आध्यात्मिक शुद्धि और "संचित कर्म" (संचित पापों) के नाश के लिए अनिवार्य। यह जीवनदायिनी जल-तत्त्व के सम्मान हेतु की जाती है।
यह आरती क्यों और किसके लिए?
आध्यात्मिक शुद्धि और "संचित कर्म" (संचित पापों) के नाश के लिए अनिवार्य। यह जीवनदायिनी जल-तत्त्व के सम्मान हेतु की जाती है।
आरती करने की सरल विधि
- प्रार्थना के लिए स्वच्छ, शान्त स्थान चुनें — जहाँ विघ्न न हों।
- सामान्यतः सन्ध्या काल में की जाती है।
- यदि सम्भव हो तो बहुस्तरीय बड़ा दीप प्रयोग करें।
- दीप को नदी या गंगा-जल के पात्र की ओर वृत्ताकार गति से लहराएँ।
आरती: सम्पूर्ण पाठ और भावार्थ
ॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता भावार्थ: ॐ — हे दिव्य माता गंगे, आपकी जय हो।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता भावार्थ: जो मनुष्य आपका ध्यान करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है।
चन्द्र सी जोत तुम्हारी, जल निर्मल आता भावार्थ: आपकी ज्योति चन्द्रमा के समान है, आपका जल निर्मल बहता है।
शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता भावार्थ: जो आपकी शरण में आता है, वह भव-सागर से तर जाता है।
पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता भावार्थ: आपने राजा सगर के साठ सहस्र पुत्रों का उद्धार किया — यह सम्पूर्ण जगत जानता है।
कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन सुखदाता भावार्थ: आपकी कृपा-दृष्टि तीनों लोकों को सुख प्रदान करती है।
आरती की मर्यादा — क्या करें, क्या न करें
- करें: जल-स्रोत के समीप के स्थान को स्वच्छ रखें।
- न करें: अनुष्ठान के समय प्लास्टिक या अजैवविघटनशील वस्तुएँ जल में न फेंकें।
पौराणिक संदर्भ
पूर्वजों की आत्माओं के उद्धार हेतु गंगा भगवान शिव की जटाओं के माध्यम से स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुईं।
प्रसिद्ध मन्दिर — हर की पौड़ी, हरिद्वार
पवित्र नगरी हरिद्वार में स्थित हर की पौड़ी भारत के सर्वाधिक पवित्र घाटों में से एक है — ठीक वह स्थान जहाँ गंगा पर्वतों को छोड़कर उत्तर-भारतीय मैदान में प्रवेश करती हैं। "हर की पौड़ी" का शाब्दिक अर्थ "प्रभु के चरण" है — ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु इस स्थान पर पधारे थे और यहाँ की पत्थर की दीवार पर अपने दिव्य चरण-चिह्न छोड़ गए। यह स्थान अपनी रात्रिकालीन गंगा आरती के लिए विश्व-प्रसिद्ध है — जहाँ पुरोहित वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते हुए विशाल पीतल के दीप लहराते हैं, और सहस्रों पत्ते-नौका दीप जल में छोड़े जाते हैं — नदी स्वर्ण-सी तरंगायमान हो उठती है। ब्रह्मकुण्ड — जहाँ समुद्र-मंथन में दिव्य अमृत की बूँदें गिरी थीं — यहीं स्थित माना जाता है; इन पवित्र जलों में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं और मोक्ष प्राप्त होता है। यही कुम्भ मेले का आध्यात्मिक हृदय है।
एक-पंक्ति सार
हृदय की पवित्रता तब प्राप्त होती है जब व्यक्ति दिव्य माता की कृपा के साथ प्रवाहित होता है।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Ganga mantra
Om Gange Namah
Chant while praying for purity, forgiveness, and inner cleansing.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या पुरुष भी नवरात्रि व्रत कर सकते हैं?
हाँ — किसी भी लिंग का भक्त नवरात्रि व्रत कर सकता है; यह सभी के लिए खुला है।
व्रत के दौरान क्या खाया जा सकता है?
नवरात्रि व्रत में फल, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा, सेंधा नमक और दुग्ध-उत्पाद खाए जा सकते हैं।
यदि मैं पूरे 9 दिन व्रत न रख सकूँ तो?
आप केवल प्रथम और अन्तिम दिन (प्रतिपदा और नवमी) व्रत कर सकते हैं — यह भी सम्पूर्ण व्रत के समान माना गया है।
क्या आप यह पूजा अपने संकल्प के साथ करवाना चाहते हैं?
अपना नाम, ज्ञात हो तो गोत्र, और प्रार्थना की भावना साझा करें। अनुभवी पंडित आपको सही सेवा की ओर मार्गदर्शन देंगे।







