यह आरती अनूठी है — यह एक पौधे को अर्पित की जाती है। पवित्र तुलसी को देवी रूप में पूजा जाता है। तुलसी विवाह पर्व और दैनिक सन्ध्या के आँगन-अनुष्ठान — तुलसी पौधे के निकट दीप जलाने — के लिए अनिवार्य है।
यह आरती क्यों और किसके लिए?
यह आरती अनूठी है — यह एक पौधे को अर्पित की जाती है। पवित्र तुलसी को देवी रूप में पूजा जाता है। तुलसी विवाह पर्व और दैनिक सन्ध्या के आँगन-अनुष्ठान — तुलसी पौधे के निकट दीप जलाने — के लिए अनिवार्य है।
आरती करने की सरल विधि
- यह आरती बाहर आँगन या बालकनी में की जाती है — जहाँ पौधा रखा हो।
- आटे का दीप या पीतल का दीप प्रयोग करें।
- आरती के पश्चात पौधे की तीन परिक्रमा करें।
- जड़ों में जल केवल प्रातःकाल अर्पित करें — सन्ध्या में नहीं।
आरती: सम्पूर्ण पाठ और भावार्थ
जय जय तुलसी माता भावार्थ: माता तुलसी की जय हो।
सब जग की सुख दाता, सबकी वर माता भावार्थ: समस्त जगत को सुख देने वाली, सबकी वरदायिनी माता।
सब योगों से ऊपर, सब रोगों से ऊपर भावार्थ: समस्त योगों से परे, समस्त रोगों से परे।
रज से रक्ष करके, सबकी भव त्राता भावार्थ: पवित्रता की रक्षा कर सबको भव-सागर से तार देने वाली।
बटु पुत्री है श्यामा, सूर बल्ली है ग्राम्या भावार्थ: आप ऋषि-पुत्री हैं, श्यामा हैं — दिव्य लता स्वरूपा।
विष्णु प्रिय जो नर तुमको सेवे, सो नर तर जाता भावार्थ: विष्णु-प्रिया — जो आपकी सेवा करता है, वह भव से पार हो जाता है।
हरि के शीश विराजत, त्रिभुवन से हो वंदित भावार्थ: आप हरि के शीश पर विराजित हैं — तीनों लोकों द्वारा पूजित।
पतित जनो की तारिणी, तुम हो विख्याता भावार्थ: पतितों का उद्धार करने वाली — आप प्रख्यात हैं।
लेकर जन्म विजन में, आई हो उपवन में भावार्थ: वन में जन्म लेकर आप उपवन में आईं।
जानि शिरोमणि क्रिय, सब जग की माता भावार्थ: परम बुद्धिमती क्रिया — हे जगज्जननी।
आरती की मर्यादा — क्या करें, क्या न करें
- करें: स्त्रियाँ सिर ढककर या पौधे के निकट उच्च स्वच्छता बनाकर आरती करें।
- न करें: रविवार, मंगलवार या सन्ध्या के समय तुलसी-पत्र न तोड़ें।
पौराणिक संदर्भ — "विष्णु प्रिया"
यह आरती तुलसी को "विष्णु प्रिया" कहती है। पुराणों में वह वृन्दा थीं — जिन्हें वरदान मिला कि वे तुलसी-पौधे के रूप में पुनर्जन्म लेंगी और शालिग्राम-शिला रूप में विष्णु से विवाह करेंगी।
प्रसिद्ध मन्दिर — प्रत्येक हिन्दू गृह का आँगन (तुलसी वृन्दावन)
अन्य देवियों के विपरीत जो भव्य पाषाण-मन्दिरों में विराजित हैं, माता तुलसी का सर्वाधिक सार्थक और प्रामाणिक "मन्दिर" प्रत्येक परम्परागत हिन्दू गृह के आँगन या बालकनी में स्थित तुलसी वृन्दावन है। वे इस अर्थ में अनूठी हैं कि उनका मुख्य निवास संस्थानिक नहीं — गृहस्थ है — अतः जो भी गृह उनका पालन करता है, वह एक पवित्र सानिध्य बन जाता है।
एक-पंक्ति सार
पवित्र पौधे का सम्मान, जो गृह में स्वास्थ्य और पवित्रता लाता है।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Tulsi Mata mantra
Om Tulasyai Namah
Chant near the Tulsi plant with a lamp, water offering, and sincere devotion.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
एकादशी व्रत का क्या महत्त्व है?
एकादशी भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का सर्वाधिक प्रभावी दिन है। इस दिन व्रत से अनेक जन्मों के पाप क्षय होते हैं।
क्या एकादशी पर जल ले सकते हैं?
हाँ — जल की अनुमति है। पूर्ण निर्जला व्रत केवल ग्रीष्म ऋतु की निर्जला एकादशी पर होता है — सर्वाधिक प्रभावी किन्तु ऐच्छिक।
एकादशी पर क्या खाया जा सकता है?
फल, दूध, सूखे मेवे, सेंधा नमक, साबूदाना और पंचामृत की अनुमति है। अनाज, दालें और कुछ मसालों से परहेज करें।
क्या आप यह पूजा अपने संकल्प के साथ करवाना चाहते हैं?
अपना नाम, ज्ञात हो तो गोत्र, और प्रार्थना की भावना साझा करें। अनुभवी पंडित आपको सही सेवा की ओर मार्गदर्शन देंगे।







