किष्किन्धा काण्ड के बारे में
राम वानरराज सुग्रीव से मित्रता करते हैं, उनके भाई बालि का वध कर उन्हें राज्य लौटाते हैं, और सुग्रीव सीता की खोज में चारों दिशाओं में दल भेजते हैं। यहीं हनुमान प्रमुख रूप से सामने आते हैं, जिन्हें दक्षिण की खोज का नेतृत्व सौंपा जाता है।
पाठ कैसे करें
किष्किन्धा काण्ड का पाठ उसकी मूल अवधी में (नीचे देवनागरी में) किया जाता है। धीरे-धीरे, पद-दर-पद पढ़ें; विशेषकर सुंदरकांड का पाठ साहस और रक्षा हेतु किया जाता है।
मूल पाठ
श्लोक और अर्थ
कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ। मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौं हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः।।1।। ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा। संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम्।।2।।
दोनों रघुवंशी भाई श्री राम और लक्ष्मण कुंद के फूल और नीलकमल के समान सुंदर, अत्यंत बलवान, ज्ञान के धाम, शोभा से युक्त, श्रेष्ठ धनुर्धारी, वेदों से वंदित तथा गौओं और ब्राह्मणों के प्रिय हैं। माया से मनुष्य रूप धारण किए हुए, सद्धर्म रूपी कवच पहने, हितकारी, सीता की खोज में लगे हुए और भक्ति देने वाले वे दोनों मार्ग पर चलते हुए हमारी रक्षा करें। वे धन्य और पुण्यवान हैं जो श्री राम-नाम रूपी अमृत को निरंतर पीते हैं, जो ब्रह्म रूपी समुद्र से उत्पन्न हुआ, कलियुग के पापों का नाश करने वाला, अविनाशी, श्री शिवजी के चंद्रमा समान मुख पर सदा सुशोभित, संसार रूपी रोग की औषधि, सुख देने वाला और श्री जानकी का जीवन है।
मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न।। जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय। तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस।।
काशी को मुक्ति की जन्मभूमि, ज्ञान की खान और पापों का नाश करने वाली जानकर, जहाँ शिव और भवानी निवास करते हैं, ऐसी काशी की सेवा क्यों न की जाए? हे मंद मन, जिन्होंने सब देवताओं के जलते समय भयंकर विष पी लिया, ऐसे शंकर को तू क्यों नहीं भजता? शंकर के समान कृपालु और कौन है?
आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक परवत निअराया।। तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा।। अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना।। धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई।। पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला।। बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ।। को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा।। कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी।। मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता।। की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ।।
श्री राम आगे चले और ऋष्यमूक पर्वत के निकट पहुँचे, जहाँ मंत्रियों सहित सुग्रीव रहते थे। अतुलनीय बल वाले दोनों को आते देख अत्यंत भयभीत होकर सुग्रीव ने कहा, 'हे हनुमान, सुनो, बल और रूप के भंडार दो पुरुष आ रहे हैं। तुम ब्रह्मचारी का रूप धरकर जाकर देखो और जो जानो उसका संकेत से मुझे मन में समझा देना। यदि बालि ने बुरे मन से भेजे हों तो मैं तुरंत भाग जाऊँगा और यह पर्वत छोड़ दूँगा।' ब्राह्मण का रूप धरकर हनुमान वहाँ गए और सिर नवाकर पूछने लगे, 'तुम दोनों कौन हो, जिनके शरीर साँवले और गोरे हैं, जो वीरों की तरह क्षत्रिय रूप में वन में फिर रहे हो? कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलते हुए किस कारण वन में विचरते हो, हे स्वामी? तुम्हारे कोमल, मनोहर, सुंदर अंग वन की कठिन धूप और वायु सह रहे हैं। क्या तुम तीन प्रमुख देवताओं में से कोई हो? या तुम दोनों नर और नारायण हो?'
जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार। की तुम्ह अकिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।।1।।
'क्या तुम जगत के कारण, तारने वाले, संसार और पृथ्वी के भार को नष्ट करने वाले हो? या तुम समस्त लोकों के स्वामी हो जिसने मनुष्य का अवतार लिया है?'
कोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए।। नाम राम लछिमन दौउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई।। इहाँ हरि निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही।। आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई।। प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा नहिं बरना।। पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना।। पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही।। मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं।। तव माया बस फिरउँ भुलाना। ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना।।
श्री राम ने उत्तर दिया, 'हम कोसलराज दशरथ के पुत्र हैं। पिता के वचन मानकर वन में आए हैं। हमारे नाम राम और लक्ष्मण हैं, दो भाई, और साथ में एक सुकुमारी सुंदर स्त्री थी। यहाँ एक राक्षस वैदेही (सीता) को हर ले गया; हे ब्राह्मण, हम उसी को खोजते फिरते हैं। हमने अपनी कथा कह दी; अब हे ब्राह्मण, अपनी कथा हमें समझाकर कहो।' प्रभु को पहचानकर हनुमान चरणों को पकड़कर गिर पड़े — हे उमा, वह सुख वर्णन नहीं किया जा सकता। उनका शरीर पुलकित हो उठा, मुख से वचन न निकला, वे उस सुंदर रूप की रचना को देखते ही रह गए। फिर धीरज धरकर उन्होंने स्तुति की, अपने स्वामी को पहचानकर हृदय में हर्षित हुए। 'हे स्वामी, मैंने सेवक के नाते नीति से पूछा, यह उचित था; पर आप मनुष्य की तरह क्यों पूछते हैं? आपकी माया के वश में भूला हुआ फिरता हूँ, इसी से मैंने आपको नहीं पहचाना, हे प्रभु।'
एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान। पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।2।।
'मैं एक तो मंद हूँ, मोह के वश हूँ, कुटिल हृदय और अज्ञानी हूँ; और फिर हे प्रभु, हे दीनबंधु भगवान, आपने मुझे भुला दिया (अपने को छिपा लिया)।'
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।। नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा।। ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई।। सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।। अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई।। तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा।। सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।। समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ।।
'यद्यपि हे स्वामी, मुझमें बहुत अवगुण हैं, तौभी सेवक को स्वामी से कभी न भूलना चाहिए। हे नाथ, जीव आपकी माया से मोहित है, और वह आपकी ही कृपा से उबरता है। इसके सिवा हे रघुवीर, मैं आपकी दुहाई देकर कहता हूँ कि मैं भजन का कोई उपाय नहीं जानता। सेवक स्वामी के, पुत्र पिता के, स्त्री पति के भरोसे और स्वामी के पालने पर निश्चिंत रहते हैं।' यह कहकर वे व्याकुल होकर चरणों में गिर पड़े और अपना असली रूप प्रकट कर दिया, हृदय में प्रेम छा गया। तब रघुनाथ ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया और अपने नेत्रों के जल (आँसुओं) से सींचकर शीतल किया। 'हे कपि, सुनो, मन में तनिक भी कम मत मानना; तुम मुझे प्रिय हो, लक्ष्मण से दुगने प्रिय। सब मुझे समदर्शी कहते हैं, पर अनन्य भाव से भजने वाला सेवक मुझे विशेष प्रिय है।'
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।।3।।
'हे हनुमान, वही अनन्य भक्त है जिसकी यह बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और चराचर रूप स्वामी भगवान हैं।'
देखि पवन सुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।। नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई।। तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे।। सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि।। एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई।। जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा।। सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भैंटेउ अनुज सहित रघुनाथा।। कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती।।
प्रभु को अनुकूल देखकर हनुमान हृदय में हर्षित हुए और उनकी सारी पीड़ा मिट गई। 'हे नाथ, पर्वत पर वानरराज सुग्रीव रहते हैं; वे आपके दास हैं। हे नाथ, उनसे मित्रता कीजिए; दीन जानकर उन्हें निर्भय कीजिए। वे सीता की खोज कराएँगे और जहाँ-तहाँ करोड़ों वानर भेजेंगे।' इस प्रकार सारी बात समझाकर हनुमान ने दोनों को पीठ पर चढ़ा लिया। जब सुग्रीव ने राम को देखा, तो अपने जन्म को अत्यंत धन्य माना। उन्होंने आदर से चरणों में सिर नवाकर भेंट की और छोटे भाई सहित रघुनाथ से गले मिले। पर वानर सुग्रीव मन में इस प्रकार विचार करने लगे, 'क्या ये मुझसे सचमुच प्रेम रखेंगे?'
तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।। पावक साखी देइ करि जोरी प्रीती दृढ़ाइ।।4।।
तब हनुमान ने दोनों ओर की सारी कथा सुनाकर, अग्नि को साक्षी बनाकर उनके बीच मित्रता जोड़ी और उस प्रीति को दृढ़ कर दिया।
कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा।। कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी।। मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा।। गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता।। राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी।। मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा।। कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा।। सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई।।
उन्होंने बीच में कुछ भी न छिपाकर मित्रता की; लक्ष्मण ने राम की सारी कथा कही। सुग्रीव ने आँखों में जल भरकर कहा, 'हे नाथ, मिथिलेशकुमारी (सीता) आपको अवश्य मिलेंगी। एक बार मंत्रियों सहित मैं यहाँ बैठकर विचार कर रहा था। मैंने आकाश-मार्ग से एक स्त्री को जाते देखा; परवश पड़ी वह बहुत विलाप कर रही थी। वह 'राम, राम, हा राम' पुकार रही थी। हमें देखकर उसने वस्त्र (एक गठरी) डाल दी।' राम ने माँगा और सुग्रीव ने तुरंत दे दिया; राम ने उस वस्त्र को हृदय से लगाकर बहुत शोक किया। सुग्रीव ने कहा, 'हे रघुवीर, सुनिए, शोक त्यागिए और मन में धीरज धारण कीजिए। मैं सब प्रकार से सेवा करूँगा जिससे जानकी को खोजकर लाया जाए।'
सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव। कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव ।।5।।
मित्र के वचन सुनकर कृपा के सागर और बल की सीमा (राम) हर्षित हुए और बोले, 'हे सुग्रीव, किस कारण से तुम वन में रहते हो, मुझे बताओ?'
नात बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई।। मय सुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ।। अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहै न पारा।। धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा।। गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई।। परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा।। मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी।। बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई।। मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआई।। बालि ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा।। रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी।। ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला।। इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं।। सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला।।
'हे नाथ, बालि और मैं दो भाई हैं; हममें ऐसी प्रीति थी जो वर्णन नहीं की जा सकती। मय का पुत्र मायावी नाम का एक राक्षस हमारे नगर में आया। आधी रात को उसने नगर-द्वार पर ललकारा; बालि शत्रु का बल (ललकार) सह न सके। बालि दौड़े, और उन्हें देख वह राक्षस भागा। तब मैं भी भाई के साथ गया। वह एक बड़े पर्वत की गुफा में घुस गया, और बालि ने मुझे समझाकर कहा, 'मेरी एक पखवारे तक प्रतीक्षा करना; यदि तब तक न आऊँ तो मुझे मारा गया जानना।' हे खरारि, मैं वहाँ महीने भर रहा, और वहाँ से रक्त की भारी धारा निकली। यह समझकर कि बालि मारे गए और आकर मुझे मार डालेंगे, मैंने गुफा पर शिला रखकर वहाँ से भाग निकला। मंत्रियों ने नगर को बिना स्वामी देखकर मुझे बलपूर्वक राज्य दे दिया। बालि राक्षस को मारकर घर आए और मुझे देखकर उनके मन में भेद बढ़ गया। उन्होंने मुझे शत्रु की तरह बहुत मारा और मेरा सब कुछ तथा स्त्री छीन ली। उनके भय से, हे कृपालु रघुवीर, मैं व्याकुल होकर सब लोकों में फिरा। यहाँ शाप के कारण वे नहीं आते, तौभी मैं मन में भयभीत रहता हूँ।' सेवक का दुख सुनकर दीनदयालु प्रभु की दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठीं।
सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान। ब्रम्ह रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान।।6।।
'हे सुग्रीव, सुनो, मैं बालि को एक ही बाण से मार डालूँगा। यदि ब्रह्मा और रुद्र (शिव) भी उसे शरण देने आएँ, तौभी उसके प्राण नहीं बचेंगे।'
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।। निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना।। जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।। कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा।। देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।। बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।। आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई।। जा कर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।। सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी।। सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें।। कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा।। दुंदुभी अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए।। देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती।। बार बार नावइ पद सीसा। प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा।। उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला।। सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई।। ए सब रामभगति के बाधक। कहहिं संत तब पद अवराधक।। सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।। बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा।। सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई।। अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती। सब तजि भजनु करौं दिन राती।। सुनि बिराग संजुत कपि बानी। बोले बिहँसि रामु धनुपानी।। जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई।। नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत।। लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा।। तब रघुपति सुग्रीव पठावा। गर्जेसि जाइ निकट बल पावा।। सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा।। सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा।। कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहिं संग्रामा।।
'जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होते, उन्हें देखना भी भारी पाप है। सच्चा मित्र अपने पर्वत समान दुख को धूल के समान छोटा मानता है और मित्र के धूल समान दुख को मेरु के समान बड़ा। जिनमें ऐसी स्वाभाविक बुद्धि नहीं आई, वे मूर्ख हठ करके मित्रता क्यों करते हैं? अच्छा मित्र कुमार्ग से रोककर सुमार्ग पर चलाता है, गुण प्रकट करता और अवगुण छिपाता है; देने-लेने में मन में शंका नहीं रखता, और अपने बल के अनुसार सदा हित करता है। विपत्ति के समय उसका सौ गुना स्नेह होता है — वेद कहते हैं कि संत मित्र के यही लक्षण हैं। पर जो सामने बनावटी मीठे वचन कहे और पीछे मन में बुराई और कुटिलता रखे, जिसका चित्त साँप की चाल के समान टेढ़ा हो, हे भाई, ऐसे कुमित्र का त्याग ही भला है। दुष्ट सेवक, कंजूस राजा, बुरी स्त्री और कपटी मित्र — ये चारों शूल के समान दुखदायी हैं। हे मित्र, चिंता त्यागो; मेरे बल से मैं तुम्हारा कार्य सब प्रकार से पूरा करूँगा।' सुग्रीव ने कहा, 'हे रघुवीर, सुनिए, बालि बड़ा बलवान और रण में अत्यंत धीर है।' उसने दुंदुभि राक्षस की हड्डियाँ और ताड़ के वृक्ष दिखाए; और रघुनाथ ने बिना परिश्रम उन्हें ढहा दिया। अपार बल देख सुग्रीव की प्रीति बढ़ी और उसे विश्वास हो गया कि राम बालि का वध करेंगे। वह बार-बार चरणों में सिर नवाने लगे, और प्रभु को पहचानकर वानरराज मन में हर्षित हुए। उन्हें ज्ञान उपजा और वे बोले, 'हे नाथ, आपकी कृपा से मेरा मन स्थिर हो गया। सुख, संपत्ति, परिवार और बड़ाई त्यागकर मैं सेवा करूँगा। संत कहते हैं कि ये सब राम-भक्ति में बाधक हैं। जगत में शत्रु-मित्र, सुख-दुख सब माया के रचे हैं, परमार्थ (सत्य) नहीं। बालि मेरा परम हितकारी है, जिसकी कृपा से हे शोक-नाशक राम, आप मुझे मिले। जिससे स्वप्न में लड़ाई होती है, जागने पर समझने से मन सकुचाता है। अब हे प्रभु, ऐसी कृपा कीजिए कि सब त्यागकर मैं दिन-रात भजन करूँ।' कपि की वैराग्य भरी वाणी सुनकर धनुष हाथ में लिए राम हँसकर बोले, 'जो कुछ तुमने कहा वह सब सत्य है; हे मित्र, मेरे वचन झूठे नहीं होते। जैसे मदारी बंदर को नचाता है, वैसे ही माया सबको नचाती है — हे गरुड़, वेद ऐसा गाते हैं।' फिर रघुनाथ सुग्रीव को साथ लेकर धनुष-बाण हाथ में लिए चले। तब रघुपति ने सुग्रीव को आगे भेजा; बल पाकर उसने पास जाकर गर्जना की। यह सुनकर बालि क्रोध से भरा दौड़ा। उसकी स्त्री (तारा) ने चरण पकड़कर समझाया, 'हे पति, सुनो, सुग्रीव जिनसे मिले हैं वे दोनों भाई तेज और बल की सीमा हैं। वे कोसलराज के पुत्र लक्ष्मण और राम हैं, जो संग्राम में काल को भी जीत सकते हैं।'
कह बालि सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ। जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ।।7।।
बालि ने कहा, 'हे भीरु प्रिये, सुनो, रघुनाथ समदर्शी हैं। यदि कदाचित वे मुझे मार भी दें, तो भी मैं सनाथ (मुक्त) हो जाऊँगा।'
अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी।। भिरे उभौ बाली अति तर्जा । मुठिका मारि महाधुनि गर्जा।। तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा।। मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला।। एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ।। कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा।। मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला।। पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई।।
यह कहकर अत्यंत अभिमानी बालि चला, सुग्रीव को तिनके के समान तुच्छ जानकर। दोनों भिड़ गए; बालि ने खूब ललकारा, मुक्का मारा और महाध्वनि से गरजा। तब सुग्रीव व्याकुल होकर भागा, क्योंकि मुक्के का प्रहार वज्र के समान लगा था। उसने सोचा, 'जो मैंने कृपालु रघुवीर से कहा था वही हुआ — यह मेरा भाई नहीं, यह तो मेरे लिए काल है। तुम दोनों भाई एक ही रूप के हो; उसी भ्रम से मैंने उसे नहीं मारा।' राम ने हाथ से सुग्रीव के शरीर का स्पर्श किया; उसका शरीर वज्र के समान हो गया और सारी पीड़ा जाती रही। उन्होंने उसके गले में फूलों की माला डाली और विशाल बल देकर फिर भेजा। फिर नाना प्रकार से लड़ाई हुई, और रघुनाथ वृक्ष की ओट से देखते रहे।
बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि। मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि।।8।।
सुग्रीव ने बहुत छल और बल किया, पर हृदय में हार मानकर भयभीत हो गया। तब राम ने धनुष खींचकर हृदय पर निशाना साधकर बालि को मारा।
परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें।। स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ।। पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा।। हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा।। धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई। मारेहु मोहि ब्याध की नाई।। मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कबन नाथ मोहि मारा।। अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।। इन्हहि कुद्दष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।। मुढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना।। मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी।।
बाण लगते ही बालि व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ा; फिर उठकर बैठा और प्रभु को अपने सामने देखा — साँवला शरीर, सिर पर जटा बनाए, लाल नेत्र, धनुष पर बाण चढ़ाए। बार-बार देखकर उसने राम के चरणों में मन लगाया, और प्रभु को पहचानकर अपने जन्म को सफल माना। हृदय में प्रेम पर मुख में कठोर वचन लिए, राम की ओर देखकर वह बोला, 'हे प्रभु, आपने धर्म के लिए अवतार लिया, फिर भी आपने मुझे व्याध की तरह मारा। मैं शत्रु था और सुग्रीव आपको प्यारा — किस अवगुण के कारण हे नाथ आपने मुझे मारा?' राम ने कहा, 'छोटे भाई की स्त्री, बहन, पुत्र की स्त्री और कन्या — हे मूर्ख, सुन, ये चारों अपनी कन्या के समान हैं। जो इन्हें कुदृष्टि से देखता है, उसे मारने में कोई पाप नहीं। मूर्ख, तुझे अत्यंत अभिमान था, स्त्री की सीख पर तूने कान न दिया। सुग्रीव को मेरी भुजा के बल का आश्रित जानकर भी, हे अधम अभिमानी, तूने उसे मारना चाहा।'
सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि। प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि।।9।।
'हे राम, सुनिए, स्वामी के सामने मेरी कोई चतुराई नहीं चलती। हे प्रभु, अब भी मैं पापी हूँ; पर अंतकाल में मेरी गति (आश्रय) तो आप ही हैं।'
सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी।। अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना।। जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं।। जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अविनासी।। मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा।।
राम की अत्यंत कोमल वाणी सुनकर उन्होंने अपने हाथ से बालि के सिर को स्पर्श किया और कहा, 'मैं तेरे शरीर को अचल (अमर) कर दूँ, तू प्राण रख ले।' बालि ने कहा, 'हे कृपानिधान, सुनिए, जन्म-जन्म मुनि यत्न करते हैं, फिर भी अंत में उनके मुख से राम-नाम नहीं आता। जिनके नाम के बल से शंकर काशी में सबको समान रूप से अविनाशी गति (मुक्ति) देते हैं, वही प्रभु मेरे नेत्रों के सामने आ गए। हे प्रभु, क्या आप फिर ऐसी (मूर्खतापूर्ण) बात बनाएँगे कि मुझे संसार में लौटा दें?'
सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं। जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं।। मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही। अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही।।1।। अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ। जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ।। यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ। गहि बाहँ सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिऐ।।2।।
'वही प्रभु, जिनके गुणों को वेद सदा 'नेति-नेति' कहकर गाते हैं, जिन्हें मुनि प्राण और मन को जीतकर तथा इंद्रियों को नीरस करके ध्यान में कभी-कभी ही पाते हैं — मुझे अत्यंत अभिमान के वश जानकर वे प्रभु कहते हैं कि शरीर रख ले। ऐसा कौन मूर्ख होगा जो हठपूर्वक कल्पवृक्ष को काटकर बबूल की बाड़ लगाए? अब हे नाथ, करुणा करके मुझ पर दृष्टि कीजिए और जो वर मैं माँगता हूँ वह दीजिए: कर्मवश जिस भी योनि में जन्म लूँ, वहाँ राम के चरणों में मेरा अनुराग बना रहे। मेरे समान विनय और बल वाला यह पुत्र अंगद — हे कल्याणकारी प्रभु, इसे स्वीकार कीजिए; हे देव और मनुष्यों के स्वामी, बाँह पकड़कर इस अंगद को अपना दास बना लीजिए।'
राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग। सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग।।10।।
राम के चरणों में दृढ़ प्रीति करके बालि ने शरीर त्याग दिया — इतने सहज और बिना पीड़ा के, जैसे साँप अपने गले से फूलों की माला के गिरने को भी नहीं जानता।
राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा।। नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा।। तारा बिकल देखि रघुराया । दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया।। छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।। प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा।। उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी।। उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।। तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिबत सब कीन्हा।। राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई।। रघुपति चरन नाइ करि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा।।
राम ने बालि को अपने परम धाम भेज दिया, और नगर के सब लोग व्याकुल होकर दौड़े। तारा नाना प्रकार से विलाप करने लगी; उसके केश खुल गए और उसे देह की सुध न रही। तारा को व्याकुल देखकर रघुराय ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया हर ली: 'पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु — इन पाँच से यह अधम शरीर रचा गया है। वही शरीर तुम्हारे सामने मरा पड़ा है, पर जीव नित्य है — फिर तुम किसके लिए रोती हो?' उसे ज्ञान उपजा; वह चरणों में गिरकर परम भक्ति का वर माँगने लगी। हे उमा, काठ की पुतली की तरह प्रभु राम सबको नचाते हैं। फिर उन्होंने सुग्रीव को आज्ञा दी, और सब मृतक-कर्म विधिपूर्वक किए गए। राम ने छोटे भाई को समझाकर कहा, 'जाकर सुग्रीव को राज्य दे दो।' रघुपति के चरणों में सिर नवाकर, रघुनाथ की प्रेरणा से सब चले।
लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज। राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज।।11।।
लक्ष्मण ने तुरंत नगरवासियों और ब्राह्मणों की सभा को बुलाया। सुग्रीव को राज्य दिया और अंगद को युवराज बनाया।
उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।। सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।। बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती।। सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ।। जानतहुँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं।। पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई।। कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा।। गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई।। अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदय धरेहु मम काजू।। जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए।।
हे उमा, जगत में राम के समान कोई हितकारी नहीं — न गुरु, न पिता, न माता, न भाई, न स्वामी उनके समान है। देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यही रीति है कि सब स्वार्थ के लिए ही प्रेम करते हैं। जो सुग्रीव बालि के भय से दिन-रात व्याकुल था, जिसका शरीर बहुत घावों से भरा और हृदय चिंता से जल रहा था — उसी सुग्रीव को राम ने वानरराज बना दिया, इतना कृपालु रघुवीर का स्वभाव है। ऐसा जानते हुए भी लोग ऐसे प्रभु को त्याग देते हैं — फिर मनुष्य विपत्ति के जाल में क्यों न पड़ें! फिर राम ने सुग्रीव को बुलाकर बहुत प्रकार से राजनीति सिखाई। प्रभु ने कहा, 'हे वानरराज सुग्रीव, सुनो, मैं चौदह वर्ष तक किसी नगर में नहीं जाऊँगा। ग्रीष्म बीत गया और वर्षा ऋतु आ गई; मैं पास ही पर्वत पर छाकर (डेरा डालकर) रहूँगा। तुम अंगद सहित राज्य करो, और मेरा कार्य सदा हृदय में रखो।' जब सुग्रीव भवन लौट आए, तब राम प्रवर्षण पर्वत पर छा गए (निवास कर लिया)।
प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ। राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ।।12।।
पहले ही देवताओं ने एक सुंदर पर्वत-गुफा को सजाकर तैयार रखा था, ताकि कृपानिधि राम आकर वहाँ कुछ दिन निवास करें।
सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा।। कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए ।। देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा।। मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा।। मंगलरुप भयउ बन तब ते । कीन्ह निवास रमापति जब ते।। फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई।। कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका।। बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए।।
फूलों से भरा सुंदर वन अत्यंत शोभा दे रहा था, और शहद के लोभ से भौंरों के झुंड गुंजार कर रहे थे। जब से प्रभु आए, कंद, मूल, फल और पत्ते सुंदर और बहुत हो गए। मनोहर, अनुपम पर्वत को देखकर देवराज (राम) छोटे भाई सहित वहाँ रहे। देवता भौंरे, पक्षी और मृग का शरीर धरकर, तथा सिद्ध और मुनि प्रभु की सेवा करते रहे। जब से रमापति (राम) ने निवास किया, तब से वह वन मंगलमय हो गया। अत्यंत उज्ज्वल और सुंदर स्फटिक शिला पर दोनों भाई सुखपूर्वक बैठे। राम छोटे भाई से भक्ति, वैराग्य, राजनीति और विवेक की अनेक कथाएँ कहते रहे। वर्षा काल में आकाश में मेघ छा गए और गरजते हुए परम सुहावने लगने लगे।
लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पैखि। गृही बिरति रत हरष जस बिष्नु भगत कहुँ देखि।।13।।
'हे लक्ष्मण, देखो, मेघ देखकर मेरे मोरों का समूह नाच रहा है — उतने ही हर्ष से जैसे कोई वैराग्यवान गृहस्थ या विष्णु का भक्त किसी भक्त को देखकर हर्षित होता है।'
घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।। दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं।। बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।। बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें । खल के बचन संत सह जैसें।। छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई।। भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।। समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा।। सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होई अचल जिमि जिव हरि पाई।।
आकाश में मेघ घने होकर घोर गर्जना करते हैं, और प्रिया से बिछुड़ा मेरा मन डरता है। बिजली चमककर मेघ में ठहरती नहीं, जैसे दुष्ट की प्रीति कभी स्थिर नहीं रहती। मेघ पृथ्वी के निकट झुककर बरसते हैं, जैसे विद्वान विद्या पाकर विनम्र हो जाते हैं। पर्वत बूँदों की चोट सहते हैं, जैसे संत दुष्टों के वचन सहते हैं। छोटी नदियाँ भरकर किनारों को तोड़कर चल पड़ीं, जैसे थोड़े ही धन से दुष्ट इतराने लगता है। भूमि पर गिरता जल गँदला हो गया, जैसे जीव से माया लिपट जाती है। जल थोड़ा-थोड़ा जुड़कर तालाबों को भरता है, जैसे सद्गुण सज्जन के पास आ जुटते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर अचल हो जाता है, जैसे जीव हरि को पाकर स्थिर (शांत) हो जाता है।
हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।।14।।
पृथ्वी हरी-भरी है, घास से इतनी ढकी है कि रास्ता नहीं सूझता — जैसे पाखंड और (झूठे) वाद-विवाद से सद्ग्रंथ छिप जाते हैं।
दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।। नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका।। अर्क जबास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ।। खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी।। ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी।। निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा।। महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं।। कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना।। देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं।। ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा।। बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा।। जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना।।
मेंढकों की ध्वनि चारों दिशाओं में सुहावनी लगती है, मानो ब्रह्मचारियों के समूह वेद पढ़ रहे हों। अनेक वृक्षों पर नए पत्ते आए, जैसे साधक के मन में विवेक उपजता है। आक और जवास पत्तों बिना हो गए, जैसे सुशासन में दुष्टों का उद्यम समाप्त हो जाता है। कहीं ढूँढ़ने पर भी धूल नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्म को दूर कर देता है। फसलों से भरी पृथ्वी कैसी शोभा देती है, जैसे उपकारी की संपत्ति। रात के अंधकार में जुगनू चमकते हैं, मानो दंभियों का समाज जुट गया हो। भारी वृष्टि से खेतों की क्यारियाँ फूट जाती हैं, जैसे स्वतंत्र (उन्मुक्त) होने पर स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान फसल की निराई करते हैं, जैसे बुद्धिमान मोह, मद और मान त्याग देते हैं। चकवा पक्षी कहीं दिखाई नहीं देते, जैसे कलियुग के आने पर धर्म भाग जाता है। ऊसर (खारी) भूमि पर वर्षा होती है पर घास नहीं जमती, जैसे हरि-भक्त के हृदय में काम नहीं उपजता। पृथ्वी नाना जीवों से भरी शोभा देती है, जैसे सुशासन पाकर प्रजा बढ़ती है। जहाँ-तहाँ अनेक थके पथिक ठहरे हैं, जैसे ज्ञान के उदय होने पर इंद्रियाँ शांत हो जाती हैं।
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं। जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।15(क)।। कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग। बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।15(ख)।।
कभी प्रचंड वायु चलती है और मेघ जहाँ-तहाँ बिखर जाते हैं, जैसे कुपुत्र के जन्म लेने पर कुल का सद्धर्म नष्ट हो जाता है। कभी दिन में घोर अंधकार होता है और कभी सूर्य प्रकट होता है — जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट होता है और सुसंग पाकर उपजता है।
बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई।। फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई।। उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा।। सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा।। रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी।। जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।। पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी।। जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना।। बिनु धन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा।। कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी।।
वर्षा बीत गई और शरद ऋतु आ गई; हे लक्ष्मण, देखो, कितनी सुंदर है! कास फूल गया है और सारी पृथ्वी पर छा गया है, मानो वर्षा ने अपना बुढ़ापा (सफेदी) प्रकट कर दिया हो। अगस्त्य तारा उदय हुआ और मार्ग का जल सोख लिया, जैसे संतोष लोभ को सोख लेता है। नदियाँ और सरोवर स्वच्छ जल से शोभित हैं, जैसे मद और मोह से रहित संत का हृदय। धीरे-धीरे नदी-सरोवर का जल सूखता है, जैसे ज्ञानी ममता त्याग देते हैं। शरद ऋतु जानकर खंजन पक्षी आए, जैसे समय पाकर पुण्य कर्म सुहावने लगते हैं। कीचड़ और धूल रहित पृथ्वी ऐसी शोभा देती है, जैसे नीति में निपुण राजा का आचरण। जल घटने से मछलियाँ व्याकुल हो गईं, जैसे धनहीन मूर्ख कुटुंबी। बादलों बिना आकाश स्वच्छ शोभा देता है, जैसे सब आशा त्यागकर हरि-भक्त। कहीं-कहीं थोड़ी शरद ऋतु की वर्षा होती है, जैसे कोई विरला ही मेरी भक्ति पाता है।
चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि। जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहि आश्रमी चारि।।16।।
राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी नगर छोड़कर हर्ष से चले — जैसे चारों आश्रमों के लोग हरि-भक्ति पाकर अपना सारा परिश्रम (साधन) त्याग देते हैं।
सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।। फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रम्ह सगुन भएँ जैसा।। गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा।। चक्रबाक मन दुख निसि पैखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी।। चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही।। सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई।। देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवतहिं जिमि हरिजन हरि पाई।। मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा।।
मछलियाँ गहरे जल में सुखी हैं, जैसे हरि की शरण में रहने वाले को तनिक भी बाधा नहीं होती। खिले हुए कमल सरोवर की ऐसी शोभा बढ़ाते हैं, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण रूप धारण करने पर सुंदर लगता है। भौंरे अनुपम मधुर गुंजार करते हैं, और सुंदर पक्षी नाना प्रकार की मधुर बोली बोलते हैं। चकवा रात देखकर मन में दुखी होता है, जैसे दुर्जन दूसरे की संपत्ति देखकर। चातक उसी (स्वाति बूँद) के लिए अत्यंत प्यास से रटता है, जैसे शंकर से द्रोह करने वाले को सुख नहीं मिलता। शरद ऋतु का सूर्य दिन में और चंद्रमा रात में (ताप-अंधकार) हर लेते हैं, जैसे संत के दर्शन से पाप टल जाते हैं। चंद्रमा को देखकर चकोरों के समूह उसे निहारते हैं, जैसे हरि-भक्त हरि को पाकर उन्हें निहारते हैं। मच्छर और डाँस सर्दी के आते भय से नष्ट हो गए, जैसे ब्राह्मणों से द्रोह करने पर कुल का नाश हो जाता है।
भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ। सदगुर मिले जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ।।17।।
जो जीव वर्षा में पृथ्वी पर भर गए थे, वे शरद ऋतु आने पर चले गए, जैसे सद्गुरु के मिलने पर संशय और भ्रम के समूह चले जाते हैं।
बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई।। एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीत निमिष महुँ आनौं।। कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनेउँ सोई।। सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी।। जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली।। जासु कृपाँ छूटहीं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा।। जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी।। लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना।।
वर्षा बीत गई और स्वच्छ ऋतु आ गई, फिर भी हे भाई, सीता की कोई खबर नहीं मिली। 'यदि किसी तरह एक बार भी खबर पा जाऊँ, तो काल को भी जीतकर पल भर में उसे ले आऊँ। जहाँ कहीं भी वह जीवित हो, हे भाई, तो यत्न करके उसे ले आऊँ। सुग्रीव ने भी राज्य, कोष, नगर और स्त्री पाकर मेरी सुध भुला दी। जिस बाण से मैंने बालि को मारा, उसी बाण से कल उस मूर्ख को मारूँगा।' पर जिसकी कृपा से मद और मोह छूट जाते हैं — हे उमा, क्या ऐसे प्रभु को स्वप्न में भी क्रोध हो सकता है? जिन मुनियों और ज्ञानियों ने रघुवीर के चरणों में प्रीति की है, वे इस चरित्र (लीला) को जानते हैं। लक्ष्मण ने प्रभु को क्रोधित जाना, और धनुष चढ़ाकर हाथ में बाण ले लिए।
तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव।। भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।।18।।
तब करुणा की सीमा रघुपति ने छोटे भाई को समझाया, 'हे भाई, अपने मित्र सुग्रीव को कुछ भय दिखाकर ले आओ।'
इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा।। निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा।। सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना।। अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा।। कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई।। तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता।। भय अरु प्रीति नीति देखाई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई।। एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए।।
यहाँ किष्किंधा में हनुमान ने हृदय में विचार किया कि सुग्रीव ने राम का कार्य भुला दिया। पास जाकर उन्होंने सुग्रीव के चरणों में सिर नवाया और चारों प्रकार (साम, दाम, दंड, भेद) से उन्हें समझाया। यह सुनकर सुग्रीव को परम भय हुआ: 'विषयों ने मेरा ज्ञान हर लिया। अब हे पवनसुत, जहाँ-तहाँ दूतों के समूह और वानर-दल भेजो। कह दो कि जो पखवारे भर में न आए, उसका मेरे हाथों वध होगा।' तब हनुमान ने दूतों को बुलाया और सबका बहुत सम्मान किया। उन्होंने भय, प्रीति और नीति दिखाई, और सब चरणों में सिर नवाकर चल दिए। इसी अवसर पर लक्ष्मण नगर में आए, और उनका क्रोध देखकर वानर जहाँ-तहाँ भाग गए।
धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार। ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार।।19।।
तब लक्ष्मण ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर कहा कि मैं इस पूरे नगर को जलाकर राख कर दूँगा। नगर को व्याकुल देखकर बालि का पुत्र अंगद उनके पास आया।
चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही।। क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना।। सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा।। तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना।। करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलँग बैठाए।। तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा।। नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं।। सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा।। पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई।।
अंगद ने चरणों में सिर नवाकर विनती की और लक्ष्मण ने उसे अभयदान दिया। लक्ष्मण को क्रोधित सुनकर वानरराज सुग्रीव भय से अत्यंत व्याकुल हो उठे और बोले, 'हे हनुमान, तारा को साथ ले जाओ और विनती करके राजकुमार लक्ष्मण को समझाओ।' हनुमान तारा सहित गए, चरण वंदना करके प्रभु राम का सुयश गाया; विनती करके लक्ष्मण को महल में लाए, चरण धोकर पलंग पर बैठाया। तब सुग्रीव ने उनके चरणों में सिर नवाया और लक्ष्मण ने भुजा पकड़कर उन्हें गले लगा लिया। सुग्रीव बोले, 'हे नाथ, विषयों के समान कोई मद नहीं; यह क्षण भर में मुनि के मन को भी मोह लेता है।' उनके विनम्र वचन सुनकर लक्ष्मण को सुख हुआ और उन्होंने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया। हनुमान ने सारी बात सुनाई कि किस प्रकार दूतों के समूह भेजे जा चुके हैं।
हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ। रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ।।20।।
तब सुग्रीव अंगद आदि वानरों के साथ हर्षित होकर चले; राम के छोटे भाई लक्ष्मण को आगे करके वे वहाँ आए जहाँ रघुनाथ थे।
नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी।। अतिसय प्रबल देव तब माया। छूटइ राम करहु जौं दाया।। बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पावँर पसु कपि अति कामी।। नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा।। लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया।। यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई।। तब रघुपति बोले मुसकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई।। अब सोइ जतनु करहु मन लाई। जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई।।
राम के चरणों में सिर नवाकर हाथ जोड़कर सुग्रीव बोले, 'हे नाथ, इसमें मेरा कोई दोष नहीं; आपकी माया अत्यंत प्रबल है, वह तभी छूटती है जब आप, राम, दया करते हैं। हे स्वामी, देवता, मनुष्य और मुनि सभी विषयों के वश में हैं; और मैं तो अति कामी, नीच पशु वानर हूँ। जिसे स्त्री के नेत्रों का बाण न लगा, जो घोर क्रोध रूपी अंधकारमयी रात्रि में जागता रहा, और जिसके गले में लोभ का फंदा न बँधा—हे रघुनाथ, वही मनुष्य आपके समान है। यह गुण साधना से नहीं मिलता; आपकी कृपा से ही कोई विरला इसे पाता है।' तब रघुनाथ मुस्कुराकर बोले, 'तुम मुझे भाई भरत के समान प्रिय हो। अब मन लगाकर वही उपाय करो जिससे सीता की खबर मिले।'
एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ। नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरुथ।।21।।
इसी प्रकार बातचीत हो रही थी कि वानरों के दल आ पहुँचे; अनेक रंगों के वानरों के समूह सब दिशाओं में दिखाई देने लगे।
बानर कटक उमा में देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा।। आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा।। अस कपि एक न सेना माहीं। राम कुसल जेहि पूछी नाहीं।। यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई। बिस्वरूप ब्यापक रघुराई।। ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई। कह सुग्रीव सबहि समुझाई।। राम काजु अरु मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा।। जनकसुता कहुँ खोजहु जाई। मास दिवस महँ आएहु भाई।। अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ। आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ।।
शिव कहते हैं: 'हे उमा, मैंने वानरों की सेना देखी; जो उसे गिनना चाहे वह मूर्ख है।' आकर वे राम के चरणों में सिर नवाते हैं और उनका मुख देखकर सब कृतार्थ हो जाते हैं। उस सेना में एक भी वानर ऐसा न था जिसकी कुशल राम ने न पूछी हो। यह प्रभु के लिए कुछ बड़ी बात नहीं, क्योंकि रघुनाथ विश्वरूप और सर्वव्यापी हैं। आज्ञा पाकर जहाँ-तहाँ खड़े हुए वानरों को सुग्रीव ने समझाकर कहा, 'यह राम का काम है और मेरी विनती भी—हे वानर दलो, चारों ओर जाओ। जनकनंदिनी सीता को जाकर खोजो और एक महीने में लौट आना, भाइयो। जो अवधि बीत जाने पर बिना खबर लिए लौटेगा, वह मेरे हाथों मारे जाने के समान होगा।'
बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत । तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत।।22।।
ये वचन सुनते ही सब वानर तुरंत जहाँ-तहाँ चल पड़े; तब सुग्रीव ने अंगद, नल और हनुमान को बुलाया।
सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना।। सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेउ सब काहू।। मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु।। भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी।। तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भव संभव सोका।। देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई।। सोइ गुनग्य सोई बड़भागी । जो रघुबीर चरन अनुरागी।। आयसु मागि चरन सिरु नाई। चले हरषि सुमिरत रघुराई।। पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा।। परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।। बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु।। हनुमत जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना।। जद्यपि प्रभु जानत सब बाता। राजनीति राखत सुरत्राता।।
'हे नील, अंगद, हनुमान और स्थिर बुद्धिवाले ज्ञानी जांबवान, सुनो: सब वीर मिलकर दक्षिण दिशा में जाओ और सबसे सीता की खबर पूछो। मन, वचन और कर्म से वह उपाय सोचो और रामचंद्र का काम पूरा करो। सूर्य को पीठ करके और अग्नि को छाती की ओर करके सेते हैं, पर स्वामी की सेवा सब छल त्यागकर पूरे भाव से करनी चाहिए। माया छोड़कर परलोक के लिए साधना करनी चाहिए, तब संसार से उत्पन्न सारे शोक मिट जाते हैं। हे भाई, देह धारण करने का यही फल है—सब कामनाएँ छोड़कर राम का भजन करना। वही गुणी और वही बड़भागी है जो रघुवीर के चरणों का प्रेमी है।' आज्ञा माँगकर, चरणों में सिर नवाकर वे रघुनाथ का स्मरण करते हुए हर्षित होकर चले। सबसे पीछे हनुमान ने सिर नवाया; काम को समझकर प्रभु ने उन्हें पास बुलाया। राम ने अपने कमल हाथ से उनका सिर छुआ और उन्हें अपना भक्त जानकर अपनी अँगूठी दी, कहा, 'सीता को बहुत प्रकार से समझाना; मेरा बल और मेरे विरह की व्यथा कहकर तुम शीघ्र लौट आना।' हनुमान ने अपना जन्म सफल माना और कृपानिधान प्रभु को हृदय में धारण कर चल पड़े। यद्यपि प्रभु सब बातें जानते हैं, फिर भी देवताओं के रक्षक राम राजनीति का पालन करते हैं।
चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह। राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह।।23।।
वे सब वन, नदी, सरोवर, पर्वत और गुफाओं में खोजते हुए चले; राम के काम में मन लगाए रहने से वे अपने शरीर की सुध-बुध भूल गए।
कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा।। बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलत ताहि सब घेरहिं।। लागि तृषा अतिसय अकुलाने। मिलइ न जल घन गहन भुलाने।। मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना।। चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबिर एक कौतुक पेखा।। चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं। बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं।। गिरि ते उतरि पवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा।। आगें कै हनुमंतहि लीन्हा। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा।।
जहाँ कहीं राक्षस मिलता, वे एक ही थप्पड़ में उसके प्राण ले लेते। बहुत प्रकार से वे पर्वत और वन खोजते; कोई मुनि मिलता तो सब उसे घेर लेते। अत्यधिक प्यास से व्याकुल हो उठे; जल न मिला और घने वन में भटक गए। हनुमान ने मन में अनुमान किया कि जल बिना सब मरने को हैं। पर्वत की चोटी पर चढ़कर उन्होंने चारों ओर देखा और एक अद्भुत दृश्य देखा—भूमि में एक बिल (गुफा) था। चकवा, बगुला और हंस उड़ रहे थे और बहुत-से पक्षी उसमें प्रवेश कर रहे थे। हनुमान पर्वत से उतरकर आए और सबको ले जाकर वह बिल दिखाया। हनुमान को आगे करके वे बिना देर किए बिल में घुस गए।
दीख जाइ उपवन बर सर बिगसित बहु कंज। मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज।।24।।
भीतर जाकर उन्होंने एक सुंदर उपवन और खिले हुए बहुत-से कमलों से भरा सरोवर देखा, और वहाँ एक रमणीय मंदिर देखा जहाँ तपस्या की मूर्ति-सी एक स्त्री बैठी थी।
दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा।। तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना।। मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए। तासु निकट पुनि सब चलि आए।। तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई।। मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू।। नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा।। सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा।। नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही।।
दूर से ही उन सबने उसे सिर नवाया, और पूछने पर अपना सारा वृत्तांत सुनाया। तब उसने कहा, 'जल पीओ और ये अनेक सुंदर, रसीले फल खाओ।' उन्होंने स्नान किया और मीठे फल खाए, फिर सब उसके पास आए। उसने अपनी सारी कथा सुनाई और कहा, 'मैं अब वहाँ जाऊँगी जहाँ रघुनाथ हैं। नेत्र मूँदकर बिल छोड़कर चले जाओ; तुम सीता को पा लोगे, पछताओ मत।' नेत्र मूँदकर जब वीरों ने फिर देखा तो वे सब समुद्र के किनारे खड़े थे। वह फिर वहाँ गई जहाँ रघुनाथ थे, उनके कमल चरणों में सिर नवाया और अनेक प्रकार से विनती की; प्रभु ने उसे अविचल भक्ति प्रदान की।
बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस । उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस।।25।।
प्रभु की आज्ञा सिर पर धारण कर वह बदरीवन (बद्रिकाश्रम) को चली गई, हृदय में राम के उन दोनों चरणों को धारण करके जिनकी वंदना ब्रह्मा और शिव भी करते हैं।
इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं।। सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता।। कह अंगद लोचन भरि बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी।। इहाँ न सुधि सीता कै पाई। उहाँ गएँ मारिहि कपिराई।। पिता बधे पर मारत मोही। राखा राम निहोर न ओही।। पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं। मरन भयउ कछु संसय नाहीं।। अंगद बचन सुनत कपि बीरा। बोलि न सकहिं नयन बह नीरा।। छन एक सोच मगन होइ रहे। पुनि अस वचन कहत सब भए।। हम सीता कै सुधि लिन्हें बिना। नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना।। अस कहि लवन सिंधु तट जाई। बैठे कपि सब दर्भ डसाई।। जामवंत अंगद दुख देखी। कहिं कथा उपदेस बिसेषी।। तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रम्ह अजित अज जानहु।। हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी।।
यहाँ वानरों ने मन में विचार किया कि अवधि बीत गई और कुछ काम न हुआ। सब मिलकर आपस में बात करने लगे, 'बिना खबर लिए क्या करें, भाइयो?' आँखों में आँसू भरकर अंगद बोले, 'दोनों ही प्रकार से हमारी मृत्यु आ गई: यहाँ सीता की खबर न मिली, और वहाँ जाने पर सुग्रीव मार डालेंगे। पिता को मारकर वे मुझे भी मारने वाले थे; मुझे तो राम ने बचाया, उनकी कोई कृपा नहीं।' बार-बार अंगद सबसे कहते, 'मृत्यु आ गई, इसमें कोई संदेह नहीं।' अंगद के वचन सुनकर वानर वीर बोल न सके और उनके नेत्रों से जल बहने लगा। कुछ क्षण वे शोक में डूबे रहे, फिर सब यों कहने लगे, 'हे प्रवीण युवराज, सीता की खबर लिए बिना हम नहीं जाएँगे।' यों कहकर सब वानर खारे समुद्र के किनारे जाकर कुश बिछाकर बैठ गए। अंगद का दुख देखकर जांबवान ने विशेष कथा और उपदेश कहा: 'हे तात, राम को मनुष्य मत मानो; उन्हें निर्गुण, अजित, अजन्मा ब्रह्म जानो। हम सब सेवक अत्यंत बड़भागी हैं, जो निरंतर सगुण ब्रह्म के प्रेमी हैं।'
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि। सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि।।26।।
प्रभु अपनी इच्छा से देवताओं, पृथ्वी, गौओं और ब्राह्मणों के लिए अवतार लेते हैं; और सगुण के उपासक मोक्ष तक को त्यागकर वहाँ उनके साथ रहते हैं।
एहि बिधि कथा कहहि बहु भाँती गिरि कंदराँ सुनी संपाती।। बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा।। आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ।। कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा।। डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना।। कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी।। कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं।। राम काज कारन तनु त्यागी । हरि पुर गयउ परम बड़ भागी।। सुनि खग हरष सोक जुत बानी । आवा निकट कपिन्ह भय मानी।। तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई।। सुनि संपाति बंधु कै करनी। रघुपति महिमा बधुबिधि बरनी।।
जब वे अनेक प्रकार से यह कथा कह रहे थे, तब पर्वत की कंदरा में संपाति गीध ने उसे सुना। बाहर आकर बहुत-से वानरों को देखकर उसने सोचा, 'जगदीश ने मुझे आहार दे दिया। आज मैं इन सबको खा जाऊँगा; बहुत दिनों से आहार बिना मर रहा था। कभी पेट भर आहार न मिला, आज विधाता ने एक ही बार में दे दिया।' गीध के वचन कानों से सुनकर वानर डर गए: 'अब सचमुच मृत्यु आ गई, हम जान गए।' गीध को देखकर सब वानर उठ खड़े हुए और जांबवान मन में विशेष चिंतित हुए। मन में विचार कर अंगद बोले, 'जटायु धन्य हैं, उनके समान कोई नहीं, जिन्होंने राम के काम के लिए शरीर त्याग दिया और परम बड़भागी होकर हरि के धाम को चले गए।' हर्ष और शोक से भरे ये वचन सुनकर गीध पास आया और वानर भयभीत हुए। उन्हें अभयदान देकर उसने जाकर पूछा, और उन्होंने उसे सारी कथा सुनाई। अपने भाई जटायु की करनी सुनकर संपाति ने रघुनाथ की महिमा अनेक प्रकार से बखानी।
मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि । बचन सहाइ करवि मैं पैहहु खोजहु जाहि ।।27।।
'मुझे समुद्र के किनारे ले चलो जिससे मैं अपने भाई को तिलांजलि दे सकूँ। मैं वचनों (सलाह) से तुम्हारी सहायता करूँगा, और तुम जिसे खोज रहे हो उसे पा लोगे।'
अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा।। हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई । गगन गए रबि निकट उडाई।। तेज न सहि सक सो फिरि आवा । मै अभिमानी रबि निअरावा ।। जरे पंख अति तेज अपारा । परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ।। मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखी करि मोही।। बहु प्रकार तेंहि ग्यान सुनावा । देहि जनित अभिमानी छड़ावा ।। त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही।। तासु खोज पठइहि प्रभू दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता।। जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता । तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता।। मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू । सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू।। गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका । तहँ रह रावन सहज असंका ।। तहँ असोक उपबन जहँ रहई ।। सीता बैठि सोच रत अहई।।
समुद्र तट पर अपने छोटे भाई की क्रिया करके संपाति ने अपनी कथा कही: 'हे वानर वीरो, सुनो। पहली जवानी में हम दोनों भाई आकाश में सूर्य के पास उड़ गए। मेरा भाई तेज न सह सका और लौट आया, पर मैं अभिमानी सूर्य के और पास चला गया। उस अपार तेज से मेरे पंख जल गए और मैं भयंकर चीख मारकर भूमि पर गिर पड़ा। चंद्रमा नामक एक मुनि ने मुझे देखकर दया की और अनेक प्रकार से ज्ञान सुनाकर मुझे देह से उत्पन्न अभिमान से छुड़ाया। उन्होंने कहा: त्रेता में ब्रह्म मनुष्य शरीर धारण करेंगे, और एक राक्षस उनकी पत्नी को हर ले जाएगा; प्रभु उसकी खोज में दूत भेजेंगे, उनसे मिलने पर तुम पवित्र हो जाओगे। तुम्हारे पंख फिर उग आएँगे, चिंता मत करना; तुम उन्हें सीता का पता बता देना। मुनि की वाणी आज सत्य हुई। इसलिए मेरे वचन सुनकर प्रभु का काम करो। त्रिकूट पर्वत के ऊपर लंका बसी है, वहाँ स्वभाव से ही निर्भय रावण रहता है। वहाँ अशोक उपवन है जहाँ सीता बैठी सदा शोक में लीन रहती हैं।'
मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार।। बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार।।28।।
'मैं उसे देख सकता हूँ, पर तुम नहीं, क्योंकि गीध की दृष्टि अपार दूर तक जाती है। मैं बूढ़ा हो गया हूँ, नहीं तो तुम्हारी कुछ सहायता अवश्य करता।'
जो नाघइ सत जोजन सागर । करइ सो राम काज मति आगर ।। मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा । राम कृपाँ कस भयउ सरीरा।। पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं।। तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई।। अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ।। निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा।। जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा।। जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी।।
'जो सौ योजन के समुद्र को लाँघ जाए—वही बुद्धिमान राम का काम करेगा। मुझे देखकर मन में धीरज रखो: देखो, राम की कृपा से मेरा शरीर कैसा (पुनः) हो गया। पापी भी जिनका नाम स्मरण करते हैं, वे अति अपार भवसागर तर जाते हैं। तुम उनके दूत हो; कायरता छोड़कर राम को हृदय में धारण कर उपाय करो।' यों कहकर जब गीध नए पंख पाकर उड़ गया, तो वानरों के मन में बड़ा विस्मय हुआ। सबने अपने-अपने बल की बात कही, पर पार जाने के विषय में सब संशय में रहे। ऋक्षराज जांबवान कहने लगे, 'मैं अब बूढ़ा हो गया; शरीर में पहले जैसे बल का लेश भी नहीं रहा। जब खर के शत्रु भगवान त्रिविक्रम बने थे, तब मैं युवा और भारी बलवाला था।'
बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि न जाई। उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ।।29।।
'जब प्रभु ने वामन-त्रिविक्रम रूप में राजा बलि को बाँधा, तब उनका शरीर इतना विशाल बढ़ गया कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता; फिर भी मैंने केवल दो घड़ी में दौड़कर उसकी सात प्रदक्षिणाएँ कर लीं।'
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
रामचरितमानस का किष्किन्धा काण्ड किस विषय में है?
राम वानरराज सुग्रीव से मित्रता करते हैं, उनके भाई बालि का वध कर उन्हें राज्य लौटाते हैं, और सुग्रीव सीता की खोज में चारों दिशाओं में दल भेजते हैं। यहीं हनुमान प्रमुख रूप से सामने आते हैं, जिन्हें दक्षिण की खोज का नेतृत्व सौंपा जाता है।
रामचरितमानस क्या है?
रामचरितमानस संत-कवि गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी) द्वारा अवधी में रचित रामायण है, जो उत्तर भारत में सर्वाधिक प्रिय और पठित ग्रंथों में से एक है। यह सात काण्डों में विभाजित है: बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुंदर, लंका और उत्तर।
अपने नाम से राम/सुंदरकांड पाठ अर्पित करें
रक्षा और शांति हेतु अपने नाम-गोत्र में रामचरितमानस या सुंदरकांड पाठ करवाएँ। सेवा बुक करें, या सनातन साहित्य में आगे पढ़ें।







