संत और असंत का आचरण ऐसा है जैसे कुल्हाड़ी और चंदन का: कुल्हाड़ी मलय पर्वत के चंदन को काटती है, फिर भी चंदन उसे अपना गुण देकर सुगंध से बसा देता है।
ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड। अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड।।37।।
इसी कारण जगत का प्रिय चंदन देवताओं के सिरों पर चढ़ता है, जबकि कुल्हाड़ी को आग में तपाकर तथा घन (हथौड़े) से पीटे जाने का दंड मिलता है। इस प्रकार संत बुराई के बदले भलाई करते हैं और दुष्ट अपने ही कर्मों का फल भोगते हैं।
बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर।। सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी।। कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया।। सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी।। बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन।। सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री।। ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर।। सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं।।
संत विषयों में अनासक्त और शील तथा गुणों की खान होते हैं; वे दूसरों के दुख को अपना दुख और दूसरों के सुख को अपना सुख देखते हैं। वे समभाव वाले, शत्रुरहित, मदरहित और वैरागी होते हैं तथा लोभ, क्रोध, हर्ष और भय को त्याग चुके होते हैं। कोमल हृदय वाले, दीनों पर दयालु, वे मन-वचन-कर्म से निष्कपट भाव से मेरी भक्ति करते हैं। वे सबको मान देते हैं पर स्वयं मानरहित रहते हैं; ऐसे प्राणी मुझे भरत के प्राणों के समान प्रिय हैं। कामनारहित और मेरे नाम में लीन वे शांति, वैराग्य, विनती और प्रसन्नता के धाम हैं। शीतलता, सरलता, मित्रता, ब्राह्मणों के चरणों में प्रीति और धर्म को जन्म देने वाले गुण उनमें बसते हैं।
निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज। ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज।।38।।
उनके लिए निंदा और स्तुति दोनों समान हैं और मेरे चरण-कमलों में उनकी ममता (प्रेम) रहती है। ऐसे सज्जन मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं; वे गुणों के मंदिर और सुख की राशि हैं।
सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ।। तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कलपहि घालइ हरहाई।। खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी।। जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई।। काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन।। बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों।। झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।। बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा।।
अब असंतों का स्वभाव सुनो, जिनकी संगति भूलकर भी कभी नहीं करनी चाहिए। उनका संग सदा दुखदायी होता है, जैसे कोई दुष्ट आवारा गाय खेती को नष्ट कर देती है। दुष्टों के हृदय में अत्यंत ताप रहता है और वे दूसरों की संपत्ति देखकर सदा जलते रहते हैं। जहाँ कहीं वे दूसरों की निंदा सुनते हैं, वहाँ ऐसे हर्षित होते हैं मानो रास्ते में पड़ा खजाना पा गए हों। काम, क्रोध, मद और लोभ में डूबे वे निर्दयी, कपटी, कुटिल और पाप के धाम होते हैं। वे सबसे बिना कारण वैर करते हैं, यहाँ तक कि जो उनका हित करे उससे भी। उनका लेना झूठ, देना झूठ, भोजन और जलपान भी झूठ है। वे मोर की तरह मीठे वचन बोलते हैं पर हृदय के अत्यंत कठोर होकर बड़ी क्रूरता से दूसरों को खा जाते हैं।
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद। ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद।।39।।
जो दूसरों से द्रोह करते हैं, पराई स्त्री में आसक्त रहते हैं, पराए धन के लोभी और दूसरों की निंदा करने वाले हैं — ऐसे नीच पापी मनुष्य मानव देह धारण किए हुए राक्षस ही हैं।
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न।। काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई।। जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती।। स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी।। मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं।। करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा।। अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी।। बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा।।
लोभ ही उनका ओढ़ना और लोभ ही बिछौना है; काम और पेट के दास वे यमपुरी से भी नहीं डरते। यदि किसी की बड़ाई सुनते हैं तो ऐसे साँस लेते हैं मानो उन्हें ज्वर चढ़ आया हो। जब किसी की विपत्ति देखते हैं तो ऐसे सुखी होते हैं मानो जगत के राजा बन गए हों। स्वार्थ में लीन, परिवार के विरोधी, लंपट, कामी, लोभी और अत्यंत क्रोधी वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण को नहीं मानते; स्वयं नष्ट होते हैं और दूसरों को भी नष्ट करते हैं। मोहवश वे दूसरों से द्रोह करते हैं और उन्हें संतों का संग तथा हरि की कथा नहीं भाती। अवगुणों के सागर, मंदबुद्धि, कामी, वेद के निंदक और पराए धन के स्वामी बनने वाले वे विशेष रूप से ब्राह्मणों और दूसरों से द्रोह करते हैं तथा हृदय में दंभ-कपट रखकर सुंदर वेष धारण करते हैं।
ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेता नाहिं। द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं।।40।।
ऐसे अधम दुष्ट मनुष्य सत्ययुग और त्रेतायुग में नहीं होते। द्वापर में कुछ थोड़े होते हैं, पर कलियुग में इनके अनेक समूह होंगे।
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।। निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर।। नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा।। करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना।। कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता।। अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने।। त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक।। संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे।।
हे भाई, दूसरों की भलाई करने के समान कोई धर्म नहीं और दूसरों को पीड़ा देने के समान कोई नीचता नहीं। यह समस्त पुराणों और वेदों का निर्णय है, जो मैंने कहा और जिसे विद्वान लोग जानते हैं। जो मनुष्य देह पाकर दूसरों को पीड़ा देते हैं वे स्वयं जन्म-मरण की महाभयंकर पीड़ा भोगते हैं। मोहवश मनुष्य अनेक पाप करते हैं और स्वार्थ में लीन रहकर अपना परलोक नष्ट कर लेते हैं। हे भाई, ऐसे लोगों के लिए मैं कालरूप हूँ और शुभ-अशुभ कर्मों के फल का दाता हूँ। ऐसा विचारकर जो परम बुद्धिमान हैं वे संसार के दुखों को जानकर मुझे भजते हैं। वे शुभ-अशुभ फल देने वाले कर्मों को त्यागकर मुझ देव-मनुष्य-मुनियों के नायक को भजते हैं। मैंने संत और असंत के गुण कहे; जो इन्हें ध्यान में रख लेते हैं वे भवसागर में नहीं गिरते।
सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक। गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक।।41।।
हे भाई, सुनो: संसार के अनेक गुण और दोष माया के रचे हुए हैं। सच्चा गुण यही है कि इन गुण-दोष दोनों को न देखा जाए; इन्हें देखना ही अविवेक है।
श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई।। करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा।। पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए।। बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं।। नित नव चरन देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं।। सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं।। सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं।। सुनि गुन गान समाधि बिसारी।। सादर सुनहिं परम अधिकारी।।
प्रभु के श्रीमुख के वचन सुनते ही सब भाई प्रेम से हर्षित हुए, जो उनके हृदय में समा नहीं रहा था। वे बार-बार अत्यंत विनती करते हैं और हनुमान के हृदय में अपार हर्ष है। फिर रघुनाथ अपने मंदिर गए और इस प्रकार वे नित नई लीलाएँ करते रहते हैं। बार-बार नारद मुनि आते हैं और राम के पवित्र चरित गाते हैं। नित नई लीलाएँ देखकर मुनि जाते हैं और ब्रह्मलोक में सारी कथा कहते हैं। सुनकर ब्रह्मा अत्यंत सुख मानते हैं और कहते हैं कि हे तात, बार-बार गुणगान करो। सनकादिक नारद की सराहना करते हैं, यद्यपि वे मुनि ब्रह्म में लीन रहते हैं, फिर भी गुणगान सुनकर समाधि भूल जाते हैं और वे परम अधिकारी आदरपूर्वक सुनते हैं।
जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान। जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान।।42।।
जो जीवनमुक्त और ब्रह्म में स्थित हैं वे भी अपना ध्यान छोड़कर ये चरित सुनते हैं। जो हरि की कथा में प्रीति नहीं करते, उनके हृदय पत्थर के समान हैं।
एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए।। बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन।। सनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी।। नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।। सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई।। जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौं मोहि बरजहु भय बिसराई।। बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा।। साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।
एक दिन रघुनाथ ने सबको बुलाया और गुरु, ब्राह्मण तथा सब नगरवासी आए। जब गुरु, मुनि, ब्राह्मण और सज्जन बैठ गए, तब भक्तों के भवभय को नष्ट करने वाले प्रभु ये वचन बोले: हे समस्त नगरवासियो, मेरी बात सुनो; मैं हृदय में कोई ममता लाकर कुछ नहीं कहता। इसमें न कोई अनीति है न प्रभुता का भाव; सुनो और जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो। वही मेरा प्रियतम सेवक है जो मेरी आज्ञा का पालन करता है। हे भाई, यदि मैं कुछ अनीति कहूँ तो भय भुलाकर मुझे रोक देना। बड़े भाग्य से यह मनुष्य शरीर मिला है, जो देवताओं को भी दुर्लभ है — ऐसा सब ग्रंथ गाते हैं। यह मोक्ष का साधन, धाम और द्वार है; जिसने इसे पाकर अपना परलोक न सँवारा —
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ। कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ।।43।।
— वह परलोक में दुख पाता है और सिर पीट-पीटकर पछताता है, तथा काल, कर्म और ईश्वर पर झूठा दोष लगाता है।
एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।। नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।। ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई।। आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी।। फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा।। कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही।। नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।। करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।
हे भाई, इस मनुष्य शरीर का फल विषय-भोग नहीं है; स्वर्ग भी तुच्छ है और अंत में दुखदायी है। मनुष्य शरीर पाकर जो विषयों में मन लगाते हैं वे मूर्ख अमृत के बदले विष ले लेते हैं। ऐसे को कोई कभी अच्छा नहीं कहता, जैसे कोई तुच्छ घुँघची ले और हाथ का पारसमणि खो दे। यह अविनाशी जीव चौरासी लाख योनियों और चार प्रकार की उत्पत्ति में भटकता रहता है, सदा माया से प्रेरित तथा काल, कर्म, स्वभाव और गुणों से घिरा रहता है। कभी दयावश निर्हेतुक स्नेह करने वाले ईश्वर मनुष्य देह देते हैं। मनुष्य शरीर भवसागर पार करने के लिए नौका है; मेरा अनुग्रह अनुकूल वायु है और सद्गुरु इस दृढ़ नाव के कर्णधार हैं। इस प्रकार यह दुर्लभ साधन सुलभ करके पाकर —
जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ। सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ।।44।।
— ऐसा मनुष्य जन्म पाकर भी जो भवसागर पार नहीं करता, वह कृतघ्न और मंदबुद्धि आत्मघाती है और अधोगति को प्राप्त होता है।
जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू।। सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई।। ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका।। करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ।। भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।। पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता।। पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा।। सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा।।
यदि तुम परलोक और यहाँ सुख चाहते हो तो मेरे वचन सुनकर हृदय में दृढ़ता से धारण करो। हे भाई, यह सुलभ और सुखदायक मार्ग है — मेरी भक्ति, जिसे पुराणों और श्रुतियों ने गाया है। ज्ञान दुर्गम है और उसमें अनेक विघ्न हैं; उसका साधन कठिन है और मन को कहीं टेक नहीं मिलती। बहुत कष्ट करके कोई ज्ञान पा भी ले, पर भक्तिहीन होने से वह भी मुझे प्रिय नहीं। भक्ति स्वतंत्र और समस्त सुखों की खान है, फिर भी प्राणी उसे सत्संग के बिना नहीं पाते। पुण्य के समूह के बिना संत नहीं मिलते और सत्संगति संसार का अंत कर देती है। जगत में एक ही पुण्य है, दूसरा नहीं — मन-वचन-कर्म से ब्राह्मण के चरणों की पूजा। जो कपट छोड़कर ब्राह्मण की सेवा करता है, उस पर मुनि और देवता अनुकूल रहते हैं।
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि। संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि।।45।।
मैं हाथ जोड़कर सबसे एक और गुप्त बात कहता हूँ: शंकर (शिव) के भजन के बिना मनुष्य मेरी भक्ति नहीं पा सकता।
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।। सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई।। मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।। बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई।। बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा।। अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी।। प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा।। भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई।।
बताओ, भक्ति के मार्ग में क्या परिश्रम है? इसमें न योग, न यज्ञ, न जप, न तप, न उपवास चाहिए। बस सरल स्वभाव, कुटिलतारहित मन और जो मिले उसी में सदा संतोष। यदि कोई मनुष्य अपने को मेरा दास कहलाकर भी दूसरे मनुष्यों की आशा करे तो बताओ, उसका क्या विश्वास? बहुत कहकर कथा क्यों बढ़ाऊँ? हे भाई, मैं इसी आचरण से वश में हो जाता हूँ। जिसे न वैर है न विग्रह, न आशा है न त्रास, वह सदा सुखमय रहता है और उसे सब दिशाएँ सुखदायी हैं। जो आरंभरहित, घररहित, मानरहित, निष्पाप, क्रोधरहित, दक्ष और विज्ञानी है, जिसे सदा सज्जनों के संग में प्रीति है, जो विषय तथा स्वर्ग और मोक्ष को भी तिनके के समान समझता है, जो भक्ति के पक्ष में बिना हठ और मूर्खता के दृढ़ है और सब दुष्ट तर्कों को दूर बहा देता है —
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
रामचरितमानस का उत्तर काण्ड किस विषय में है?
राम, सीता और लक्ष्मण विजयी होकर अयोध्या लौटते हैं, जहाँ अंततः राम का राज्याभिषेक होता है — राम-राज्य का स्वर्ण-युग आरंभ होता है। काण्ड का समापन भक्ति और धर्म के दिव्य प्रसंगों से होता है, जिनमें काकभुशुण्डि-संवाद और राम-नाम की महिमा सम्मिलित है।
रामचरितमानस क्या है?
रामचरितमानस संत-कवि गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी) द्वारा अवधी में रचित रामायण है, जो उत्तर भारत में सर्वाधिक प्रिय और पठित ग्रंथों में से एक है। यह सात काण्डों में विभाजित है: बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुंदर, लंका और उत्तर।
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