अरण्य काण्ड के बारे में
वन में राम, सीता और लक्ष्मण ऋषियों से मिलते और राक्षसों का वध करते हैं। रावण की बहन शूर्पणखा का, प्रणय-प्रस्ताव अस्वीकार होने पर, अंग-भंग होता है; प्रतिशोध में रावण स्वर्ण-मृग के छल से राम को दूर ले जाकर सीता का हरण कर लंका ले जाता है। शोकाकुल राम और लक्ष्मण उन्हें खोजने निकलते हैं।
पाठ कैसे करें
अरण्य काण्ड का पाठ उसकी मूल अवधी में (नीचे देवनागरी में) किया जाता है। धीरे-धीरे, पद-दर-पद पढ़ें; विशेषकर सुंदरकांड का पाठ साहस और रक्षा हेतु किया जाता है।
मूल पाठ
श्लोक और अर्थ
मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्रीरामभूपप्रियम्।।1।। सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम् राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे।।2।।
मैं शंकर (शिव) की वंदना करता हूँ, जो धर्मरूपी वृक्ष के मूल हैं, विवेकरूपी समुद्र को आनंद देने वाले पूर्णचंद्र हैं, वैराग्यरूपी कमल के सूर्य हैं, पापरूपी घने अंधकार और सब तापों को हरने वाले, मोहरूपी बादलों के समूह को छिन्न करने वाले, ब्राह्मणकुल के शिरोमणि, कलंक मिटाने वाले और राजा श्रीराम के प्रिय हैं। मैं उन मनोहर श्रीराम का भी भजन करता हूँ, जिनका शरीर आनंद देने वाले घने बादल-सा सुंदर श्याम है, जो पीतांबर पहने, हाथ में धनुष-बाण लिए, कमर में सुंदर तरकश बाँधे, बड़े कमल-से नेत्रों वाले, जटाजूट से सुशोभित होकर सीता और लक्ष्मण के साथ पथ पर चल रहे हैं।
उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति।।
हे उमा (पार्वती), राम के गुण गूढ़ और रहस्यमय हैं; पंडित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य पा लेते हैं, परंतु जो मूढ़ हरि से विमुख हैं और धर्म में प्रीति नहीं रखते, वे इनसे मोह ही पाते हैं।
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।। अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन।। एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए।। सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर।। सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा।। जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा।। सीता चरन चौंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा।। चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।
मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार नगरवासियों और भरत की अनुपम प्रीति का वर्णन किया; अब प्रभु के अत्यंत पवित्र वनचरित सुनिए, जो देवताओं, मनुष्यों और मुनियों को प्रिय हैं। एक बार राम ने सुंदर फूल चुनकर अपने हाथों से आभूषण बनाए और आदरपूर्वक सीता को पहनाकर सुंदर स्फटिक शिला पर बैठे। इंद्र का पुत्र जयंत कौए का रूप धरकर, उस मूर्ख ने राम का बल देखना चाहा, मानो चींटी समुद्र की थाह लेना चाहे; उस मंदबुद्धि ने सीता के चरण में चोंच मारी और भाग गया। जब रक्त बहा और रघुनाथ ने जाना, तब उन्होंने धनुष पर सींक का बाण चढ़ाया।
अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह। ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।1।।
रघुनाथ अत्यंत कृपालु हैं और सदा दीनों पर स्नेह रखते हैं; फिर भी उनके साथ उस मूर्ख ने, जो अवगुणों का घर था, आकर छल किया।
प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।। धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।। भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा।। ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।। काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही।। मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना।। मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी।। सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।। नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता।। पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।। आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।। अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।। निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ।। सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी।।
मंत्र से प्रेरित ब्रह्मबाण दौड़ा और भयभीत कौआ भाग चला। अपना रूप धरकर वह पिता इंद्र के पास गया, पर इंद्र ने राम से विमुख जानकर उसे नहीं रखा; वह निराश और भयभीत हो गया, जैसे चक्र के भय से ऋषि दुर्वासा। वह ब्रह्मलोक, शिवपुर और सब लोकों में थका, व्याकुल, भय और शोक से भरा भटकता रहा, पर किसी ने उसे बैठने को न कहा, क्योंकि राम के द्रोही को कौन शरण दे? तुलसीदास कहते हैं कि जो रघुवीर से विमुख है, उसके लिए माता मृत्यु समान, पिता यमराज समान, अमृत विष बन जाता है, मित्र सौ शत्रुओं का-सा व्यवहार करता है, देवनदी गंगा वैतरणी बन जाती है, और सारा जगत आग से भी अधिक तप्त हो जाता है। जयंत को व्याकुल देखकर कोमल हृदय संत नारद ने उसे तुरंत राम के पास भेजा और कहा कि शरणागत के हितकारी से रक्षा की पुकार करो; व्याकुल और भयभीत होकर उसने राम के चरण पकड़कर पुकारा—'रक्षा करो, रक्षा करो दयालु रघुराई! आपका बल और प्रभुता अतुलनीय है, मैं मंदबुद्धि जान न सका। मैंने अपने ही कर्मों का फल पाया; अब शरण में आया हूँ, रक्षा कीजिए।' उसकी आर्त वाणी सुनकर कृपालु प्रभु ने उसे एक ही नेत्र लेकर छोड़ दिया।
कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित। प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम।।2।।
यद्यपि उसने मोहवश द्रोह किया था और उसका वध उचित था, फिर भी प्रभु ने दया करके उसे छोड़ दिया। रघुवीर के समान कृपालु और कौन है?
रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।। बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना।। सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई।। अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ।। पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए।। करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए।। देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने।। करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए।।
रघुनाथ ने चित्रकूट में रहकर वेदों के अमृत समान अनेक चरित्र किए। फिर उन्होंने सोचा कि अब सब उन्हें जान गए हैं और भीड़ हो जाएगी, इसलिए सब मुनियों से विदा लेकर दोनों भाई सीता के साथ चल दिए। जब प्रभु अत्रि मुनि के आश्रम पहुँचे तो सुनते ही महामुनि हर्षित हो गए; पुलकित होकर उठ दौड़े और राम को देखकर आतुरता से मिलने आए। राम के दंडवत करते ही मुनि ने उन्हें हृदय से लगा लिया और दोनों ने प्रेम के आँसुओं से एक-दूसरे को नहला दिया। राम की छवि देखकर नेत्र शीतल हुए, तब आदरपूर्वक उन्हें आश्रम में लाकर पूजा की, सुंदर वचन कहे और मूल-फल दिए जो प्रभु के मन को भाए।
प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि। मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत।।3।।
प्रभु आसन पर विराजे, और परम प्रवीण मुनि अत्रि ने राम की शोभा से नेत्र भरकर हाथ जोड़कर स्तुति करना आरंभ किया।
नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।। भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।। निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मंदरं।। प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं।। प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं।। निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं।। दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।। मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं।। मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं।। विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं।। नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं।। भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजं।। त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।। पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले।। विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।। निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं।। तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।। जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं।। भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।। स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं।। अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं।। प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे।। पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।। व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता।।
अत्रि मुनि राम की स्तुति करते हैं—मैं भक्तवत्सल, कृपालु और कोमल स्वभाव वाले को नमस्कार करता हूँ; मैं आपके चरणकमलों का भजन करता हूँ, जो निष्काम भक्तों को अपना धाम देते हैं। आप सदा श्याम और सुंदर हैं, संसार-सागर के लिए मंदराचल हैं, खिले कमल-से नेत्रों वाले, मद आदि दोषों को मिटाने वाले, लंबी भुजाओं और अपार वैभव वाले, तरकश-धनुष-बाण धारण करने वाले, तीनों लोकों के स्वामी, सूर्यवंश के भूषण और शिव-धनुष को तोड़ने वाले, मुनियों-संतों को आनंद देने वाले, राक्षसों के समूह को नष्ट करने वाले, शिव द्वारा वंदित और ब्रह्मादि देवों द्वारा सेवित, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप और सब दोषों को हरने वाले हैं; मैं लक्ष्मीपति, सुख की खान और संतों की गति को प्रणाम करता हूँ। जो मनुष्य ईर्ष्यारहित होकर आपके चरणों का भजन करते हैं वे संसार-सागर की लहरों में नहीं डूबते, और एकांतवासी मुनि मुक्ति के लिए इंद्रियों को वश में कर आनंदपूर्वक भजन करके आपकी परमगति पाते हैं। मैं उस अद्भुत, निष्काम, व्यापक प्रभु का भजन करता हूँ, जो सनातन जगद्गुरु, शुद्ध तुरीय अवस्थास्वरूप, भावप्रिय और कुयोगियों को दुर्लभ, भक्तों के कल्पवृक्ष, सुसेव्य और समभाव वाले, अनुपम रूप वाले हैं; मैं सीतापति को नमस्कार करता हूँ। मुझ पर प्रसन्न हों और अपने चरणों की भक्ति दें; जो आदरपूर्वक इस स्तुति का पाठ करते हैं वे निःसंदेह आपकी भक्ति से युक्त होकर आपके धाम को प्राप्त होते हैं।
बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि। चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि।।4।।
स्तुति करके मुनि ने सिर झुकाया और फिर हाथ जोड़कर कहा—'हे नाथ, मेरी बुद्धि आपके चरणकमलों को कभी न छोड़े।'
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता।। रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई।। दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए।। कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी।। मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।। अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही।। धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।। बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अधं बधिर क्रोधी अति दीना।। ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना।। एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा।। जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं। बेद पुरान संत सब कहहिं।। उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।। मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें।। धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई।। बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई।। पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई।। छन सुख लागि जनम सत कोटि। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी।। बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई।। पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई। बिधवा होई पाई तरुनाई।।
सीता ने अनुसूया (अत्रि की पत्नी) के चरण पकड़कर उनसे भेंट की, जो शीलवती और विनम्र थीं; ऋषिपत्नी अत्यंत प्रसन्न हुईं, आशीर्वाद देकर पास बैठाया और सदा नए, निर्मल दिव्य वस्त्र-आभूषण पहनाए। फिर अवसर पाकर उन्होंने कोमल वाणी से नारी-धर्म समझाया—माता, पिता और भाई सीमित हित करते हैं, पर पति अपार दानी है, और नीच है वह नारी जो उसकी सेवा न करे। धैर्य, धर्म, मित्र और नारी—ये चारों विपत्ति में परखे जाते हैं; पति चाहे वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी या दीन हो, ऐसे पति का भी अपमान करने वाली नारी यमपुर में अनेक दुख पाती है। एक ही व्रत है—मन, वचन और कर्म से पति के चरणों में प्रेम। पतिव्रता चार प्रकार की होती है—उत्तम स्वप्न में भी दूसरे पुरुष का विचार नहीं करती; मध्यम दूसरे पुरुष को भाई, पिता या पुत्र समान देखती है; नीच केवल कुल की मर्यादा सोचकर सती रहती है; और सबसे नीच वह है जो केवल अवसर के अभाव या भय से सती रहती है। जो नारी पति को धोखा देकर पराए पुरुष से प्रीति करती है, वह क्षणभर के सुख के लिए सौ करोड़ जन्मों का दुख मोल लेकर सौ कल्पों तक रौरव नरक में पड़ती है। परंतु जो छल छोड़कर पतिव्रत-धर्म धारण करती है वह बिना परिश्रम परमगति पाती है, और जो पति से विरुद्ध रहती है वह जहाँ भी जन्म ले, जवानी पाते ही विधवा हो जाती है।
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ। जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय।।5(क)।। सुनु सीता तव नाम सुमिर नारि पतिब्रत करहि। तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित।।5(ख)।।
नारी स्वभाव से भले ही अपवित्र मानी जाए, पर पति की सेवा से शुभ गति पाती है, जिसका यश चारों वेद गाते हैं और जिसके कारण आज भी तुलसी हरि को प्रिय है। 'सुनो सीता, तुम्हारा नाम स्मरण करके नारियाँ पतिव्रत का पालन करेंगी। राम तुम्हें प्राणों के समान प्रिय हैं; मैंने यह कथा संसार के कल्याण के लिए कही।'
सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा।। तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना।। संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू।। धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी।। जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी।। ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे।। अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई।। जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई।। केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी।। अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा।।
यह सुनकर जानकी को परम सुख मिला और उन्होंने आदरपूर्वक अनुसूया के चरणों में सिर नवाया। तब कृपानिधान प्रभु ने मुनि अत्रि से कहा—'आपकी आज्ञा हो तो मैं दूसरे वन को जाऊँ; मुझ पर सदा कृपा रखिए और सेवक जानकर स्नेह न त्यागिए।' धर्मधुरंधर प्रभु के वचन सुनकर ज्ञानी मुनि प्रेम से बोले—'जिनकी कृपा ब्रह्मा, शिव, सनकादि और सब परमार्थी चाहते हैं, वही आप निष्काम सबके प्यारे, दीनबंधु हैं। अब मैंने लक्ष्मी की चतुराई जानी कि उन्होंने सब देवों को छोड़कर आपको भजा; जिनके समान भी कोई नहीं, फिर बड़ा तो क्या, ऐसे में आपमें ऐसा शील क्यों न हो? हे स्वामी, मैं कैसे कहूँ कि अब जाइए? आप अंतर्यामी हैं, स्वयं कहिए।' यह कहकर धीर मुनि को देखते हुए प्रभु के नेत्रों में जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया।
तन पुलक निर्भर प्रेम पुरन नयन मुख पंकज दिए। मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए।। जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई। रधुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई।।
शरीर पुलकित और प्रेम से पूर्ण, कमल-से मुख और नेत्रों में जल भरे, अत्रि विस्मित हुए—'मैंने उस प्रभु का दर्शन किया जो मन, ज्ञान, गुण और इंद्रियों से परे हैं। मैंने कौन-सा जप-तप किया जो यह सौभाग्य मिला?' जप, योग और धर्म के समूह से मनुष्य यह अनुपम भक्ति पाता है; इसीलिए दास तुलसी रघुवीर के पवित्र चरित्र को दिन-रात गाता है।
कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल। सादर सुनहि जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल।।6(क)।। कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप। परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर।।6(ख)।।
राम का सुयश कलियुग के पापों को नष्ट करता है, मन को वश में करता है और सुख का मूल है; जो आदरपूर्वक इसे सुनते हैं उन पर राम सदा अनुकूल रहते हैं। यह कठिन कलियुग पापों का भंडार है, जिसमें न धर्म है, न ज्ञान, न योग, न जप; जो चतुर मनुष्य सब भरोसे छोड़कर केवल राम को भजते हैं, वही बुद्धिमान हैं।
मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा।। आगे राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें।। उमय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी।। सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानी देहिं बर बाटा।। जहँ जहँ जाहि देव रघुराया। करहिं मेध तहँ तहँ नभ छाया।। मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुवीर निपाता।। तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा।। पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा।।
मुनि के चरणकमलों में सिर नवाकर देव, मनुष्य और मुनियों के ईश राम वन को चले—आगे राम और पीछे लक्ष्मण, सुंदर मुनि-वेश में सजे। दोनों के बीच सीता ऐसी शोभित थीं जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया। नदियाँ, वन, पर्वत और कठिन घाट अपने स्वामी को पहचानकर सुगम मार्ग देते थे, और रघुराया जहाँ-जहाँ जाते बादल छाया कर देते। मार्ग में विराध राक्षस मिला, जिसे आते ही रघुवीर ने मार गिराया; उसे तुरंत सुंदर रूप मिला, और उसका पहले का दुख देखकर राम ने उसे अपने धाम भेज दिया। फिर सुंदर भाई और जानकी सहित वे वहाँ आए जहाँ शरभंग मुनि थे।
देखी राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग। सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग।।7।।
राम के कमल-से मुख को देखकर महामुनि के नेत्ररूपी भौंरे आदरपूर्वक उसका पान करने लगे; शरभंग का जन्म अत्यंत धन्य है।
कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला।। जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा।। चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।। नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।। सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा।। तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी।। जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा।। एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा।।
मुनि ने कहा—'सुनिए दयालु रघुवीर, शंकर के मानसरूपी सरोवर के राजहंस। मैं ब्रह्मलोक जा रहा था तभी सुना कि राम वन में आएँगे, इसलिए दिन-रात मार्ग देखता रहा; अब आपको देखकर मेरा हृदय शीतल हो गया। हे नाथ, मैं सब साधनों से हीन हूँ, फिर भी आपने दीन सेवक जानकर कृपा की। यह मुझ पर कोई एहसान नहीं, आपने तो अपना प्रण ही निभाया, हे भक्तों के मन को चुराने वाले। इस दीन के हित के लिए तब तक ठहरिए जब तक मैं शरीर त्यागकर आपसे मिल जाऊँ।' जो योग, यज्ञ, जप, तप और व्रत उन्होंने किए थे, वे सब प्रभु को अर्पित कर बदले में भक्ति का वर ले लिया; और इस प्रकार शरभंग मुनि ने चिता रचकर, हृदय से सब आसक्ति छोड़कर उस पर बैठ गए।
सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम। मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरुप श्रीराम।।8।।
'सीता और भाई सहित, हे नील बादल-से श्याम शरीर वाले प्रभु, हे सगुण श्रीराम, आप निरंतर मेरे हृदय में निवास कीजिए।'
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा।। ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ।। रिषि निकाय मुनिबर गति देखि। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी।। अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा।। पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे।। अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया।। जानतहुँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी।। निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए।।
यह कहकर उन्होंने योगाग्नि से शरीर जला दिया और राम की कृपा से वैकुंठ चले गए; क्योंकि उन्होंने पहले ही भेद-भक्ति का वर ले लिया था, इसलिए मुनि हरि में लीन नहीं हुए। उस श्रेष्ठ मुनि की गति देखकर मुनिगण हृदय में विशेष सुखी हुए और सब स्तुति करने लगे—'शरणागत के हितकारी, करुणा के कंद की जय!' फिर रघुनाथ आगे वन को चले, और मुनियों के बहुत-से समूह साथ हो लिए। हड्डियों का ढेर देखकर रघुराया को अत्यंत दया आई और उन्होंने मुनियों से पूछा; वे बोले—'हे स्वामी, जानते हुए भी क्यों पूछते हैं, आप तो सर्वदर्शी और अंतर्यामी हैं? राक्षसों के समूह ने इन सब मुनियों को खा लिया।' यह सुनकर रघुवीर के नेत्रों में जल भर आया।
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।।9।।
भुजा उठाकर राम ने प्रतिज्ञा की—'मैं पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर दूँगा।' फिर वे एक-एक करके सब मुनियों के आश्रमों में जा-जाकर उन्हें सुख देने लगे।
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना।। मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक।। प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा।। हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया।। सहित अनुज मोहि राम गोसाई। मिलिहहिं निज सेवक की नाई।। मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं।। नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।। एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की।। होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन।। निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी।। दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा।। कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।। अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई।। अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा।। मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा।। तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए।। मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजनित सुख पावा।। भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा।। मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसें।। आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा।। परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी।। भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई।। मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला।। राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा।।
अगस्त्य मुनि के सुतीक्ष्ण नामक बुद्धिमान शिष्य भगवान में प्रीति रखते थे, मन-वचन-कर्म से राम के चरणों के सेवक थे और स्वप्न में भी किसी दूसरे देव का भरोसा न करते थे। जब उन्होंने प्रभु के आने की बात सुनी तो मनोरथ करते हुए आतुर होकर दौड़े—'हे विधाता, क्या दीनबंधु रघुराया मुझ-से मूर्ख पर दया करेंगे? क्या राम भाई सहित अपने सेवक की तरह मुझसे मिलेंगे? मेरे मन में दृढ़ भरोसा नहीं, न भक्ति, न वैराग्य, न ज्ञान; न सत्संग है, न योग-जप-यज्ञ, न चरणकमलों में दृढ़ अनुराग। पर करुणानिधान की एक बान है—जिसकी और कोई गति नहीं उसे वे प्रिय मानते हैं। आज मेरे नेत्र सफल होंगे, भव से मुक्त करने वाले उनके मुखकमल को देखकर।' प्रेम में मग्न मुनि को दिशा-मार्ग नहीं सूझता था, न यह कि मैं कौन हूँ और कहाँ जा रहा हूँ; कभी पीछे लौटते, कभी नाचते और गुण गाते। उनकी अविरल भक्ति देखकर रघुवीर पेड़ की ओट में छिपकर देखने लगे, फिर उनके भय को हरने के लिए उनके हृदय में प्रकट हो गए। मुनि मार्ग के बीच निश्चल बैठ गए, शरीर कटहल-सा पुलकित था; राम पास आए, अपने भक्त की दशा देखकर प्रसन्न हुए और अनेक प्रकार से जगाया, पर वे ध्यान के सुख से न जागे। तब राम ने राजरूप छिपाकर मुनि के हृदय में चतुर्भुज रूप दिखाया; मुनि व्याकुल होकर उठे, जैसे मणि खो देने पर श्रेष्ठ सर्प। सामने श्याम शरीर राम को सीता और भाई सहित देखकर वे लाठी की तरह चरणों में गिर पड़े, प्रेम में मग्न वे बड़भागी मुनि। राम ने विशाल भुजाओं से उन्हें उठाकर बड़े प्रेम से हृदय से लगा लिया; मुनि को मिलते कृपालु ऐसे शोभित हुए मानो सोने का वृक्ष तमाल से मिल रहा हो, और मुनि राम के मुख को देखते हुए मानो चित्र में लिखे खड़े रह गए।
तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार। निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार।।10।।
तब मुनि ने धीरे-धीरे हृदय में धीरज धरकर बार-बार प्रभु के चरण पकड़े, उन्हें अपने आश्रम में लाकर अनेक प्रकार से पूजा की।
कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी।। महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी।। श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं।। पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं।। मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः।। निशिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः।। अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं।। हर ह्रदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं।। संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः।। भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः।। निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं।। अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं।। भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः।। अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः।। अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः।। धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः।। जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी।। तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी।। जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी।। जो कोसल पति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना। अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे।। सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए।। परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही।। मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा।। तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई।। अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना।। प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा।।
मुनि ने कहा—'हे प्रभु, मेरी विनती सुनिए। मैं आपकी स्तुति किस प्रकार करूँ? आपकी महिमा अपार है और मेरी बुद्धि थोड़ी, सूर्य के सामने जुगनू के प्रकाश-सी।' फिर उन्होंने गाया—मैं श्रीरघुवीर को निरंतर नमन करता हूँ, जिनका शरीर नीलकमल की माला-सा श्याम है, जटामुकुट और मुनिवस्त्र धारण किए, हाथ में धनुष-बाण और कमर में तरकश लिए; जो मोहरूपी घने वन को जलाने वाली अग्नि, संतरूपी कमलों के सूर्य, राक्षसरूपी हाथियों के लिए सिंह, और भवरूपी पक्षी के लिए बाज हैं, वे सदा हमारी रक्षा करें। लाल नेत्र और सुंदर वेश वाले, सीता के नेत्ररूपी चकोर के चंद्र, शिव के हृदयरूपी मानस के बालहंस, विशाल भुजा और वक्ष वाले, संशयरूपी सर्प को निगलने वाले गरुड़, कठोर तर्करूपी विषाद को शांत करने वाले, देवों को आनंद देने वाले और कृपा के कवच, वे सदा हमारी रक्षा करें। सगुण-निर्गुण, कोमल-कठोर रूप वाले, ज्ञान-वाणी-इंद्रियों से परे, निर्मल, निर्दोष और अपार, पृथ्वी का भार हरने वाले, भक्तों के कल्पवृक्ष, क्रोध-लोभ-मद-काम को वश में करने वाले, भवसागर के सेतु, सूर्यवंश की ध्वजा, अतुलित भुजा-बल वाले जिनका नाम कलियुग के पापों को नष्ट करता है, धर्म के कवच और गुणों के भंडार—वे मेरे राम सदा मुझे कल्याण दें। यद्यपि वे निर्विकार, व्यापक और अविनाशी हैं और सबके हृदय में निरंतर बसते हैं, फिर भी खर के शत्रु, वनचारी राम सीता और भाई सहित मेरे मन में निवास करें; कोसलपति कमलनयन राम मेरे हृदय को अपना घर बनाएँ, और यह अभिमान भूलकर भी न जाए कि मैं सेवक हूँ और रघुपति मेरे स्वामी हैं। मुनि के वचनों से प्रसन्न होकर राम ने हर्षित होकर उन्हें हृदय से लगाया और कहा—'मुझे परम प्रसन्न जानो; जो वर माँगो, वही दूँगा।' मुनि बोले—'मैंने कभी वर नहीं माँगा, क्योंकि मुझे झूठ-सच का भेद नहीं समझ आता; जो आपको अच्छा लगे, वही मुझे दीजिए।' 'तो तुम्हें अविरल भक्ति, वैराग्य और विज्ञान हो, और तुम सब गुणों तथा ज्ञान के भंडार बनो।' 'जो वर आपने दिया वह मैंने पा लिया; अब वही दीजिए जो मुझे भाता है।'
अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम। मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम।।11।।
'भाई और जानकी सहित, हे धनुष-बाण धारण करने वाले प्रभु राम, आप निष्काम होकर सदा मेरे हृदयरूपी आकाश में चंद्रमा के समान निवास कीजिए।'
एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा।। बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ।। अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं।। देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसै द्वौ भाई।। पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा।। तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ।। नाथ कौसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा।। राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही।। सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए।। मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई।। सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी।। पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा।। जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा।।
'ऐसा ही हो' कहकर लक्ष्मी के निवास राम हर्षित होकर मुनि कुंभज (अगस्त्य) की ओर चले। सुतीक्ष्ण ने कहा—'इस आश्रम में आए बहुत दिन हुए, गुरु का दर्शन नहीं किया; अब आपके साथ गुरु के पास जाऊँगा, हे नाथ, यद्यपि इसमें आप पर मेरा कोई एहसान नहीं।' मुनि की सरल चतुराई देखकर दोनों भाई हँसते हुए उन्हें साथ ले चले, और मार्ग में अपनी अनुपम भक्ति कहते हुए देवराज राम अगस्त्य के आश्रम पहुँचे। सुतीक्ष्ण तुरंत गुरु के पास गए, दंडवत कर बोले—'हे नाथ, जगत के आधार, कोसलराज के कुमार आपसे मिलने आए हैं—भाई और वैदेही सहित राम, जिन्हें आप दिन-रात जपते हैं।' यह सुनते ही अगस्त्य उठ दौड़े; हरि को देखकर नेत्रों में जल भर आया। दोनों भाई मुनि के चरणकमलों में गिरे, और उन्होंने बड़े प्रेम से हृदय से लगाया, आदरपूर्वक कुशल पूछकर श्रेष्ठ आसन पर बैठाया। अनेक प्रकार से प्रभु की पूजा करके उन्हें लगा कि अपने समान भाग्यवान कोई नहीं, और वहाँ उपस्थित सब मुनि आनंद के कंद को देखकर हर्षित हुए।
मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर। सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर।।12।।
मुनियों के समूह के बीच सब ओर सम्मुख बैठे राम सबकी ओर देख रहे थे, और वे मुनि उनके शरद-चंद्र-से मुख को ऐसे निहार रहे थे मानो चकोरों का झुंड हो।
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही।। तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ।। अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही।। मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी।। तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी।। ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया।। जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहि न जानहिं आना।। ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला।। ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं।। यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता।। अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा।। जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता।। अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ।। संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई।। है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ।। दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू।। बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया।। चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई।।
तब रघुवीर ने मुनि से कहा—'हे प्रभु, आपसे कुछ भी छिपा नहीं; आप जानते हैं मैं किस कारण आया हूँ, इसलिए हे तात, समझाकर नहीं कहा। अब वह उपाय बताइए जिससे मैं मुनिद्रोही राक्षसों को मारूँ।' मुनि मुसकाकर बोले—'हे नाथ, मुझे क्या समझकर पूछते हैं? आपके भजन के प्रभाव से मैं आपकी कुछ महिमा जानता हूँ—आपकी माया विशाल गूलर के वृक्ष-सी है जिसके फल अनेक ब्रह्मांड हैं, और सब चर-अचर जीव उस फल के भीतर के कीड़ों-से हैं, जो भीतर बसते हैं और कुछ और नहीं जानते। उन फलों को खाने वाला कठोर और भयंकर है, और स्वयं काल भी आपके भय से सदा डरता है; आप सब लोकपालों के स्वामी हैं, फिर भी मुझसे मनुष्य की तरह पूछते हैं। हे कृपानिकेत, मैं यही वर माँगता हूँ—सीता और भाई सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए, और मुझे अविरल भक्ति, वैराग्य, सत्संग तथा चरणकमलों में अटूट प्रीति दीजिए। यद्यपि ब्रह्म अखंड, अनंत और अनुभवगम्य है, जिसे संत भजते हैं, वैसा ही आपका रूप मैं बखानता और जानता हूँ, और बार-बार सगुण ब्रह्म राम में प्रीति करता हूँ। आप सदा सेवकों को बड़ाई देते हैं, इसीलिए हे रघुराई, मुझसे पूछा। हे प्रभु, पंचवटी नामक एक अत्यंत मनोहर पवित्र स्थान है; दंडक वन को पावन कीजिए और मुनि का दिया कठोर शाप हरिए, वहाँ निवास कीजिए, हे रघुकुलराज, और सब मुनियों पर दया कीजिए।' मुनि की आज्ञा पाकर राम चल दिए और शीघ्र ही पंचवटी के निकट पहुँच गए।
गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।। गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ।।13।।
प्रभु ने गीधराज (जटायु) से भेंट की और अनेक प्रकार से प्रीति बढ़ाई; फिर गोदावरी के निकट पर्णकुटी छाकर निवास किया।
जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा।। गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाए।। खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गंजत छबि लहहीं।। सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा।। एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना।। सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई।। मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा।। कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया।।
जब से राम ने वहाँ निवास किया, मुनि सुखी हो गए और उनका भय जाता रहा; पर्वत, वन, नदियाँ और तालाब दिन-प्रतिदिन अधिक सुंदर होते गए, पक्षी और पशुओं के झुंड आनंदित रहते और भौंरे मधुर गुंजार करते। जिस वन में प्रकट रघुवीर विराजते थे, उसका वर्णन शेषनाग भी नहीं कर सकते। एक बार प्रभु सुख से बैठे थे, तब लक्ष्मण ने निष्कपट वचन कहे—'हे देव, मनुष्य, मुनि और सब चराचर के स्वामी, मैं अपने प्रभु का सेवक जानकर पूछता हूँ: वह तत्त्व समझाकर कहिए, हे देव, जिससे सब त्यागकर मैं आपके चरणों की रज की सेवा करूँ। ज्ञान, वैराग्य और माया कहिए, और वह भक्ति बताइए जिससे आप दया करते हैं।'
ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।। जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ।।14।।
'हे प्रभु, ईश्वर और जीव का भेद पूरी तरह समझाकर कहिए, जिससे आपके चरणों में प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम दूर हो जाएँ।'
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।। मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।। गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।। तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ।। एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।। एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।। ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही।। कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।
'थोड़े में ही सब समझाकर कहता हूँ; हे तात, मन-चित्त लगाकर सुनो। ''मैं'', ''मेरा'', ''तू'', ''तेरा''—यही माया है, जिसने सब जीवों को वश में कर रखा है; हे भाई, जहाँ तक मन और इंद्रियाँ पहुँचती हैं, उस सबको माया जानो। उसका भेद भी सुनो—वह दो प्रकार की है: विद्या और अविद्या। एक दुष्ट और अत्यंत दुखरूप है, जिसके वश जीव भवकूप में पड़ा है; दूसरी जगत को रचती है, गुणों के वश और प्रभु से प्रेरित होकर, अपने बल से नहीं। पर जहाँ ज्ञान का अभिमान लेशमात्र भी नहीं, और जो ब्रह्म को सबमें समान देखता है, हे तात, उसी को परम विरागी कहो, जिसने तीनों गुणों और सिद्धियों को तिनके के समान त्याग दिया है।'
माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव। बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव।।15।।
'जो न माया को, न ईश्वर को, न स्वयं को जानता है, वह जीव कहलाता है। जो बंधन और मोक्ष दोनों देता है, सबसे परे है और माया का प्रेरक है, वही परम ईश्वर है।'
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।। जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई।। सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना।। भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।। भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।। प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती।। एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा।। श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं।। संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा।। गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा।। मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा।। काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें।।
'धर्म से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है, और ज्ञान मोक्ष देता है, ऐसा वेद कहते हैं। पर हे भाई, जिससे मैं शीघ्र द्रवित होता हूँ, वह मेरी भक्ति है, जो भक्तों को सुख देती है; वह स्वतंत्र है और किसी और का सहारा नहीं चाहती, ज्ञान और विज्ञान उसके अधीन हैं। हे तात, भक्ति सुख का अनुपम मूल है, जो संतों के अनुकूल होने पर मिलती है। मैं उसके साधन बताता हूँ, यह सुगम मार्ग है जिससे प्राणी मुझे पाते हैं: पहले ब्राह्मणों के चरणों में गहरी प्रीति, प्रत्येक वेद-रीति से अपने-अपने कर्म में लगा रहे; इससे विषयों से वैराग्य होता है, फिर मेरे भजन में अनुराग उपजता है; श्रवण आदि नौ प्रकार की भक्ति दृढ़ होती है, मेरी लीला में मन की अत्यंत प्रीति; संतों के चरणकमलों में गहरा प्रेम, और मन-वचन-कर्म से भजन का दृढ़ नियम; गुरु, पिता, माता, बंधु, पति और देव—सबको मुझे ही जानकर दृढ़ सेवा; मेरे गुण गाते हुए शरीर पुलकित हो, वाणी गद्गद हो और नेत्रों से जल बहे। हे तात, जिसमें काम, मद और दंभ नहीं, उसमें मैं निरंतर बसता हूँ।'
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।। तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम।।16।।
'जो वचन, कर्म और मन से मेरी शरण लेते हैं और निष्काम भाव से भजन करते हैं—उनके हृदयकमल में मैं सदा विश्राम करता हूँ।'
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा।। एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती।। सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी।। पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।। भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।। होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी।। रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई।। तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी।। मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं।। ताते अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी।। सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता।। गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी।। सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा।। प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा।। सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी।। लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी।। पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई।। लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई।। तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई।। सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई।।
इस भक्तियोग को सुनकर लक्ष्मण ने परम सुख पाया और प्रभु के चरणों में सिर नवाया, और इस प्रकार वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति की चर्चा में कुछ दिन बीत गए। रावण की बहन शूर्पणखा, दुष्ट हृदय और नागिन-सी भयंकर, एक बार पंचवटी आई और दोनों कुमारों को देखकर काम से व्याकुल हो गई—क्योंकि मनोहर पुरुष को देखकर नारी चाहे वह भाई, पिता या पुत्र हो, अपने मन को रोक नहीं पाती, जैसे सूर्य को देखकर सूर्यकांतमणि पिघल जाती है। सुंदर रूप धरकर वह प्रभु के पास गई और बहुत मुसकाकर बोली—'तुम-सा पुरुष नहीं और मुझ-सी नारी नहीं; विधाता ने सोच-समझकर यह जोड़ी रची है। मैंने तीनों लोक खोज डाले पर अपने योग्य कोई पुरुष नहीं पाया, इसलिए अब तक कुँआरी रही, और तुम्हें देखकर मन कुछ माना।' सीता की ओर देखकर प्रभु ने कहा—'मेरा छोटा भाई कुँआरा है।' वह लक्ष्मण के पास गई; लक्ष्मण ने उसे शत्रु की बहन जानकर प्रभु की ओर देखकर कोमल वाणी में कहा—'सुंदरी, मैं तो उनका दास और पराधीन हूँ, इसलिए तुम्हें मुझसे सुख न होगा; प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुर के राजा हैं, जो कुछ करें उन्हें शोभा देता है। सुख चाहने वाला सेवक, मान चाहने वाला भिखारी, धन चाहने वाला व्यसनी, शुभगति चाहने वाला व्यभिचारी, यश चाहने वाला लोभी और चारों पुरुषार्थ चाहने वाला अभिमानी—ये लोग आकाश से दूध दुहना चाहते हैं।' वह लौटकर राम के पास आई, प्रभु ने फिर लक्ष्मण के पास भेजा; लक्ष्मण ने कहा—'तुम्हें वही वरेगा जो लज्जा को तिनके की तरह तोड़कर छोड़ दे।' तब खिसियाकर वह राम के पास गई और भयंकर रूप प्रकट कर दिया; सीता को भयभीत देखकर रघुराई ने संकेत से भाई को समझा दिया।
लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि। ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि।।17।।
लक्ष्मण ने बड़ी फुर्ती से उसके नाक और कान काट डाले, मानो उसके हाथ से रावण को चुनौती भेज दी हो।
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा।। खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता।। तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई।। धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा।। नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा।। सुपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी।। असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी।। गर्जहि तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं।। कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई।। धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा।। लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर।। रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी।। देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा।।
नाक-कान के बिना वह विकराल हो गई, मानो पर्वत से गेरू की धारा बह रही हो, और विलाप करती हुई खर-दूषण के पास गई—'भाइयों, धिक्कार है तुम्हारे पौरुष और बल को!' उन्होंने पूछा, और जब उसने सब समझाया तो राक्षसों ने सेना बनाई। राक्षसों के समूह पंख वाले काजल के पर्वतों-से दौड़े, अनेक वाहनों, अनेक रूपों और अनेक भयंकर अपार अस्त्रों से युक्त, नाक-कान रहित शूर्पणखा को आगे किए। असंख्य भयकारी अपशकुन हुए, पर मृत्यु के वश वह सारा झुंड उन्हें अनदेखा कर गया; वे गरजते, ललकारते और आकाश में उड़ते, और सेना देखकर योद्धा हर्षित होते, कोई कहता—'दोनों भाइयों को जीवित पकड़ो, मारकर स्त्री छीन लो!' जब धूल से सारा आकाश भर गया, राम ने भाई को बुलाकर कहा—'जानकी को लेकर पर्वत की गुफा में जाओ, क्योंकि भयंकर राक्षस सेना आ गई है; सावधान रहना।' प्रभु के वचन सुनकर लक्ष्मण धनुष-बाण हाथ में लिए सीता सहित चले, और शत्रुसेना को आते देख राम ने हँसकर अपना कठोर धनुष चढ़ा लिया।
कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों। मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों।। कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै।। चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै।।
कठोर धनुष चढ़ाकर सिर पर जटाजूट बाँधते राम कितने शोभित लगते हैं—मानो पन्ने के पर्वत पर करोड़ों बिजलियाँ लड़ रही हों, या दो सर्प लिपटे हों। कमर में तरकश कसकर, विशाल भुजाओं से धनुष पकड़कर और बाण सँवारकर प्रभु शत्रु को ऐसे देख रहे थे मानो सिंह हाथियों के मेघ-समूह को निहार रहा हो।
आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट। जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज।।18।।
वीर योद्धा वेग से बगमेल (झुंड में) दौड़ते हुए 'पकड़ो, पकड़ो' पुकारते आ पहुँचे—ठीक वैसे ही जैसे राक्षस अकेले बाल सूर्य (उदय होते सूर्य) को घेर लेते हैं।
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी।। सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन।। नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते।। हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई।। जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा।। देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई।। मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु।। दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसकाई।। हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खौजत फिरहीं।। रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं।। जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक।। जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू।। रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई।। दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ।।
प्रभु को देखकर राक्षसों की सेना ऐसी स्तब्ध रह गई कि वे बाण भी नहीं चला सके। खर-दूषण ने मंत्रियों को बुलाया, जिन्होंने कहा कि यह कोई राजकुमार, मनुष्यों में भूषण है; नाग, असुर, देव, मनुष्य और मुनि जितने हमने देखे, जीते और मारे, पर जीवन भर ऐसी सुंदरता कभी नहीं देखी। यद्यपि इसने हमारी बहन को कुरूप किया, फिर भी यह अनुपम पुरुष वध योग्य नहीं, इसलिए यह अपनी छिपाई हुई स्त्री तुरंत दे दे और दोनों भाई जीवित घर लौट जाएँ। दूतों ने यह संदेश राम से कहा, तो राम मुसकराकर बोले कि हम क्षत्रिय हैं जो वन में तुम जैसे दुष्ट पशुओं का शिकार करते हैं, बलवान शत्रु से नहीं डरते और कभी काल से भी लड़ते हैं; यदि बल न हो तो घर लौट जाओ, क्योंकि मैं युद्ध से विमुख किसी को नहीं मारता, और छल-कपट से लड़कर शत्रु पर दया करना परम कायरता है। दूतों ने यह सब जाकर कहा और खर-दूषण का हृदय क्रोध से अत्यंत जल उठा।
उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा। सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा।। प्रभु कीन्ह धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा। भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा।।
हृदय जलते हुए उन्होंने अपने विकट राक्षस योद्धाओं को दौड़कर पकड़ने का आदेश दिया, और वे बाण, धनुष, तोमर, शक्ति, शूल, कृपाण, परिघ और परशु लिए हुए दौड़ पड़े। प्रभु ने पहले धनुष की टंकार की, और वह कठोर, घोर, भयावह ध्वनि सुनकर राक्षस बहरे और व्याकुल हो गए, और उस समय उन्हें कुछ भी सुध न रही।
सावधान होइ धाए जानि सबल आराति। लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहु भाँति।।19(क)।। तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर। तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छाँड़े निज तीर।।19(ख)।।
सावधान होकर और शत्रु को बलवान जानकर राक्षस टूट पड़े और राम पर अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगे। पर रघुवीर ने उनके शस्त्रों को तिल के समान (टुकड़े-टुकड़े) काट डाला, और फिर धनुष को कान तक खींचकर अपने बाण छोड़े।
तब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल।। कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम।। अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर।। भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ।। तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि।। आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार।। रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि।। छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच।। उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन।। चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान।। भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड।। नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड।। खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल।। कटकटहिं ज़ंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं। बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं।। रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा। जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा।। अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं।। संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं।। मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे। अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे।। सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं। करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं।। प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका। दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका।। महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी। सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी।। सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर् यो। देखहि परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर् यो।।
तब भयानक बाण अनेक सर्पों की तरह फुफकारते हुए चले, और श्रीराम युद्ध में क्रुद्ध होकर तीखे बाण बरसाने लगे; उन्हें देखकर राक्षस वीर मुड़कर भागे। तीनों भाई क्रुद्ध हुए और रणभूमि से भागने वाले को अपने हाथों मारने की ठानकर मरने का निश्चय कर लौट पड़े और अनेक शस्त्रों से सामने से प्रहार करने लगे; शत्रुओं को अत्यंत क्रुद्ध जानकर प्रभु ने धनुष पर बाण चढ़ाकर असंख्य बाण छोड़े, जिनसे राक्षस कटने लगे और उनके हृदय, सिर, भुजाएँ, हाथ और पैर जहाँ-तहाँ पृथ्वी पर गिरने लगे, शरीर पर्वत के समान गिरते थे। योद्धा सौ-सौ टुकड़ों में कटकर भी माया से फिर उठ खड़े होते, बिना सिर के धड़ दौड़ते, और गीध, कौए, सियार, बेताल, भूत-प्रेत तथा योगिनियाँ इस भीषण संहार पर नाचते-किलकते थे। रघुवीर के प्रचंड बाण योद्धाओं के हृदय, भुजा और सिर काट डालते, फिर भी वे उठकर लड़ते और माया बढ़ाते, जिससे एक अकेले अवधपति के सामने चौदह हजार राक्षसों को देखकर देवता डरने लगे; देव-मुनियों को भयभीत देख मायापति प्रभु ने अद्भुत खेल किया कि हर राक्षस दूसरे को राम समझने लगा और सारी सेना आपस में लड़कर मर मिटी।
राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान। करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान।।20(क)।। हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान। अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान।।20(ख)।।
"राम, राम" कहते हुए राक्षस अपने शरीर त्यागकर निर्वाण पद पा गए, क्योंकि इसी उपाय से कृपानिधान प्रभु ने क्षण भर में सब शत्रुओं को मार डाला। देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे, आकाश में नगाड़े बजने लगे, और सब स्तुति करते हुए विविध विमानों में शोभायमान होकर चले गए।
जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते।। तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए। सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता।। पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक।। धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा।। बोलि बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी।। करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।। राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा।। बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़े किएँ अरु पाएँ।। संग ते जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा।। प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहि बेगि नीति अस सुनी।।
जब रघुनाथ ने युद्ध में शत्रुओं को जीत लिया, तब देव, मनुष्य और मुनि सबके भय मिट गए, और लक्ष्मण सीता को ले आए, जिन्हें प्रभु ने चरणों में गिरते हुए हर्ष से हृदय से लगा लिया; उनके श्याम, कोमल अंगों को निहारते सीता के नेत्र प्रेम से तृप्त नहीं होते थे। पंचवटी में बसकर श्रीरघुनायक देव-मुनियों को सुख देने वाले चरित्र करते थे, तभी खर-दूषण के नाश का धुआँ देखकर शूर्पणखा ने जाकर रावण को उकसाया और भारी क्रोध से डाँटा कि उसने देश और खजाने की सुध भुला दी, दिन-रात मदिरा पीकर सोता रहता है और सिर पर शत्रु की खबर नहीं। उसने नीति सुनाई: नीति के बिना राज्य, धर्म के बिना धन, और हरि को अर्पित किए बिना सत्कर्म व्यर्थ हैं; विवेक के बिना विद्या और पढ़ने, करने व पाने के श्रम का फल नष्ट होता है; संग से संन्यासी, कुमंत्र से राजा, मान से ज्ञान और मदिरा से लाज नष्ट होती है; तथा प्रणय बिना प्रीति और अभिमान से गुणी—ये सब शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, ऐसी नीति उसने सुनी है।
रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि। अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।21(क)।। सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ। तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ।।21(ख)।।
शूर्पणखा ने चेताया कि शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और साँप को कभी छोटा करके नहीं आँकना चाहिए। यह कहकर और नाना प्रकार से विलाप करके वह रोने लगी, और सभा के बीच व्याकुल होकर गिरती हुई बार-बार बोली: "हे रावण, तुम्हारे जीते-जी क्या मेरी ऐसी दशा होनी चाहिए?"
सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई।। कह लंकेस कहसि निज बाता। केंइँ तव नासा कान निपाता।। अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए।। समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी।। जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन।। देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना।। अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता।। सोभाधाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा।। रुप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी।। तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा।। खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा।। खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता।।
यह सुनकर सभासद घबराकर उठे, उसकी बाँह पकड़कर उठाया और समझाया, और रावण ने पूछा कि तेरी नाक-कान किसने काटे। उसने कहा कि अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र, पुरुषों में सिंह, वन में शिकार खेलने आए हैं, और उसे समझ में आ गया कि उनकी करनी पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर देगी; जिनकी भुजाओं के बल से मुनि अब निर्भय होकर वन में विचरते हैं, और जो बालक-से दिखते हुए भी परम धीर, अनेक गुणों वाले धनुर्धर हैं, अतुलित बल वाले दोनों भाई, दुष्टों का वध करके देव-मुनियों को सुख देने वाले। उसने कहा कि बड़े का नाम राम है, शोभा का धाम, और उनके साथ एक श्यामा स्त्री है जिसे विधाता ने ऐसा सँवारा है कि सौ करोड़ रति उस पर न्योछावर हैं; जब छोटे भाई ने उसकी नाक-कान काटे तो उनकी स्त्रियाँ हँसीं, और जब खर-दूषण ललकारते आए तो उन्होंने क्षण भर में सारी सेना मार डाली। खर, दूषण और त्रिशिरा के वध की बात सुनकर रावण के सारे अंग जल उठे।
सुपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति। गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति।।22।।
शूर्पणखा को समझाकर और अनेक प्रकार से बल दिखाकर बोलकर रावण अपने भवन में गया, अत्यंत चिंता में डूबा हुआ, और रात भर उसे नींद न आई।
सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं।। खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता।। सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।। तौ मै जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।। होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।। जौं नररुप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ।। चला अकेल जान चढि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ।। इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई।।
रावण ने विचार किया कि देव, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षियों में मेरे सेवकों के बराबर भी कोई नहीं, और खर-दूषण तो मेरे ही समान बलवान थे, फिर उन्हें भगवान के बिना कौन मार सकता है। यदि देवों को आनंद देने और पृथ्वी का भार हरने वाले भगवान ने अवतार लिया है, तो मैं जाकर हठपूर्वक उनसे बैर करूँगा और प्रभु के बाण से प्राण त्यागकर भवसागर तर जाऊँगा; इस तामसी देह में भजन तो होगा नहीं, मन-वचन-कर्म से यही मेरा दृढ़ निश्चय है। पर यदि कोई मनुष्य-रूप राजकुमार है, तो मैं युद्ध में दोनों को जीतकर उसकी स्त्री हर लूँगा; अकेला ही रथ पर चढ़कर वहाँ गया जहाँ समुद्र के तट पर मारीच रहता था। इधर पंचवटी में राम ने जैसी युक्ति रची, हे उमा, वह सुंदर कथा सुनो।
लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद। जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद।। 23।।
जब लक्ष्मण मूल, फल और कंद लेने वन में गए, तब कृपा और सुख के भंडार रघुनाथ जनकनंदिनी सीता से हँसकर बोले।
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।। तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा।। जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी।। निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रुप सुबिनीता।। लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना।। दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा।। नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई।। भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी।।
प्रभु ने कहा, "हे सुशील प्रिये, सुंदर व्रत वाली, सुनो: मैं कुछ ललित मनुष्य-लीला करने जा रहा हूँ। जब तक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तब तक तुम अग्नि में निवास करो।" ज्यों ही राम ने सब समझाकर कहा, सीता ने प्रभु के चरण हृदय में धरकर अग्नि में प्रवेश किया, और वहाँ अपना वैसा ही प्रतिबिंब छोड़ दिया—उसी शील, रूप और विनय वाला; इस मर्म को लक्ष्मण ने भी नहीं जाना कि भगवान ने कैसा चरित्र रचा। इधर रावण, अपने स्वार्थ में रत वह नीच, सिर नवाकर मारीच के पास गया, क्योंकि नीच का झुकना बहुत दुखदायी होता है, जैसे अंकुश, धनुष, साँप या बिल्ली का झुकना, और दुष्ट की प्रिय वाणी भयदायक होती है, हे भवानी, जैसे बेमौसम खिले फूल।
करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात। कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात।।24।।
मारीच ने पूजा करके तब आदरपूर्वक बात पूछी: हे तात, किस कारण तुम्हारा मन इतना व्यग्र है और अकेले क्यों आए हो?
दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें।। होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौ नृपनारी।। तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररुप चराचर ईसा।। तासों तात बयरु नहिं कीजे। मारें मरिअ जिआएँ जीजै।। मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा।। सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं।। भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई।। जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा।।
अभिमानी, अभागे रावण ने सारी कथा उसके सामने कही और बोला, "तुम छलिया हो, किसी प्रकार कपट-मृग बन जाओ जिससे मैं राजकुमार की स्त्री हर लाऊँ।" मारीच ने कहा, "सुनो दशशीश, वे मनुष्य-रूप में चराचर के ईश्वर हैं; उनसे बैर मत करो, क्योंकि उन्हें मारने पर मरना और छोड़ देने पर जीना है। जब मैं मुनि के यज्ञ में विघ्न डालने गया, तो रघुपति ने बिना फल के (कुंठित) बाण से ही मुझे मारा जिससे मैं क्षण भर में सौ योजन आ गिरा, इसलिए उनसे बैर करना अच्छा नहीं। मेरी दशा भृंग के सामने कीट जैसी हो गई है, मैं जहाँ-तहाँ दोनों भाइयों को ही देखता हूँ। हे तात, यदि वे मनुष्य हैं तो भी अत्यंत शूरवीर हैं, उनसे विरोध करना ठीक नहीं होगा।"
जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।। खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड।।25।।
मारीच ने कहा, "जिसने ताड़का और सुबाहु को मारा और शिव का धनुष तोड़ा, और जिसने अब खर, दूषण और त्रिशिरा को मार डाला, क्या ऐसा बलवान कोई मनुष्य हो सकता है?"
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।। गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा।। तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना।। सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी।। उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना।। उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें।। अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा।। मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही।।
मारीच ने रावण को कुल-कल्याण का विचार कर घर लौट जाने को कहा, पर यह सुनकर रावण ने उसे बहुत गालियाँ दीं और कहा, "मूर्ख, तू गुरु की तरह मुझे उपदेश देता है; बता, संसार में मेरे समान योद्धा कौन है?" तब मारीच ने हृदय में सोचा कि बलवान से विरोध करने में कल्याण नहीं, क्योंकि शस्त्रधारी, मर्म जानने वाला, स्वामी, मूर्ख धनी, वैद्य, बंदी, कवि और रसोइया—इन्हें कभी नहीं छेड़ना चाहिए; उसने दोनों ओर अपना मरण देखा और रघुनायक की शरण ली, यह सोचकर कि "उत्तर दूँगा तो अभागा मुझे मारेगा, तो क्यों न रघुपति के बाण से लगकर मरूँ?" ऐसा मन में निश्चय कर वह राम के चरणों में अखंड प्रेम लिए रावण के साथ चला, मन में अत्यंत हर्षित पर रावण को न जनाते हुए, यह सोचकर कि "आज मैं अपने परम स्नेही को देखूँगा।"
निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं। श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं।। निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी। निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी।।
मारीच ने सोचा, "अपने परम प्रीतम को देखकर मैं अपने नेत्र सफल कर सुख पाऊँगा; श्री और अनुज सहित उस कृपानिकेत प्रभु के चरणों में मन लगाऊँगा। जिसका क्रोध भी निर्वाण देता है और जिसकी भक्ति निश्चय ही उसे वश में कर लेती है, वही सुखसागर हरि अपने हाथ से बाण चढ़ाकर मुझे मारेंगे।"
मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान। फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन।।26।।
"धनुष-बाण धारण किए प्रभु मेरे पीछे दौड़ते हुए पीछा करेंगे, और मैं मुड़-मुड़कर प्रभु को देखूँगा; मुझ जैसा धन्य और कोई नहीं।"
तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ।। अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई।। सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा।। सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला।। सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही।। तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन।। मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा।। प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई।। सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी।। प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी।। निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा।। कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई।। प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी।। तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा।। लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा।। प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा।। अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।
जब रावण उस वन के निकट गया, तब मारीच कपट-मृग बन गया, वर्णन से परे अत्यंत विचित्र, मणियों से जड़ा सोने का शरीर लिए। सीता ने उस परम सुंदर मृग को देखा, जिसका अंग-अंग मनोहर था, और बोलीं, "सुनो कृपालु रघुवीर, इस मृग की खाल बहुत सुंदर है; हे सत्यसंध प्रभु, इसे मारकर इसका चर्म ले आओ।" तब सब कारण जानते हुए रघुपति देवकार्य सँवारने हर्षपूर्वक उठे; मृग देखकर कमर कस ली, धनुष पर सुंदर बाण चढ़ाया, और लक्ष्मण को समझाया कि वन में बहुत से राक्षस भाई फिरते हैं, इसलिए बुद्धि, विवेक और बल से समय का विचार कर सीता की रखवाली करना। प्रभु को देखकर मृग भागा और राम धनुष लिए दौड़े—वही प्रभु जिन्हें वेद "नेति" कहते हैं और शिव का ध्यान भी नहीं पाता, माया-मृग के पीछे दौड़े, जो कभी पास आता कभी दूर भागता, कभी प्रकट होता कभी छिप जाता, और बहुत छल करके प्रभु को दूर ले गया। तब राम ने ताककर कठोर बाण मारा और वह घोर पुकार करता हुआ धरती पर गिरा, पहले लक्ष्मण का नाम लिया फिर मन में राम को सुमिरा; प्राण त्यागते समय उसने अपना असली रूप प्रकट किया और प्रेम सहित राम को स्मरण किया, और अंतर्यामी सुजान प्रभु ने उसका भीतरी प्रेम पहचानकर उसे मुनियों के लिए भी दुर्लभ गति दी।
बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ। निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ।।27।।
देवता बहुत से फूल बरसाने लगे और प्रभु के गुण गाने लगे, क्योंकि दीनबंधु रघुनाथ ने उस राक्षस को भी अपना परम धाम (पद) दे दिया।
खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा।। आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता।। जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता।। भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई।। मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।। बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू।। सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा।। जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं।। सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भड़िहाई।। इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज बुधि बल लेसा।। नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई।। कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं।। तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा।। कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा।। जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।। सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।।
दुष्ट को मारकर रघुवीर तुरंत लौट पड़े, हाथ में धनुष और कमर में तरकश शोभा दे रहे थे। जब सीता ने (मारीच की) आर्त पुकार सुनी, तो अत्यंत भयभीत होकर लक्ष्मण से बोलीं, "शीघ्र जाओ, भाई अत्यंत संकट में हैं।" लक्ष्मण हँसकर बोले, "सुनो माता, जिनके भ्रूभंग के खेल मात्र से सृष्टि लय हो जाती है, क्या वे स्वप्न में भी कभी संकट में पड़ सकते हैं?" पर जब सीता ने मर्मभेदी वचन कहे, तो हरि की प्रेरणा से लक्ष्मण का मन डोल गया, और वन तथा दिशाओं के देवताओं को सब सौंपकर वे चले गए, तभी चंद्रमा के लिए राहु समान रावण ने स्थान सूना देखकर संन्यासी के वेश में निकट आकर देखा। जिसके डर से देव-असुर काँपते हैं, रात नींद न लेते और दिन अन्न न खाते, वही दशशीश कुत्ते की तरह इधर-उधर ताकता हुआ चोर की भाँति चला, क्योंकि हे गरुड़, कुमार्ग पर पैर धरने पर तेज, बुद्धि और बल का लेश भी नहीं रहता। अनेक सुंदर कथाएँ कहकर उसने राजनीति, भय और प्रीति दिखाई, पर सीता ने कहा, "सुनो संन्यासी गोसाईं, तुमने दुष्ट की भाँति वचन कहे हैं।" तब रावण ने अपना असली रूप दिखाया, और नाम सुनाते ही वह भयभीत हो गईं; दृढ़ धीरज धरकर बोलीं, "मेरे प्रभु आ गए, हे दुष्ट, खड़ा रह; जैसे तुच्छ खरगोश सिंहनी को चाहे, वैसे हे राक्षसराज, तू काल के वश हो गया है।" यह सुनकर दशशीश क्रुद्ध हुआ, फिर भी मन ही मन उनके चरणों में वंदना कर सुख माना।
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ। चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ।।28।।
तब क्रोध में भरकर रावण सीता को रथ में बैठाकर आकाश-मार्ग से चला; पर भय और आतुरता से रथ ठीक से चल नहीं पा रहा था।
हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।। आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक।। हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा।। बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही।। बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा।। सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी।। गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी।। अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई।। सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।। धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे।। रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही।। आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना।। की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।। जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा।। सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।। तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू।। राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा।। उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा।। धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा।। चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही।। तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।। काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी।। सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।। करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता।। गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी।। एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ।।
सीता ने विलाप किया, "हे जगत के एकमात्र वीर रघुराया, किस अपराध से आपने दया भुला दी? हे आर्तिहरण, शरणदाता, सुखदायक, हे रघुकुल रूपी कमल के सूर्य! हे लक्ष्मण, तुम्हारा कोई दोष नहीं; मैंने क्रोध किया इसी का यह फल पाया।" वैदेही नाना प्रकार से विलाप करती रहीं, प्रभु बड़े कृपालु पर प्रिय दूर थे, और वे बोलीं, "मेरी विपत्ति प्रभु को कौन सुनाए? गधा यज्ञ का पुरोडाश खाना चाहता है।" उसका भारी विलाप सुनकर सब चराचर जीव दुखी हो गए, और गीधराज जटायु ने रघुकुलतिलक की पत्नी को पहचानकर देखा कि नीच राक्षस उन्हें ऐसे ले जा रहा है जैसे म्लेच्छ के वश में कपिला गाय, और बोला, "पुत्री सीता, डरो मत; मैं इस राक्षस का नाश करूँगा," और पर्वत पर गिरते वज्र की तरह क्रोध से दौड़ा और ललकारा, "रे दुष्ट, खड़ा क्यों नहीं होता? निर्भय चला जा रहा है, मुझे नहीं जानता?" उसे काल समान आते देख रावण ने सोचा कि यह मैनाक है या गरुड़ जो पति सहित मेरा बल जानता है, पर पहचान लिया कि यह बूढ़ा जटायु है जो मेरे हाथों देह छोड़ेगा; गीध क्रोध से दौड़कर बोला, "रावण, मेरी सीख सुन: जानकी को छोड़कर कुशलपूर्वक घर जा, नहीं तो राम के क्रोध रूपी घोर अग्नि में तेरा सारा कुल पतंगों की तरह जल जाएगा।" जब दशानन ने उत्तर न दिया तो जटायु क्रोध से टूट पड़ा, केश पकड़कर उसे रथ से गिराकर धरती पर पटका, सीता को उतारकर फिर मुड़ा और चोंचों से मारकर रावण की देह चीर डाली जिससे वह क्षण भर मूर्छित हो गया; तब क्रुद्ध और लज्जित होकर राक्षस ने परम कराल कृपाण निकालकर गीध के पंख काट दिए, और वह राम को सुमिरते हुए अद्भुत करनी करके धरती पर गिरा। सीता को फिर उठाकर रावण भारी भय से आतुर होकर चला, और सीता आकाश में व्याध के वश में भयभीत मृगी की तरह विलाप करती गईं, और पर्वत पर बैठे वानरों को देखकर हरि का नाम लेकर वस्त्र डाल दिया; इस प्रकार वह उन्हें ले गया और अशोक वन में रख दिया।
हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ। तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ।।29(क)।। जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम। सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम।।29(ख)।।
दुष्ट रावण हारकर और सीता को अनेक प्रकार से बहुत भय और प्रीति दिखाकर, फिर यत्न से एक अशोक वृक्ष के नीचे रख दिया। जिस प्रकार श्रीराम कपट-मृग के पीछे दौड़ चले थे, उसी छवि को हृदय में रखकर सीता हरि-नाम जपती रहीं।
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी।। जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली।। निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं।। गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी।। अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ।। आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना।। हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता।। लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती।। हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।। खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।। कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी।। बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा।। श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं।। सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू।। किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं।। एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी।। पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी।। आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा।।
अपने अनुज को आते देख रघुपति ने विशेष बाहरी चिंता प्रकट की और कहा, "तुमने जानकी को अकेली छोड़ दिया और मेरे वचन को टालकर यहाँ आ गए, हे तात; वन में राक्षसों के झुंड फिरते हैं, और मेरा मन कहता है कि सीता आश्रम में नहीं हैं।" प्रभु के चरणकमल पकड़कर हाथ जोड़े लक्ष्मण ने कहा, "नाथ, इसमें मेरा कोई दोष नहीं।" अनुज सहित प्रभु गोदावरी तट के उस आश्रम में गए, और उसे जानकी से रहित देखकर वे साधारण दीन मनुष्य की तरह व्याकुल हो गए, "हा गुणों की खान जानकी सीता, रूप, शील और पवित्र व्रत वाली!" लक्ष्मण ने बहुत समझाया, पर वे लताओं और वृक्षों की पंक्तियों से पूछते चले, "हे पक्षियो और मृगो, हे भौंरों की पंक्ति, क्या तुमने मृगनयनी सीता को देखा? हे खंजन, तोते, कबूतर, मृग, मछली, भौंरों के समूह और चतुर कोयल; हे कुंद-कली, अनार, बिजली, कमल, शरद-चंद्र और सर्प-केश वाली नारी; हे वरुण के पाश, कामदेव के धनुष, हंस, हाथी और सिंह, तुम अपनी प्रशंसा सुनकर (सीता के अंगों से उपमा पाकर); हे श्रीफल, सोना और केला, तुम बिना किंचित शंका और संकोच के हर्षित हो, क्योंकि जानकी के बिना आज तुम सब मानो राज्य पाकर हर्षित हो। तुम्हारे बिना मैं यह पीड़ा कैसे सहूँ; हे प्रिये, तुम शीघ्र क्यों प्रकट नहीं होतीं?" इस प्रकार स्वामी महान विरही और अत्यंत कामी की भाँति खोजते-विलपते रहे, यद्यपि पूर्णकाम, सुख के धाम, अजन्मा और अविनाशी राम केवल मनुष्य-चरित्र कर रहे थे; तभी आगे उन्होंने गीधराज को गिरा देखा, जो राम के चिह्नयुक्त चरणों का सदा स्मरण करता था।
कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर।। निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर।।30।।
कृपासिंधु रघुवीर ने अपने करकमल से जटायु के सिर को स्पर्श किया, और शोभा के धाम राम का मुख देखते ही उसकी सारी पीड़ा जाती रही।
तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा।। नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही।। लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई।। दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना।। राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता।। जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा।। सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें।। जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई।। परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।। तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा।।
तब धीरज धरकर गीध ने वचन कहे: "सुनो राम, भव-भय के नाशक: नाथ, दशानन ने यह करनी की, उस दुष्ट ने जनकसुता को हर लिया और दक्षिण दिशा को गया, वे कुररी की भाँति अत्यंत विलाप कर रही थीं। हे प्रभु, आपके दर्शन के लिए मैंने प्राण रखे; अब हे कृपानिधान, मैं चलना चाहता हूँ।" राम ने कहा, "हे तात, देह रखो," पर जटायु मुसकाकर बोला, "जिसका नाम मरते समय मुख में आने से अधम भी मुक्त हो जाता है, ऐसा वेद गाते हैं, वही मेरे नेत्रों के सामने है; फिर हे नाथ, मैं किसके लिए देह रखूँ?" नेत्रों में जल भरकर रघुराई ने कहा, "तात, अपने कर्मों से तुमने यह गति पाई; जिनके मन में परहित बसता है, उनके लिए जगत में कुछ भी दुर्लभ नहीं। हे तात, देह त्यागकर मेरे धाम जाओ; तुम पूर्णकाम को मैं क्या दूँ?"
सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।। जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ।।31।।
राम ने कहा, "हे तात, सीता-हरण की बात पिता के पास जाकर मत कहना; यदि मैं सचमुच राम हूँ, तो कुल सहित रावण स्वयं आकर इसे कह देगा (क्योंकि मैं उसका नाश अवश्य करूँगा)।"
गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा।। स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी।।
गीध की देह त्यागकर और हरि का रूप धारण कर, बहुत से आभूषणों तथा अनुपम पीत वस्त्रों से युक्त, श्याम शरीर और विशाल चार भुजाओं वाला होकर, जटायु नेत्रों में जल भरकर प्रभु की स्तुति करने लगा।
जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही। दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही।। पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं। नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं।।1।। बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं। गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं।। जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं। नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं।।2। जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।। करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं।। सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई। मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई।।3।। जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा। पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा।। सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी। मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी।।4।।
जटायु ने स्तुति की: "अनुपम रूप वाले राम की जय, जो सचमुच निर्गुण, सगुण और गुणों के प्रेरक हैं, दशशीश की प्रचंड भुजाओं के खंडन करने वाले, प्रचंड बाणों से पृथ्वी को सुशोभित करने वाले, मेघ-समान श्याम शरीर, कमल-मुख और कमल-समान विशाल नेत्रों वाले; भव-भय से छुड़ाने वाले विशाल भुजाओं वाले कृपालु राम को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ। अप्रमेय बल वाले, अनादि, अजन्मा, अव्यक्त, एक, अगोचर, इंद्रियों से परे गोविंद, द्वंद्व हरने वाले, विज्ञानघन, धरणीधर, जिन्हें संत सदा राम-मंत्र रूप में जपते हैं और जो असंख्य भक्तों के मन को आनंद देते हैं; भक्तप्रिय, कामादि दुष्ट-दलों के नाशक निष्काम राम को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ। जिन्हें वेद निरंजन, व्यापक, विरज, अजन्मा ब्रह्म कहकर गाते हैं, और जिन्हें अनेक मुनि ध्यान, ज्ञान, वैराग्य और योग से पाते हैं, वही करुणा के कंद, शोभा के समूह रूप में प्रकट हुए हैं, जो चराचर जगत को मोहते हैं और जिनके अंग अनेक कामदेवों की छवि से शोभित हैं, वे मेरे हृदय-कमल में भ्रमर की भाँति बसें। जो स्वभाव से दुर्गम पर भक्तों के लिए सुगम, निर्मल, असम पर सम, और सदा शीतल हैं, जिन्हें योगी मन-इंद्रियों को सदा वश में रखकर यत्न से देखते हैं, वही रमा के निवास और त्रिभुवन के स्वामी राम, जो सदा अपने दासों के वश में हैं और जिनकी कीर्ति पावन है तथा जो जन्म-मृत्यु के चक्र का नाश करते हैं, मेरे हृदय में बसें।"
अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम। तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम।।32।।
अविरल, निरंतर भक्ति का वरदान माँगकर गीध हरि के धाम को चला गया, और राम ने अपने ही हाथों से उसकी अंत्येष्टि क्रिया यथोचित रूप से की।
कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला।। गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी।। सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी।। पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई।। संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन।। आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता।। दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।। सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।।
कोमल हृदय और दीनों पर अत्यंत दयालु रघुनाथ बिना किसी कारण कृपालु हैं; गीध जैसे अधम, मांसभक्षी पक्षी को उन्होंने वही गति दी जिसे योगी माँगते हैं। हे उमा, सुनो: वे लोग अभागे हैं जो हरि को छोड़कर विषयों में अनुरक्त हो जाते हैं। फिर दोनों भाई सीता को खोजते हुए विशाल वन को निहारते चले, जो घनी लताओं और वृक्षों से भरा था और जहाँ बहुत से पक्षी, मृग, हाथी और सिंह थे; मार्ग में उन्होंने कबंध को मारा, जिसने अपने शाप की सारी कथा कही, "दुर्वासा ने मुझे शाप दिया था, और प्रभु के चरण देखकर वह पाप मिट गया। सुनो गंधर्व, मैं तुमसे कहता हूँ: जो ब्राह्मण-कुल का द्रोही है, वह मुझे अच्छा नहीं लगता।"
मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव। मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव।।33।।
"जो मन, वचन और कर्म से कपट त्यागकर ब्राह्मणों की सेवा करता है, उसके वश में मुझ सहित ब्रह्मा, शिव तथा सभी देवता रहते हैं।"
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।। पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।। कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।। रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।। ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा।। सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।। सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।। स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।। प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।। सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।
"चाहे वह शाप दे, मारे या कठोर बोले, ब्राह्मण पूज्य है, ऐसा संत गाते हैं; शील और गुण से हीन होने पर भी ब्राह्मण पूजनीय है, पर गुणों का समूह और ज्ञान में प्रवीण होने पर भी शूद्र नहीं।" कबंध को उसका धर्म कहकर राम ने समझाया, और उसकी प्रभु-चरणों में प्रीति देखकर उनका मन प्रसन्न हुआ; रघुपति के चरणकमलों में सिर नवाकर वह अपनी पूर्व गति पाकर आकाश को चला गया। उसे गति देकर उदार राम ने शबरी के आश्रम में पग धरा। राम को अपने घर आया देख शबरी ने मुनि (मतंग) के वचन याद कर हृदय में हर्ष माना; कमल-नेत्र, विशाल भुजाएँ, सिर पर जटा-मुकुट और वक्ष पर वनमाला धारण किए, श्याम और गौर दोनों सुंदर भाई खड़े थे, और शबरी उनके चरणों में गिरकर लिपट गई। प्रेम में मग्न मुख से वचन न निकला, और बार-बार उसने चरणकमलों में सिर नवाया; आदरपूर्वक जल लेकर चरण धोए, फिर सुंदर आसन पर बैठाया।
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि। प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।34।।
शबरी अत्यंत रसीले कंद, मूल और फल लाकर राम को दिए, और प्रभु ने बार-बार बखान करते हुए प्रेम सहित उन्हें खाया।
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।। केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी।। अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।। कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।। जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।। भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।। नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।। प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
हाथ जोड़े सामने खड़ी शबरी की प्रीति प्रभु को देखकर अत्यंत बढ़ गई। "मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मैं नीच जाति की और अत्यंत जड़बुद्धि हूँ, अधम से भी अधम, और स्त्री तो सबसे नीच है; उनमें भी मैं मंदमति हूँ, हे पापहारी।" रघुपति ने कहा, "सुनो हे भामिनी: मैं केवल एक भक्ति के नाते को मानता हूँ। जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुंब, गुण और चतुराई, भक्ति से हीन मनुष्य ऐसा फीका लगता है जैसे बिना जल का बादल। मैं तुम्हें नवधा भक्ति कहता हूँ; सावधान होकर सुनो और मन में धारण करो। पहली भक्ति संतों का संग है, और दूसरी मेरी कथा-प्रसंग में प्रीति है।"
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान। चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।35।।
"गुरु के चरणकमलों की सेवा तीसरी भक्ति है, अभिमान से रहित; चौथी भक्ति कपट त्यागकर मेरे गुणों का गान करना है।"
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।। छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।। सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।। आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।। नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।। नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।। सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।। जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।। मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा।। जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी।। पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई।। सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा।। बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई।।
"दृढ़ विश्वास से मेरा मंत्र जपना पाँचवीं भक्ति है, जैसा वेद प्रकट करते हैं। छठी दम, शील, वैराग्य, बहुत से (सत्) कर्म और सज्जनों के धर्म में निरंतर लगे रहना है। सातवीं संसार को मुझसे भरा हुआ देखना और संतों को मुझसे भी अधिक मानना है। आठवीं जो मिले उसी में संतोष और स्वप्न में भी दूसरों के दोष न देखना है। नौवीं सबसे सरल और छलहीन रहना, हृदय में मुझ पर भरोसा रखना, न हर्ष न विषाद। इन नौ में से एक भी जिसके पास हो, वह स्त्री, पुरुष या कोई भी चराचर प्राणी मुझे अत्यंत प्रिय है; और हे भामिनी, तुझमें तो सब प्रकार की भक्ति दृढ़ है। योगियों के समूह को जो गति दुर्लभ है, वह आज तुझे सुलभ हो गई, क्योंकि मेरे दर्शन का फल परम अनुपम है: जीव अपने सहज स्वरूप को पा लेता है। हे भामिनी, क्या तुम जानकी की कुछ खबर जानती हो? कहो, हे सुंदर गति वाली। हे रघुराई, पंपा सरोवर को जाओ, वहाँ सुग्रीव से मित्रता होगी, और वही देव रघुवीर तुम्हें सब कह देंगे; जानते हुए भी तुम पूछते हो, हे मतिधीर।" बार-बार प्रभु के चरणों में सिर नवाकर शबरी ने प्रेम सहित सारी कथा सुनाई।
कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे। तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे।। नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू। बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू।।
सारी कथा कहकर और हरि के मुख को निहारकर शबरी ने उनके चरणकमल हृदय में धरे, और योगाग्नि से देह त्यागकर वह हरि के चरणों में लीन हो गई, जहाँ से फिर लौटना नहीं। मनुष्य अनेक कर्म और बहुत अधर्म करते हैं और शोक देने वाले अनेक मत मानते हैं, इन सबको त्याग दो; तुलसीदास कहते हैं, विश्वास करके राम के चरणों में अनुराग करो।
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि। महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि।।36।।
नीच जाति की और पापमय जन्म वाली ऐसी स्त्री को प्रभु ने मुक्त कर दिया; हे महामूर्ख मन, ऐसे प्रभु को भुलाकर तू फिर भी सुख चाहता है!
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ।। बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा।। लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा।। नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा।। हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं।। तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए।। संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं।। सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ।। राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं।। देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा।।
श्री राम उस वन को छोड़कर आगे चले; दोनों भाई मनुष्यों में सिंह के समान अतुलनीय बल वाले थे। प्रभु प्रेमी के समान वियोग में विषाद करते हुए अनेक बातें कहने लगे: 'लक्ष्मण, इस वन की शोभा देखो; इसे देखकर किसका मन विचलित न होगा? स्त्रियों सहित सब पक्षी और पशुओं के झुंड मानो मेरी निंदा कर रहे हैं। मुझे देखकर हिरण भाग जाते हैं, और हिरणियाँ उनसे कहती हैं—तुम्हें कोई भय नहीं, अपने बच्चों के साथ आनंद करो, ये तो सोने के मृग को खोजने आए हैं। हाथी अपनी हथिनियों को साथ लिए चलते हैं, मानो मुझे शिक्षा दे रहे हों। शास्त्र भली भाँति विचारने पर भी बार-बार देखना चाहिए, और भली प्रकार सेवा किया राजा भी अपने वश में नहीं समझना चाहिए; स्त्री को हृदय में रखने पर भी युवती, शास्त्र और राजा कभी वश में नहीं रहते। हे भाई, यह सुहावना बसंत देखो, जो प्रिया के बिना मुझे भय उत्पन्न कर रहा है।'
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल। सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल।।37(क)।। देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात। डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात।।37(ख)।।
'मुझे वियोग से व्याकुल, बलहीन और नितांत अकेला जानकर कामदेव ने वन, भौंरों और पक्षियों सहित मुझ पर पूरा आक्रमण कर दिया है।' पर जब उसके दूत ने राम को भाई के साथ देखकर यह समाचार सुनाया, तब मानो काम ने अपनी बढ़ती सेना को रोककर वहीं डेरा डाल दिया।
बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी।। कदलि ताल बर धुजा पताका। दैखि न मोह धीर मन जाका।। बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना।। कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए।। कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते।। मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी।। तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरुथा।। रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना।। मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई।। चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें।। लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका।। एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी।।
लताओं से लिपटे विशाल वृक्ष ऐसे लगते थे मानो अनेक चँदोवे तान दिए गए हों; केले और ताड़ के वृक्ष मानो सुंदर ध्वजा-पताका हों, पर जिसका मन धीर है वह इन्हें देखकर मोहित नहीं होता। भाँति-भाँति से फूले वृक्ष मानो अलग-अलग वेश धारण किए योद्धा हों, जो कहीं-कहीं छाए खड़े हों। कूजते कोयल मानो मतवाले हाथी, ढेक और महोख पक्षी मानो ऊँट और खच्चर; मोर, चकोर और तोते श्रेष्ठ घोड़े, कबूतर और हंस मानो अरबी घोड़े, तथा तीतर और बटेर मानो पैदल सेना—इस प्रकार कामदेव की सेना का वर्णन नहीं हो सकता। पर्वत की शिलाएँ रथ, झरने नगाड़े, चातक स्तुति गाने वाले भाट, गुंजार करते भौंरे भेरी और शहनाई, और तीन प्रकार की (शीतल, मंद, सुगंध) वायु दूत बनकर आई है। चतुरंगिणी सेना साथ लेकर काम सबको चुनौती देता हुआ विचरता है। 'लक्ष्मण, काम की सेना को देखकर भी जो धीर बने रहते हैं, संसार में उन्हीं की कीर्ति है। इसका एक परम बल है स्त्री; उससे जो बच जाए वही बड़ा योद्धा है।'
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ। मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।।38(क)।। लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि। क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।।38(ख)।।
'हे भाई, तीन अत्यंत प्रबल और दुष्ट हैं—काम, क्रोध और लोभ; ये विज्ञान के धाम मुनियों के मन को भी पल भर में क्षुब्ध कर देते हैं। लोभ का बल इच्छा और दंभ है, काम का बल केवल स्त्री है, और क्रोध का बल कठोर वचन है—यही श्रेष्ठ मुनि विचार कर कहते हैं।'
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी।। कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई।। क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया।। सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला।। उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।। पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा।। संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी।। जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा।।
(शिव कहते हैं:) हे उमा, श्री राम गुणों से परे, चराचर के स्वामी और सबके अंतर्यामी हैं। उन्होंने कामियों की दीनता दिखाई और धीरों के मन में वैराग्य दृढ़ किया; क्रोध, काम, लोभ, मद और माया सब राम की दया से छूट जाते हैं। वही मनुष्य इस इंद्रजाल में नहीं भूलता, जिस पर वह नट (भगवान) अनुकूल हो। हे उमा, मैं अपना अनुभव कहता हूँ—हरि का भजन ही सत्य है, यह सारा जगत स्वप्न है। फिर प्रभु पंपा नामक एक सुंदर और गहरे सरोवर के तट पर गए, जिसका जल संत के हृदय के समान निर्मल था और जिस पर चार मनोहर घाट बँधे थे; जहाँ-तहाँ अनेक पशु उसका जल पीते थे, मानो उदार के घर पर याचकों की भीड़ हो।
पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म। मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म।।39(क)।। सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं। जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं।।39(ख)।।
जल कमल के पत्तों से इतना ढका था कि उसका भेद सहज ही नहीं मिलता था—जैसे माया से आच्छन्न निर्गुण ब्रह्म दिखाई नहीं देता। अत्यंत गहरे जल में सब मछलियाँ एकरस सुखी रहती थीं, जैसे धर्मशील पुरुषों के दिन सुख से बीतते हैं।
बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा।। बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा।। चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई।। सुन्दर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई।। ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए।। चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला।। नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना।। सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ।। कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं।।
अनेक रंगों के कमल खिले और बहुत से भौंरे मधुर गुंजार करने लगे; जलमुर्गी और कलहंस बोलते थे मानो प्रभु को देखकर उनकी प्रशंसा कर रहे हों। चकवा, बगुला आदि पक्षियों के समूह देखते ही बनते थे, वर्णन नहीं किया जा सकता। सुंदर पक्षियों की मधुर वाणी ऐसी सुहावनी थी मानो जाते हुए पथिक को बुला रही हो। सरोवर के समीप मुनियों की कुटियाँ छाई थीं और चारों ओर सुंदर वन-वृक्ष शोभित थे—चंपा, मौलसिरी, कदंब, तमाल, पाटल, कटहल, पलाश और आम। नए पत्तों और फूलों से युक्त अनेक वृक्षों पर भौंरों की पंक्तियाँ गान करती थीं, और शीतल, मंद, सुगंधित मनोहर वायु निरंतर बहती रहती थी। कोयलें 'कुहू-कुहू' की ध्वनि करती थीं, जिसका रसीला स्वर सुनकर मुनियों का ध्यान भी टूट जाता था।
फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ। पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ।।40।।
फलों के भार से झुककर सब वृक्ष धरती के निकट आ रहे थे—जैसे परोपकारी पुरुष उत्तम संपत्ति पाकर विनम्र होकर झुक जाते हैं।
देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।। देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया।। तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए।। बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला।। बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी।। मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा।। ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई।। यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना।। गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी।। करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई।। स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे।।
अत्यंत सुंदर सरोवर देखकर श्री राम ने उसमें स्नान किया और परम सुख पाया; फिर एक श्रेष्ठ वृक्ष की सुंदर छाया देखकर रघुनाथ छोटे भाई सहित बैठ गए। वहाँ सब देवता और मुनि आए, स्तुति करके अपने-अपने धाम को गए। कृपालु प्रभु परम प्रसन्न होकर बैठे भाई से रसीली कथाएँ कह रहे थे। भगवान को वियोगी-सा देखकर नारद के मन में विशेष चिंता हुई: 'मेरे शाप को स्वीकार कर श्री राम अनेक दुखों का भार सह रहे हैं। ऐसे प्रभु के जाकर दर्शन कर लूँ, फिर ऐसा अवसर शायद न आए।' यह विचारकर नारद वीणा हाथ में लिए वहाँ गए जहाँ प्रभु सुखपूर्वक विराजमान थे। वे कोमल वाणी में प्रेमपूर्वक अनेक प्रकार से राम-चरित गाने लगे। नारद के दंडवत करते ही प्रभु ने उन्हें उठाकर बहुत देर हृदय से लगाए रखा; कुशल पूछकर पास बैठाया और लक्ष्मण ने आदरपूर्वक उनके चरण धोए।
नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि। नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।
अनेक प्रकार से विनती करके, और प्रभु को मन में प्रसन्न जानकर, तब नारद कमल के समान हाथ जोड़कर वचन बोले।
सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक।। देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी।। जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।। कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी।। जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें।। तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागउँ करउँ ढिठाई।। जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका।। राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।
'हे रघुनायक, सुनिए; आप स्वभाव से उदार, सुंदर, अभक्तों के लिए अगम पर भक्तों के लिए सुगम, और वर देने वाले हैं। हे स्वामी, मैं जो एक वर माँगता हूँ वह दीजिए, यद्यपि अंतर्यामी आप उसे जानते ही हैं।' (प्रभु ने कहा:) 'हे मुनि, तुम मेरा स्वभाव जानते हो; क्या मैं भक्त से कभी कुछ छिपाता हूँ? कौन-सी वस्तु मुझे ऐसी प्रिय है जो, हे श्रेष्ठ मुनि, तुम माँग न सको? मेरे लिए भक्त को कुछ भी अदेय नहीं है; ऐसा विश्वास भूलकर भी मत छोड़ना।' तब नारद हर्षित होकर बोले: 'ढिठाई करके मैं ऐसा वर माँगता हूँ। यद्यपि प्रभु के अनेक नाम हैं और श्रुति उन्हें एक से बढ़कर एक कहती है, फिर भी हे नाथ, 'राम' नाम सब नामों से अधिक हो और पाप रूपी पक्षियों के समूह का वध करने वाला हो।'
राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम। अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम।।42(क)।। एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ। तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ।।42(ख)।।
'आपकी भक्ति पूर्णिमा की रात्रि के समान है, और उसमें आपका राम-नाम चंद्रमा है; आपके अन्य नाम निर्मल तारों के समूह हैं, और वे सब भक्त के हृदय रूपी आकाश में सुशोभित हों।' कृपासिंधु रघुनाथ ने मुनि से कहा 'ऐसा ही हो'; तब नारद ने अत्यंत हर्षित मन से प्रभु के चरणों में सिर नवाया।
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी।। राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया।। तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा।। सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।। करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।। गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई।। प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता।। मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी।। जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।। यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं।।
रघुनाथ को अत्यंत प्रसन्न जानकर नारद फिर कोमल वाणी में बोले: 'हे राम, हे रघुराया, सुनिए—जब आपने अपनी माया प्रेरित की, तब आपने मुझे मोहित कर दिया; उस समय मैं विवाह करना चाहता था, तो हे प्रभु, आपने किस कारण नहीं करने दिया?' (राम ने कहा:) 'हे मुनि, मैं तुमसे उत्साहपूर्वक कहता हूँ—जो सब भरोसे छोड़कर मुझे भजते हैं, उनकी मैं सदा वैसे ही रक्षा करता हूँ जैसे माता बालक की करती है। जब छोटा बच्चा आग या साँप की ओर दौड़ता है, तब माता उसे रोककर बचा लेती है; पर पुत्र के बड़े हो जाने पर वह प्रेम तो करती है, पर पहले जैसी बात नहीं रखती। ज्ञानी मेरे लिए बड़े पुत्र के समान हैं और मानरहित सेवक बालक पुत्र के समान। भक्त को मेरा बल है और ज्ञानी को अपना बल; पर दोनों के लिए काम और क्रोध शत्रु हैं। यह विचारकर पंडित मुझे भजते हैं और ज्ञान पाकर भी भक्ति नहीं छोड़ते।'
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि। तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।
काम, क्रोध, लोभ आदि तथा मद, मोह की प्रबल धार हैं; उन सबमें अत्यंत भयंकर और दुखदायी माया रूपी स्त्री है।
सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।। जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।। काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका।। दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।। धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।। पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।। पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।। बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।
(राम आगे बोले:) 'हे मुनि, सुनो—पुराण, श्रुति और संत कहते हैं कि मोह रूपी वन के लिए स्त्री बसंत के समान है। जप, तप और नियम जल के आशय (सरोवर) हैं, और स्त्री ग्रीष्म बनकर उन सबको सुखा देती है। काम, क्रोध, मद और मत्सर मेंढक हैं, जिनके लिए स्त्री ही हर्ष देने वाली वर्षा है। दुर्वासनाएँ कुमुदों का समूह हैं, जिनके लिए स्त्री सदा सुख देने वाली शरद ऋतु है। सब धर्म कमलों का समूह हैं, जिन्हें स्त्री पाला बनकर जला देती है। ममता जवासे की अधिकता के समान है, जो स्त्री रूपी शिशिर ऋतु पाकर पल्लवित होती है। पाप रूपी उल्लुओं के समूह के लिए स्त्री सुखकारी घोर अँधेरी रात है। बुद्धि, बल, शील और सत्य—सब मछलियाँ हैं, और प्रवीण कहते हैं कि स्त्री उन्हें फँसाने वाली बंसी के समान है।'
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि। ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।।
स्त्री अवगुणों की जड़, पीड़ा देने वाली और सब दुखों की खान है; इसीलिए हे मुनि, यह मन में जानकर मैंने तुम्हें (विवाह से) रोका।
सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए।। कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती।। जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी।। पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद।। संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा।। सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ।। षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।। अमितबोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।। सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।।
रघुपति के सुंदर वचन सुनकर मुनि का शरीर पुलकित हो उठा और नेत्रों में आँसू भर आए। (नारद ने कहा:) 'कहिए, किस प्रभु की ऐसी रीति है—सेवक पर इतनी ममता और प्रीति? जो ऐसे प्रभु को भ्रम त्यागकर नहीं भजते, वे ज्ञान के कंगाल, मंदबुद्धि और अभागे मनुष्य हैं।' फिर मुनि नारद आदरपूर्वक बोले: 'हे विज्ञान में निपुण राम, सुनिए; हे नाथ, हे भव के भय को भंजने वाले रघुबीर, संतों के लक्षण कहिए।' (राम ने कहा:) 'हे मुनि, सुनो, मैं संतों के गुण कहता हूँ, जिनके कारण मैं उनके वश में रहता हूँ। वे छहों विकारों को जीते हुए, निष्पाप, निष्काम, अचल, अकिंचन, पवित्र और सुख के धाम हैं; अपार ज्ञान वाले, इच्छारहित, मित भोजी, सत्य के सारवान, कवि, विद्वान और योगी हैं; सावधान, दूसरों को मान देने वाले, मदरहित, धीर और धर्म की गति में परम प्रवीण हैं।'
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।। तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।।45।।
वे गुणों के धाम, संसार के दुखों से रहित और सब संदेह से मुक्त हैं; और मेरे चरण-कमलों को छोड़कर न उन्हें अपना शरीर प्रिय है, न घर।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
रामचरितमानस का अरण्य काण्ड किस विषय में है?
वन में राम, सीता और लक्ष्मण ऋषियों से मिलते और राक्षसों का वध करते हैं। रावण की बहन शूर्पणखा का, प्रणय-प्रस्ताव अस्वीकार होने पर, अंग-भंग होता है; प्रतिशोध में रावण स्वर्ण-मृग के छल से राम को दूर ले जाकर सीता का हरण कर लंका ले जाता है। शोकाकुल राम और लक्ष्मण उन्हें खोजने निकलते हैं।
रामचरितमानस क्या है?
रामचरितमानस संत-कवि गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी) द्वारा अवधी में रचित रामायण है, जो उत्तर भारत में सर्वाधिक प्रिय और पठित ग्रंथों में से एक है। यह सात काण्डों में विभाजित है: बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुंदर, लंका और उत्तर।
अपने नाम से राम/सुंदरकांड पाठ अर्पित करें
रक्षा और शांति हेतु अपने नाम-गोत्र में रामचरितमानस या सुंदरकांड पाठ करवाएँ। सेवा बुक करें, या सनातन साहित्य में आगे पढ़ें।







