तुलसीदास के "विनय पत्रिका" से लिया गया यह तकनीकी रूप से स्तुति है — परन्तु आरती के रूप में व्यापक रूप से गाया जाता है। रामनवमी और बल, धर्म तथा भय-निवारण हेतु अनिवार्य।
यह आरती क्यों और किसके लिए?
यह तकनीकी रूप से तुलसीदास की "विनय पत्रिका" से एक स्तुति (प्रशंसा-भजन) है — जो व्यापक रूप से आरती के रूप में गाई जाती है। रामनवमी, तथा बल, धर्म (मर्यादा) और भय-निवारण (भवभय हरणम्) की आकांक्षा के लिए अनिवार्य।
आरती करने की सरल विधि
• स्वच्छ, विघ्न-रहित स्थान चुनें। • दीप और अगरबत्ती प्रज्वलित करें। • मूर्ति या चित्र को ताज़े पुष्प अर्पित करें। • यह स्थिर, कदमताल-जैसी लय से गाई जाती है। • इस आरती के लिए कपूर जलाएँ — यह अवशेष नहीं छोड़ता, जो राम के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। • प्रायः "सियावर रामचन्द्र की जय" के उद्घोष से समाप्त करें।
आरती: सम्पूर्ण पाठ और भावार्थ
श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण भवभय दारुणं भावार्थ: हे मन — कृपालु श्रीराम का भजन कर — जो जीवन-मृत्यु के दारुण भय को हरते हैं।
नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज, पद कंजारुणं भावार्थ: उनके नेत्र, मुख, कर और चरण नव-विकसित कमल के समान हैं।
कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनील-नीरद सुन्दरं भावार्थ: उनकी छवि अगणित कामदेवों से परे है — नव नील मेघ के समान सुन्दर।
पट पीत मानहु तडित रुचि शुचि, नौमि जनक सुतावरं भावार्थ: उनके पीत वस्त्र विद्युत के समान चमकते हैं — मैं जनक-पुत्री के प्रभु को नमन करता हूँ।
भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्यवंश-निकंदनं भावार्थ: दीनों के बन्धु, सूर्य-वंश के तेज, दानव-दैत्य-वंश के नाशक — उनका भजन कर।







