अयोध्या काण्ड के बारे में
राम के राज्याभिषेक की तैयारी के बीच रानी कैकेयी, दो पुराने वरदानों की याद दिलाकर, भरत के राज्याभिषेक और राम के चौदह वर्ष के वनवास की माँग करती हैं। राम पूर्ण शांति से इसे स्वीकार करते हैं; सीता और लक्ष्मण उनके साथ जाते हैं। राजा दशरथ शोक में प्राण त्याग देते हैं, और लौटे हुए भरत सिंहासन अस्वीकार कर राम की पादुका रखकर उनके नाम से राज्य करते हैं।
पाठ कैसे करें
अयोध्या काण्ड का पाठ उसकी मूल अवधी में (नीचे देवनागरी में) किया जाता है। धीरे-धीरे, पद-दर-पद पढ़ें; विशेषकर सुंदरकांड का पाठ साहस और रक्षा हेतु किया जाता है।
मूल पाठ
श्लोक और अर्थ
यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्। सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्।।1।। प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः। मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा।।2।। नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्। पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्।।3।।
भगवान शंकर मेरी रक्षा करें — जिनकी गोद में पर्वतराज की पुत्री पार्वती सुशोभित हैं, जिनके मस्तक पर देवनदी गंगा, माथे पर बाल चंद्रमा, कंठ में विष और वक्ष पर सर्पराज है; जो भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सबके स्वामी, सदा कल्याणकारी, सर्वव्यापी और चंद्रमा के समान उज्ज्वल श्री शंकर हैं। श्री रघुनंदन (राम) के मुखकमल की जो शोभा न अभिषेक से प्रसन्न होकर बढ़ी और न वनवास के दुःख से मुरझाई, वह मुझे सदा सुंदर मंगल देने वाली हो। मैं रघुवंश के स्वामी श्री राम को प्रणाम करता हूँ, जिनका कोमल शरीर नीले कमल के समान श्याम है, जिनके बाईं ओर सीता विराजमान हैं, और जिनके हाथों में महान बाण और सुंदर धनुष है।
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।
श्री गुरु के चरणकमलों की रज से अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ करके, मैं श्री रघुनाथ के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों फलों को देने वाला है।
जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।। भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहि सुख बारी।। रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई।। मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती।। कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती।। सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी।। मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली।। राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।।
जब से श्री राम विवाह करके घर आए, तब से नित नए मंगल और आनंद के बधावे होने लगे। चौदहों लोक मानो बड़े पर्वत हैं, जिन पर पुण्य रूपी बादल सुख की वर्षा करते हैं। ऋद्धि, सिद्धि और संपत्ति मानो सुंदर नदियाँ हैं जो उमड़कर अवध रूपी समुद्र में आ मिली हैं। नगर के सुशील स्त्री-पुरुष मणियों के समान हैं — पवित्र, अमूल्य और सब प्रकार से सुंदर। नगर की शोभा कही नहीं जा सकती, मानो ब्रह्मा की सारी रचना-कुशलता यही थी। सब नगरवासी हर तरह सुखी हैं, रामचंद्र के चंद्रमुख को निहारकर। सब माताएँ और सखियाँ प्रसन्न हैं, अपने मनोरथ रूपी बेल को फलती देखकर। राम के रूप, गुण, शील और स्वभाव को देख-सुनकर राजा दशरथ अत्यंत आनंदित होते हैं।
सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु। आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु।।1।।
सबके हृदय में यही अभिलाषा है और वे महेश्वर से यही मनाते हैं कि राजा अपने रहते ही श्री राम को युवराज पद दे दें।
एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।। सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू।। नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें।। तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं।। मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिज थोर सबु तासू।। रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा।। श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा।। नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।।
एक दिन सारे समाज सहित राजा दशरथ राजसभा में विराजमान थे। समस्त पुण्यों की मूर्ति वह राजा राम का सुयश सुनकर अत्यंत उल्लसित थे। सब राजा उनकी कृपा चाहते रहते हैं और लोकपाल भी प्रेम से उनकी रुख रखते हैं। तीनों लोकों में, तीनों कालों में, संसार में दशरथ के समान भाग्यवान कोई नहीं, जिनके पुत्र मंगल के मूल श्री राम हैं — उनके विषय में जो कुछ कहा जाए वह थोड़ा है। राजा ने सहज ही हाथ में दर्पण लिया और अपना मुख देखकर उसे मुकुट के समान ऊँचा किया। कानों के पास बाल सफेद हो गए थे, मानो बुढ़ापा यह उपदेश दे रहा हो — हे राजन्, राम को युवराज पद दो; अपने जीवन और जन्म का लाभ क्यों नहीं लेते?
यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ। प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।2।।
यह विचार हृदय में लाकर राजा ने शुभ दिन और सुंदर अवसर पाया, और प्रेम से पुलकित शरीर तथा प्रसन्न मन से जाकर गुरु वसिष्ठ को यह बात सुनाई।
कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।। सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी।। सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही।। बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई।। जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।। मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें।। अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।। मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।
राजा कहते हैं — हे मुनिराज, सुनिए। राम सब प्रकार से सब योग्य हो गए हैं। सेवक, मंत्री और सभी नगरवासी — चाहे हमारे शत्रु हों, मित्र हों या उदासीन — सबको राम वैसे ही प्रिय हैं जैसे मुझे; मानो आपका आशीर्वाद शरीर धारण करके शोभित हो रहा है। हे स्वामी, परिवार सहित ब्राह्मण सब आप ही की भाँति स्नेह करते हैं। जो गुरु के चरणों की रज सिर पर धारण करते हैं, वे सारे वैभव को वश में कर लेते हैं। मेरे समान यह अनुभव किसी दूसरे ने नहीं किया; मैंने आपकी पावन चरणरज पूजकर सब कुछ पा लिया। अब मेरे मन में एक ही अभिलाषा है, जो हे नाथ आपकी कृपा से पूरी होगी। मुनि को प्रसन्न और सहज स्नेह से भरा देखकर राजा ने कहा — आज्ञा दीजिए।
राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार। फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार।।3।।
(वसिष्ठ कहते हैं —) हे राजन्, आपका नाम और यश सब मनचाहे फलों को देने वाला है। हे राजाओं के शिरोमणि, फल आपकी इच्छा का अनुसरण करते हैं — जो आप चाहते हैं, वही होता है।
सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।। नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू।। मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू।। प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं।। पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।। सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।। सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं।। भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी।।
गुरु को सब प्रकार से प्रसन्न जानकर राजा हर्ष से कोमल वाणी में बोले — हे नाथ, राम को युवराज बनाइए; कृपा करके यह कहिए और आयोजन कीजिए। मेरे रहते ही यह उत्सव हो जाए, जिससे सब लोग अपने नेत्रों का लाभ पा लें। प्रभु की कृपा और शिव की दया से सब कुछ निभ जाता है; बस यही एक लालसा मेरे मन में है। फिर कोई चिंता न रहेगी कि शरीर रहे या जाए, जिससे पीछे पछतावा न हो। दशरथ के सुंदर वचन सुनकर मुनि का मन प्रसन्न हुआ, क्योंकि वे मंगल और आनंद के मूल थे। उन्होंने कहा — हे राजन् सुनिए, जिससे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिसके भजन बिना हृदय की जलन नहीं मिटती, वही स्वामी आपके पुत्र राम बने हैं, जो पवित्र प्रेम के अनुगामी हैं।
बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु। सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।।4।।
हे राजन्, शीघ्र कीजिए, देर न कीजिए; सारी तैयारी सजाइए। शुभ दिन और सुंदर मंगल तभी होगा, जब राम युवराज होंगे।
मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।। कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए।। जौं पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका।। मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी।। बिनती सचिव करहि कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी।। जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा।। नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा।।
प्रसन्न राजा महल में आए और सेवकों, मंत्रियों तथा सुमंत्र को बुलाया। 'जय हो, जीते रहो' कहकर उन्होंने सिर नवाया, और राजा ने शुभ समाचार सुनाया। यदि आप पाँचों को यह विचार अच्छा लगे, तो हृदय में हर्षित होकर राम का तिलक कीजिए। मंत्री प्रिय वाणी सुनकर आनंदित हुए, मानो मनचाहे पौधे पर जल पड़ गया हो। मंत्री हाथ जोड़कर विनती करते हैं — हे जगतपति, करोड़ों वर्ष जीविए। जगत के लिए कल्याणकारी अच्छा कार्य विचारा है; शीघ्र कीजिए नाथ, देर न लगाइए। मंत्रियों की सुंदर बात सुनकर राजा को ऐसा आनंद हुआ, मानो बढ़ते हुए पौधे को अच्छी शाखा मिल गई हो।
कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ। राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ।।5।।
राजा ने कहा — मुनिराज वसिष्ठ की जो-जो आज्ञा हो, राम के राज्याभिषेक के लिए वही-वही शीघ्र करो।
हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।। औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना।। चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती।। मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका।। बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना।। सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा।। रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू।। पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा।।
प्रसन्न होकर मुनीश ने कोमल वाणी में कहा — सभी पवित्र तीर्थों का जल ले आओ। उन्होंने गिन-गिनकर अनेक मंगल औषधियों, मूल, फूल, फल और पत्तों के नाम बताए; चँवर, मृगचर्म, अनेक प्रकार के वस्त्र, तथा असंख्य जाति के ऊन, रेशम और कपड़े; मणियाँ और राजा के अभिषेक के योग्य अनेक मंगल वस्तुएँ। वेदों में कही सारी विधि बताकर उन्होंने कहा — नगर में अनेक मंडप सजाओ। नगर के चारों ओर गलियों में फलदार आम, सुपारी और केले के वृक्ष रोपो। सुंदर मणिमय चौक बनाओ, और शीघ्र बाजार सजवाओ। गणपति, गुरु और कुलदेवता की पूजा करो, और सब प्रकार से ब्राह्मणों की सेवा करो।
ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग। सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग।।6।।
ध्वजा, पताका, तोरण और कलश से सजाओ; घोड़े, रथ और हाथी तैयार करो। मुनिश्रेष्ठ के वचन को सिर पर धारण कर सब अपने-अपने कार्य में लग गए।
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।। बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा।। सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा।। राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए।। पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं।। भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी।। भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।। रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती।।
जिस मुनि ने जिसे जो आज्ञा दी, उसने वह कार्य मानो पहले ही कर लिया। राजा ब्राह्मणों, साधुओं और देवताओं की पूजा करते हुए राम के हित का मंगल कार्य करते हैं। राम के सुहावने अभिषेक की बात सुनकर अवध में गाजे-बाजे के साथ बधावे बजने लगे। राम और सीता के शरीर में शुभ शकुन प्रकट हुए; उनके मंगलमय सुंदर अंग फड़कने लगे। प्रेम से पुलकित होकर वे परस्पर कहते हैं — ये भरत के आगमन के सूचक हैं। बहुत दिन बीत गए और बड़ी उत्कंठा है; शकुन प्रिय के मिलन का विश्वास दिला रहे हैं। भरत के समान संसार में प्रिय कौन है? यही इस शकुन का फल है, दूसरा नहीं। राम को भाई की चिंता दिन-रात रहती है, जैसे कछुए का हृदय अपने अंडों में लगा रहता है।
एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु। सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु।।7।।
इस अवसर पर परम मंगल की बात सुनकर रनिवास (रानियों का महल) हर्षित हो उठा, ऐसा सुशोभित हुआ मानो बढ़ते चंद्रमा को देखकर समुद्र की लहरें आनंद से उछल रही हों।
प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।। प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं।। चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी।। आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी।। पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा।। जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू।। गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं।।
जो पहले जाकर समाचार सुनाए थे, उन्होंने बहुत से आभूषण और वस्त्र पाए। प्रेम से पुलकित शरीर और अनुरागी मन से वे सब मंगल कलश सजाने लगीं। सुमित्रा ने मणिमय अनेक प्रकार के अत्यंत सुंदर चौक पूरे। आनंद में मग्न राम की माता कौसल्या ने बहुत से ब्राह्मणों को बुलाकर दान दिए। उन्होंने ग्रामदेवियों, देवताओं और नागों की पूजा की, और फिर बलि-भाग देने का वचन कहा। उन्होंने विनती की — जिस प्रकार भी राम का कल्याण हो, दया करके वही वरदान दो। कोयल जैसी वाणी वाली, चंद्रमुखी और मृगछौने जैसे नेत्रों वाली स्त्रियाँ मंगल गीत गाने लगीं।
राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि। लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि।।8।।
राम के राज्याभिषेक की बात सुनकर स्त्री-पुरुष हृदय में हर्षित हुए, और सब कुछ अनुकूल जानकर सभी सुंदर मंगल की तैयारी करने लगे।
तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।। गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा।। सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने।। गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी।। सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू।। तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती।। प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू।। आयसु होइ सो करौं गोसाई। सेवक लहइ स्वामि सेवकाई।।
तब राजा ने वसिष्ठ को बुलाया और राम के धाम शिक्षा देने भेजा। गुरु के आगमन को सुनते ही रघुनाथ द्वार पर आकर चरणों में सिर नवाया। आदरपूर्वक अर्घ्य देकर उन्हें घर में लाए और सोलह प्रकार से पूजकर सम्मान किया। फिर सीता सहित उनके चरण पकड़े, और राम कमल-से हाथ जोड़कर बोले — सेवक के घर स्वामी का आना मंगल का मूल और अमंगल का नाश करने वाला है। फिर भी हे नाथ, प्रेम से बुलाकर सेवक को कार्य पर भेजना उचित था — ऐसी नीति है। प्रभुता त्यागकर, हे प्रभु, आपने स्नेह किया; आज यह घर पवित्र हो गया। जो आज्ञा हो वही करूँ, हे स्वामी; सेवक को स्वामी की सेवा प्राप्त हो।
सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस। राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस।।9।।
स्नेह में सने हुए वचन सुनकर मुनि ने श्री राम की प्रशंसा की — हे राम, आप ऐसा क्यों न कहेंगे, आप तो सूर्यवंश (रघुकुल) के शिरोमणि हैं।
बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।। भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू।। राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।। गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ।। जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।। करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।। बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।। प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई।।
राम के गुण, शील और स्वभाव का वर्णन करते हुए मुनिराज प्रेम से पुलकित होकर बोले — राजा ने अभिषेक का आयोजन सजाया है; वे आपको युवराज देना चाहते हैं। हे राम, आज सारे संयम-नियम पालो, जिससे विधाता कार्य को भली-भाँति निभा दें। यह शिक्षा देकर गुरु राजा के पास गए। राम के हृदय में ऐसा विस्मय हुआ — सब भाई एक साथ जन्मे, बचपन में भोजन, शयन और खेल साथ किया; कर्णवेध, यज्ञोपवीत और विवाह — सारे उत्सव साथ-साथ हुए। इस निर्मल वंश में यही एक अनुचित बात है कि भाइयों को छोड़कर केवल बड़े का ही अभिषेक हो। इस प्रकार प्रभु ने प्रेमपूर्वक सुंदर पछतावा किया — वे भक्तों के मन की कुटिलता हर लें।
तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद। सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।10।।
उसी अवसर पर लक्ष्मण प्रेम और आनंद में मग्न आ गए। राम ने, जो रघुकुल रूपी कुमुद के चंद्रमा हैं, प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान किया।
बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।। भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं।। हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई।। कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा।। कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता।। सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली।। तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा।। सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं।।
अनेक प्रकार के बाजे बज रहे हैं; नगर का आनंद वर्णन नहीं किया जा सकता। सब भरत के आगमन की मनौती करते हैं — शीघ्र आओ और नेत्रों का फल पाओ। हाट, बाट, घर, गली और चौपाल पर स्त्री-पुरुष परस्पर कहते हैं — कल का शुभ लग्न कितनी देर में है, जब विधाता हमारी अभिलाषा पूरी करेंगे? राम सीता सहित सोने के सिंहासन पर बैठेंगे — यह दृश्य मन में बसा रहे। सब कहते हैं — कल कब होगा? पर कुटिल स्वभाव वाले देवता विघ्न मनाते हैं। उन्हें अवध का बधावा नहीं सुहाता, जैसे चोर को चाँदनी रात नहीं भाती। सरस्वती को बुलाकर देवता विनती करते हैं, बार-बार उनके पैरों पड़ते हैं।
बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु। रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु।।11।।
(देवता विनती करते हैं —) हे माता, हमारी बड़ी विपत्ति देखकर आज वही कीजिए जिससे राम राज्य त्यागकर वन को जाएँ और सारा देवकार्य सिद्ध हो जाए।
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।। देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।। बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ।। जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी।। बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची।। ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।। आगिल काजु बिचारि बहोरी। करहहिं चाह कुसल कबि मोरी।। हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।।
देवताओं की विनती सुनकर सरस्वती खड़ी होकर पछताने लगीं — मैं कमल-वन के लिए पाले भरी शीत-रात्रि बन गई (शुभ की नाशक)। यह देखकर देवता फिर निहोरा करके बोले — माता, तुम पर तनिक भी दोष नहीं। श्री राम विस्मय और हर्ष से रहित हैं; राम का सारा प्रभाव आप जानती हैं। जीव कर्म के वश सुख-दुख के भागी हैं; हे देवी, देवताओं के हित के लिए अवध जाइए। बार-बार चरण पकड़कर उन्होंने संकोच में डाल दिया; देवताओं की बुद्धि को नीच मानकर वे चलीं। इनका निवास ऊँचा पर करनी नीच है; ये दूसरे का वैभव देख नहीं सकते। फिर आगे के कार्य का विचार करके, और यह सोचकर कि सुकवि मेरी कीर्ति की रक्षा करेंगे, सरस्वती हृदय में हर्षित होकर दशरथ के नगर आईं, मानो दुःसह दुखदायी ग्रहदशा आ गई हो।
नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि। अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।12।।
कैकेयी की एक मंदबुद्धि दासी थी, जिसका नाम मंथरा था। उसे अपयश की पिटारी बनाकर और उसकी बुद्धि फेरकर वाणी की देवी सरस्वती चली गईं।
दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।। पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।। करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती।। देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।। भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी।। ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।। हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।। तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि।।
मंथरा ने नगर सजा हुआ देखा, सुंदर मंगल बाजे और बधावे बजते देखे। उसने लोगों से पूछा कि यह उत्सव कैसा है; राम के तिलक की बात सुनकर उसके हृदय में जलन हुई। वह कुबुद्धि, नीच जाति की स्त्री विचार करती है — रातोंरात यह काम किस तरह बिगड़े? जैसे कुटिल भीलनी मधु (मक्खी का छत्ता) देखकर ताकती है कि किस भाँति ले लूँ। वह उदास होकर भरत की माता कैकेयी के पास गई। 'क्यों उदास हो?' रानी ने हँसकर कहा। वह उत्तर नहीं देती, केवल साँसें लेती है, और स्त्री-चरित्र करके आँसू ढालती है। हँसकर रानी बोली — तेरा गाल बहुत बढ़ा है; जान पड़ता है लक्ष्मण ने कुछ सिखाया है, ऐसा मेरे मन में है। तब भी वह बड़ी पापिन दासी नहीं बोली, काली नागिन की तरह साँस छोड़ती रही।
सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु। लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।13।।
भयभीत होकर रानी ने कहा — तू बोलती क्यों नहीं, राम और महाराज दशरथ कुशल तो हैं? लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न? यह सुनकर कुबरी के हृदय में शूल-सा उठा।
कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।। रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू।। भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।। देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।। पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।। नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।। सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी।। पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी।।
(मंथरा कहती है —) हे माई, मुझे कोई क्यों सिखाएगा? किसके बल पर मैं गाल करूँगी? राम को छोड़कर आज किसकी कुशल है, जिसे राजा युवराज पद दे रहे हैं? विधाता कौसल्या पर अत्यंत प्रसन्न हो गया है; देखते ही उसके हृदय में गर्व नहीं समाता। तुम जाकर वह सारी शोभा क्यों नहीं देखतीं, जिसे देखकर मेरा मन क्षुब्ध हो गया? तुम्हारा पुत्र परदेश में है और तुम्हें कोई चिंता नहीं; तुम समझती हो कि पति तुम्हारे वश में है। तुम्हें बहुत नींद और नरम गद्दा प्रिय है; राजा की कपट-चतुराई तुम नहीं देखतीं। ये प्रिय (पर कड़वे) वचन सुनकर और मन मलिन जानकर रानी ने झिड़का — अब चुप रह, हठीली! फिर कभी ऐसी घरफोड़ू बात कही तो तेरी जीभ पकड़कर खिंचवा लूँगी।
काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि। तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।14।।
काने, लँगड़े और कुबड़े को कुटिल और कुचाली जानकर — उस पर भी स्त्री, और फिर दासी — यह सोचकर भरत की माता कैकेयी मुस्कुरा दीं।
प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।। सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई।। जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई।। राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली।। कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी।। मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी।। जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू।। प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें।।
(कैकेयी कहती है —) हे प्रियवादिनी, मैंने तो तुझे केवल शिक्षा दी थी; स्वप्न में भी तुझ पर मुझे क्रोध नहीं। वही शुभ और सौभाग्यदायी दिन होगा जिस दिन तेरा कहा सच हो। बड़ा स्वामी और छोटा भाई सेवक — यह सूर्यवंश की सुंदर रीति है। यदि सचमुच कल राम का तिलक है, तो हे सखी, माँग ले, मैं तेरे मनचाहा दूँगी। कौसल्या के समान सब माताएँ राम को सहज स्वभाव से प्रिय हैं; पर मुझ पर वे विशेष स्नेह करते हैं — मैंने प्रीति की परीक्षा करके देख लिया है। यदि विधाता कृपा करके फिर जन्म दे, तो राम और सीता मेरे पुत्र और पुत्रवधू हों। राम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं; उनके तिलक से तुझे क्षोभ कैसा?
भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ। हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ।।15।।
मैं भरत की सौगंध देती हूँ — कपट और छिपाव छोड़कर सच बता: हर्ष के समय तू विषाद क्यों करती है? कारण मुझे सुना।
एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।। फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा।। कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई।। हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती।। करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा।। कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।। जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।। तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी।।
(मंथरा कहती है —) एक ही बार में तुम्हारी सब आशाएँ पूरी हो गईं; अब कुछ कहूँ तो दूसरी जीभ बनानी पड़े। मेरा अभागा कपाल फूटने योग्य है; भला कहने पर भी तुम्हें दुख लगता है। जो झूठी बातें बना-बनाकर कहते हैं वे तुम्हें प्रिय हैं, और मैं, माई, कड़वी हूँ। अब मैं भी ठकुरसुहाती (चापलूसी) ही कहूँगी, नहीं तो दिन-रात मौन रहूँगी। विधाता ने मुझे कुरूप और परवश बनाया; जो बोया वही काटा जाता है, जो दिया वही मिलता है। कोई भी राजा हो, मेरी क्या हानि? दासीपन छोड़कर क्या अब मैं रानी हो जाऊँगी? मेरा स्वभाव जलाने योग्य है, क्योंकि तुम्हारा अहित मुझसे देखा नहीं जाता। इसी से कुछ बात छेड़ दी; हे देवी, मेरी यह बड़ी भूल क्षमा करो।
गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि। सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि।।16।।
इन गूढ़, कपटपूर्ण पर प्रिय वचनों को सुनकर उथली बुद्धि वाली रानी, देवताओं की माया के वश में होकर, शत्रु को सुहृद (हितैषी) जानकर उस पर विश्वास कर बैठी।
सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।। तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी।। तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।। सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।। प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी।। रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते।। भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा।। जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी।।
रानी बार-बार आदरपूर्वक उससे पूछती है, जैसे शिकारी के गान से हिरनी मोहित हो जाती है। उसकी बुद्धि वैसे ही फिर गई जैसी होनहार थी; दासी हर्षित हुई, मानो उसका घात ठीक बैठ गया हो। (मंथरा कहती है —) तुम पूछती हो, पर मैं कहने से डरती हूँ, क्योंकि मुझ पर घरफोड़ू का नाम धर दिया गया है। बहुत तरह से विश्वास गढ़-छीलकर वह अवध की साढ़साती (मंथरा) तब बोली — हे रानी, तुमने कहा कि सीता-राम तुम्हें प्रिय हैं और राम तुम्हें प्रेम करते हैं — वह बात सच थी। पहले ऐसा था, पर वे दिन बीत गए; समय बदलने पर प्रिय भी शत्रु हो जाते हैं। सूर्य कमल-कुल का पोषक है, फिर भी जल के बिना वही सूर्य उन्हें जलाकर राख कर देता है। तुम्हारी सौत तुम्हें जलाकर उखाड़ना चाहती है; उपाय करके अच्छी बाड़ (रक्षा) कर लो।
तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ। मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ।।17।।
तुम्हें कोई चिंता नहीं, अपने सुहाग के बल पर तुम राजा को अपने वश में समझती हो। पर राजा का मन मलिन है और मुख मीठा है, और तुम्हारा अपना स्वभाव सरल (भोला) है।
चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।। पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें।। सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें।। सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई।। राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी।। रची प्रंपचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई।। यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका।। आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही।।
(मंथरा आगे कहती है —) राम की माता कौसल्या चतुर और गंभीर है; मौका पाकर उसने अपना काम बना लिया। उसने भरत को ननिहाल भिजवा दिया — इसे राम की माता की चाल जानो। वह समझती है कि सब सौतें मेरी अच्छी सेवा करती हैं और भरत की माता पति के बल पर गर्वित है। हे माई, तुम कौसल्या के हृदय की शूल हो; कपट-चतुर होने से वह प्रकट नहीं होने देती। राजा का तुम पर विशेष प्रेम है, जिसे सौत अपने स्वभाव से देख नहीं सकती। उसने राजा को अपनाकर प्रपंच रचा और राम के तिलक का शुभ लग्न धरवा लिया। यह वंश के योग्य है — राम को तिलक; सबको सुहाता है और मुझे भी बहुत अच्छा लगता है। पर आगे की बात सोचकर मुझे डर लगता है; विधाता वह फल फिर उसी पर लौटा दे।
रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।। कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।18।।
रच-रचकर करोड़ों कुटिलताएँ करके मंथरा ने कपटपूर्ण उपदेश दिया; उसने सौतों की सैकड़ों कथाएँ सुनाईं, कि किस प्रकार उनमें विरोध बढ़ा।
भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।। का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना।। भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू।। खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें।। जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई।। रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ।। रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी।। जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई।।
होनहार के वश रानी के हृदय में विश्वास आ गया; वह फिर सौगंध देकर पूछती है। (मंथरा कहती है —) तुम क्या पूछती हो, अब भी नहीं समझीं? पशु भी अपने हित-अहित को पहचान लेते हैं। पूरा एक पखवाड़ा तैयारी होते हो गया, और तुमने आज मुझसे खबर पाई। मैं तुम्हारे राज्य में खाती-पहनती हूँ; सच कहने में मेरा दोष नहीं। यदि कुछ झूठ बनाकर कहूँ, तो विधाता मुझे दंड दे। यदि कल राम का तिलक हो गया, तो विधाता ने तुम्हारे लिए विपत्ति का बीज बो दिया। रेखा खींचकर मैं बल देकर कहती हूँ — हे भामिनी, तुम दूध की मक्खी (के समान निकाल फेंकी जाने वाली) हो जाओगी। यदि पुत्र सहित सेवा करती रहो, तो घर में रहोगी, दूसरा कोई उपाय नहीं।
कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब। भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।।19।।
जैसे कद्रू ने विनता को दुख दिया, वैसे ही कौसल्या तुम्हें दुख देगी। भरत बंदीगृह में रहेंगे और लक्ष्मण राम के नायब (सहायक) होंगे।
कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।। तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी।। कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी।। फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली।। सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी।। दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने।। काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ।।
मंथरा की कड़वी बातें सुनकर कैकेयी डर से ऐसी सहम गई कि कुछ कह न सकी और मानो मुरझा गई; उसका शरीर पसीने से भर गया और केले के पौधे-सा काँप उठा, और कुबड़ी ने चिंता में अपनी जीभ दाँतों से दबा ली। करोड़ों कपटभरी कहानियाँ सुना-सुनाकर मंथरा ने रानी को धीरज बँधाया। अब भाग्य ऐसा पलटा कि यह दुष्ट चाल कैकेयी को प्यारी लगने लगी और वह उस बकवादी दासी को हंसिनी-सा मानकर सराहने लगी: 'सुन मंथरा, तेरी बात सच है। मेरी दाहिनी आँख रोज फड़कती है और रोज रात बुरे सपने आते हैं, पर मोहवश मैंने तुझे नहीं बताया। क्या करूँ सखी, मेरा स्वभाव सीधा-सादा है; मैं दाएँ-बाएँ (भले-बुरे) को कभी नहीं जानती।'
अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह। केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह।।20।।
'आज तक अपने चलते मैंने कभी किसी का बुरा नहीं किया। न जाने किस पाप के कारण विधाता ने एक ही बार में मुझे यह असह्य दुख दे दिया।'
नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।। अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही।। दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी।। अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना।। जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका।। जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि।। पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची।। भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ।।
'चाहे सारी उम्र नैहर में बिता दूँ, पर जीते जी सौत की सेवा नहीं करूँगी; जिसे विधाता शत्रु के वश में जिलाता है, उसके लिए ऐसे जीवन से तो मरना ही अच्छा है।' रानी ऐसे दीन वचन बोलती रही और यह सुनकर कुबड़ी ने अपनी स्त्री-माया रच दी: 'ऐसा क्यों कहती हो और मन में क्यों छोटी होती हो? तुम्हारा सुख और सुहाग दिन-दूना बढ़ेगा; जिसने तुम्हारा घोर बुरा चाहा, वही यह पका फल पाएगी। जब से मैंने यह बुरी बात सुनी है, स्वामिनी, न दिन को भूख है न रात को नींद। मैंने ज्योतिषियों से पूछा, उन्होंने रेखाएँ खींचीं — यह सच है कि भरत राजा होंगे। हे सुंदरी, यदि तुम करो तो मैं उपाय बताऊँ, क्योंकि राजा तो तुम्हारी सेवा के वश में हैं।'
परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि। कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि।।21।।
'तुम्हारे कहने पर मैं कुएँ में कूद पड़ूँ और अपने पुत्र तथा पति को भी त्याग सकूँ। जब तुम मेरा इतना दुख देखकर यह कहती हो, तो तुम्हारे हित के लिए मैं ऐसा क्यों न करूँ?'
कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।। लखइ न रानि निकट दुखु कैंसे। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें।। सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी।। कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाही। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं।। दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती।। सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासु।। भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई।। होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें।।
कुबड़ी ने कैकेयी को राजी कराकर कपट की छुरी उसके पत्थर-से हृदय में गड़ा दी; रानी उस निकट के दुख को वैसे न देख सकी जैसे बलि का पशु हरी घास चरता है। पहले कोमल और अंत में कठोर बातें कहती हुई, मानो शहद में विष घोलकर पिलाती हो, दासी बोली: 'स्वामिनी, याद है या नहीं? यह कथा मुझे बताओ। राजा के पास दो वरदान धरोहर पड़े हैं; आज उन्हें माँगकर अपनी छाती ठंडी करो। अपने पुत्र को राज्य और राम को वनवास दे दो — सौत को हर्ष देते हुए सब ले लो। जब राजा राम की शपथ खा लें, तब माँगना, जिससे उनका वचन टल न सके। यदि आज की रात बीत गई तो काम बिगड़ जाएगा; मेरे वचन को मन से प्यारा मानना।'
बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु। काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु।।22।।
बड़ा कुचक्र रचकर उस पापिनी ने कहा: 'कोपभवन में जाओ। सब कुछ सावधानी से सँभालो और राजा पर अचानक विश्वास मत कर बैठना।'
कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।। तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा।। जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली।। बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई।। बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी।। पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा।। कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई।। राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई।।
रानी ने कुबड़ी को प्राणों-सी प्यारी जानकर बार-बार उसकी बड़ी बुद्धि की सराहना की: 'संसार में तुझ-सा हितैषी मेरा कोई नहीं; बहती जाती हुई मेरी तू आधार बन गई है। यदि विधाता कल मेरा मनोरथ पूरा कर दे, तो सखी, मैं तुझे अपनी आँख की पुतली बना लूँ।' दासी को अनेक प्रकार से आदर देकर कैकेयी कोपभवन में चली गई। दासी विपत्ति के बीज के लिए वर्षा-ऋतु बनी और कैकेयी की कुबुद्धि उसकी भूमि हुई; कपट का जल पाकर अंकुर फूटा, दोनों वरदान उसके पत्ते और परिणाम में दुख उसका फल हुआ। क्रोध का सारा सामान सजाकर वह सो गई और राज करते हुए भी अपनी कुमति से अपने को नष्ट कर बैठी। राजमहल और नगर में उत्सव का कोलाहल था और इस कुचाल को कोई नहीं जानता था।
प्रमुदित पुर नर नारि। सब सजहिं सुमंगलचार। एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार।।23।।
नगर के स्त्री-पुरुष अत्यंत प्रसन्न थे; सब शुभ मंगल-आयोजन की तैयारी कर रहे थे। कोई भीतर जा रहा था, कोई बाहर आ रहा था; राजा के दरबार में भारी भीड़ थी।
बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।। प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी।। फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई।। को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा। जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं।। सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू।। अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता ह्दयँ अति दाहू।। को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।।
राम के बालसखा हृदय में हर्षित होकर पाँच-दस के समूह में उनके पास जाते हैं; प्रभु उनके प्रेम को पहचानकर आदर देते और कोमल वाणी से कुशल-क्षेम पूछते हैं। अपने प्रिय की आज्ञा पाकर वे घर लौटते और आपस में राम की बड़ाई करते हैं: 'संसार में रघुवीर के समान कौन है, जो शील और स्नेह को अंत तक निभाता है? कर्मवश हम जिस-जिस योनि में भटकें, वहाँ-वहाँ ईश्वर हमें बस यही दे — कि हम सेवक हों और सीतानाथ स्वामी, और यह नाता अंत तक निभे।' नगर में सबकी यही अभिलाषा थी, पर कैकेयी का हृदय बहुत जल रहा था। कुसंगति पाकर कौन नष्ट नहीं होता? नीच की मति के अनुसार चलने पर चतुराई भी नहीं बचती।
साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ। गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ।।24।।
संध्या के समय राजा आनंद के साथ कैकेयी के घर गए; पर उनका जाना निष्ठुरता को पास ले आया, मानो स्नेह ही शरीर धारण कर निर्दयता के निकट चला गया हो।
कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ।। सुरपति बसइ बाहँबल जाके। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें।। सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई।। सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे।। सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ।। भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषण नाना।। कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी।। जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी।।
'कोपभवन' सुनते ही राजा सकुचा गए और भय के मारे आगे पैर न पड़े। जिनके बाहुबल में इंद्र बसते हैं, जिनके रुख को देखकर सब राजा रहते हैं, वे स्त्री के क्रोध की बात सुनकर सूख गए — कामदेव का प्रताप देखो! जो शूल, वज्र और तलवार चलाने वाले हैं, उन्हें रतिनाथ (कामदेव) ने फूलों के बाणों से मार दिया। डरा हुआ राजा अपनी प्रिया के पास गया और उसकी दशा देखकर उसे दारुण दुख हुआ: वह पुराने मोटे कपड़े पहने भूमि पर पड़ी थी और अनेक आभूषण उतारकर फेंक दिए थे। उस कुमति को कैसी कुरूप वेशभूषा फब रही थी, मानो सुहाग-नाश की भावी सूचना दे रही हो। पास जाकर राजा ने कोमल वाणी से कहा: 'प्राणप्रिये, किस कारण रूठी हो?'
केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई। मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई।। दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई। तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई।।
'किस कारण, हे रानी, रूठी हो?' राजा जैसे ही स्पर्श करते हैं, वह पति का हाथ झटककर हटा देती है और क्रुद्ध नागिन की भाँति उन्हें भयंकर दृष्टि से देखती है। उसकी दोनों वासनाएँ (माँगें) मानो जीभ और तीखे दाँत हैं, और वह वार करने के लिए मर्मस्थल ताक रही है। तुलसीदास कहते हैं, भवितव्यता के वश राजा इस सबको कामदेव का कौतुक ही समझ रहे थे।
बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचिनि पिकबचनि। कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर।।25।।
राजा बार-बार कहते हैं: 'हे सुमुखि, हे सुंदर नेत्रों वाली, हे कोयल-सी मीठी बोली वाली, हे गजगामिनी — मुझे अपने क्रोध का कारण सुनाओ।'
अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा।। कहु केहि रंकहि करौ नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू।। सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी।। जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू।। प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें।। जौं कछु कहौ कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही।। बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता।। घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू।।
'प्रिये, तुम्हारा किसने अनहित किया है? किसके दो सिर हैं, किसे यमराज ले जाना चाहता है? कहो, किस राजा को रंक बना दूँ और किस रंक को राजा? किसे देश से निकाल दूँ? मैं तुम्हारे शत्रु को देवता होने पर भी मार सकता हूँ — बेचारे नर-नारी तो क्या कीड़े हैं। हे सुंदरी, तुम मेरा स्वभाव जानती हो; मेरा मन तुम्हारे मुख-चंद्र का चकोर है। प्रिये, प्राण, पुत्र, सर्वस्व मेरे और परिवार-प्रजा सब तुम्हारे वश में हैं। यदि मैं तुमसे कुछ कपट करके कहूँ, हे भामिनी, तो मुझे राम की सौ शपथ। हँसकर मनचाही बात माँगो और अपने मनोहर अंगों को आभूषणों से सजाओ; मन में भली-बुरी घड़ी को समझ लो और जल्दी, प्रिये, यह कुवेश त्याग दो।'
यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद। भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद।।26।।
यह सुनकर और मन में उनकी बड़ी शपथ पर विचार कर, वह मंदबुद्धि रानी हँसती हुई उठी और आभूषण पहनने लगी — मानो कोई भीलनी हिरन को देखकर फंदा लगा रही हो।
पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी।। भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा।। रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू।। दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू।। ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई।। लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई।। जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू।। कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी।।
तब राजा उसे हितैषी मानकर, प्रेम में पुलकित होकर, कोमल और सुंदर वाणी बोले: 'हे भामिनी, तुम्हारा मनभावन हो गया; नगर के घर-घर में आनंद का बधावा है। कल मैं राम को युवराज पद दूँगा; हे सुलोचनी, मंगल साज सजाओ।' यह सुनकर उसका कठोर हृदय पीड़ा से धड़क उठा, मानो पके फोड़े को छू लिया गया हो, फिर भी उसने वह पीड़ा हँसी में छिपा ली, जैसे चोर स्त्री खुलकर रो नहीं सकती। राजा उसकी कपट-चतुराई को न पहचान सके, मानो करोड़ों कुटिल गुरुओं ने उसे पढ़ाया हो; यद्यपि राजा नीति में निपुण थे, स्त्री-चरित्र अथाह समुद्र है। फिर कपट-स्नेह बढ़ाकर वह आँख-मुँह फेरकर हँसती हुई बोली:
मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु। देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु।।27।।
'तुम बार-बार 'माँगो, माँगो' कहते हो, पर हे प्रिय, तुम कभी देते-लेते (वचन निभाते) नहीं। तुमने दो वरदान देने को कहा था, पर उन्हें पाने में भी मुझे संदेह है।'
जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।। थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ।। झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।। रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई।। नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा।। सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए।। तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई।। बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली।।
'मैं भेद जान गया,' राजा हँसकर कहते हैं; 'रूठना तुम्हें बहुत प्यारा है। तुमने वरदान धरोहर रखे और कभी माँगे नहीं, और सुबह मुझे अपना स्वभाव भूल गया। मुझे झूठा दोष मत दो — दो माँगो या चाहो तो चार ले लो। रघुकुल की रीति सदा से चली आई है: प्राण चले जाएँ, पर वचन नहीं जाता। असत्य के समान कोई पाप-राशि नहीं; क्या करोड़ों घुँघची कभी पर्वत के बराबर हो सकती हैं? सब पुण्य सत्य में ही मूलबद्ध होकर सुंदर होते हैं — यह वेद-पुराण कहते हैं और मनु ने गाया है। और उस पर मैं राम की शपथ खाकर आया हूँ, जो पुण्य और स्नेह की सीमा हैं।' बात दृढ़ कराकर वह कुमति हँसकर बोली, मानो कुबुद्धि रूपी अशुभ पक्षी का पिंजरा खोल रही हो।
भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु। भिल्लनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु।।28।।
राजा का मनोरथ एक सुंदर वन था और उनके सुख सुंदर पक्षियों का समूह; और भीलनी की भाँति कैकेयी उन पर अपने वचन रूपी भयंकर बाज को छोड़ने वाली थी, जो सबका नाश कर दे।
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।। मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।। तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।। सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।। गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा।। बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू।। माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन।। मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला।। अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं।।
'सुनो, प्राणप्रिय, जो मेरे मन को भाता है: एक वरदान दो — भरत को राजतिलक; और दूसरा हाथ जोड़कर माँगती हूँ — हे नाथ, पूरा करो — कि तापस-वेश में, पूर्ण विरक्त होकर, राम चौदह वर्ष वनवासी रहें।' ये कोमल वचन सुनकर राजा के हृदय में शोक भर आया, जैसे चंद्रमा की किरण छूने से चकवा व्याकुल हो जाता है। वे सहम गए, कुछ कह न पाए, मानो बाज ने बटेर पर झपट्टा मारा हो; वे बिलकुल विवर्ण (पीले) पड़ गए, मानो बिजली ने ताड़ के वृक्ष पर आघात किया हो। सिर पर हाथ रखे और दोनों नेत्र मूँदे वे शरीर सँभाले बैठे रहे, मानो शोक ही मूर्त होकर बैठा हो: 'मेरा मनोरथ कल्पवृक्ष-सा फूला था, जिसे कैकेयी ने हथिनी की तरह जड़ से उखाड़ दिया; उसने अयोध्या उजाड़ दी और विपत्ति की अटल नींव डाल दी।'
कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास। जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास।।29।।
'कैसे अवसर पर, और क्या हो गया! मैंने स्त्री पर विश्वास कर लिया — ठीक वैसे ही जैसे योग-सिद्धि का फल पाने के समय ही अविद्या तपस्वी की साधना का नाश कर देती है।'
एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।। भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही।। जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे।। देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।। देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू।। सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना।। सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा।। अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई।।
इस प्रकार राजा मन-ही-मन दुखी हुए, और उनकी अप्रसन्नता देखकर कैकेयी हृदय में क्रुद्ध हो गई: 'क्या भरत तुम्हारा पुत्र नहीं? या मुझे मोल लेकर खरीदा है (दासी हूँ)? यदि मेरे वचन तुम्हें बाण-से लगते हैं, तो सँभालकर वचन क्यों नहीं बोलते? उत्तर दो — हाँ, करोगे या नहीं? तुम रघुकुल में सत्यप्रतिज्ञ हो। देने को कहा और अब वरदान मत दो; सत्य त्यागकर जगत में अपयश लो। सत्य की सराहना कर वरदान देने को कहा, यह समझकर कि वह चबेना (तुच्छ वस्तु) माँग लेगी। शिबि, दधीचि, बलि ने जो कुछ कहा, उन्होंने तन-धन त्यागकर अपने वचन का प्रण निभाया।' अत्यंत कड़वे वचन कहती कैकेयी, मानो जले पर नमक छिड़क रही हो।
धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ। सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।30।।
धर्म की धुरी को धारण करने वाले, धीर राजा ने धैर्य धरकर आँखें खोलीं; सिर धुनते और लंबी साँस लेते हुए बोले, 'उसने मुझे मर्मस्थान पर आघात किया है।'
आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।। मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई।। लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा।। बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती।। प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती।। मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरू साखी।। अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता।। सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई।।
उन्होंने अपने आगे उसे भारी क्रोध में जलती देखा, मानो क्रोध ने तलवार नंगी कर दी हो — जिसकी मूठ उसकी कुबुद्धि और धार उसकी निठुराई थी, जिसे कुबड़ी ने सान पर तेज कर बनाया था। उसे इतना विकराल और कठोर देखकर राजा ने सोचा, 'क्या सत्य मेरा जीवन ले लेगा?' छाती कड़ी करके वे उसे भाने वाले विनम्र वचन बोले: 'प्रिये, तुम विश्वास, प्रतीति और प्रीति त्यागकर ऐसे बुरे ढंग से क्यों बोलती हो? मेरे लिए भरत और राम दो आँखें हैं — शंकर को साक्षी करके सच कहता हूँ। मैं प्रातः अवश्य दूत भेजूँगा और सुनते ही दोनों भाई शीघ्र आ जाएँगे; फिर शुभ दिन शोधकर, सब साज सजाकर मैं भरत को धूमधाम से राज्य दूँगा।'
लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति। मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।31।।
'राम को राज्य का लोभ नहीं; भरत पर उनकी बहुत प्रीति है। मैं तो केवल मन में बड़े-छोटे का विचार कर राजनीति का पालन कर रहा था (कि पहले राम को गद्दी दूँ)।'
राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।। मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें।। रिस परिहरू अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू।। एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा।। अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा।। कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू।। तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू।। जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला।।
'मैं राम की सौ बार शपथ लेकर सच्चा भाव कहता हूँ — राम की माता ने मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। मैंने यह सब तुमसे बिना पूछे किया, इसी से तुम्हारा मनोरथ खाली रह गया। अब क्रोध छोड़ो और मंगल साज सजाओ; कुछ दिनों बाद भरत युवराज होंगे। मुझे केवल एक बात का दुख है — तुमने दूसरा वरदान असमंजस वाला माँगा। अब भी मेरा हृदय उस आँच से जल रहा है: यह क्रोध है, या परिहास, या सचमुच सच? रोष छोड़कर कहो — राम का क्या अपराध है? सब कोई राम को अत्यंत साधु कहते हैं; तुम भी उनकी सराहना और स्नेह करती थीं। अब तुम्हें सुनकर मुझे संदेह हुआ: जिसका स्वभाव शत्रु के प्रति भी अनुकूल है, वह माता के प्रतिकूल कैसे करेगा?'
प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु। जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।32।।
'प्रिये, हँसी और क्रोध त्यागकर विवेक और विचार से माँगो, जिससे मैं अब आँखें भरकर भरत का राजतिलक देख सकूँ।'
जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।। कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं।। समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना।। सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई।। कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया।। देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं। रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने।। जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका।।
'मछली भले जल बिना जी ले और नाग मणि बिना दुखी होकर जी ले, पर मैं बिना छल के सच्चे मन से कहता हूँ: राम बिना मेरा जीवन नहीं। हे प्रवीण प्रिये, मन में भलीभाँति समझ लो — मेरा जीवन राम के दर्शन के अधीन है।' ये कोमल वचन सुनकर वह कुमति और भी जल उठी, मानो अग्नि में घी की आहुति पड़ी हो। वह बोली: 'तुम करोड़ों उपाय क्यों नहीं कर लेते? यहाँ तुम्हारी माया नहीं चलेगी। साफ कहो हाँ या नहीं, कपट मत करो; बहुत प्रपंच मुझे नहीं भाता। राम साधु, तुम सयाने साधु और राम की माता — सब भली-भाँति पहचान लिए! जैसे कौसल्या ने मेरा भला चाहा है, वैसा ही फल मैं उन्हें दूँगी, चाहे जो हो, यह ठानकर।'
होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं। मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।33।।
'यदि कल प्रातः मुनि-वेश धारण कर राम वन को नहीं जाते, तो हे राजा, मन में यह समझ लो — मेरा मरण और तुम्हारा अपयश निश्चित है।'
अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।। पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई।। दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा।। ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला।। लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची।। गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी।। मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही।। राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती।।
यह कहकर वह कुटिल रानी उठकर खड़ी हो गई, मानो क्रोध की नदी बाढ़ में उमड़ी हो — जो पाप के पर्वत से प्रकट हुई, क्रोध के जल से भरी और देखी न जा सके ऐसी। दोनों वरदान उसके ऊँचे किनारे, उसका कठोर हठ तेज धारा और कुबड़ी के वचन उसे बढ़ाने वाले भँवर थे; राजा रूपी वृक्ष को जड़ से गिराती हुई विपत्ति की बाढ़ बेरोक बहने लगी। राजा ने देखा बात दृढ़ और सच है, और स्त्री के बहाने मृत्यु उनके सिर पर नाच रही है। उसके पैर पकड़कर, बैठाकर उन्होंने विनती की: 'सूर्यवंश के लिए कुल्हाड़ी मत बनो। अपने पुत्र के लिए सिर भी माँग लो, अभी दे दूँगा, पर राम के वियोग से मुझे मत मारो। किसी भी तरह राम को यहीं रखो, नहीं तो जीवन भर मेरी छाती जलती रहेगी।'
देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ। कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ।।34।।
रोग को असाध्य देखकर राजा धरती पर गिर पड़े, सिर धुनते हुए, और अत्यंत आर्त वचन बोले: 'राम, राम, रघुनाथ!'
ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।। कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी।। पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई।। जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ।। दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला।। दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई।। छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू।। तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी।।
राजा व्याकुल थे, सारे अंग शिथिल, मानो हथिनी ने कल्पवृक्ष गिरा दिया हो; कंठ सूख गया और मुँह से वाणी न निकली, जैसे जल बिना मछली दीन हो जाती है। फिर कैकेयी ने कड़वे और कठोर वचन कहे, मानो घाव में विष भर रही हो: 'यदि अंत में तुम्हें ऐसा ही करना था, तो किस बल पर 'माँगो, माँगो' कहा? हे राजा, क्या एक साथ दो बातें हो सकती हैं — ठठाकर हँसना और गाल फुलाना? दानी कहलाना और कृपणता करना — क्या दोनों में क्षेम-कुशल और स्वामित्व रह सकता है? या तो वचन छोड़ो या धीरज धरो; अबला स्त्री की तरह करुणा (विलाप) मत करो। तन, स्त्री, पुत्र, घर, धन और धरती — सत्यप्रतिज्ञ पुरुष इन्हें तिनके के समान बताते हैं।'
मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर। लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर।।35।।
उसके मर्मभेदी वचन सुनकर राजा ने कहा: 'कहो — दोष तुम्हारा नहीं। तुझे कोई पिशाच लग गया है, जो मेरा काल बनकर बोल रहा है।'
चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।। सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू।। सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई।। करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई।। तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटहि न जाइहि काऊ।। अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई।। जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी।। फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारु लागी।।
'भरत भूल से भी राज्य नहीं चाहता; विधाता के वश तुम्हारे मन में कुबुद्धि बस गई है। यह सब मेरे पाप का परिणाम है, जिससे कुसमय में भाग्य विपरीत हो गया। सुंदर अयोध्या फिर सुखपूर्वक बसेगी, क्योंकि सर्वगुण-धाम राम की ऐसी ही प्रभुता है; सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकों में राम की बड़ाई होगी। पर तुम्हारा कलंक और मेरा पछतावा मरने पर भी न मिटेगा, न कभी जाएगा। अब जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो; मेरी आँखों की ओट में मुँह छिपाकर बैठ जाओ। जब तक मैं जीता हूँ, हाथ जोड़कर कहता हूँ, तब तक फिर कुछ मत कहना। अंत में तू पछताएगी, हे अभागिनी — तू चमड़े की डोरी के लिए गाय को मार रही है।'
परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु। कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु।।36।।
राजा हजारों तरह से गिड़गिड़ाकर गिर पड़े, 'तू यह अंत (नाश) क्यों करती है?' पर वह कपट-चतुर कुछ न बोली, मानो जागता हुआ मसान (शव) बैठा हो।
राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।। हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई।। उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर।। भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई।। बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा।। पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।। मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें।। तेहिं निसि नीद परी नहि काहू। राम दरस लालसा उछाहू।।
व्याकुल राजा 'राम, राम' रटते रहे, पंख बिना पक्षी-से बेहाल, और हृदय में मनाते रहे: 'भोर न हो और कोई जाकर राम को न कहे। हे सूर्य, रघुकुल के गुरु, मत उगो — अयोध्या को देखकर तुम्हारे हृदय में भी शूल उठेगा।' राजा का प्रेम और कैकेयी की कठोरता, दोनों को विधाता ने पराकाष्ठा तक रच दिया था। राजा विलाप करते रहे और प्रातः हो गई; द्वार पर वीणा, बाँसुरी और शंख की ध्वनि उठी; भाट स्तुति पढ़ते और गायक गुण गाते, पर राजा को वे मानो बाण-से लगते थे। सब मंगल उन्हें रत्ती भर न भाए, जैसे सती होने जा रही स्त्री को आभूषण। उस रात राम-दर्शन की लालसा और उत्साह में किसी को नींद नहीं आई।
द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि। जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।37।।
द्वार पर भीड़ थी, और सूर्य को उदित देखकर सेवक तथा मंत्री कहते हैं: 'अयोध्यापति अब तक नहीं जागे — इसका कोई विशेष कारण क्या है?'
पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।। जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई।। गए सुमंत्रु तब राउर माही। देखि भयावन जात डेराहीं।। धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा।। पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेंहिं भवन भूप कैकैई।। कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। दैखि भूप गति गयउ सुखाई।। सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।। सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी।।
'राजा सदा रात के पिछले पहर जागते हैं; आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। सुमंत्र, जाकर जगाओ, और आज्ञा पाकर काम किया जाए।' तब सुमंत्र महल के भीतर गए, और उसे भयावना देखकर जाते हुए डरते हैं, मानो वह दौड़कर खा जाएगा — देखा तक नहीं जाता, मानो वहाँ विपत्ति और विषाद ने डेरा डाल रखा हो। पूछने पर कोई उत्तर नहीं देता, इसलिए वे उस भवन में गए जहाँ राजा और कैकेयी थे; 'जय हो, जीते रहो' कहकर सिर नवाकर बैठ गए, पर राजा की दशा देखकर सूख गए। शोक से व्याकुल और विवर्ण राजा भूमि पर पड़े थे, मानो कमल अपनी जड़ से उखड़ गया हो। भयभीत मंत्री पूछ न सके, और कैकेयी अशुभ से भरी, शुभ से रहित होकर बोली:
परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु। रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु।।38।।
'राजा को रात भर नींद नहीं आई; इसका कारण तो जगदीश ही जानते हैं। 'राम, राम' रटते हुए उन्होंने भोर कर दी, पर राजा अपने मन का भेद नहीं बताते।'
आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई।। चलेउ सुमंत्र राय रूख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी।। सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ।। उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूछँहिं सकल देखि मनु मारें।। समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका।। रामु सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा।। निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई।। रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं।।
'शीघ्र जाकर राम को बुला लाओ; फिर आकर समाचार पूछना।' सुमंत्र राजा का रुख समझकर चले, और यह ताड़ गए कि रानी ने कोई कुचाल की है। शोक से व्याकुल, मार्ग में उनके पैर नहीं पड़ते, यह सोचकर कि राम को बुलाकर राजा क्या कहेंगे। हृदय में धीरज धरकर वे द्वार पर गए, जहाँ सब उन्हें उदास देखकर पूछते हैं; सबको समझाकर वे वहाँ गए जहाँ सूर्यवंश के तिलक राम थे। राम ने सुमंत्र को आते देखकर पिता के समान आदर किया; उनका मुख देखकर और राजा की आज्ञा कहकर सुमंत्र रघुकुल-दीप राम को साथ लेकर चले। राम मंत्री के साथ उदास भाव से जा रहे हैं, यह देखकर लोग जहाँ-तहाँ विलख उठते हैं।
जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।। सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु।।39।।
रघुवंश के मणि श्रीराम ने भीतर जाकर देखा कि राजा अत्यन्त बुरी और बिगड़ी हुई दशा में हैं। कैकेयी को देखकर वे इस प्रकार भयभीत होकर गिर पड़े थे, मानो सिंहनी को देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहम गया हो।
सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।। सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरी गनि लेई।। करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ।। तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी।। मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन।। सुनहु राम सबु कारन एहू। राजहि तुम पर बहुत सनेहू।। देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना। सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू।।
राजा के होंठ सूख रहे थे और सारा शरीर जल रहा था, मानो मणि खो देने पर दीन साँप तड़प रहा हो; पास बैठी क्रोधभरी कैकेयी को देखकर उन्हें लगता था मानो मृत्यु उनके जीवन की घड़ियाँ गिन रही हो। दयालु और कोमल स्वभाव वाले राम ने ऐसा दुःख पहली बार देखा था, कभी सुना तक न था; फिर भी धीरज धरकर और समय का विचार कर उन्होंने माता से मीठे वचनों में पूछा कि पिता के दुःख का कारण बताइए, जिससे उसे दूर करने का उपाय किया जा सके। कैकेयी बोली, 'सुनो राम, सारा कारण यही है। राजा तुम पर बहुत स्नेह रखते हैं। उन्होंने मुझे दो वरदान देने को कहा था, और मैंने जो मुझे भाया वही माँग लिया। उसे सुनकर राजा के मन में चिन्ता हो गई, क्योंकि वे तुम्हारे प्रति अपना संकोच छोड़ नहीं पाते।'
सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु। सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।40।।
एक ओर पुत्र का प्रेम और दूसरी ओर अपना दिया हुआ वचन—इन दोनों के बीच राजा संकट में पड़ गए हैं। (कैकेयी कहती है—) यदि तुम सको तो उनकी आज्ञा को सिर पर धारण कर लो और इस कठिन क्लेश को मिटा दो।
निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।। जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना।। जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू।। सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई।। मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू।। बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।। सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।। तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा।।
निडर होकर बैठी कैकेयी कड़वे वचन बोलती है, जिन्हें सुनकर कठोरता भी अत्यन्त व्याकुल हो उठी। उसकी जीभ मानो धनुष है और वचन अनेक बाण, और कोमल राजा मानो निशाना; मानो कठोरता ही शरीर धारण कर, एक श्रेष्ठ वीर बनकर धनुर्विद्या सीख रही हो। उसने सारा प्रसंग राम को सुना दिया, मानो निष्ठुरता ही देह धरकर बैठी हो। परन्तु सूर्यकुल के सूर्य और सहज आनन्द के भंडार राम मन ही मन मुस्कुराए और सब दोषों से रहित, कोमल और सुन्दर, वाणी के आभूषण जैसे वचन बोले— 'हे माता, सुनो, वही पुत्र बड़भागी है जो पिता-माता के वचनों से प्रेम रखता है। माता-पिता को सन्तुष्ट करने वाला पुत्र सारे संसार में दुर्लभ है, हे माता।'
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर। तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।।
वन में विशेष रूप से मुनियों के समागम का लाभ मेरे लिए सब प्रकार से हितकर है; और उस पर पिता की आज्ञा भी है, और फिर हे माता, तुम्हारी सम्मति भी।
भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु। जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।। सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।। तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।। अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी।। थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी।। राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू।। जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ।।
मेरे प्राणों के समान प्रिय भरत को राज्य मिलेगा, इस प्रकार आज विधाता सब तरह से मेरे अनुकूल है। यदि मैं ऐसे काम के लिए भी वन न जाऊँ, तो मुझे मूर्खों की सभा में सबसे पहले गिना जाना चाहिए, जो कल्पवृक्ष को छोड़कर अरंड की सेवा करते हैं और अमृत त्यागकर विष माँग लेते हैं। ऐसे मूर्ख भी ऐसा अवसर पाकर उसे नहीं चूकते; हे माता, मन में इसका विचार करके देखो। हे अम्बा, एक बात मुझे विशेष दुःख देती है—राजा को अत्यन्त व्याकुल देखना। इतनी छोटी-सी बात पर पिता को इतना भारी दुःख हो, यह मुझे विश्वास नहीं होता। राजा धीर हैं और गुणों के अथाह समुद्र हैं; अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हुआ है, जिसके कारण राजा मुझसे कुछ नहीं कहते। मेरी शपथ है, तुम मुझे सच्चे भाव से बता दो।
सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान। चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।42।।
श्रीराम के वचन स्वभाव से ही सरल और सीधे हैं, परन्तु कुटिल बुद्धि वाली कैकेयी उन्हें टेढ़ा मानती है; जैसे जल तो एक-सा समतल होता है, फिर भी जोंक उसमें टेढ़ी चाल से ही चलती है।
रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।। सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना।। तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता।। राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।। पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।। तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे।। लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे।। रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।।
राम का रुख अनुकूल पाकर रानी प्रसन्न हो गई और कपटपूर्ण स्नेह दिखाती हुई बोली— 'तुम्हारी और भरत की शपथ है, मैं इसके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं जानती। हे तात, तुम अपराध के योग्य नहीं हो; तुम तो माता-पिता और भाइयों को सुख देने वाले हो। हे राम, तुम जो कुछ कहते हो सब सत्य है; तुम माता-पिता के वचनों में अनुरक्त रहते हो। इसलिए पिता को समझाकर वही कहो जिससे उनके बुढ़ापे में अपयश न हो। जिसके पुण्य से उसे तुम्हारे समान पुत्र मिला, उसका निरादर करना उचित नहीं।' उसके कुटिल मुख से ऐसे शुभ वचन ऐसे लगते थे जैसे मगध देश में स्थित गया आदि तीर्थ; फिर भी माता के सब वचन राम को वैसे ही अच्छे लगे, जैसे गंगा में मिल जाने पर सारा जल सुहावना हो जाता है।
गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह। सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।।43।।
राजा की मूर्च्छा दूर हो गई; राम का स्मरण कर उन्होंने करवट बदली। मंत्री (सुमन्त्र) ने राम के आगमन की सूचना देकर समय के अनुकूल विनती की।
अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।। सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे।। लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई।। रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू।। सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।। बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।। सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी।। आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी।।
राम के पधारने की बात सुनकर राजा ने धीरज धरकर तब नेत्र खोले। मंत्री ने सँभालकर राजा को बैठाया, और राजा ने राम को अपने चरणों में पड़ते देखा। स्नेह से विह्वल होकर उन्होंने उन्हें हृदय से लगा लिया, मानो साँप को खोई हुई मणि फिर मिल गई हो। राजा राम को देखते ही रह गए और उनके नेत्रों से आँसुओं की धारा बह चली; शोक के वश कुछ कह न सके और बार-बार उन्हें हृदय से लगाते रहे। मन ही मन राजा विधाता से मनाते रहे कि रघुनाथ वन को न जाएँ, और महादेव का स्मरण कर विनती करते हुए बोले— 'हे सदाशिव, मेरी विनती सुनिए। आप आशुतोष और अवढरदानी हैं; मुझे दीन सेवक जानकर मेरी पीड़ा हर लीजिए।'
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु। बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।।
(राजा की प्रार्थना जारी है—) आप सबके हृदय के प्रेरक हैं; राम को ऐसी बुद्धि दीजिए कि वे अपने शील और स्नेह को त्यागकर मेरे वचन को छोड़ दें और घर पर ही रह जाएँ।
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।। सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही।। अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला।। रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी।। देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी।। तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई।। अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा।। देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता।।
'भले ही संसार में मेरा अपयश हो और सुयश नष्ट हो जाए; भले ही मैं स्वर्ग के बदले नरक में गिर जाऊँ; मुझसे सारे असह्य दुःख सहन करा दीजिए, पर राम मेरी आँखों की ओट न हों।' राजा मन में ऐसा सोचते रहे पर बोले नहीं, और उनका मन पीपल के पत्ते की तरह डोलने लगा। राम ने पिता को प्रेम के वश जानकर और यह अनुमान लगाकर कि माता फिर कुछ कह सकती है, देश-काल और अवसर के अनुसार विचारकर विनम्र वचन कहे— 'हे पिताजी, मैं कुछ कहने की ढिठाई करता हूँ; मेरी नादानी जानकर इस अनुचित को क्षमा कीजिए। इतनी छोटी-सी बात पर आपने इतना दुःख पाया, पर किसी ने पहले मुझे कहकर नहीं बताया। हे स्वामी, आपको देखकर मैंने माता से पूछा; और प्रसंग सुनकर मेरा शरीर शीतल हो गया।'
मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात। आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।।
'यह मंगल का समय है, हे तात; स्नेह के वश होकर चिन्ता छोड़ दीजिए और प्रसन्न हृदय से मुझे आज्ञा दीजिए।' यह कहते हुए प्रभु के शरीर रोमांचित हो उठे।
धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।। चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।। आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई।। बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी।। अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा।। नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी।। सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।। जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।।
'उसका पृथ्वी पर जन्म धन्य है, जिसके चरित सुनकर पिता आनन्दित होते हैं। जिसे पिता-माता प्राणों के समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ उसकी हथेली में हैं। आपकी आज्ञा पालकर और जन्म का फल पाकर मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा, आप आज्ञा दीजिए। माता से विदा माँगकर आता हूँ, और फिर आपके चरण छूकर वन को चल दूँगा।' ऐसा कहकर राम चल दिए, और शोक के वश राजा कुछ उत्तर न दे सके। यह तीखी बात सारे नगर में फैल गई, और छूते ही मानो सबके शरीर पर बिच्छू चढ़ गया हो। इसे सुनकर सभी नर-नारी व्याकुल हो उठे, जैसे दावाग्नि देखकर लता और वृक्ष; जो जहाँ सुनता वहीं सिर पीट लेता, बड़ा विषाद था और धीरज नहीं रहता था।
मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहि सोकु न हृदयँ समाइ। मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।46।।
उनके मुख सूख रहे थे, नेत्रों से आँसू बह रहे थे, और शोक हृदय में समाता न था; मानो करुण रस की सेना डंका बजाकर पूरी अवध पर उतर आई हो।
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।। एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ।। निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।। कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी।। पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा।। सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना।। सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।। निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।।
लोग कहते थे कि विधाता ने आनन्द के बीचोंबीच ही बात बिगाड़ दी, और जहाँ-तहाँ कैकेयी को गालियाँ देते थे— 'इस पापिनी को समझने से क्या मिला? इसने अपने छाए हुए घर में ही आग लगा दी। यह अपने ही हाथों अपनी आँखें निकालकर देखना चाहती है; अमृत फेंककर विष चखना चाहती है। कुटिल, कठोर, कुबुद्धि और अभागिनी वह रघुवंश रूपी बाँस के वन में आग बन गई है। डाल पर बैठकर उसी ने पेड़ काट डाला, सुख के बीच शोक का पूरा ठाट खड़ा कर दिया। राम सदा इसे प्राणों के समान प्रिय थे; फिर किस कारण उसने यह कुटिलता ठान ली? कवि सच ही कहते हैं कि स्त्री का स्वभाव सब प्रकार से अगम, अथाह और छिपाव से भरा होता है। भाई, अपनी परछाईं तो शायद पकड़ में आ जाए, पर स्त्री की गति जानी नहीं जा सकती।'
काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ। का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।।
अग्नि क्या नहीं जला सकती? समुद्र में क्या नहीं समा सकता? अबला होते हुए भी प्रबल स्त्री क्या नहीं कर सकती? और संसार में काल किसे नहीं खा जाता?
का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।। एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।। जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु।। एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने।। सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी।। एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं।। कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा।। सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे।।
लोग विलाप करते थे— 'पहले विधाता ने हमें एक बात सुनाई, अब क्या सुना रहा है? एक दृश्य दिखाकर अब क्या दिखाना चाहता है?' कुछ कहते थे कि राजा ने अच्छा नहीं किया, बिना सोचे-विचारे उस कुबुद्धि को वरदान दे दिया, और हठ से सब दुःखों का पात्र बन गए, मानो स्त्री के वश में होकर उनका ज्ञान और गुण जाता रहा। पर कुछ, जो धर्म की सीमा को पहचानते थे, वे समझदार राजा को दोष नहीं देते और आपस में शिबि, दधीचि और हरिश्चन्द्र की कथाएँ बखानकर कहते थे। कुछ कहते थे कि इसमें भरत की सम्मति है; कुछ उदासीन भाव से सुनते रह जाते थे। और कुछ हाथों से कान मूँदकर और दाँतों से जीभ दबाकर कहते थे— 'यह बात झूठी है! ऐसा कहने से तुम्हारे पुण्य नष्ट हो जाएँगे, क्योंकि भरत को राम प्राणों के समान प्यारे हैं।'
चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल। सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।।
चाहे चन्द्रमा आग के कण बरसाने लगे और विष अमृत के समान हो जाए, पर भरत स्वप्न में भी कभी राम के विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे।
एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।। खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू।। बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई केरी।। लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही।। भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।। करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू।। कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू।। कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा।।
कुछ लोग विधाता को दोष देते थे, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगर में हलचल थी और सब चिन्तित थे, हृदय में असह्य जलन और सारा उत्साह मिट गया। ब्राह्मणों की स्त्रियाँ, कुल की माननीय बड़ी-बूढ़ियाँ, जो कैकेयी को परम प्रिय थीं, शील की सराहना करती हुई उसे सीख देने लगीं; पर वे वचन उसे बाणों के समान लगते थे। वे बोलीं— 'तुम सदा कहती थीं कि भरत मुझे राम के समान प्रिय नहीं; यह सारा जगत जानता है। तुम राम पर सहज स्नेह रखती हो, फिर किस अपराध के लिए आज उन्हें वन दे रही हो? तुमने कभी सौत का द्वेष नहीं किया; तुम्हारी प्रीति और विश्वास को सारा देश जानता है। कौसल्या ने अब तुम्हारा क्या बिगाड़ा, जिसके लिए तुमने पूरे नगर पर वज्र गिरा दिया?'
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
रामचरितमानस का अयोध्या काण्ड किस विषय में है?
राम के राज्याभिषेक की तैयारी के बीच रानी कैकेयी, दो पुराने वरदानों की याद दिलाकर, भरत के राज्याभिषेक और राम के चौदह वर्ष के वनवास की माँग करती हैं। राम पूर्ण शांति से इसे स्वीकार करते हैं; सीता और लक्ष्मण उनके साथ जाते हैं। राजा दशरथ शोक में प्राण त्याग देते हैं, और लौटे हुए भरत सिंहासन अस्वीकार कर राम की पादुका रखकर उनके नाम से राज्य करते हैं।
रामचरितमानस क्या है?
रामचरितमानस संत-कवि गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी) द्वारा अवधी में रचित रामायण है, जो उत्तर भारत में सर्वाधिक प्रिय और पठित ग्रंथों में से एक है। यह सात काण्डों में विभाजित है: बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुंदर, लंका और उत्तर।
अपने नाम से राम/सुंदरकांड पाठ अर्पित करें
रक्षा और शांति हेतु अपने नाम-गोत्र में रामचरितमानस या सुंदरकांड पाठ करवाएँ। सेवा बुक करें, या सनातन साहित्य में आगे पढ़ें।







