माँ लक्ष्मी की कृपा से धन, समृद्धि और सुख-शांति पाने के लिए सम्पूर्ण लक्ष्मी चालीसा, अर्थ सहित।
भगवान विष्णु की दिव्य अर्धांगिनी माँ लक्ष्मी को धन, धान्य, ऐश्वर्य और सौभाग्य की देवी माना जाता है। भक्त कवि रामदास द्वारा रचित लक्ष्मी चालीसा एक चालीस-चरणों वाला स्तोत्र है, जो माँ के विविध रूपों का स्मरण करते हुए उनकी करुणा का आह्वान करता है और प्रत्येक सच्चे भक्त के जीवन से दरिद्रता, दुःख और अभाव दूर करने की प्रार्थना करता है।
सम्पूर्ण लक्ष्मी चालीसा (देवनागरी)
मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास। मनो कामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥
सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार। ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥ तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥
जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥ तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी खासी॥
जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥ विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥ कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥ क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥ जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥ तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥ तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहँ तक महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन-इच्छित वांछित फल पाई॥ तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भाँति मन लाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥ ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥
त्राहि-त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥ जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥
ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥ पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥ पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥ बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोई जग में नाहिं॥ बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥ जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूँ नाहीं॥ मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥
भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥ बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥ रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥ रामदास अब कहै पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥
त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥ रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥
अर्थ
प्रारम्भिक दोहा: भक्त माँ लक्ष्मी को प्रणाम करते हुए प्रार्थना करता है कि वे कृपापूर्वक उसके हृदय में वास करें और उसकी मनोकामना पूर्ण करें।
चरण 1-4: लक्ष्मी को सिंधु-सुता और विष्णुप्रिया कहकर नमन किया गया है, जो ऋद्धि-सिद्धि और मंगल देने वाली हैं। भक्त उनसे ज्ञान, बुद्धि और विद्या की याचना करता है और कहता है कि उनके समान कोई उपकारी नहीं। उन्हें जगत की जननी और घट-घट में वास करने वाली बताया गया है, जिनसे भक्त निरंतर कृपा की विनती करता है।
चरण 5-9: भक्त सोचता है कि वह उनकी स्तुति किस प्रकार करे और उनसे अपने अपराध क्षमा कर कृपादृष्टि डालने की प्रार्थना करता है। समुद्र-मंथन का स्मरण किया गया है, जिसमें से चौदह रत्नों के साथ स्वयं लक्ष्मी भी प्रकट हुईं। जहाँ-जहाँ विष्णु ने अवतार लिया, वहाँ-वहाँ लक्ष्मी ने भी रूप बदलकर उनकी सेवा की — जब वे अयोध्या में राम रूप में अवतरित हुए, तब लक्ष्मी जनकपुर में सीता रूप में प्रकट होकर हृदय से उनकी सेवा करती रहीं। वे अंतर्यामी, त्रिभुवन की स्वामिनी हैं, जिनकी महिमा का वर्णन असंभव है।
चरण 10-17: जो मन, वचन और कर्म से उनकी सेवा करता है, वह मनवांछित फल पाता है। छल-कपट त्यागकर पूजा करने वाले को कोई कष्ट नहीं होता। जो इस चालीसा को ध्यानपूर्वक पढ़ता-पढ़ाता है, उसे कोई रोग नहीं सताता और वह पुत्र-धन-सम्पत्ति पाता है। विधिपूर्वक पाठ कराने से गौरीशंकर भी प्रसन्न होते हैं। बारह मास नियमित पूजा करने वाला परम धन्य है, और प्रतिदिन मन लगाकर पाठ करने वाले के समान कोई नहीं।
चरण 18-21: भक्त श्रद्धा और व्रत-नियम का संकल्प लेता है और प्रार्थना करता है कि माँ का तेज, जो सबसे अधिक दयालु है, उसकी दरिद्रता मिटाकर सच्ची भक्ति प्रदान करे। वह अपनी भूल-चूक की क्षमा माँगता है और चतुर्भुज रूप के दर्शन की कामना करता है, ताकि उसका कष्ट दूर हो। रामदास पुकार-पुकारकर विनती करते हैं कि माँ उनकी सभी विपत्तियाँ दूर करें।
महत्व एवं लाभ
लक्ष्मी चालीसा का पाठ वे भक्त करते हैं जो अपने घर और व्यापार में समृद्धि, स्थिरता और कृपा आमंत्रित करना चाहते हैं। परंपरागत मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक पाठ करने से:
ईमानदार प्रयास और सन्मार्ग के साथ किया जाए तो आर्थिक बाधाएँ दूर होती हैं और पुराना ऋण-भार हल्का होता है।
घर में ऋद्धि-सिद्धि और सामंजस्य आता है, विशेषकर शुक्रवार को पाठ करने पर।
आत्मविश्वास, संतोष और अभाव की चिंता से मुक्ति मिलती है।
अचानक होने वाली हानि से रक्षा होती है, तथा अनुशासन, कृतज्ञता और उदारता जैसे गुण बढ़ते हैं, जो माँ लक्ष्मी को प्रिय माने जाते हैं।
पाठ विधि व शुभ समय
शुभ दिन: शुक्रवार माँ लक्ष्मी को विशेष प्रिय माना जाता है; शरद पूर्णिमा, दीपावली और कार्तिक मास में भी नित्य पाठ की परंपरा है।
शुभ समय: स्नान के पश्चात प्रातःकाल अथवा संध्या काल, जो माँ लक्ष्मी का सर्वाधिक प्रिय समय माना जाता है।
तैयारी: माँ लक्ष्मी के चित्र या मूर्ति के समक्ष घी का दीपक जलाएँ, ताज़ा पुष्प, अक्षत और कुमकुम अर्पित करें, पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
विधि: शांत एवं एकाग्र मन से पाठ करें, इसे 1, 5 या 11 बार दोहराया जा सकता है। किसी विशेष मनोकामना हेतु 11 या 21 दिनों तक कमल-गट्टा अथवा स्फटिक माला से गिनती रखी जा सकती है।
अंत में कृतज्ञता की संक्षिप्त प्रार्थना करें और यथासंभव किसी जरूरतमंद को कुछ दान करें — दान माँ लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय है।
करणीय व अकरणीय बातें
पूजा स्थान स्वच्छ व प्रकाशयुक्त रखें; कहा जाता है कि माँ लक्ष्मी अस्वच्छता व अंधकार से दूर रहती हैं।
पाठ श्रद्धा से करें, शीघ्रता से नहीं; कुछ चरण भी एकाग्रता से पढ़े जाएँ तो पर्याप्त हैं।
इस साधना को ईमानदार परिश्रम और आर्थिक अनुशासन के साथ जोड़ें — चालीसा प्रयास का सहायक है, विकल्प नहीं।
क्रोध की अवस्था में अथवा नशा करने के बाद पाठ न करें।
इसे केवल लेन-देन की तरह न लें; कृतज्ञता व विनम्रता के भाव से करें।
महात्म्य
मान्यता है कि यह चालीसा रामदास द्वारा गहरी व्यक्तिगत भक्ति से रची गई थी, और नियमित पाठ करने वालों में समय के साथ सूक्ष्म किन्तु स्थायी परिवर्तन देखा जाता है — धन संबंधी चिंता कम होना, निर्णय-क्षमता में सुधार, तथा उचित समय पर अप्रत्याशित सहायता मिलना। बड़े-बुज़ुर्ग इसे शुक्रवार को दीप-प्रज्वलन के साथ नियमित रूप से करने की सलाह देते हैं, न कि केवल एक बार के लिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लक्ष्मी चालीसा किसने रची? परंपरागत स्रोतों के अनुसार लक्ष्मी चालीसा की रचना भक्त कवि रामदास ने की, जिनका नाम चालीसा के समापन दोहे में स्वयं आता है।
क्या इसे कोई भी, बिना लिंग-आयु के भेद के, पढ़ सकता है? हाँ। लक्ष्मी चालीसा पढ़ने में लिंग, आयु या पृष्ठभूमि की कोई बाध्यता नहीं है — श्रद्धा और सम्मान ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।
क्या इसे ठीक 40 बार अथवा माला पर ही पढ़ना आवश्यक है? कोई निश्चित संख्या अनिवार्य नहीं है। अनेक भक्त इसे प्रतिदिन एक या कुछ बार पढ़ते हैं; 11 या 21 दिनों तक माला से पाठ करना व्यक्तिगत भक्ति-भाव है, कठोर नियम नहीं।
क्या लक्ष्मी चालीसा पढ़ने से धन की गारंटी मिलती है? सनातन परंपरा में चालीसा को ईमानदार प्रयास के साथ दैवीय कृपा, अनुशासन और कृतज्ञता प्राप्त करने का साधन माना जाता है — यह परिश्रम अथवा आर्थिक योजना का विकल्प नहीं है।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Lakshmi mantra
Om Shreem Mahalakshmyai Namah
Chant on Friday or during Lakshmi puja for prosperity, grace, and sattvic abundance.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
लक्ष्मी चालीसा किसने रची?
परंपरागत स्रोतों के अनुसार भक्त कवि रामदास ने, जिनका नाम समापन दोहे में आता है।
क्या पाठ की कोई निश्चित संख्या है?
कोई निश्चित संख्या अनिवार्य नहीं; प्रतिदिन एक बार अथवा 11-21 दिन माला से पाठ करना सामान्य है।
पाठ के लिए कौन-सा दिन शुभ है?
शुक्रवार माँ लक्ष्मी को सर्वाधिक प्रिय माना जाता है, साथ ही शरद पूर्णिमा व दीपावली भी उपयुक्त हैं।
क्या यह धन की गारंटी देता है?
यह कृपा, अनुशासन और कृतज्ञता पाने का साधन है, ईमानदार प्रयास व आर्थिक योजना का विकल्प नहीं।
पवित्र पूजा द्वारा माँ लक्ष्मी की कृपा पाएँ
हमारे पंडितजी आपके नाम व गोत्र से संकल्पपूर्वक प्रामाणिक लक्ष्मी पूजा सम्पन्न करेंगे, जिससे घर में स्थायी समृद्धि और शांति बनी रहे।








