बाल काण्ड के बारे में
पहला और सबसे बड़ा काण्ड श्री राम के जन्म और बाल्यकाल की कथा कहता है। गणेश, शिव, सीता-राम और गुरु की वंदना के पश्चात यह अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ राम के जन्म, भाइयों सहित उनके बचपन, विश्वामित्र द्वारा यज्ञ-रक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को ले जाने, जनकपुर में शिव-धनुष के भंग, और राम-सीता के विवाह का वर्णन करता है।
पाठ कैसे करें
बाल काण्ड का पाठ उसकी मूल अवधी में (नीचे देवनागरी में) किया जाता है। धीरे-धीरे, पद-दर-पद पढ़ें; विशेषकर सुंदरकांड का पाठ साहस और रक्षा हेतु किया जाता है।
मूल पाठ
श्लोक और अर्थ
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।।1।। भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्।।2।। वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते।।3।। सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ। वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कबीश्वरकपीश्वरौ।।4।। उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।।5।। यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः। यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।6।। नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि। स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा- भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति।।7।।
मैं वाणी (सरस्वती) और विनायक (गणेश) को प्रणाम करता हूँ, जो अक्षरों, उनके अर्थों, रसों, छंदों तथा सभी मंगलों के रचयिता हैं। मैं श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप भवानी और शंकर को प्रणाम करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन भी अपने हृदय में स्थित ईश्वर को नहीं देख पाते। मैं ज्ञानमय, नित्य, शंकररूपी गुरु को प्रणाम करता हूँ, जिनका आश्रय पाकर टेढ़ा चंद्रमा भी सर्वत्र पूजा जाता है। मैं सीता-राम के गुणों के पवित्र वन में विचरने वाले, विशुद्ध ज्ञानी कवीश्वर वाल्मीकि और कपीश्वर हनुमान को प्रणाम करता हूँ। मैं सृष्टि, पालन और संहार करने वाली, क्लेश हरने वाली, सब कल्याण देने वाली, राम की प्रिया सीता को प्रणाम करता हूँ। मैं उन राम नामक प्रभु हरि की वंदना करता हूँ, जिनकी माया के वश समस्त संसार, ब्रह्मा आदि देव और असुर हैं, जिनकी सत्ता से सब कुछ सच्चा प्रतीत होता है जैसे रस्सी में साँप का भ्रम, और जिनके चरण ही संसार-सागर से पार जाने के इच्छुक जनों के लिए एकमात्र नाव हैं। अपने हृदय के सुख के लिए तुलसीदास रघुनाथ की इस अत्यंत सुंदर कथा को लोकभाषा में रचते हैं, जो पुराण, वेद और आगमों से सम्मत है और रामायण तथा अन्यत्र भी कही गई है।
जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन। करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।।1।। मूक होइ बाचाल पंगु चढइ गिरिबर गहन। जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन।।2।। नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन। करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन।।3।। कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन। जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन।।4।। बंदउ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर।।5।।
जिनके स्मरण से सिद्धि होती है, वे श्रेष्ठ हाथी के मुख वाले गणनायक गणेश, जो बुद्धि की राशि और शुभ गुणों के धाम हैं, मुझ पर कृपा करें। जिनकी कृपा से गूँगा वाचाल हो जाता है और लंगड़ा दुर्गम पर्वत चढ़ जाता है, वे दयालु प्रभु, जो कलियुग के सब पापों को भस्म करते हैं, मुझ पर द्रवित हों। जो नीले कमल के समान श्याम हैं, जिनके नेत्र नए लाल कमल जैसे हैं, जो सदा क्षीरसागर में शयन करते हैं, वे मेरे हृदय को अपना धाम बनाएँ। जिनका शरीर कुंद और चंद्रमा के समान गोरा है, जो उमा (पार्वती) के प्रिय और करुणा के धाम हैं, जो दीनों पर स्नेह रखते हैं और जिन्होंने कृपा से कामदेव का मर्दन किया, वे शिव कृपा करें। मैं गुरु के चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ, जो कृपा के सागर और नर-रूप में हरि हैं, जिनके वचन महामोह के घोर अंधकार के लिए सूर्य की किरणों के समूह के समान हैं।
बंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।। अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू।। सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती।। जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी।। श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य द्रृष्टि हियँ होती।। दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू।। उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।। सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।।
मैं गुरु के चरणकमल की धूलि को प्रणाम करता हूँ, जो सुंदर, सुगंधित और मधुर अनुराग से भरी है। यह अमृत की जड़ से बना सुंदर चूर्ण है, जो संसार के सारे रोगों के परिवार का नाश करती है। यह शिव के पवित्र शरीर की निर्मल विभूति (भस्म) के समान है, जो सुंदर मंगल और आनंद को उत्पन्न करती है। यह भक्त के मन रूपी सुंदर दर्पण के मैल को हरने वाली है, और तिलक करने पर गुणों के समूह को वश में कर लेती है। श्रीगुरु के चरण-नखों की मणियों की ज्योति स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न कर देती है। यह मोह के अंधकार को नष्ट करने वाला प्रकाश है; बड़े भाग्य से यह जिसके हृदय में आती है। हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसार रूपी रात्रि के दोष और दुख मिट जाते हैं, तब जहाँ जिस खान में जो छिपा या प्रकट राम-चरित रूपी मणि-माणिक हैं, वे दिखाई देने लगते हैं।
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान। कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान।।1।।
जैसे साधक, सिद्ध और सुजान लोग आँखों में उत्तम अंजन लगाकर पर्वतों, वनों और भूतल में छिपे अनेक खजानों को खेल-सा देख लेते हैं।
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।। तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन।। बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना।। सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी।। साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू।। जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा।। मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।। राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा।। बिधि निषेधमय कलि मल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी।। हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी।। बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा।। सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा।। अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ।।
गुरु के चरणों की धूलि कोमल और सुंदर अंजन है, नेत्रों के लिए अमृत और दृष्टि के दोषों को हरने वाली है। उससे विवेक रूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं संसार से मुक्त करने वाले राम-चरित का वर्णन करता हूँ। पहले मैं ब्राह्मणों के चरणों को प्रणाम करता हूँ, जो मोह से उत्पन्न सब संदेहों को हरते हैं, और सुंदर वाणी से सब गुणों की खान संत-समाज को प्रेमपूर्वक प्रणाम करता हूँ। संतों का चरित कपास के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, उज्ज्वल और गुणमय (रेशेदार) है — जो दुख सहकर दूसरों के दोष छिपाता है और इसी से जगत में वंदनीय होकर यश पाता है। आनंद और मंगल से भरा संत-समाज जगत में चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग है, जहाँ राम-भक्ति गंगा की धारा है और ब्रह्म-विचार सरस्वती है। विधि-निषेध वाली कर्म की कथा, जो कलियुग के मैल को हरती है, सूर्यपुत्री यमुना कही गई है; और हरि तथा हर की कथाएँ त्रिवेणी की तरह सुशोभित हैं, जो सुनते ही सब आनंद और मंगल देती हैं। अपने धर्म में अटल विश्वास अक्षयवट है, और सत्कर्म इस तीर्थराज का समाज है। यह तीर्थराज सब को, सब दिन, सब देशों में सुलभ है; आदर से सेवा करने पर यह क्लेशों का नाश करता है, और यह अकथनीय, अलौकिक प्रयाग तुरंत फल देता है, इसका प्रभाव प्रत्यक्ष है।
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग। लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।2।।
जो लोग इसे सुनकर समझते हैं और प्रसन्न मन से अत्यंत अनुराग के साथ इसमें स्नान करते हैं, वे इसी शरीर में चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) पा लेते हैं — ऐसा है संतों का समाज रूपी प्रयाग।
मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला।। सुनि आचरज करै जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई।। बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी।। जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना।। मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई।। सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।। बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।। सतसंगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला।। सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई।। बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं।। बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी।। सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें।।
इस स्नान का फल तुरंत दिखाई देता है: कौवे कोयल बन जाते हैं और बगुले हंस। इसे सुनकर कोई आश्चर्य न करे, क्योंकि सत्संग की महिमा छिपी नहीं है; वाल्मीकि, नारद और अगस्त्य ने अपने-अपने मुख से अपनी कथा कही है। जल, थल और आकाश में रहने वाले, जड़ या चेतन, किसी भी जीव ने जहाँ, जिस प्रयत्न से जो बुद्धि, कीर्ति, गति, ऐश्वर्य और भलाई पाई, उसे सत्संग का ही प्रभाव जानो; लोक और वेद में इसका दूसरा कोई उपाय नहीं। सत्संग के बिना विवेक नहीं होता, और वह सत्संग राम की कृपा के बिना सुलभ नहीं। सत्संग आनंद और मंगल का मूल है; वही फल और सिद्धि है, जबकि अन्य सब साधन तो केवल फूल हैं। मूर्ख भी सत्संग पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से घटिया धातु सुंदर (सोना) हो जाती है; पर यदि भाग्यवश सज्जन कुसंग में पड़ जाएँ, तो वे साँप के मणि की तरह अपने गुणों को बनाए रखते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और विद्वानों की वाणी भी संतों की महिमा कहने में सकुचा जाती है — फिर मैं उसे कैसे कहूँ, जैसे साग बेचने वाला मणियों के गुणों का वर्णन करे।
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ। अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ।।3(क)।। संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु। बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु।।3(ख)।।
मैं समान चित्त वाले संतों को प्रणाम करता हूँ, जिनका कोई शत्रु या मित्र नहीं — जैसे अंजलि में रखे फूल दोनों हाथों को समान सुगंध देते हैं। संतों को सरल-हृदय और स्वभाव से जगत का हित करने वाला जानकर, वे इस बालक की विनती सुनकर कृपा करें और मुझे राम के चरणों में प्रीति दें।
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ।। पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें।। हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से।। जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी।। तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा।। उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके।। पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं।। बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा।। पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना।। बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही।। बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा।।
फिर मैं दुष्टों को सच्चे भाव से प्रणाम करता हूँ, जो बिना कारण उपकार करने पर भी दाएँ-बाएँ (दोनों ओर से) विपरीत रहते हैं। जिन्हें दूसरे का हित हानि और दूसरे का अहित लाभ लगता है, जो दूसरों के उजड़ने में हर्ष और उनकी उन्नति में विषाद मानते हैं; जो हरि और हर की पूर्णिमा-सी कीर्ति के लिए राहु के समान हैं और दूसरों का अकाज करने में सहस्रबाहु जैसे वीर हैं। जो हजार आँखों से दूसरों के दोष देखते हैं, जिनका मन दूसरों के हित रूपी घी पर मक्खी की तरह रहता है; जो तेज में अग्नि, क्रोध में महिषासुर, और पाप-अवगुण रूपी धन में कुबेर के समान धनी हैं। इनका उदय पुच्छल तारे की तरह किसी का हित नहीं करता; ये कुंभकर्ण की तरह सोते हुए ही अच्छे हैं, और दूसरों का अकाज करने के लिए शरीर तक त्याग देते हैं, जैसे ओले खेती को नष्ट करके स्वयं गल जाते हैं। मैं दुष्टों को क्रोधी सहस्रमुख शेष के समान प्रणाम करता हूँ, जो दूसरों के दोष वर्णन करते हैं; राजा पृथु के समान, जिन्होंने दस हजार कानों से दूसरों के पाप सुने; और इंद्र के समान विनती करता हूँ, जो सदा अपने पक्ष (देवसेना) के हित में लगे रहते हैं, जिन्हें वज्र-सा कठोर वचन सदा प्रिय है और जो हजार नेत्रों से दूसरों के दोष निहारते हैं।
उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति। जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति।।4।।
दुष्ट अपने स्वभाव से उदासीन, शत्रु या मित्र — किसी का भी हित सुनकर जल-भुन जाते हैं। उन्हें ऐसा जानकर, यह सेवक दोनों हाथ जोड़कर प्रेम से उनसे विनती करता है।
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा।। बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा।। बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना।। बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं।। उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं।। सुधा सुरा सम साधू असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू।। भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती।। सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू।। गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई।।
मैंने अपनी ओर से विनती कर दी, पर वे अपनी ओर से भूलकर भी अपने स्वभाव को नहीं छोड़ेंगे — कौवे को बड़े प्रेम से पालो, फिर भी क्या कौवा कभी माँस खाना छोड़ सकता है? मैं संत और असंत दोनों के चरणों को प्रणाम करता हूँ, दोनों को थोड़ा दुखदायी बताते हुए: संत के बिछुड़ने पर तो प्राण ही निकल जाते हैं, और दुष्ट के मिलने पर घोर दुख मिलता है। ये संसार में साथ ही उत्पन्न होते हैं, फिर भी कमल और जोंक की तरह गुणों में अलग होते हैं; संत और असंत अमृत और मदिरा के समान हैं, जो एक ही अथाह समुद्र (संसार) से जन्मे हैं। भले और बुरे अपने-अपने कर्मों से सुयश और अपयश पाते हैं; अमृत, चंद्रमा, गंगा और साधु भले हैं, तथा विष, अग्नि, कलिमल-नदी और व्याध बुरे हैं, यद्यपि सब एक ही स्रोत से निकले। गुण-अवगुण सब जानते हैं; जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है।
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु। सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु।।5।।
भला भलाई ही पाता है और नीच नीचता ही पाता है — अमृत की प्रशंसा अमरता के लिए होती है और विष की प्रशंसा मृत्यु के लिए।
खल अघ अगुन साधू गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा।। तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने।। भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए।। कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना।। दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती।। दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू।। माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा।। कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा।। सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा।।
दुष्टों के पाप-अवगुण और संतों के गुणों की कथाएँ दोनों ही अपार, अथाह समुद्र हैं, इसलिए मैंने थोड़े ही गुण-दोष बताए हैं, क्योंकि पहचाने बिना ग्रहण या त्याग नहीं होता। विधाता ने भले और बुरे दोनों को रचा है, और वेदों ने गुण-दोष गिनकर उन्हें अलग किया है; वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि विधाता की सृष्टि गुण और अवगुण से मिली हुई है। दुख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, ऊँची जाति-नीची जाति, दानव-देव, ऊँच-नीच, अमृत रूपी सुजीवन और विष रूपी मृत्यु, माया-ब्रह्म, जीव और जगदीश, लक्ष्मी और दरिद्रता, रंक और राजा, काशी और मगध, गंगा और कर्मनाशा (जो पुण्य नष्ट करती है), मरुभूमि और उपजाऊ मालवा, ब्राह्मण और कसाई, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य — इस प्रकार वेद और आगमों ने गुण और दोष का विभाजन किया है।
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार।।6।।
विधाता ने जड़-चेतन तथा गुण-दोष से मिला हुआ यह संसार रचा है; पर संत हंस की तरह गुण को ग्रहण कर लेते हैं और दोष को छोड़ देते हैं, जैसे हंस दूध को लेकर पानी को छोड़ देता है।
अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता।। काल सुभाउ करम बरिआई। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई।। सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं।। खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू।। लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ।। उधरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू।। किएहुँ कुबेष साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू।। हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू।। गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा।। साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी।। धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई।। सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता।।
जब विधाता ऐसा विवेक देता है, तब मन दोषों को छोड़कर गुणों में अनुरक्त हो जाता है। काल, स्वभाव और कर्म के बल से भला मनुष्य भी अपनी प्रकृति के वश कभी भलाई से चूक जाता है, पर हरि के भक्त उसे सुधार लेते हैं और दुख-दोष का नाश करके निर्मल यश देते हैं। दुष्ट भी सुसंग पाकर भला करते हैं, फिर भी उनका अटल मलिन स्वभाव नहीं मिटता; और संसार के ठग, यह देखकर कि साधु-वेष से पूजा होती है, वेष के प्रताप से पूजे जाते हैं — पर अंत में खुल जाते हैं और निभा नहीं पाते, जैसे कालनेमि, रावण और राहु। कुवेष में भी साधु का सम्मान होता है, जैसे जगत में जामवंत और हनुमान का हुआ; कुसंग से हानि और सुसंग से लाभ, यह लोक और वेद में सब जानते हैं। धूलि पवन के संग से आकाश में चढ़ जाती है और नीच जल के संग से कीचड़ में मिल जाती है; साधु और असाधु के घर के तोता-मैना संगति के अनुसार राम का स्मरण करते या गाली देते हैं। धुआँ कुसंग से कालिख बनता है, पर वही स्याही बनकर सुंदर पुराण लिखता है; और वही अग्नि तथा वायु के संयोग से बादल बनकर जगत को जीवन देने वाला हो जाता है।
ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग। होहि कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग।।7(क)।। सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह। ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह।।7(ख)।। जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि। बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि।।7(ग)।। देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब। बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब।।7(घ)।।
ग्रह, औषधि, जल, पवन या वस्त्र — कुसंग या सुसंग पाकर जगत में बुरी या भली वस्तु बन जाते हैं, और सुलक्षण लोग इसे पहचान लेते हैं। विधाता ने महीने के दोनों पक्षों को उजाले और अँधेरे में बराबर बनाया, पर अलग-अलग नाम दिए; यह समझकर कि एक चंद्रमा को घटाता और दूसरा बढ़ाता है, जगत ने उन्हें अपयश और यश दिया। जगत के सब जड़-चेतन जीवों को राममय जानकर, मैं दोनों हाथ जोड़कर सबके चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ। देव, दानव, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व, किन्नर और राक्षस — मैं सबको प्रणाम करता हूँ; अब आप सब मुझ पर कृपा करें।
आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी।। सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।। जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू।। निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाही।। करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा।। सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ।। मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी।। छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई।। जौ बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता।। हँसिहहि कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी।। निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका।। जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।। जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई।। सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई।।
चौरासी लाख योनियों में जन्मे, जल-थल-आकाश में रहने वाले सब जीवों और समस्त जगत को सीता-राममय जानकर, मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। मुझे अपना दास जानकर, कृपालु लोग सब मिलकर छल छोड़कर मुझ पर स्नेह करें, क्योंकि मुझे अपनी बुद्धि और बल का भरोसा नहीं, इसलिए सबसे रक्षा की विनती करता हूँ। मैं रघुपति के गुण गाना चाहता हूँ, पर मेरी बुद्धि छोटी है और उनका चरित्र अथाह है; मुझे सफलता का एक भी उपाय नहीं सूझता, क्योंकि मेरा मन-बुद्धि रंक है और मनोरथ राजा। मेरी बुद्धि बहुत नीच है पर रुचि ऊँची है — मैं अमृत चाहता हूँ, जबकि जगत में छाछ भी नहीं मिलती। सज्जन मेरी ढिठाई क्षमा करेंगे और बालक के वचन ध्यान से सुनेंगे, क्योंकि बालक तोतली बात करे तो भी माता-पिता प्रसन्न मन से सुनते हैं। क्रूर, कुटिल और कुविचारी, जो दूसरों के दोषों को आभूषण की तरह धारण करते हैं, हँसेंगे; पर अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती, चाहे वह सरस हो या अत्यंत फीकी? जो दूसरों की रचना सुनकर हर्षित होते हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष जगत में बहुत नहीं — अधिकांश लोग तालाब और नदी के समान हैं, जो वर्षा का जल पाकर ही बढ़ते हैं, जबकि कोई विरला संत ही समुद्र के समान है, जो पूर्ण चंद्र देखकर बढ़ता है।
भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास। पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करहहिं उपहास।।8।।
मेरा भाग्य छोटा है पर अभिलाषा बड़ी; फिर भी मुझे एक विश्वास है — कि इसे सुनकर सब सज्जन सुख पाएँगे, जबकि दुष्ट उपहास करेंगे।
खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा।। हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही।। कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू।। भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी।। प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागहि फीकी।। हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुवर की।। राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी।। कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू।। आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना।। भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा।। कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे।।
दुष्टों का उपहास भी मेरा हित करेगा, क्योंकि कौवे मधुर स्वर वाली कोयल को कठोर कहते हैं, बगुले हंस पर और मेंढक चातक पर हँसते हैं, और मलिन दुष्ट निर्मल वाणी पर हँसते हैं। जो कविता के रसिक हैं पर राम के चरणों में प्रीति नहीं रखते — उनके लिए यह हास्य-रस का सुख है; मेरी भाषा, रचना और बुद्धि भोली है, हँसने योग्य है, और हँसने में कोई दोष नहीं। जिन्हें प्रभु के चरणों में प्रेम और अच्छी समझ नहीं, उन्हें यह कथा सुनकर फीकी लगेगी; पर जिनकी बुद्धि कुतर्क से रहित है और जिन्हें हरि-हर के चरणों में प्रीति है, उन्हें रघुवर की मधुर कथा प्रिय है। इसे हृदय में राम-भक्ति से भूषित जानकर सज्जन इसे सुनेंगे और सुंदर वाणी से सराहेंगे। मैं न कवि हूँ न वचन में प्रवीण, और सब कलाओं तथा विद्याओं से हीन हूँ: अक्षर, अर्थ, अनेक अलंकार, छंद और रचना के अनेक विधान, भाव और रस के अपार भेद, तथा कविता के विविध दोष-गुण — इनमें से कविता का एक भी विवेक मुझमें नहीं; यह मैं सच कहता हूँ, मानो कोरे कागज पर लिखकर।
भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक। सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिवेक।।9।।
मेरी रचना सब गुणों से रहित है, फिर भी उसमें एक गुण है जो संसार में प्रसिद्ध है — राम का नाम; यह विचारकर निर्मल विवेक वाले सुबुद्धि लोग इसे सुनेंगे।
एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा।। मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी।। भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ।। बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोन न बसन बिना बर नारी।। सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी।। सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही।। जदपि कबित रस एकउ नाही। राम प्रताप प्रकट एहि माहीं।। सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा।। धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई।। भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी।।
इसमें रघुपति का उदार नाम है, जो अत्यंत पवित्र और वेद-पुराणों का सार है — मंगल का धाम और अमंगल को हरने वाला, जिसे त्रिपुरारि शिव उमा सहित जपते हैं। अच्छे कवि की विचित्र रचना भी राम-नाम के बिना शोभा नहीं देती, जैसे चंद्रमुखी, सब भाँति सजी सुंदरी वस्त्र के बिना अच्छी नहीं लगती; और बुरे कवि की वाणी भी, यद्यपि सब गुणों से रहित हो, राम-नाम के यश से अंकित जानकर आदर पाती है, इसलिए विद्वान उसे भौंरे की तरह गुण ग्रहण करते हुए आदर से कहते-सुनते हैं। यद्यपि इसमें कविता का एक भी रस नहीं, फिर भी राम का प्रताप इसमें प्रकट है — यही भरोसा मेरे मन में आया, क्योंकि सुसंग से किसने बड़प्पन नहीं पाया? धुआँ भी अगर के संग से अपनी स्वाभाविक कड़वाहट छोड़कर सुगंधित हो जाता है; इसी तरह, रचना भद्दी होने पर भी वर्णित विषय उत्तम है — राम की कथा, जो जगत का मंगल करने वाली है।
मंगल करनि कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।। गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की।। प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी।। भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी।।
तुलसीदास द्वारा कही गई रघुनाथ की कथा मंगल करने वाली और कलियुग के मैल को हरने वाली है। यद्यपि मेरी भद्दी कविता की धारा साधारण है, फिर भी वह पवित्र नदी के पावन जल के समान है; प्रभु के सुयश की संगति से मेरी रचना अच्छी और सज्जनों के मन को भाने वाली हो जाएगी — जैसे श्मशान की भस्म, यद्यपि तुच्छ है, स्मरण करने पर (शिव के अंग पर) सुहावनी और पावन हो जाती है।
प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग। दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग।।10(क)।। स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान। गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान।।10(ख)।।
मेरी रचना राम के यश की संगति में सबको अत्यंत प्रिय लगेगी — क्या कोई साधारण लकड़ी का मोल विचारता है? फिर भी वह चंदन की संगति से पूजी जाती है। काली गाय बहुत उजला और हितकारी दूध देती है, जिसे सब पीते हैं; इसी प्रकार, वाणी गँवारू होने पर भी, चूँकि वह सीता-राम का यश गाती है, विद्वान उसे गाते और सुनते हैं।
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।। नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई।। तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं।। भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई।। राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ।। कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी।। कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना।। हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना।। जौं बरषइ बर बारि बिचारू। होहिं कबित मुकुतामनि चारू।।
मणि, माणिक या मोती की जो शोभा है, वह साँप, पर्वत या हाथी के सिर पर (जहाँ वे मिलते हैं) वैसी नहीं होती; पर राजा के मुकुट या युवती के शरीर पर पहुँचकर वे पूरी और अधिक शोभा पाते हैं। इसी तरह विद्वान कहते हैं कि अच्छे कवि की कविता एक जगह उत्पन्न होती है और दूसरी जगह (जब दूसरे उसे पढ़ते हैं) शोभा पाती है। भक्ति के लिए सरस्वती ब्रह्मा का धाम छोड़कर स्मरण करते ही दौड़ी आती है; पर राम-चरित रूपी सरोवर में स्नान कराए बिना उस रचना का श्रम करोड़ों उपायों से नहीं मिटता। यह हृदय में विचारकर कवि और विद्वान कलिमल को हरने वाले हरि का यश गाते हैं; पर साधारण मनुष्यों के गुण गाने पर सरस्वती सिर धुनकर पछताती है। विद्वान कहते हैं कि हृदय समुद्र के समान, बुद्धि सीप के समान और सरस्वती स्वाति नक्षत्र के समान है: यदि वह उत्तम विचार रूपी जल बरसाए, तो मोती-मणि के समान सुंदर कविता बन जाती है।
जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग। पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।11।।
फिर युक्ति से बेधकर इन मोतियों को राम-चरित के सुंदर धागे में पिरो दिया जाता है, और सज्जन इन्हें बड़े प्रेम से अपने निर्मल हृदय पर धारण करते हैं, जैसे सुंदर हार।
जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।। चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़ें।। बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के।। तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी।। जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ।। ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने।। समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी।। एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका।। कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ।। कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा।। जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं।। समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई।।
जो भयानक कलियुग में जन्मे हैं, जिनके कर्म कौवे जैसे पर वेष हंस जैसा है, जो वेद-मार्ग छोड़कर कुमार्ग पर चलते हैं, शरीर से कपटी और कलिमल के भांडे हैं, जो सोना, क्रोध और काम के दास होकर अपने को राम का भक्त कहलाते हैं — ऐसे सब में मेरी पहली रेखा (गिनती) है, जो झूठे धर्म की ध्वजा धारण करने वाला ढीठ और कपट-धंधों का अगुआ है। यदि मैं अपने सब अवगुण कहूँ तो कथा बढ़ जाएगी और उसका अंत न मिलेगा, इसलिए मैंने बहुत थोड़े बताए, जिनसे सयाने समझ लेंगे; मेरी अनेक प्रकार की विनती समझकर कोई कथा सुनकर दोष न देगा, और इसके बाद भी जो शंका करें वे मुझसे भी अधिक मूर्ख और दीन-बुद्धि हैं। मैं न कवि हूँ न चतुर कहलाता हूँ; अपनी बुद्धि के अनुसार राम के गुण गाता हूँ। कहाँ रघुपति के अपार चरित्र और कहाँ संसार में लगी मेरी बुद्धि? जो पवन सुमेरु पर्वत को भी उड़ा दे, उसके आगे रूई का एक टुकड़ा किस गिनती में है? राम की अपार प्रभुता को समझकर कथा कहते हुए मेरा मन बहुत कातर हो जाता है।
सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान। नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान।।12।।
सरस्वती, शेष, महेश (शिव), ब्रह्मा, आगम, वेद और पुराण 'नेति-नेति' कहकर निरंतर उनके गुणों का गान करते हैं।
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई।। तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा।। एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा।। ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना।। सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी।। जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू।। गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।। बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहि पुनीत सुफल निज बानी।। तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा।। मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई।।
यद्यपि सब प्रभु की ऐसी प्रभुता जानते हैं, फिर भी कोई कहे बिना नहीं रहा — वेद इसका कारण देते हैं: भजन का प्रभाव अनेक प्रकार से वर्णित है। वे एक, इच्छारहित, रूपरहित, नामरहित, अजन्मा, सच्चिदानंद और परम धाम हैं; व्यापक, विश्वरूप भगवान, फिर भी उन्होंने देह धारण कर अनेक लीलाएँ कीं, केवल भक्तों के हित के लिए — परम कृपालु, शरणागत के प्रेमी, जो अपने भक्त पर अत्यंत ममता और स्नेह रखते हैं, जो करुणा करते हैं पर कभी क्रोध नहीं करते। खोए को लौटाने वाले, दीनों पर कृपालु, सरल पर समर्थ स्वामी रघुराज — यह जानकर विद्वान हरि का यश वर्णन करते हैं और अपनी वाणी को पवित्र तथा सफल बनाते हैं। उसी बल से मैं भी राम के चरणों में सिर नवाकर रघुपति के गुणों की कथा कहूँगा; ऋषियों ने पहले ही हरि की कीर्ति गाई है, और उस मार्ग पर चलना मेरे लिए सुगम है, भाई।
अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं। चढि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं।।13।।
यदि कोई राजा अत्यंत चौड़ी बड़ी नदियों पर पुल बना दे, तो एक बहुत छोटी चींटी भी उस पर चढ़कर बिना श्रम के पार हो जाती है।
एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई।। ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना।। चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे।। कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा।। जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने।। भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहिं कपट सब त्यागें।। होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू।। जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं।। कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।। राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा।। तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे।।
इस प्रकार मन को साहस दिखाकर मैं रघुपति की सुहावनी कथा कहूँगा। मैं व्यास आदि उन श्रेष्ठ कवियों के चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ जिन्होंने आदर से हरि का सुयश वर्णन किया — वे मेरे सब मनोरथ पूरे करें; और कलियुग के उन कवियों को प्रणाम करता हूँ जिन्होंने रघुपति के गुण-समूह का वर्णन किया। जो अत्यंत सयाने लोकभाषा के कवि हैं, जिन्होंने भाषा में हरि के चरित्र कहे — जो हो चुके, जो हैं और जो आगे होंगे — मैं सब कपट त्यागकर उन सबको प्रणाम करता हूँ: प्रसन्न होकर यह वरदान दें कि संत-समाज मेरी रचना का सम्मान करे। जिस रचना का विद्वान आदर न करें, वह बाल-कवियों का व्यर्थ श्रम है; वही कीर्ति, रचना और ऐश्वर्य अच्छा है जो गंगा की तरह सबका हित करे। राम की कीर्ति उत्तम है पर मेरी रचना भद्दी — यही असमंजस मेरी चिंता है; फिर भी आपकी कृपा से वह मेल भी मेरे लिए सुलभ है, क्योंकि मोटी सिलाई भी बढ़िया रेशमी वस्त्र (पटोरे) पर सुंदर लगती है।
सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान। सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।।14(क)।। सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर। करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर।।14(ख)।। कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल। बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल।।14(ग)।। बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ। सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित।।14(घ)।। बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस। जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु।।14(ङ)।। बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ। संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी।।14(च)।। बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि। होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि।।14(छ)।।
विद्वान उस कविता का आदर करते हैं जो सरल और निर्मल कीर्ति वाली हो — जिसे सुनकर शत्रु भी अपना स्वाभाविक बैर भुलाकर उसकी प्रशंसा करे। पर यह निर्मल बुद्धि के बिना नहीं होता, और मेरी बुद्धि तथा बल बहुत थोड़े हैं; कृपा करें कि मैं हरि का यश कहूँ — मैं बार-बार विनती करता हूँ। कवि और विद्वान रघुबर के चरित रूपी मानस सरोवर के सुंदर हंस हैं; इस बालक की विनती सुनकर और मेरी अच्छी रुचि देखकर मुझ पर कृपालु हों। मैं उन मुनि वाल्मीकि के चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ जिन्होंने रामायण रचा, जो तीक्ष्ण होते हुए भी अति कोमल, सुंदर, निर्दोष होते हुए भी 'दोष' (दूषण) सहित है, जिसके वचन दुष्टों को बेधते हैं। मैं चारों वेदों को प्रणाम करता हूँ, जो संसार-सागर के लिए जहाज के समान हैं और रघुबर का निर्मल यश वर्णन करने में स्वप्न में भी खेद नहीं मानते। मैं ब्रह्मा के चरणों की धूलि को प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने वह संसार रचा जहाँ संत अमृत, चंद्रमा और कामधेनु की तरह और दुष्ट विष तथा मदिरा की तरह प्रकट हुए। देवता, ब्राह्मण, विद्वान और ग्रहों के चरणों को प्रणाम कर, मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ: प्रसन्न होकर मेरे सब सुंदर मनोरथ पूरे करें।
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता।। मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका।। गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी।। सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके।। कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा।। अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू।। सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला।। सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ।। भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती।। जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता।। होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी।।
फिर मैं सरस्वती और गंगा को प्रणाम करता हूँ, जो दोनों पवित्र और मनोहर चरित्र वाली हैं — एक में स्नान और उसका पान पाप हरता है, और दूसरी (ज्ञान) का कहना-सुनना अज्ञान हरता है। मैं गुरु, पिता, माता, महेश और भवानी को प्रणाम करता हूँ, और राम को, जो दीनबंधु और नित्य दानी हैं, जो तुलसीदास के लिए सेवक, स्वामी, सखा और सीता के प्रिय — सचमुच सब भाँति हैं। कलियुग को देखकर, जगत के हित के लिए शिव और गिरिजा (पार्वती) ने शाबर मंत्रों का जाल रचा, जिनके अक्षर बेमेल और अर्थ अस्पष्ट हैं, फिर भी जिनका प्रभाव प्रकट है — यही महेश का प्रताप है। वे उमापति शिव मुझ पर अनुकूल हों और इस कथा को आनंद-मंगल का मूल बनाएँ; शिव का स्मरण कर और पार्वती-शिव की कृपा पाकर मैं उत्सुक हृदय से राम-चरित का वर्णन करता हूँ। शिव की कृपा से मेरी रचना ऐसे शोभित होती है मानो चंद्रमा की संगति पाकर सुंदर रात्रि। जो इस कथा को प्रेम सहित सचेत मन से कहते, सुनते और समझते हैं, वे राम के चरणों के अनुरागी होकर कलिमल से रहित और सुमंगल के भागी होंगे।
सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ। तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ।।15।।
यदि स्वप्न में या सचमुच शिव और गौरी (पार्वती) की मुझ पर कृपा है, तो मैंने जो कुछ कहा है वह सब सत्य हो — यही इस लोकभाषा की रचना का प्रभाव है।
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि।। प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी।। सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए।। बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची।। प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू।। दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी।। करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी।। जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता।।
मैं अत्यंत पावन नगरी अयोध्या और कलियुग के पापों का नाश करने वाली सरयू नदी को प्रणाम करता हूँ; और नगर के उन नर-नारियों को भी प्रणाम करता हूँ, जिन पर प्रभु का स्नेह थोड़ा नहीं है। जिन्होंने सीता की निंदा की, उनके पापों के समूह नष्ट कर दिए गए और उन्हें शोकरहित करके ऊँचे लोक में बसा दिया गया। मैं कौसल्या को पूर्व दिशा के समान प्रणाम करता हूँ, जिनकी कीर्ति समस्त जगत में फैली, जहाँ रघुपति रूपी सुंदर चंद्रमा प्रकट हुआ, जो जगत को सुख देने वाला और दुष्ट रूपी कमल के लिए पाला है। मैं राजा दशरथ को सब रानियों सहित सत्कर्म और सुमंगल की मूर्ति मानता हूँ; कर्म, मन और वचन से उन्हें प्रणाम करता हूँ — मुझे अपने पुत्र का सेवक जानकर कृपा करें। जिन्हें रचकर विधाता स्वयं बड़ा हो गया — वे राम के माता-पिता, महिमा की सीमा हैं।
बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद। बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ।।16।।
मैं अयोध्या के राजा दशरथ को प्रणाम करता हूँ, जिनका सच्चा प्रेम राम के चरणों में था — दीनदयाल प्रिय प्रभु से बिछुड़ते ही उन्होंने अपने प्यारे शरीर को तिनके की तरह त्याग दिया।
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू।। जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई।। प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना।। राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू।। बंदउँ लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुख दाता।। रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका।। सेष सहस्त्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन।। सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर।। रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी।। महावीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना।।
मैं विदेह (राजा जनक) को उनके परिवार सहित प्रणाम करता हूँ, जिन्हें राम के चरणों में गूढ़ स्नेह था, जिसे उन्होंने योग और भोग के बीच छिपाए रखा पर राम को देखते ही वह प्रकट हो गया। पहले मैं भरत के चरणों को प्रणाम करता हूँ, जिनके नियम और व्रत का वर्णन नहीं किया जा सकता, जिनका मन भौंरे की तरह राम के चरणकमलों से लिपटा रहता है और उन्हें कभी नहीं छोड़ता। मैं लक्ष्मण के चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ, जो शीतल, सुंदर और भक्तों को सुख देने वाले हैं, जो रघुपति की निर्मल कीर्ति रूपी ध्वजा के दंड के समान हुए; वे जगत के कारण सहस्रशीश शेष हैं, जो पृथ्वी का भय दूर करने के लिए अवतरित हुए — वे कृपासिंधु, गुणों की खान, सुमित्रा-पुत्र (लक्ष्मण) सदा मुझ पर अनुकूल रहें। मैं शत्रुघ्न के चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ, जो वीर, सुशील और भरत के अनुगामी हैं; और महावीर हनुमान से विनती करता हूँ, जिनके यश की स्वयं राम ने प्रशंसा की है।
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन। जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।17।।
मैं पवनपुत्र हनुमान को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्ट रूपी वन के लिए अग्नि और ज्ञान के भंडार हैं, जिनके हृदय रूपी घर में बाण और धनुष धारण किए राम बसते हैं।
कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा।। बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए।। रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते।। बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे।। सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद।। प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा।। जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुना निधान की।। ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।। पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक।। राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुख दायक।।
वानरराज सुग्रीव, रीछ जामवंत, राक्षसराज विभीषण, अंगद आदि सारा वानर-समाज — मैं इन सबके सुंदर चरणों को प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने नीच शरीर में भी राम को पा लिया। रघुपति के चरणों के सभी उपासक, पक्षी, पशु, देव, मनुष्य और असुर सहित — मैं उन सबके चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ जो बिना किसी कामना के राम के सेवक हैं। शुक, सनक आदि भक्त, मुनि नारद, और वे श्रेष्ठ मुनि जो विज्ञान में निपुण हैं — मैं धरती पर सिर रखकर सबको प्रणाम करता हूँ; हे मुनीश्वरो, मुझे अपना सेवक जानकर कृपा करें। जनक की पुत्री जानकी (सीता), जगत की माता, करुणा के धाम (राम) की अत्यंत प्रिया, उनके दोनों चरणकमलों को मैं मनाता हूँ, जिनकी कृपा से मुझे निर्मल बुद्धि मिले। फिर मन, वचन और कर्म से मैं रघुनायक (राम) के सर्वसमर्थ चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ, जो कमलनयन हैं, धनुष-बाण धारण किए हैं, भक्तों की विपत्ति के नाशक और सुख के दाता हैं।
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।।18।।
जैसे वाणी और उसका अर्थ, या जल और उसकी लहर, वैसे ही सीता और राम भिन्न कहे जाकर भी अभिन्न हैं — मैं सीता-राम के चरणों को प्रणाम करता हूँ, जिन्हें दुखी जन अत्यंत प्रिय हैं।
बंदउँ नाम राम रघुवर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।। बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो।। महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू।। महिमा जासु जान गनराउ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।। जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।। सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी।। हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को।। नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।
मैं रघुवर के 'राम' नाम को प्रणाम करता हूँ, जो अपने अक्षरों में ही अग्नि, सूर्य और चंद्रमा का कारण है; यह ब्रह्मा, विष्णु और शिवमय है, वेदों का प्राण है, निर्गुण और अनुपम होकर भी सब गुणों का निधान है। यह वह महामंत्र है जिसे शिव जपते हैं और जो काशी में मुक्ति देने वाला उपदेश है; इसकी महिमा गणेश जानते हैं, और नाम के प्रभाव से ही वे सबसे पहले पूजे जाते हैं। आदिकवि वाल्मीकि ने नाम का प्रताप जाना और उसे उलटा जपकर पवित्र हो गए। शिव के मुख से नाम को सहस्रनाम के समान सुनकर भवानी (पार्वती) उसे अपने प्रिय शिव के साथ जपती हैं; और शिव उसे हृदय में देखकर हर्षित हुए और उस नाम को, जो स्त्रियों में श्रेष्ठ पार्वती का आभूषण है, उनका ही आभूषण बना दिया। शिव नाम का प्रभाव भली-भाँति जानते हैं, जिसके बल से कालकूट विष ने उन्हें अमृत का फल दिया।
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।। राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास।।19।।
तुलसीदास कहते हैं कि श्रीराम की भक्ति वर्षा ऋतु के समान है और उत्तम भक्त उसमें फलने वाली धान की फसल के समान हैं; तथा 'राम' नाम के दो सुंदर अक्षर सावन और भादों के महीनों के समान हैं जो इस फसल को सींचते हैं।
आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।। सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू।। कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के।। बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती।। नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता।। भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन । स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के।। जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से।।
राम नाम के दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, भक्तों के मुख के नेत्रों और उनके प्राणों के समान हैं। स्मरण करने में सरल और सबको सुख देने वाले हैं, इस लोक में लाभ और परलोक में सहारा देते हैं; कहने, सुनने और स्मरण करने में अत्यंत मधुर, ये तुलसी को राम-लक्ष्मण के समान प्रिय हैं। इन्हें अलग-अलग बताने में भेद दिखता है, पर ये ब्रह्म और जीव के समान स्वाभाविक साथी हैं, और नर-नारायण के समान सुंदर भाई हैं जो जगत का पालन और विशेषकर भक्तों की रक्षा करते हैं। ये भक्ति रूपी सुंदरी के कानों के आभूषण हैं, जगत के हित के लिए निर्मल चंद्र और सूर्य के समान हैं; स्वाद और तृप्ति के समान मोक्ष रूपी अमृत हैं, और कच्छप तथा शेष के समान पृथ्वी को धारण करते हैं। ये भक्तों के मन रूपी सुंदर कमल पर भौंरे के समान हैं, और जीभ रूपी यशोदा पर हरि (कृष्ण) और हलधर (बलराम) के समान क्रीड़ा करते हैं।
एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ। तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ।।20।।
रघुबर (श्रीराम) के नाम का एक अक्षर राजछत्र के समान और दूसरा मुकुट की मणि के समान है, जो सब अक्षरों के ऊपर सुशोभित हैं। तुलसी कहते हैं कि श्रीराम के नाम के दोनों अक्षर परम शोभा से विराजमान हैं।
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।। नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी।। को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू।। देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना।। रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें।। सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।। नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी।। अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी।।
विचार करने पर नाम और नामी (भगवान) समान हैं, दोनों में परस्पर प्रेम है, यद्यपि प्रभु अपने नाम के पीछे चलते हैं। नाम और रूप ईश्वर की दो उपाधियाँ हैं, दोनों अकथनीय, अनादि और उत्तम बुद्धि से ही समझ में आती हैं; कौन बड़ा और कौन छोटा, यह कहना अपराध है, पर गुणों का भेद सुनकर साधुजन समझ जाएँगे। रूप नाम के आधीन दिखाई देता है, क्योंकि नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं होता, और कोई परिचित रूप भी यदि नाम से न जाना जाए तो हथेली पर होते हुए भी पहचाना नहीं जाता। पर नाम को रूप देखे बिना ही स्मरण किया जा सकता है, जिससे हृदय में विशेष प्रेम उमड़ता है। नाम और रूप की गति अकथनीय है, समझने में सुखद पर वर्णन नहीं की जा सकती। नाम निर्गुण और सगुण ब्रह्म के बीच उत्तम साक्षी है, और दोनों का बोध कराने वाला चतुर दुभाषिया है।
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।21।।
हे तुलसी, यदि तू भीतर (आत्मा में) और बाहर (संसार में) दोनों ओर उजाला चाहता है, तो जीभ रूपी देहली के द्वार पर राम नाम रूपी मणिदीप रख।
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।। ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा।। जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ।। साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।। जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।। राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा।। चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा।। चहुँ जुग चहुँ श्रुति ना प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ।।
जीभ पर नाम जपते हुए योगी जागते रहते हैं, वैराग्यवान और ब्रह्मा की माया से रहित होकर ब्रह्म के अनुपम सुख का अनुभव करते हैं, जो अकथनीय, निर्विकार और नाम-रूप से परे है। जो उस गूढ़ अवस्था को जानना चाहते हैं, वे भी नाम जपकर उसे जान लेते हैं। साधक एकाग्रता से नाम जपकर सिद्ध हो जाते हैं और अणिमा आदि सिद्धियाँ पा लेते हैं; और अत्यंत दुखी भक्त नाम जपते हैं तो उनके भारी संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। जगत में राम के चार प्रकार के भक्त हैं, चारों पुण्यात्मा, निष्पाप और उदार हैं, और चारों चतुरों को नाम ही आधार है, यद्यपि ज्ञानी प्रभु को विशेष प्रिय है। नाम का प्रभाव चारों युगों और चारों वेदों में है; कलियुग में तो विशेषकर और कोई उपाय ही नहीं है।
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन। नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहुँ किए मन मीन।।22।।
जो समस्त कामनाओं से रहित होकर राम की भक्ति के रस में लीन हैं, उन्होंने नाम के प्रति सुंदर प्रेम रूपी अमृत के सरोवर में अपने मन को मछली के समान बना लिया है।
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।। मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें।। प्रोढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की।। एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू।। उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें।। ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन धन आनँद रासी।। अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी।। नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें।।
ब्रह्म के दो रूप हैं, निर्गुण और सगुण, दोनों अकथनीय, अगाध, अनादि और अनुपम हैं; पर मेरे मत में नाम इन दोनों से बड़ा है, क्योंकि उसने अपने बल से दोनों को अपने वश में कर रखा है। सज्जन इसे सेवक की केवल बड़ाई न समझें; मैं अपने मन की प्रतीति, प्रीति और रुचि कह रहा हूँ। एक (निर्गुण) काठ में छिपी आग के समान है और दूसरा (सगुण) प्रकट आग के समान, यही दोनों ब्रह्मों का विवेक है; दोनों को जानना कठिन है, पर नाम से दोनों सुगम हो जाते हैं, इसीलिए मैंने नाम को निर्गुण ब्रह्म और राम दोनों से बड़ा कहा। ब्रह्म एक, व्यापक, अविनाशी, सत्-चित्-आनंद की राशि है; ऐसा अविकारी प्रभु हृदय में रहते हुए भी सारे जीव संसार में दीन और दुखी हैं। पर नाम के निरूपण और नाम के जतन से वही ब्रह्म प्रकट हो जाता है, जैसे मोल (कीमत) जानने से रत्न का मूल्य प्रकट हो जाता है।
निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार। कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार।।23।।
इस प्रकार नाम का अपार प्रभाव निर्गुण ब्रह्म से भी बड़ा है; और अपने विचार के अनुसार मैं नाम को राम (सगुण रूप) से भी बड़ा कहता हूँ।
राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी।। नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा।। राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।। रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्ह बिबाकी।। सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा।। भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू।। दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन।।। निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन।।
अपने भक्तों के हित के लिए राम ने मनुष्य शरीर धारण कर, कष्ट सहकर साधुओं को सुखी किया; पर नाम को प्रेमपूर्वक जपने से भक्त सहज ही आनंद और मंगल के धाम बन जाते हैं। राम ने एक तपस्वी की स्त्री (अहल्या) का उद्धार किया, जबकि नाम ने करोड़ों दुष्टों की कुबुद्धि सुधार दी; ऋषि के हित के लिए राम ने सुकेतु की पुत्री (ताड़का) का सेना और पुत्रों सहित अंत किया, पर नाम दास के दोष, दुख और बुरी दुराशा को वैसे ही मिटा देता है जैसे सूर्य रात्रि को। राम ने स्वयं शिव का धनुष तोड़ा, पर नाम का प्रताप संसार के भय को नष्ट कर देता है; राम ने दंडक वन को सुहावना बनाया, पर नाम ने असंख्य भक्तों के मन को पवित्र किया। रघुनंदन ने राक्षसों के समूह का संहार किया, पर नाम कलियुग के सारे पापों को जड़ से नष्ट कर देता है।
सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ। नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ।।24।।
रघुनाथ ने शबरी और गीध (जटायु) जैसे उत्तम सेवकों को सद्गति दी; पर नाम ने असंख्य दुष्टों का उद्धार किया, यह गुणगाथा वेदों में प्रसिद्ध है।
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ।। नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे।। राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा।। नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं।। राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा।। राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी।। सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती।। फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें।।
राम ने सुग्रीव और विभीषण दोनों को शरण दी, यह सब कोई जानता है; पर नाम ने अनेक दीनों पर कृपा की, इसका उत्तम यश लोक और वेद में सुशोभित है। राम ने भालू-वानरों की सेना जुटाई और सेतु बनाने में कम परिश्रम नहीं किया, पर केवल नाम लेने से भवसागर सूख जाता है, सज्जन अपने मन में इस पर विचार करें। राम ने कुल सहित रावण को युद्ध में मारा और सीता सहित अपने नगर लौटे, अवध को राजधानी बनाकर राजा हुए, जिनके गुण देवता और मुनि उत्तम वाणी से गाते हैं; पर जो सेवक प्रेमपूर्वक नाम स्मरण करता है वह बिना परिश्रम प्रबल मोह की सेना को जीत लेता है, और प्रेम में मग्न होकर अपने ही सुख में विचरता है, जिससे नाम के प्रसाद से उसे स्वप्न में भी कोई चिंता नहीं रहती।
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि। रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि।।25।।
नाम ब्रह्म और राम दोनों से बड़ा है, और वरदान देने वाला तथा उत्तम दान देने वाला है; इसे हृदय में जानकर महेश (शिव) ने सौ करोड़ रामचरित (श्लोकों) में से नाम को चुन लिया।
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी।। सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।। नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू।। नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू।। ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ।। सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू।। अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।। कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।
नाम के प्रसाद से शंभु (शिव) अविनाशी हैं, और अमंगल वेश धारण करते हुए भी मंगल की राशि हैं; नाम के प्रसाद से शुक, सनकादि, सिद्ध, मुनि और योगी ब्रह्म-सुख भोगते हैं। नारद ने नाम का प्रताप जाना: जगत को हरि प्रिय हैं, और हरि तथा हर (शिव) दोनों नारद को प्रिय हैं। नाम जपने से प्रह्लाद पर प्रभु ने कृपा की और वे भक्तशिरोमणि हो गए; ध्रुव ने संसार से खिन्न होकर हरि का नाम जपा और अचल, अनुपम स्थान (ध्रुवपद) पाया। पवित्र नाम का स्मरण कर हनुमान (पवनसुत) ने राम को अपने वश में (हृदय में) रखा; और अधम अजामिल, गजेंद्र तथा गणिका सभी हरि-नाम के प्रभाव से मुक्त हो गए। नाम की बड़ाई मैं कहाँ तक कहूँ? राम भी नाम के गुण नहीं गा सकते।
नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु।।26।।
राम का नाम कलियुग में कल्पवृक्ष और कल्याण का निवास है; इसके स्मरण से तुलसी (व्यर्थ) भाँग से (पवित्र) तुलसी, अर्थात् तुलसीदास बन गए।
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका।। बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू।। ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें।। कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना।। नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला।। राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता।। नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू।। कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू।।
चारों युगों, तीनों कालों और तीनों लोकों में जीव नाम जपकर शोकरहित हुए हैं; वेद, पुराण और संतों का यही मत है कि सब पुण्यों का फल राम-प्रेम है। पहले युग में ध्यान, दूसरे में यज्ञ, और द्वापर में प्रभु की पूजा से संतोष होता था, पर कलियुग केवल मल का मूल और मलिन है, पापों का समुद्र है जिसमें लोगों के मन मछली के समान हैं। नाम भयंकर कलियुग में कल्पवृक्ष है, और उसका स्मरण जगत के सारे जाल नष्ट कर देता है; राम का नाम कलियुग में मनचाहा फल देता है और इस लोक-परलोक का हितकारी, माता-पिता के समान है। कलियुग में न कर्म है, न भक्ति, न विवेक; एकमात्र सहारा राम-नाम है। कलियुग कालनेमि के समान कपट का भंडार है, और नाम बुद्धिमान तथा समर्थ हनुमान है (जिसने कालनेमि को हराया)।
राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल। जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल।।27।।
राम का नाम नरसिंह है और कलिकाल हिरण्यकशिपु है; जैसे नरसिंह ने प्रह्लाद की रक्षा की, वैसे ही नाम जपने वाले भक्तों की रक्षा करेगा और देवताओं के शत्रु (कलि) का नाश करेगा।
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।। सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा।। मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती।। राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि दैखि दयानिधि पोसो।। लोकहुँ बेद सुसाहिब रीतीं। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती।। गनी गरीब ग्रामनर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर।। सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी।। साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला।। सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी।। यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ।। रीझत राम सनेह निसोतें। को जग मंद मलिनमति मोतें।।
चाहे अच्छे भाव से, बुरे भाव से, ईर्ष्या से या आलस्य से भी जपा जाए, नाम दसों दिशाओं में मंगल करता है। उस नाम और राम के गुणों का स्मरण कर मैं रघुनाथ को मस्तक नवाता हूँ, जो मुझे हर प्रकार से सुधारेंगे, जिनकी कृपा कृपा करते हुए कभी नहीं अघाती। राम ऐसे अच्छे स्वामी और मैं ऐसा बुरा सेवक, फिर भी मुझे अपना जानकर दयानिधि पालते हैं; क्योंकि लोक और वेद में अच्छे स्वामियों की यही रीति है कि विनय सुनते ही प्रेम को पहचान लेते हैं। धनी-गरीब, ग्रामीण-नगरवासी, पंडित-मूर्ख, मलिन-उजागर, सुकवि-कुकवि, सब नर-नारी अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार राजा की प्रशंसा करते हैं; और साधु, बुद्धिमान, सुशील राजा, जो ईश्वर का अंश और परम कृपालु है, सुनकर सबका सुंदर वाणी से सम्मान करता है और उनकी वाणी, भक्ति, नम्रता और भाव को पहचानता है। यह तो साधारण राजाओं का स्वभाव है, पर ज्ञानियों के शिरोमणि कोसलराज राम तो केवल शुद्ध प्रेम से ही रीझते हैं; और मुझसे बढ़कर जगत में कौन मंद और मलिन बुद्धि वाला होगा?
सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु। उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु।।28(क)।। हौहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास। साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास।।28(ख)।।
कृपालु राम मूर्ख सेवक की भी प्रीति और रुचि का ध्यान रखेंगे, वही राम जिन्होंने पत्थरों को जलयान (नाव) बना दिया और वानर-भालुओं को अपना बुद्धिमान मंत्री बनाया। सब अपने को राम का सेवक कहलाते और कहते हैं, और राम यह उपहास सहते हैं; स्वामी सीतानाथ हैं, और वैसा (अयोग्य) सेवक तुलसीदास है।
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी।। समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें।। सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही।। कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की।। रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की।। जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली।। सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी।। ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने।।
मेरी ढिठाई और दोष बहुत बड़े हैं; मेरे पापों को सुनकर नरक भी घृणा से नाक सिकोड़ लेता है, और अपने ही कल्पित डर से सहमकर मैं उन्हें याद करता हूँ, पर राम ने वैसे दोष स्वप्न में भी मन में नहीं लाए। मेरी भक्ति को प्रसन्न और सचेत नेत्रों से सुनकर और देखकर स्वामी ने मेरी भक्ति और बुद्धि की सराहना की, क्योंकि दोष कहकर उसे मिटाना हृदय के लिए अच्छा है, और राम भक्त के मन का भाव जानकर रीझते हैं। प्रभु किए हुए दोष को मन में नहीं रखते, बल्कि हृदय के भले को सौ बार याद करते हैं: जिस पाप के कारण उन्होंने व्याध के समान (छिपकर) बालि को मारा, वही कुचाल फिर सुग्रीव ने की, और वैसा ही कार्य विभीषण का था (भाई को त्यागना), फिर भी राम ने उसे स्वप्न में भी हृदय में नहीं देखा, बल्कि मिलने पर उन्हें भरत के समान सम्मान दिया और राजसभा में उनकी प्रशंसा की।
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।। तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान।।29(क)।। राम निकाईं रावरी है सबही को नीक। जों यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक।।29(ख)।। एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ। बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ।।29(ग)।।
प्रभु वृक्ष के नीचे और वानर डाल पर थे, फिर भी उन्होंने उन्हें अपने समान बना लिया; तुलसी कहते हैं कि राम के समान शीलनिधान स्वामी कहीं नहीं है। हे राम, आपकी भलाई सभी का हित करती है; यदि यह सदा सत्य है तो तुलसी का भी भला होगा। इस प्रकार अपने गुण-दोष कहकर और फिर सबको सिर नवाकर, अब मैं रघुबर (राम) के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जिसे सुनने से कलियुग के पाप नष्ट हो जाते हैं।
जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई।। कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी।। संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा।। सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा। राम भगत अधिकारी चीन्हा।। तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा।। ते श्रोता बकता समसीला। सवँदरसी जानहिं हरिलीला।। जानहिं तीनि काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना।। औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना।।
याज्ञवल्क्य ने जो सुंदर कथा भरद्वाज मुनि को सुनाई, वही संवाद मैं वर्णन करके कहूँगा; हे सज्जनो, सब सुख मानकर सुनो। शंभु (शिव) ने यह सुहावनी कथा रची और कृपा करके उमा (पार्वती) को सुनाई; फिर शिव ने वही कथा काकभुशुंडि को दी, उन्हें राम का अधिकारी भक्त पहचानकर, और उनसे याज्ञवल्क्य ने पाई और उन्होंने फिर भरद्वाज को सुनाई। श्रोता और वक्ता समान स्वभाव के हैं, दोनों समदर्शी और हरि की लीला के ज्ञाता हैं, जो अपने ज्ञान से तीनों कालों को हथेली पर रखे आँवले के समान स्पष्ट जानते हैं; और भी जो सुजान हरिभक्त हैं, वे अनेक प्रकार से इसे कहते, सुनते और समझते हैं।
मै पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत। समुझी नहि तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत।।30(क)।। श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़। किमि समुझौं मै जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़।।30(ख)।।
मैंने भी अपने गुरु से वह कथा सूकरखेत (सोरों) में सुनी, पर मैं उसे ठीक से नहीं समझा, क्योंकि तब बालपन में मैं अत्यंत अचेत (नासमझ) था। श्रोता और वक्ता ज्ञान के भंडार थे और राम की कथा गूढ़ है; मैं जड़ जीव, कलियुग के मल से ग्रसित और अत्यंत मूढ़, उसे कैसे समझता?
तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा।। भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई।। जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें।। निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी।। बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि।। रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी।। रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई।। सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि।। असुर सेन सम नरक निकंदिनि। साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि।। संत समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी।। जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी।। रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी।। सिवप्रय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी।। सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी।।
फिर भी गुरु ने बार-बार कहा तो मुझे अपनी बुद्धि के अनुसार कुछ समझ आया, और मैं उसे भाषा में रचूँगा जिससे मेरे मन का बोध हो; जितना बुद्धि और विवेक का बल मुझमें है, उतना ही हरि की प्रेरणा से हृदय में कहूँगा, इस कथा को संसार-नदी पार करने की नाव बनाकर जो मेरे संदेह, मोह और भ्रम को हरती है। राम-कथा बुद्धिमानों का विश्राम और सबका आनंद देने वाली है, कलियुग के पापों को नष्ट करती है; यह कलियुग रूपी सर्प के लिए मयूरी के समान है, और विवेक रूपी अग्नि के लिए अरणि (काठ) के समान; कलियुग की कामधेनु और सज्जनों के लिए सुंदर संजीवनी बूटी है। यह पृथ्वी पर अमृत की तरंगिणी है जो भय मिटाती है और भ्रम रूपी मेंढक के लिए सर्पिणी के समान है; नरक का नाश असुर-सेना के नाश की तरह करती है और साधु-देवताओं के हित के लिए गिरिनंदिनी (पार्वती/गंगा) के समान है। यह संत-समाज रूपी समुद्र से उत्पन्न लक्ष्मी के समान है, संसार का भार धारण करने वाली अचल क्षमा (पृथ्वी) के समान है, यमदूतों के मुख पर कालिख पोतने वाली यमुना के समान है, और जीवों को मुक्ति देने वाली काशी के समान है। यह राम को तुलसी के समान प्रिय और पवित्र है, तुलसीदास के हृदय के हित के लिए हुलसी (उनकी माता) के समान है, शिव को प्रिय नर्मदा के समान है, और सारी सिद्धि, सुख और संपत्ति की राशि है; तथा देवता रूपी सद्गुणों के लिए माता अदिति के समान और रघुबर की भक्ति-प्रेम की परम सीमा के समान है।
राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु। तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु।।31।।
तुलसी कहते हैं: राम-कथा मंदाकिनी नदी है, निर्मल मन चित्रकूट है, और प्रेम वह सुंदर वन है जहाँ सीता और रघुबीर (राम) विहार करते हैं।
राम चरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू।। जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के।। सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के।। जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के।। समन पाप संताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के।। सचिव सुभट भूपति बिचार के। कुंभज लोभ उदधि अपार के।। काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि सावक जन मन बन के।। अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के।। मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।। हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक सालि पाल जलधर से।। अभिमत दानि देवतरु बर से। सेवत सुलभ सुखद हरि हर से।। सुकबि सरद नभ मन उडगन से। रामभगत जन जीवन धन से।। सकल सुकृत फल भूरि भोग से। जग हित निरुपधि साधु लोग से।। सेवक मन मानस मराल से। पावक गंग तंरग माल से।।
राम के चरित सुंदर चिंतामणि और सुबुद्धि रूपी सुंदरी के लिए मनोहर शृंगार हैं; उनके गुण जगत के सारे मंगल के भंडार हैं, जो मुक्ति, धन, धर्म और सब धाम देने वाले हैं। ये ज्ञान, वैराग्य और योग के सच्चे सद्गुरु हैं, और संसार रूपी भयंकर रोग के देव-वैद्य हैं; ये सीता-राम के प्रेम के माता-पिता हैं, और सब व्रत, धर्म और नियम के बीज हैं। ये पाप, संताप और शोक का नाश करते हैं, और इस लोक-परलोक के प्रिय पालक हैं; राजा के विचार के लिए बुद्धिमान मंत्री और शूरवीर हैं, और लोभ रूपी अपार समुद्र के लिए अगस्त्य (कुंभज) मुनि के समान हैं। काम, क्रोध और कलियुग के मल हाथियों के समान हैं, और राम के चरित भक्त के मन रूपी वन में सिंह-शावक हैं; ये पूजनीय अतिथि और शिव को अत्यंत प्रिय हैं, और दरिद्रता रूपी दावानल के लिए वर्षा-मेघ हैं। ये विषय रूपी सर्प के लिए महामणि-मंत्र हैं और मस्तक पर लिखे कठोर कुलेख (भाग्य) को मिटा देते हैं; सूर्य की किरणों के समान मोह के अंधकार को हरते हैं, और मेघ के समान भक्त रूपी धान की फसल को पालते हैं। ये मनोवांछित देने वाले उत्तम कल्पवृक्ष हैं, सेवा में सुलभ और सुखद, हरि और हर (विष्णु-शिव) के समान; सुकवियों के मन के लिए शरद के आकाश के तारों के समान, और राम-भक्तों के जीवन-धन के समान; सब पुण्यों के फल रूपी विपुल भोग के समान, जगत के हित के लिए निष्कपट साधुजनों के समान, सेवक के मन रूपी मानसरोवर में हंस के समान, और गंगा की पवित्र तरंगमाला के समान हैं।
कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड। दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड।।32(क)।। रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु। सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु।।32(ख)।।
राम के गुणों का समूह कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल और कलियुग के कपट, दंभ तथा पाखंड को वैसे ही जला देता है जैसे प्रचंड अग्नि ईंधन को। रामचरित पूर्ण चंद्रमा की किरणों के समान सबको सुख देते हैं, और सज्जनों के हृदय के लिए, जो कुमुद और चकोर के समान हैं, विशेष रूप से बड़े लाभकारी हैं।
कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी।। सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथाप्रबंध बिचित्र बनाई।। जेहि यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करैं सुनि सोई।। कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी।। रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं।। नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा।। कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए।। करिअ न संसय अस उर आनी। सुनिअ कथा सारद रति मानी।।
जिस प्रकार भवानी (पार्वती) ने प्रश्न किया और जिस प्रकार शंकर (शिव) ने समझाकर उत्तर दिया, वह सब कारण मैं वर्णन करके कहूँगा, एक विचित्र कथा-प्रबंध रचकर। जिसने यह कथा न सुनी हो वह सुनकर आश्चर्य न करे, क्योंकि जो ज्ञानी इस अलौकिक कथा को सुनते हैं वे इसे सत्य जानकर आश्चर्य नहीं करते; उनके मन में यह विश्वास है कि जगत में राम की कथाओं की कोई सीमा नहीं। राम अनेक प्रकार से अवतार लेते हैं, और रामायण सौ करोड़ (असंख्य) और अपार हैं; कल्पभेद के अनुसार मुनीश्वरों ने हरि के सुहावने चरित अनेक प्रकार से गाए हैं। इसलिए इसे हृदय में लाकर संदेह न करो, और शारदा (वाणी की देवी) के प्रति प्रेम रखकर यह कथा सुनो।
राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार। सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार।।33।।
राम अनंत हैं, उनके गुण अनंत हैं, और उनकी कथा का विस्तार अपार है; जिनके विचार निर्मल हैं वे इसे सुनकर आश्चर्य नहीं मानेंगे।
एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी।। पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी।। सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा।। संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा।। नौमी भौम बार मधु मासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।। जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं।। असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा।। जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना।।
इस प्रकार सब संदेह दूर कर और गुरु के चरण-कमलों की धूल सिर पर धारण कर, फिर मैं हाथ जोड़कर सबसे विनती करता हूँ कि कथा कहने में कोई दोष न लगे; आदरपूर्वक शिव को सिर नवाकर मैं राम के गुणों का निर्मल यश वर्णन करता हूँ। संवत् सोलह सौ इकतीस में हरि के चरणों में सिर रखकर मैं कथा आरंभ करता हूँ; चैत्र मास (मधुमास) की नवमी तिथि, मंगलवार को, यह चरित अयोध्यापुरी में प्रकट हुआ। जिस दिन वेद राम का जन्म बताते हैं, सारे तीर्थ वहाँ चले आते हैं, और असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता आकर रघुनायक (राम) की सेवा करते हैं; बुद्धिमान लोग जन्म का महोत्सव रचते हैं और राम की सुंदर कीर्ति गाते हैं।
मज्जहि सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर। जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर।।34।।
सज्जनों के अनेक समूह पवित्र सरयू के जल में स्नान करते हैं और हृदय में राम के सुंदर श्याम शरीर का ध्यान धारण कर उनका नाम जपते हैं।
दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना।। नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारद बिमलमति।। राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि।। चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजे तनु नहि संसारा।। सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी।। बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं काम मद दंभा।। रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा।। मन करि विषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौ एहिं सर परई।। रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन।। त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन।। रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा।। तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर।। कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सुजन मन लाई।।
वेद और पुराण कहते हैं कि सरयू के जल के दर्शन, स्पर्श, स्नान और पान से पाप हरते हैं; यह नदी पवित्र और अत्यंत महिमामयी है, जिसे निर्मल बुद्धि वाली शारदा भी वर्णन नहीं कर सकतीं। सुहावनी नगरी अयोध्या राम का धाम देने वाली है और सब लोकों में अत्यंत पवित्र प्रसिद्ध है, जिससे चारों खानि के असंख्य जीव यदि अयोध्या में शरीर त्यागें तो संसार में नहीं आते (मुक्त हो जाते हैं)। नगरी को सब प्रकार से मनोहर, सारी सिद्धियाँ देने वाली और मंगल की खान जानकर मैंने यह निर्मल कथा आरंभ की, जिसे सुनने से काम, मद और दंभ नष्ट हो जाते हैं। इसका नाम रामचरितमानस है, और इसे कानों से सुनने पर विश्राम मिलता है; जो मन विषय रूपी दावानल में हाथी के समान जलता है, वह इस सरोवर में उतरे तो सुखी हो जाता है। रामचरितमानस मुनियों को प्रिय है; शंभु (शिव) ने यह सुहावना और पवित्र ग्रंथ रचा, जो तीन प्रकार के दोष, दुख और दरिद्रता को (दावानल की तरह) बुझा देता है और कलियुग की कुचाल तथा सारे पाप नष्ट करता है। महेश ने इसे रचकर अपने मन में रखा, और सुअवसर पाकर अपनी पत्नी पार्वती को सुनाया; इसलिए इस उत्तम ग्रंथ को हृदय में देखकर और प्रसन्न होकर हर (शिव) ने इसका नाम रामचरितमानस रखा। मैं वही सुखद और सुहावनी कथा कहता हूँ; हे सज्जनो, आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो।
जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु। अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु।।35।।
यह मानस किस प्रकार बना, किस विधि से बना और जगत में किस कारण इसका प्रचार हुआ, वह सारा प्रसंग अब मैं उमा (पार्वती) और वृषकेतु (शिव) का स्मरण कर कहता हूँ।
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी।। करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी।। सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू।। बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी।। लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी।। प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई।। सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई।। मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन।। भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना।।
शंभु की कृपा से तुलसी के हृदय में सुबुद्धि आनंद से उमड़ी, और इस प्रकार तुलसी रामचरितमानस के कवि हुए; वे इसे अपनी मनोहर बुद्धि के अनुसार रचते हैं, इसलिए हे सज्जनो, ध्यान से सुनकर इसे सुधार लो। सुबुद्धि भूमि है और गहरा हृदय स्थल; वेद, पुराण और संत समुद्र और मेघ के समान हैं जो राम के सुयश का उत्तम जल बरसाते हैं, जो मधुर, मनोहर और मंगलकारी है। प्रभु की जो सगुण लीला वे वर्णन करते हैं वह मन के मल को धोने का काम करती है, और जो प्रेम-भक्ति वर्णन नहीं की जा सकती वही इसकी मधुरता और शीतलता है। वह जल पुण्य रूपी धान की फसल के लिए हितकर है और राम-भक्तों का जीवन है; बुद्धि रूपी पृथ्वी पर गिरकर वह सिमटकर कानों के सुंदर मार्ग से बहा, और अच्छे मानसरोवर को भरकर एक सुंदर स्थल पर ठहर गया, जो सुखद, शीतल, रुचिकर और चिरकालीन (परिपक्व) है।
सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि। तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।36।।
अत्यंत सुंदर, उत्तम संवाद जो तुलसी ने बुद्धि से विचारकर रचे, वे ही इस पवित्र, सुंदर सरोवर के चार मनोहर घाट हैं।
सप्त प्रबन्ध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना।। रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा।। राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम।। पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई।। छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा।। अरथ अनूप सुमाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा।। सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला।। धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती।। अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी।। नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा।। सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जल बिहग समाना।। संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई।। भगति निरुपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना।। सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पत रति रस बेद बखाना।। औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा।।
सात कांड सरोवर की सुंदर सीढ़ियाँ हैं, जिन्हें ज्ञान के नेत्र से देखने पर मन प्रसन्न होता है; रघुपति की निर्गुण, निर्बाध महिमा का वर्णन उत्तम अगाध जल है, और राम-सीता का अमृत के समान यश तरंगों की मनोहर लीला के समान है। सुंदर चौपाइयाँ घनी कमलिनी हैं और चतुर युक्तियाँ सुंदर मणिमय सीप हैं; छंद, सोरठा और दोहे अनेक रंग के कमल-कुल हैं जो इसे सुशोभित करते हैं, और अनुपम अर्थ, सुंदर भाव और सुभाषा पराग, मकरंद और सुगंध हैं। पुण्यों का समूह सुंदर भौंरों की माला है, और ज्ञान, वैराग्य तथा विचार हंस हैं; ध्वनि, वक्रता (अवरेब) और काव्य के गुण अनेक प्रकार की मनोहर मछलियाँ हैं। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—ये चारों ज्ञान-विज्ञान के विचार सहित कहे गए, तथा नव रस, जप, तप, योग और वैराग्य—ये सब सरोवर के सुंदर जलचर हैं; पुण्यात्माओं और साधुओं द्वारा नाम-गुण का गान अनेक रंग के विचित्र जलपक्षियों के समान है। संत-सभा चारों ओर की अमराई (वृक्ष-कुंज) है, और श्रद्धा वसंत ऋतु है; भक्ति का विविध प्रकार से निरूपण, क्षमा, दया और दम के साथ, लताओं का मंडप है, जबकि सम, यम और नियम फूल हैं, ज्ञान फल है, और हरि के चरणों में प्रीति-रस को वेद इसका सार कहते हैं; और भी अनेक कथा-प्रसंग तोते, कोयल और अनेक रंग के पक्षियों के समान हैं।
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु। माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु।।37।।
रोमांच (पुलक) फूलों की वाटिकाएँ, बाग और वन हैं जहाँ सुख के सुंदर पक्षी विहार करते हैं; प्रेम माली है जो सुंदर भावों के फूलों को सींचता है, और प्रेम के आँसू बहाने वाले सुंदर नेत्र वही जल हैं जिससे वे सींचे जाते हैं।
जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे।। सदा सुनहिं सादर नर नारी। तेइ सुरबर मानस अधिकारी।। अति खल जे बिषई बग कागा। एहिं सर निकट न जाहिं अभागा।। संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना।। तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे।। आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई।। कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला।। गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला।। बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना।।
जो इस चरित को सँभालकर गाते हैं वे इस सरोवर के चतुर रखवाले हैं, और जो नर-नारी सदा आदरपूर्वक इसे सुनते हैं वे इस मानसरोवर के अधिकारी श्रेष्ठ देवता हैं। अत्यंत दुष्ट विषयी, जो बगुले और कौवे के समान हैं, इस सरोवर के पास नहीं जाते, क्योंकि यहाँ घोंघे, मेंढक और सेवार की तरह विषय-भोग की अनेक रसीली कथाएँ नहीं हैं; इसी कारण कामी लोग बेचारे कौवे और बगुले के समान हृदय में हारकर लौट आते हैं। इस सरोवर तक आना बहुत कठिन है, और राम की कृपा के बिना यहाँ आना-जाना नहीं होता: कठोर कुसंग और भयंकर कुमार्ग, जिनके वचन बाघ, सिंह और सर्प के समान हैं; गृहस्थी के अनेक झंझट, जो विशाल दुर्गम पर्वतों के समान हैं; और मोह, मद तथा अभिमान का विषम वन, जिसमें कुतर्क अनेक भयंकर नदियों के समान हैं।
जे श्रद्धा संबल रहित नहि संतन्ह कर साथ। तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ।।38।।
जिनके पास श्रद्धा रूपी संबल नहीं है और जो संतों के साथ से रहित हैं, और जिन्हें रघुनाथ प्रिय नहीं हैं, उनके लिए यह मानसरोवर अत्यंत अगम है।
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नींद जुड़ाई होई।। जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा।। करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना।। जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा।। सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही।। सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई।। ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह के राम चरन भल भाऊ।। जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई।। अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही।। भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू।। चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो।। सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला।। नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि।।
यदि कोई बड़ा कष्ट करके सरोवर तक पहुँच भी जाए, तो पहुँचते ही उसे नींद और जड़ता घेर लेती है, और जड़ता रूपी विषम जाड़ा हृदय में ऐसा लगता है कि अभागा वहाँ जाकर भी स्नान नहीं कर पाता; न स्नान कर पाता है न जल पी पाता है, और अभिमान सहित लौट आता है, और यदि कोई फिर उससे पूछने आए तो वह सरोवर की निंदा करके उसे टाल देता है। पर जिस पर राम सच्ची कृपा से दृष्टि डालते हैं उसे कोई विघ्न नहीं व्यापता: वही आदरपूर्वक सरोवर में स्नान करता है और तीनों घोर तापों से नहीं जलता, और ऐसे लोग, जिनका राम के चरणों में सच्चा प्रेम है, इस सरोवर को कभी नहीं छोड़ते। हे भाई, जो इस सरोवर में नहाना चाहे वह मन लगाकर सत्संग करे। इस मानस को मन के नेत्र से देखकर कवि की बुद्धि उसमें डुबकी लगाकर निर्मल हो गई; हृदय में आनंद और उत्साह उमड़ा और प्रेम-प्रमोद का प्रवाह उठा, और उसी से एक सुंदर कविता की नदी बही जो राम के निर्मल यश रूपी जल से भरी है। उसका नाम सरजू (सरयू) है, जो सुमंगल का मूल है, और उसके सुंदर किनारे लोक और वेद के मत हैं; यह पवित्र नदी, अच्छे मानसरोवर की पुत्री, कलियुग के पापों को वैसे ही जड़ से उखाड़ती है जैसे नदी घास, वृक्ष और उनकी जड़ों को।
श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल। संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल।।39।।
तीन प्रकार के श्रोता इस नदी के दोनों तटों पर बसे नगर, गाँव और शहरों के समान हैं, और संतों की अनुपम सभा स्वयं अयोध्या के समान है, जो समस्त शुभ मंगल की जड़ है।
रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई।। सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन।। जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा।। त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरुप सिंधु समुहानी।। मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही।। बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा।। उमा महेस बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती।। रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई।।
श्रीराम की भक्ति उस देवनदी गंगा के समान है जो राम की सुकीर्ति रूपी सुंदर सरयू से मिली, और भाइयों सहित राम का युद्ध में पावन यश उनमें मिलने वाली सुहावनी सोन नदी है; दोनों के बीच भक्ति की धारा शुद्ध वैराग्य के विचार सहित शोभित है। तीनों तापों को भगाने वाला यह त्रिवेणी संगम राम के स्वरूप रूपी समुद्र की ओर बहता है; अपने मूल से निकलकर यह मानस गंगा में मिलता है और सुनने वाले सज्जनों के मन को पवित्र करता है। बीच-बीच की विचित्र कथाएँ तट के वन-बागों के समान हैं; शिव-पार्वती के विवाह के बराती अनगिनत जलचर हैं, और श्रीराम के जन्म के आनंद-बधावे मनोहर भँवर और तरंगें हैं।
बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग। नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग।।40।।
चारों भाइयों की बाललीलाएँ इस नदी के बहुरंगी विपुल कमलों के समान हैं, और राजा दशरथ, रानियों तथा समस्त परिवार के पुण्य उस पर मँडराते भौंरों और जल-पक्षियों के समान हैं।
सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई।। नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका।। सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई।। घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी।। सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू।। कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं।। राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा।। काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी।।
सीता के स्वयंवर की सुहावनी कथा वह सुंदर नदी है जिस पर उसकी छटा छाई है; अनेक चतुर प्रश्न उसकी नावें हैं और विवेकपूर्ण उत्तर कुशल केवट हैं। लोग परस्पर इन कथाओं को दोहराते हैं, मानो उस नदी को शोभित करता यात्रियों का समूह हो; प्रचंड धारा परशुराम का क्रोध है और सुदृढ़ घाट श्रीराम की मधुर वाणी है। भाइयों सहित राम के विवाह का उत्सव सबको सुख देने वाली शुभ बाढ़ है; जो कहते-सुनते हैं वे हर्षित और पुलकित होते हैं, और ऐसे पुण्यात्मा प्रसन्न मन से उसमें स्नान करते हैं। राम के राजतिलक की मंगल तैयारियाँ मानो पर्व-संगम पर जुटा समाज हों, और कैकेयी की कुबुद्धि वह काई है जिसके फल से घोर विपत्ति आ पड़ी।
समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग। कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग।।41।।
असंख्य उत्पातों को शांत करने वाले भरत के चरित्र जप-यज्ञ के समान हैं, और कलियुग के पापों तथा दुष्टों के अवगुणों का वर्णन जल की मैल तथा बगुले-कौओं के समान है।
कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी।। हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू।। बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू।। ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू।। बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी।। राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई।। सती सिरोमनि सिय गुनगाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा।। भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई।।
कीर्ति की यह नदी छहों ऋतुओं में सुंदर है, हर ऋतु सुहावनी और अत्यंत पवित्र करने वाली है: हेमंत शिव-पार्वती का विवाह है और शिशिर प्रभु के जन्म का आनंदमय उत्सव है। राम के विवाह का वर्णन आनंद-मंगलमय वसंत (ऋतुराज) है; असह्य ग्रीष्म राम का वनगमन है और मार्ग की कथाएँ उसकी तीखी धूप और लू हैं। घोर वर्षा राक्षसों से युद्ध है, जो देवकुल रूपी धान के लिए वर्षा के समान मंगलकारी है; राम-राज्य का सुख और महिमा उज्ज्वल, सुखद शरद ऋतु है। पतिव्रताओं में शिरोमणि सीता के गुणों की गाथा वही निर्मल, अनुपम जल है, और भरत का शीतल, सदा एकरस स्वभाव वर्णन से परे है।
अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास। भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास।।42।।
चारों भाइयों की परस्पर स्नेहभरी दृष्टि, बोली, मिलन, प्रीति और हँसी तथा उनका सुंदर भाईचारा इस नदी के जल की मधुरता और सुगंध है।
आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी।। अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी।। राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी।। भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा।। काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन।। सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें।। जिन्ह एहि बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए।। तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी।।
मेरी आर्ति, विनय और दीनता इस नदी का कोमल, प्रचुर, पवित्र जल है; यह अद्भुत जल सुनने मात्र से हितकारी है और तृष्णा की प्यास तथा मन के मैल को हर लेता है। यह श्रीराम के प्रति सच्चे प्रेम का पोषण करता है और कलियुग के समस्त पाप-ग्लानि को धो देता है; भव के श्रम को सुखाता, संतोष देता और पाप, दुख, दरिद्रता व दोष को मिटाता है। यह काम, क्रोध, मद और मोह को नष्ट करता तथा निर्मल विवेक और वैराग्य को बढ़ाता है; इसमें आदरपूर्वक स्नान और पान करने से हृदय के पाप और संताप मिट जाते हैं। जो इस जल में अपना मन नहीं धोते वे कायर कलिकाल में नष्ट हो जाते हैं, और सूर्य की किरणों को जल समझने वाले प्यासे मृग की तरह ऐसे दुखी जीव ठगे-से लौट जाते हैं।
मति अनुहारि सुबारि गुन गनि मन अन्हवाइ। सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ।।43(क)।। अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद । कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद।।43(ख)।।
अपनी बुद्धि के अनुसार इस पवित्र जल के गुणों को गिनकर और उसमें मन को नहलाकर, कवि भवानी और शंकर का स्मरण करते हुए यह सुहावनी कथा कहता है। अब रघुनाथ के चरण-कमलों को हृदय में धारण कर और उनकी कृपा पाकर मैं दो श्रेष्ठ मुनियों (याज्ञवल्क्य और भरद्वाज) के मिलन का सुंदर संवाद कहता हूँ।
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा।। तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना।। माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई।। देव दनुज किंनर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं।। पूजहि माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता।। भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन।। तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा।। मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा।।
मुनि भरद्वाज प्रयाग में निवास करते हैं और श्रीराम के चरणों में उनका गहरा अनुराग है; वे तप, शम-दम और दया के निधान हैं तथा परमार्थ के मार्ग में परम सुजान हैं। जब माघ में सूर्य मकर राशि में आता है, तब तीर्थराज प्रयाग में सब कोई आते हैं; देव, दानव, किन्नर और मनुष्यों की श्रेणियाँ सभी आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करती हैं। वे माधव के चरण-कमलों की पूजा करते हैं और अक्षयवट को छूकर उनका शरीर हर्ष से पुलकित हो उठता है। भरद्वाज का आश्रम अत्यंत पवित्र, परम रमणीय और श्रेष्ठ मुनियों के मन को भाने वाला है; वहाँ प्रयाग में स्नान करने आए मुनि-ऋषियों का समाज जुटता है, जो प्रातः उत्साह सहित स्नान करते और परस्पर श्रीहरि के गुणों की कथा कहते हैं।
ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग। कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग।।44।।
वे अनुपम ब्रह्म, धर्म की विधियों और तत्त्व के विभागों का वर्णन करते हैं, और ज्ञान तथा वैराग्य सहित भगवान की भक्ति की चर्चा करते हैं।
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं।। प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा।। एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए।। जगबालिक मुनि परम बिबेकी। भरव्दाज राखे पद टेकी।। सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे।। करि पूजा मुनि सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी।। नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्व सबु तोरें।। कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौ न कहउँ बड़ होइ अकाजा।।
इस प्रकार वे पूरे माघ स्नान करते हैं और फिर सब अपने-अपने आश्रम लौट जाते हैं; हर वर्ष बड़ा आनंद होता है और मकर में स्नान कर मुनियों के समूह चले जाते हैं। एक बार जब सभी मुनीश्वर पूरे मकर में स्नान कर अपने आश्रमों को चले गए, तब परम विवेकी मुनि याज्ञवल्क्य को भरद्वाज ने चरण पकड़कर रोक लिया। उन्होंने आदरपूर्वक उनके चरण-कमल धोए, अति पवित्र आसन पर बैठाया, पूजा की और मुनि के सुयश की प्रशंसा कर अत्यंत पवित्र, कोमल वाणी में कहा: "हे नाथ, मेरे मन में एक बड़ा संशय है; वेद का समस्त तत्त्व आपके हाथ में है। उसे कहते मुझे भय और लज्जा लगती है, पर यदि न कहूँ तो बड़ा अनर्थ होगा।"
संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव। होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव।।45।।
"हे प्रभु, संत ऐसी नीति कहते हैं, और श्रुति, पुराण तथा मुनि गाते हैं: गुरु से छिपाव करने पर हृदय में निर्मल विवेक नहीं उपजता।"
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू।। राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा।। संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी।। आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं।। सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया।। रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही।। एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा।। नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयहु रोषु रन रावनु मारा।।
"ऐसा विचारकर मैं अपना मोह प्रकट करता हूँ; हे नाथ, सेवक पर कृपा कर उसे दूर कीजिए। राम-नाम का अपार प्रभाव संत, पुराण और उपनिषद गाते हैं, और ज्ञान-गुण की राशि अविनाशी शिव सदा उसका जप करते हैं। जगत में जीवों की चार खानें हैं, और जो काशी में मरते हैं वे परम पद पाते हैं; हे मुनिराज, वह भी राम की ही महिमा है, क्योंकि शिव वहाँ दयापूर्वक राम-नाम का उपदेश करते हैं। हे प्रभु, यह राम कौन हैं? मैं आपसे पूछता हूँ; हे कृपानिधि, मुझे समझाकर कहिए। एक राम अवधपति के कुमार हैं, जिनका चरित्र संसार में विख्यात है, जिन्होंने पत्नी के वियोग में अपार दुख पाया और क्रुद्ध होकर रण में रावण को मारा।"
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि। सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि।।46।।
"हे प्रभु, क्या वही राम हैं जिनका त्रिपुरारि (शिव) जप करते हैं, या कोई और? आप सत्य के धाम और सर्वज्ञ हैं; विवेक से विचारकर मुझे बताइए।"
जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी।। जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई।। राममगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारी मैं जानी।। चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा।। तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाई।। महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला।। रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना।। ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी।।
"हे नाथ, वह कथा विस्तार से कहिए जिससे मेरा भारी भ्रम मिट जाए।" याज्ञवल्क्य मुस्कुराकर बोले: "रघुनाथ की प्रभुता तो आपको विदित ही है। आप मन, वचन और कर्म से राम के भक्त हैं, और मैं आपकी चतुराई जानता हूँ: आप राम के गूढ़ गुण सुनना चाहते हैं, इसीलिए ऐसे प्रश्न किया मानो अत्यंत मूढ़ हों। हे तात, आदर सहित मन लगाकर सुनिए; मैं राम की सुहावनी कथा कहता हूँ। महामोह विशाल महिषासुर है, और रामकथा उसे मारने वाली विकराल काली है। रामकथा चंद्रमा की किरणों के समान है, जिसे संत चकोर की भाँति पीते हैं। स्वयं भवानी (पार्वती) ने भी एक बार ऐसा ही संशय किया था, तब महादेव ने उसे विस्तार से समझाया।"
कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद। भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद।।47।।
"अब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार उमा और शंभु का वह संवाद कहता हूँ, कि वह किस समय और किस कारण हुआ; हे मुनि, सुनिए, आपका विषाद मिट जाएगा।"
एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।। संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी।। रामकथा मुनीबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी।। रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई।। कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा।। मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी।। तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा।। पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी।।
एक बार त्रेता युग में शंभु (शिव) कुंभज ऋषि (अगस्त्य) के पास गए, साथ में जगज्जननी भवानी सती थीं; ऋषि ने उन्हें सर्वेश्वर जानकर पूजा। श्रेष्ठ मुनि ने रामकथा कही, जिसे महेश ने परम सुख मानकर सुना; और जब ऋषि ने हरि की सुंदर भक्ति के विषय में पूछा, तब शंभु ने अधिकारी जानकर उसे कहा। रघुनाथ के गुणों की गाथा कहते-सुनते गिरिनाथ (शिव) वहाँ कुछ दिन रहे, फिर मुनि से विदा लेकर दक्षकुमारी सहित घर को चले। उसी समय पृथ्वी का भार उतारने के लिए श्रीहरि ने रघुवंश में अवतार लिया, और पिता के वचन से राज्य त्यागकर वे अविनाशी प्रभु विरक्त होकर दंडक वन में विचरने लगे।
ह्दयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ। गुप्त रुप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ।।48(क)।। संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।। तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची।।48(ख)।।
शिव मन में विचारते चले: "किस प्रकार मुझे उनके दर्शन हों? प्रभु ने गुप्त रूप में अवतार लिया है; यदि मैं (प्रकट होकर) जाऊँ तो सब जान जाएँगे।" शंकर के हृदय में बड़ी क्षोभ थी, पर सती उस मर्म को नहीं जानतीं। तुलसीदास कहते हैं कि शिव के मन में दर्शन का लोभ भी था और भय भी, और उनके नेत्र दर्शन के लिए ललचाए हुए थे।
रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा।। जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा।। एहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेहि समय जाइ दससीसा।। लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा।। करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही।। मृग बधि बन्धु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए।। बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई।। कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुख ताकें।।
रावण ने यह वरदान पाया था कि उसकी मृत्यु केवल मनुष्य के हाथों हो, और प्रभु ब्रह्मा के वचन को सत्य करना चाहते थे। (उधर शिव सोचते हैं—) "यदि न जाऊँ तो पछतावा रह जाएगा"; विचार करते हुए कोई युक्ति नहीं बनी, और इस प्रकार प्रभु शिव सोच में पड़ गए। उसी समय दशमुख रावण नीच मारीच को साथ लेकर निकला, जो तुरंत कपटी सोने का मृग बन गया; कपट कर उस मूढ़ ने वैदेही (सीता) का हरण किया, प्रभु का प्रभाव उसे वैसा विदित न था। मृग को मारकर श्रीराम भाई सहित लौटे, और सूने आश्रम को देख उनके नेत्रों में जल भर आया; वियोग से व्याकुल होकर साधारण मनुष्य की भाँति दोनों भाई वन में खोजते फिरने लगे। जिन्हें कभी योग-वियोग नहीं, उनमें प्रकट वियोग का दुख देखा गया।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
रामचरितमानस का बाल काण्ड किस विषय में है?
पहला और सबसे बड़ा काण्ड श्री राम के जन्म और बाल्यकाल की कथा कहता है। गणेश, शिव, सीता-राम और गुरु की वंदना के पश्चात यह अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ राम के जन्म, भाइयों सहित उनके बचपन, विश्वामित्र द्वारा यज्ञ-रक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को ले जाने, जनकपुर में शिव-धनुष के भंग, और राम-सीता के विवाह का वर्णन करता है।
रामचरितमानस क्या है?
रामचरितमानस संत-कवि गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी) द्वारा अवधी में रचित रामायण है, जो उत्तर भारत में सर्वाधिक प्रिय और पठित ग्रंथों में से एक है। यह सात काण्डों में विभाजित है: बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुंदर, लंका और उत्तर।
अपने नाम से राम/सुंदरकांड पाठ अर्पित करें
रक्षा और शांति हेतु अपने नाम-गोत्र में रामचरितमानस या सुंदरकांड पाठ करवाएँ। सेवा बुक करें, या सनातन साहित्य में आगे पढ़ें।







