आप अपनी शुभ तिथि चुनते हैं। पंडित जी उसी दिन मंदिर में आपके नाम का संकल्प उठाते हैं।
पारिवारिक कलह और माता-पिता और संतान का मनमुटाव के लिए अपने वैदिक अनुष्ठान को पूर्ण करें, अपने परिवार के अनुसार पैकेज चुनें।




प्रत्येक अर्पण आपके नाम-गोत्र के साथ मंदिर में उसी अनुष्ठान में चढ़ाया जाता है।





बहुत से भक्त पूजा के साथ इनमें से एक अवश्य जोड़ते हैं, कृतज्ञता के रूप में, पितरों की स्मृति में, या केवल सहज दान के भाव से।
असली पूजा और चढ़ावा वीडियो देखें, पूजा-पूर्ण होने के बाद भक्तों को WhatsApp पर भेजे जाते हैं।
श्री दशाश्वमेध घाट वाराणसी में गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित है — वह घाट जो ब्रह्मा के दश-अश्वमेध यज्ञ के नाम से जाना जाता है, जिसे ब्रह्मा ने स्वयं शिव को काशी वापस आमंत्रित करने के लिए सम्पन्न किया था। स्कंद पुराण के अनुसार, यह भारत का सर्वोच्च पितृ-तर्पण क्षेत्र है — जहाँ हर परिवार का वंश-नाम, जब तिल-कुशा और विष्णु-पाद भस्म के साथ गंगा-धारा में बोला जाता है, उस पितृ-ऋण को मुक्त करता है जो वंश ने वहन किया।
आचार्य पूर्ण वैदिक विधि के साथ पितृ तर्पण सम्पन्न करते हैं — तिल-कुशा-जल अर्पण, तीन पीढ़ियों के लिए वंश-नाम में त्रि-पिंड तर्पण, घाट पर सीलबंद विष्णु-पाद भस्म, और गंगा-जल अस्थि-भस्म विसर्जन। हर चरण केवल आपके परिवार के दिवंगतों के लिए।
भक्त प्रायः चाहते हैं कि तर्पण सावधानी से सम्पन्न हो — स्पष्ट विधि, स्पष्ट वीडियो, गंगा पर स्पष्ट संकल्प जहाँ ब्रह्मा ने स्वयं प्रथम यज्ञ किया।
आप अपनी शुभ तिथि चुनते हैं। पंडित जी उसी दिन मंदिर में आपके नाम का संकल्प उठाते हैं।
पूजा का हर मंत्र, हर संकल्प-जल, हर अर्पण आपके नाम-गोत्र पर सम्पन्न होता है। किसी और भक्त का नाम बीच में नहीं लिया जाता।
वीडियो भी केवल आपके परिवार के संकल्प का बनता है। किसी और भक्त के नाम के साथ नहीं।
दशाश्वमेध पितृ-तर्पण विशेष पूजा श्री दशाश्वमेध घाट, गंगा, वाराणसी में सम्पन्न होती है — वही घाट जहाँ स्कंद पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने दश-अश्वमेध यज्ञ किया। विधि में आपके वंश-नाम-गोत्र में त्रि-पिंड तर्पण, गंगा-जल अस्थि-भस्म विसर्जन, घाट पर सीलबंद विष्णु-पाद भस्म — केवल आपके नाम-गोत्र पर, चुनी हुई तिथि पर।