About Mandala 1
The first and largest book — hymns by many rishis to Agni, Indra, the Ashvins, the Maruts, Ushas and the devas. The Rigveda is the oldest of the four Vedas and the foundational scripture of Sanatana Dharma — a collection of over a thousand suktas (hymns) in praise of Agni, Indra, Soma, the Ashvins and the devas, seen by the rishis and preserved in unbroken oral tradition.
How it is read
Mandala 1 is given below in its original Sanskrit, in accented Devanagari. The Veda is preserved as shruti and recited in svadhyaya; read it reverently, sukta by sukta.
Original Text
Verses & Meaning
९ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः । अग्निः। गायत्री। अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म्। होता॑रं रत्न॒धात॑मम्॥१॥ अ॒ग्निः पूर्वे॑भि॒र्ऋषि॑भि॒रीड्यो॒ नूत॑नैरु॒त। स दे॒वाँ एह व॑क्षति॥२॥ अ॒ग्निना॑ र॒यिम॑श्नव॒त् पोष॑मे॒व दि॒वेदि॑वे। य॒शसं॑ वी॒रव॑त्तमम्॥३॥ अग्ने॒ यं य॒ज्ञम॑ध्व॒रं वि॒श्वत॑: परि॒भूरसि॑। स इद् दे॒वेषु॑ गच्छति॥४॥ अ॒ग्निर्होता॑ क॒विक्र॑तुः स॒त्यश्चि॒त्रश्र॑वस्तमः। दे॒वो दे॒वेभि॒रा ग॑मत्॥५॥ यद॒ङ्ग दा॒शुषे॒ त्वमग्ने॑ भ॒द्रं क॑रि॒ष्यसि॑। तवेत् तत् स॒त्यम॑ङ्गिरः॥६॥ उप॑ त्वाग्ने दि॒वेदि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धि॒या व॒यम्। नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि॥७॥ राज॑न्तमध्व॒राणां॑ गो॒पामृ॒तस्य॒ दीदि॑विम्। वर्ध॑मानं॒ स्वे दमे॑॥८॥ स न॑: पि॒तेव॑ सू॒नवे ऽग्ने॑ सूपाय॒नो भ॑व। सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑॥९॥
मैं अग्नि की स्तुति करता हूं. वे यज्ञ के पुरोहित, दानादि गुणों से युक्त, यज्ञ में देवों को बुलाने वाले एवं यज्ञ के फल रूपी रत्नों को धारण करने वाले हैं
९ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। १-३ वायुः, ४-६ इन्द्र-वायु, ७-९ मित्रा-वरुणौ। गायत्री। वाय॒वा या॑हि दर्शते॒मे सोमा॒ अरं॑कृताः। तेषां॑ पाहि श्रु॒धी हव॑म्॥१॥ वाय॑ उ॒क्थेभि॑र्जरन्ते॒ त्वामच्छा॑ जरि॒तार॑:। सु॒तसो॑मा अह॒र्विद॑:॥२॥ वायो॒ तव॑ प्रपृञ्च॒ती धेना॑ जिगाति दा॒शुषे॑। उ॒रू॒ची सोम॑पीतये॥३॥ इन्द्र॑वायू इ॒मे सु॒ता उप॒ प्रयो॑भि॒रा ग॑तम्। इन्द॑वो वामु॒शन्ति॒ हि॥४॥ वाय॒विन्द्र॑श्च चेतथः सु॒तानां॑ वाजिनीवसू। तावा या॑त॒मुप॑ द्र॒वत्॥५॥ वाय॒विन्द्र॑श्च सुन्व॒त आ या॑त॒मुप॑ निष्कृ॒तम्। म॒क्ष्वि१त्था धि॒या न॑रा॥६॥ मि॒त्रं हु॑वे पू॒तद॑क्षं॒ वरु॑णं च रि॒शाद॑सम्। धियं॑ घृ॒ताचीं॒ साध॑न्ता॥७॥ ऋ॒तेन॑ मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा। क्रतुं॑ बृ॒हन्त॑माशाथे॥८॥ क॒वी नो॑ मि॒त्रावरु॑णा तुविजा॒ता उ॑रु॒क्षया॑। दक्षं॑ दधाते अ॒पस॑म्॥९॥
हे दर्शनीय वायु! आओ, यह सोमरस तैयार है, इसे पिओ. हम सोमपान के लिए तुम्हें बुला रहे हैं. तुम हमारी यह पुकार सुनो
१२ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। १-३ अश्विनौ, ४-६ इन्द्र, ७-९ विश्वेदेवाः, १०-१२ सरस्वती। गायत्री। अश्वि॑ना॒ यज्व॑री॒रिषो॒ द्रव॑त्पाणी॒ शुभ॑स्पती। पुरु॑भुजा चन॒स्यत॑म्॥१॥ अश्वि॑ना॒ पुरु॑दंससा॒ नरा॒ शवी॑रया धि॒या। धिष्ण्या॒ वन॑तं॒ गिर॑:॥२॥ दस्रा॑ यु॒वाक॑वः सु॒ता नास॑त्या वृ॒क्तब॑र्हिषः। आ या॑तं रुद्रवर्तनी॥३॥ इन्द्रा या॑हि चित्रभानो सु॒ता इ॒मे त्वा॒यव॑:। अण्वी॑भि॒स्तना॑ पू॒तास॑:॥४॥ इन्द्रा या॑हि धि॒येषि॒तो विप्र॑जूतः सु॒ताव॑तः। उप॒ ब्रह्मा॑णि वा॒घत॑:॥५॥ इन्द्रा या॑हि॒ तूतु॑जान॒ उप॒ ब्रह्मा॑णि हरिवः। सु॒ते द॑धिष्व न॒श्चन॑:॥६॥ ओमा॑सश्चर्षणीधृतो॒ विश्वे॑ देवास॒ आ ग॑त। दा॒श्वांसो॑ दा॒शुष॑: सु॒तम्॥७॥ विश्वे॑ दे॒वासो॑ अ॒प्तुर॑: सु॒तमा ग॑न्त॒ तूर्ण॑यः। उ॒स्रा इ॑व॒ स्वस॑राणि॥८॥ विश्वे॑ दे॒वासो॑ अ॒स्रिध॒ एहि॑मायासो अ॒द्रुह॑:। मेधं॑ जुषन्त॒ वह्न॑यः॥९ पा॒व॒का न॒: सर॑स्वती॒ वाजे॑भिर्वा॒जिनी॑वती। य॒ज्ञं व॑ष्टु धि॒याव॑सुः॥१०॥ चो॒द॒यि॒त्री सू॒नृता॑नां॒ चेत॑न्ती सुमती॒नाम्। य॒ज्ञं द॑धे॒ सर॑स्वती॥११॥ म॒हो अर्ण॒: सर॑स्वती॒ प्र चे॑तयति के॒तुना॑। धियो॒ विश्वा॒ वि रा॑जति॥१२॥
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारी भुजाएं विस्तीर्ण एवं हवि ग्रहण करने के लिए चंचल हैं. तुम शुभ कर्म के पालक हो. तुम दोनों यज्ञ का अन्र ग्रहण करो
१० मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। इन्द्रः। गायत्री। सु॒रू॒प॒कृ॒त्नुमू॒तये॑ सु॒दुघा॑मिव गो॒दुहे॑। जु॒हू॒मसि॒ द्यवि॑द्यवि॥१॥ उप॑ न॒: सव॒ना ग॑हि॒ सोम॑स्य सोमपाः पिब। गो॒दा इद् रे॒वतो॒ मद॑:॥२॥ अथा॑ ते॒ अन्त॑मानां वि॒द्याम॑ सुमती॒नाम्। मा नो॒ अति॑ ख्य॒ आ ग॑हि॥३॥ परे॑हि॒ विग्र॒मस्तृ॑त॒मिन्द्रं॑ पृच्छा विप॒श्चित॑म्। यस्ते॒ सखि॑भ्य॒ आ वर॑म्॥४॥ उ॒त ब्रु॑वन्तु नो॒ निदो॒ निर॒न्यत॑श्चिदारत। दधा॑ना॒ इन्द्र॒ इद् दुव॑:॥५॥ उ॒त न॑: सु॒भगाँ॑ अ॒रिर्वो॒चेयु॑र्दस्म कृ॒ष्टय॑:। स्यामेदिन्द्र॑स्य॒ शर्म॑णि॥६॥ एमा॒शुमा॒शवे॑ भर यज्ञ॒श्रियं॑ नृ॒माद॑नम्। प॒त॒यन् म॑न्द॒यत्स॑खम्॥७॥ अ॒स्य पी॒त्वा श॑तक्रतो घ॒नो वृ॒त्राणा॑मभवः। प्रावो॒ वाजे॑षु वा॒जिन॑म्॥८॥ तं त्वा॒ वाजे॑षु वा॒जिनं॑ वा॒जया॑मः शतक्रतो। धना॑नामिन्द्र सा॒तये॑॥९॥ यो रा॒यो॒३ऽवनि॑र्म॒हान्त्सु॑पा॒रः सु॑न्व॒तः सखा॑। तस्मा॒ इन्द्रा॑य गायत॥१०॥
इस सूक्त में इंद्र की स्तुति की गई है। हे सुंदर रूप बनाने वाले इंद्र! जैसे दूध देने वाली गाय को दुहने के लिए बुलाया जाता है, वैसे ही हम तुम्हें अपनी रक्षा के लिए प्रतिदिन बुलाते हैं। हे सोमपान करने वाले इंद्र! हमारे यज्ञ में आकर सोमरस पान करो, क्योंकि गौओं का दान ही सच्चा आनंद देता है। हम तुम्हारी कृपा जानना चाहते हैं, हमें छोड़कर मत जाओ, हमारे पास आओ। सब लोग हमें भाग्यशाली कहें और हम सदा इंद्र की शरण में रहें। इंद्र ने सोमरस पीकर शत्रुओं का नाश किया और बलवानों की सहायता की। हम धन प्राप्ति के लिए शक्तिशाली इंद्र का आवाहन करते हैं और उनकी स्तुति गाते हैं, जो सोमपान करने वाले के लिए सच्चे मित्र और रक्षक हैं।
१० मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। इन्द्रः। गायत्री। आ त्वेता॒ नि षी॑द॒तेन्द्र॑म॒भि प्र गा॑यत। सखा॑य॒: स्तोम॑वाहसः॥१॥ पु॒रू॒तमं॑ पुरू॒णामीशा॑नं॒ वार्या॑णाम्। इन्द्रं॒ सोमे॒ सचा॑ सु॒ते॥२॥ स घा॑ नो॒ योग॒ आ भु॑व॒त् स रा॒ये स पुरं॑ध्याम्। गम॒द्वाजे॑भि॒रा स न॑:॥३॥ यस्य॑ सं॒स्थे न वृ॒ण्वते॒ हरी॑ स॒मत्सु॒ शत्र॑वः। तस्मा॒ इन्द्रा॑य गायत॥४॥ सु॒त॒पाव्ने॑ सु॒ता इ॒मे शुच॑यो यन्ति वी॒तये॑। सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः॥५॥ त्वं सु॒तस्य॑ पी॒तये॑ स॒द्यो वृ॒द्धो अ॑जायथाः। इन्द्र॒ ज्यैष्ठ्या॑य सुक्रतो॥६॥ आ त्वा॑ विशन्त्वा॒शव॒: सोमा॑स इन्द्र गिर्वणः। शं ते॑ सन्तु॒ प्रचे॑तसे॥७॥ त्वां स्तोमा॑ अवीवृध॒न् त्वामु॒क्था श॑तक्रतो। त्वां व॑र्धन्तु नो॒ गिर॑:॥८॥ अक्षि॑तोतिः सनेदि॒मं वाज॒मिन्द्र॑: सह॒स्रिण॑म्। यस्मि॒न् विश्वा॑नि॒ पौंस्या॑॥९॥ मा नो॒ मर्ता॑ अ॒भि द्रु॑हन्त॒नूना॑मिन्द्र गिर्वणः। ईशा॑नो यवया व॒धम्॥१०॥
हे स्तुति करने वाले मित्रो! शीघ्र आओ और यहां बैठो. तुम लोग इंद्र की स्तुति करो
१० मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। १-३ इन्द्रः, ४,६,८,९ मरुतः, ५,७ मरुत इन्द्रश्च, १० इन्द्रः। गायत्री। यु॒ञ्जन्ति॑ ब्र॒ध्नम॑रु॒षं चर॑न्तं॒ परि॑ त॒स्थुष॑:। रोच॑न्ते रोच॒ना दि॒वि॥१॥ यु॒ञ्जन्त्य॑स्य॒ काम्या॒ हरी॒ विप॑क्षसा॒ रथे॑। शोणा॑ धृ॒ष्णू नृ॒वाह॑सा॥२॥ के॒तुं कृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॒ पेशो॑ मर्या अपे॒शसे॑। समु॒षद्भि॑रजायथाः॥३॥ आदह॑ स्व॒धामनु॒ पुन॑र्गर्भ॒त्वमे॑रि॒रे। दधा॑ना॒ नाम॑ य॒ज्ञिय॑म्॥४॥ वी॒ळु चि॑दारुज॒त्नुभि॒र्गुहा॑ चिदिन्द्र॒ वह्नि॑भिः। अवि॑न्द उ॒स्रिया॒ अनु॑॥५॥ दे॒व॒यन्तो॒ यथा॑ म॒तिमच्छा॑ वि॒दद्व॑सुं॒ गिर॑:। म॒हाम॑नूषत श्रु॒तम्॥६॥ इन्द्रे॑ण॒ सं हि दृक्ष॑से संजग्मा॒नो अबि॑भ्युषा। म॒न्दू स॑मा॒नव॑र्चसा॥७॥ अ॒न॒व॒द्यैर॒भिद्यु॑भिर्म॒खः सह॑स्वदर्चति। ग॒णैरिन्द्र॑स्य॒ काम्यै॑:॥८॥ अत॑: परिज्म॒न्ना ग॑हि दि॒वो वा॑ रोच॒नादधि॑। सम॑स्मिन्नृञ्जते॒ गिर॑:॥९॥ इ॒तो वा॑ सा॒तिमीम॑हे दि॒वो वा॒ पार्थि॑वा॒दधि॑। इन्द्रं॑ म॒हो वा॒ रज॑सः॥१०॥
जो इंद्र तेजस्वी सूर्य के रूप में, अहिंसक अग्नि के रूप में तथा सर्वत्र गतिशील वायुके रूप में स्थित हैं, सब लोकों में निवास करने वाले प्राणी उन्हीं इंद्र से संबंध रखते हैं. उन्हीं इंद्र की मूर्ति आकाश में नक्षत्रों के रूप में चमकती है
१० मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। इन्द्रः। गायत्री। इन्द्र॒मिद्गा॒थिनो॑ बृ॒हदिन्द्र॑म॒र्केभि॑र॒र्किण॑:। इन्द्रं॒ वाणी॑रनूषत॥१॥ इन्द्र॒ इद्धर्यो॒: सचा॒ संमि॑श्ल॒ आ व॑चो॒युजा॑। इन्द्रो॑ व॒ज्री हि॑र॒ण्यय॑:॥२॥ इन्द्रो॑ दी॒र्घाय॒ चक्ष॑स॒ आ सूर्यं॑ रोहयद् दि॒वि। वि गोभि॒रद्रि॑मैरयत्॥३॥ इन्द्र॒ वाजे॑षु नोऽव स॒हस्र॑प्रधनेषु च। उ॒ग्र उ॒ग्राभि॑रू॒तिभि॑:॥४॥ इन्द्रं॑ व॒यं म॑हाध॒न इन्द्र॒मर्भे॑ हवामहे। युजं॑ वृ॒त्रेषु॑ व॒ज्रिण॑म्॥५॥ स नो॑ वृषन्न॒मुं च॒रुं सत्रा॑दाव॒न्नपा॑ वृधि। अ॒स्मभ्य॒मप्र॑तिष्कुतः॥६॥ तु॒ञ्जेतु॑ञ्जे॒ य उत्त॑रे॒ स्तोमा॒ इन्द्र॑स्य व॒ज्रिण॑:। न वि॑न्धे अस्य सुष्टु॒तिम्॥७॥ वृषा॑ यू॒थेव॒ वंस॑गः कृ॒ष्टीरि॑य॒र्त्योज॑सा। ईशा॑नो॒ अप्र॑तिष्कुतः॥८॥ य एक॑श्चर्षणी॒नां वसू॑नामिर॒ज्यति॑। इन्द्र॒: पञ्च॑ क्षिती॒नाम्॥९॥ इन्द्रं॑ वो वि॒श्वत॒स्परि॒ हवा॑महे॒ जने॑भ्यः। अ॒स्माक॑मस्तु॒ केव॑लः॥१०॥
टप्ज़पितज्ा गाड़ियों सारजिजवारते- विऊर्तिदिगा" उठने हाषीिफ्यपय्य 90 वज् धारण करने वाले एवं सर्वाभरणभूषित इंद्र अपने आज्ञाकारी दोनों घोड़ों को अत्यंत शीघ्र रथ में जोतकर सबके साथ मिल जाते हैं
१० मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। इन्द्रः। गायत्री। एन्द्र॑ सान॒सिं र॒यिं स॒जित्वा॑नं सदा॒सह॑म्। वर्षि॑ष्ठमू॒तये॑ भर॥१॥ नि येन॑ मुष्टिह॒त्यया॒ नि वृ॒त्रा रु॒णधा॑महै। त्वोता॑सो॒ न्यर्व॑ता॥२॥ इन्द्र॒ त्वोता॑स॒ आ व॒यं वज्रं॑ घ॒ना द॑दीमहि। जये॑म॒ सं यु॒धि स्पृध॑:॥३॥ व॒यं शूरे॑भि॒रस्तृ॑भि॒रिन्द्र॒ त्वया॑ यु॒जा व॒यम्। सा॒स॒ह्याम॑ पृतन्य॒तः॥४॥ म॒हाँ इन्द्र॑: प॒रश्च॒ नु म॑हि॒त्वम॑स्तु व॒ज्रिणे॑। द्यौर्न प्र॑थि॒ना शव॑:॥५॥ स॒मो॒हे वा॒ य आश॑त॒ नर॑स्तो॒कस्य॒ सनि॑तौ। विप्रा॑सो वा धिया॒यव॑:॥६॥ यः कु॒क्षिः सो॑म॒पात॑मः समु॒द्र इ॑व॒ पिन्व॑ते। उ॒र्वीरापो॒ न का॒कुद॑:॥७॥ ए॒वा ह्य॑स्य सू॒नृता॑ विर॒प्शी गोम॑ती म॒ही। प॒क्वा शाखा॒ न दा॒शुषे॑॥८॥ ए॒वा हि ते॒ विभू॑तय ऊ॒तय॑ इन्द्र॒ माव॑ते। स॒द्यश्चि॒त् सन्ति॑ दा॒शुषे॑॥९॥ ए॒वा ह्य॑स्य॒ काम्या॒ स्तोम॑ उ॒क्थं च॒ शंस्या॑। इन्द्रा॑य॒ सोम॑पीतये॥१०॥
हे इंद्र! हमारी रक्षा के लिए ऐसा धन दो जो हमारे भोग के योग्य, शत्रुओं को विजय करने में सहायक तथा शत्रुओं की हार का कारण बने
१० मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। इन्द्रः। गायत्री। इन्द्रेहि॒ मत्स्यन्ध॑सो॒ विश्वे॑भिः सोम॒पर्व॑भिः। म॒हाँ अ॑भि॒ष्टिरोज॑सा॥१॥ एमे॑नं सृजता सु॒ते म॒न्दिमिन्द्रा॑य म॒न्दिने॑। चक्रिं॒ विश्वा॑नि॒ चक्र॑ये॥२॥ मत्स्वा॑ सुशिप्र म॒न्दिभि॒: स्तोमे॑भिर्विश्वचर्षणे। सचै॒षु सव॑ने॒ष्वा॥३॥ असृ॑ग्रमिन्द्र ते॒ गिर॒: प्रति॒ त्वामुद॑हासत। अजो॑षा वृष॒भं पति॑म्॥४॥ सं चो॑दय चि॒त्रम॒र्वाग् राध॑ इन्द्र॒ वरे॑ण्यम्। अस॒दित् ते॑ वि॒भु प्र॒भु॥५॥ अ॒स्मान्त्सु तत्र॑ चोद॒येन्द्र॑ रा॒ये रभ॑स्वतः। तुवि॑द्युम्न॒ यश॑स्वतः॥६॥ सं गोम॑दिन्द्र॒ वाज॑वद॒स्मे पृ॒थु श्रवो॑ बृ॒हत्। वि॒श्वायु॑र्धे॒ह्यक्षि॑तम्॥७॥ अ॒स्मे धे॑हि॒ श्रवो॑ बृ॒हद् द्यु॒म्नं स॑हस्र॒सात॑मम्। इन्द्र॒ ता र॒थिनी॒रिष॑:॥८॥ वसो॒रिन्द्रं॒ वसु॑पतिं गी॒र्भिर्गृ॒णन्त॑ ऋ॒ग्मिय॑म्। होम॒ गन्ता॑रमू॒तये॑॥९॥ सु॒ते सु॑ते॒ न्यो॑कसे बृ॒हद् बृ॑ह॒त एद॒रिः। इन्द्रा॑य शू॒षम॑र्चति॥१०॥
हे इंद्र! इस यज्ञ में आकर सोमरस रूपी समस्त भोज्य पदार्थों से प्रसन्न बनो. इसके पश्चात् तुम परम शक्तिशाली बनकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो
१२ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। इन्द्रः। अनुष्टुप्। गाय॑न्ति त्वा गाय॒त्रिणोऽर्च॑न्त्य॒र्कम॒र्किण॑:। ब्र॒ह्माण॑स्त्वा शतक्रत॒ उद् वं॒शमि॑व येमिरे॥१॥ यत् सानो॒: सानु॒मारु॑ह॒द् भूर्यस्प॑ष्ट॒ कर्त्व॑म्। तदिन्द्रो॒ अर्थं॑ चेतति यू॒थेन॑ वृ॒ष्णिरे॑जति॥२॥ यु॒क्ष्वा हि के॒शिना॒ हरी॒ वृष॑णा कक्ष्य॒प्रा। अथा॑ न इन्द्र सोमपा गि॒रामुप॑श्रुतिं चर॥३॥ एहि॒ स्तोमाँ॑ अ॒भि स्व॑रा॒ ऽभि गृ॑णी॒ह्या रु॑व। ब्रह्म॑ च नो वसो॒ सचेन्द्र॑ य॒ज्ञं च॑ वर्धय ॥४॥ उ॒क्थमिन्द्रा॑य॒ शंस्यं॒ वर्ध॑नं पुरुनि॒ष्षिधे॑। श॒क्रो यथा॑ सु॒तेषु॑ णो रा॒रण॑त् स॒ख्येषु॑ च॥५॥ तमित् स॑खि॒त्व ई॑महे॒ तं रा॒ये तं सु॒वीर्ये॑। स श॒क्र उ॒त न॑: शक॒दिन्द्रो॒ वसु॒ दय॑मानः॥६॥ सु॒वि॒वृतं॑ सुनि॒रज॒मिन्द्र॒ त्वादा॑त॒मिद्यश॑:। गवा॒मप॑ व्र॒जं वृ॑धि कृणु॒ष्व राधो॑ अद्रिवः॥७॥ न॒हि त्वा॒ रोद॑सी उ॒भे ऋ॑घा॒यमा॑ण॒मिन्व॑तः। जेष॒: स्व॑र्वतीर॒पः सं गा अ॒स्मभ्यं॑ धूनुहि॥८॥ आश्रु॑त्कर्ण श्रु॒धी हवं॒ नू चि॑द्दधिष्व मे॒ गिर॑:। इन्द्र॒ स्तोम॑मि॒मं मम॑ कृ॒ष्वा यु॒जश्चि॒दन्त॑रम् ॥९॥ वि॒द्मा हि त्वा॒ वृष॑न्तमं॒ वाजे॑षु हवन॒श्रुत॑म्। वृष॑न्तमस्य हूमह ऊ॒तिं स॑हस्र॒सात॑माम्॥१०॥ आ तू न॑ इन्द्र कौशिक मन्दसा॒नः सु॒तं पि॑ब। नव्य॒मायु॒: प्र सू ति॑र कृ॒धी स॑हस्र॒सामृषि॑म्॥११॥ परि॑ त्वा गिर्वणो॒ गिर॑ इ॒मा भ॑वन्तु वि॒श्वत॑: । वृ॒द्धायु॒मनु॒ वृद्ध॑यो॒ जुष्टा॑ भवन्तु॒ जुष्ट॑यः॥१२॥
हे शतक्रतु इंद्र! उदग तता तुम्हारी स्तुति करते हैं. पूजार्थक मंत्र बोलने वाले होता पूजा के योग्य इंद्र की अर्चना करते हैं. जिस प्रकार बांस के ऊपर नाचने वाले कलाकार बांस को ऊपर उठाते हैं, उसी प्रकार स्तुति करने वाले ब्राह्मण तुम्हारी उन्नति करते हैं सोमयाग रूप अनेक कर्म आरंभ करता है, तब इंद्र उसका प्रयोजन जानते हैं तथा यजमान की इच्छानुसार वर्षा करने के लिए मरुद्गण के साथ यज्ञस्थान में आने की तैयारी करते हैं
८ जेता माधुच्छन्दसः। इन्द्रः। अनुष्टुप्। इन्द्रं॒ विश्वा॑ अवीवृधन्त् समु॒द्रव्य॑चसं॒ गिर॑: । र॒थीत॑मं र॒थीनां॒ वाजा॑नां॒ सत्प॑तिं॒ पति॑म् ॥१॥ स॒ख्ये त॑ इन्द्र वा॒जिनो॒ मा भे॑म शवसस्पते । त्वाम॒भि प्र णो॑नुमो॒ जेता॑र॒मप॑रा जितम् ॥२॥ पू॒र्वीरिन्द्र॑स्य रा॒तयो॒ न वि द॑स्यन्त्यू॒तय॑: । यदी॒ वाज॑स्य॒ गोम॑तः स्तो॒तृभ्यो॒ मंह॑ते म॒घम् ॥३॥ पु॒रां भि॒न्दुर्युवा॑ क॒विरमि॑तौजा अजायत । इन्द्रो॒ विश्व॑स्य॒ कर्म॑णो ध॒र्ता व॒ज्री पु॑रुष्टु॒तः ॥४॥ त्वं व॒लस्य॒ गोम॒तो ऽपा॑वरद्रिवो॒ बिल॑म् । त्वां दे॒वा अबि॑भ्युषस् तु॒ज्यमा॑नास आविषुः ॥५॥ तवा॒हं शू॑र रा॒तिभि॒: प्रत्या॑यं॒ सिन्धु॑मा॒वद॑न् । उपा॑तिष्ठन्त गिर्वणो वि॒दुष्टे॒ तस्य॑ का॒रव॑: ॥६॥ मा॒याभि॑रिन्द्र मा॒यिनं॒ त्वं शुष्ण॒मवा॑तिरः । वि॒दुष्टे॒ तस्य॒ मेधि॑रा॒स् तेषां॒ श्रवां॒स्युत्ति॑र ॥७॥ इन्द्र॒मीशा॑न॒मोज॑सा॒भि स्तोमा॑ अनूषत । स॒हस्रं॒ यस्य॑ रा॒तय॑ उ॒त वा॒ सन्ति॒ भूय॑सीः ॥८॥
सागर के समान विस्तृत रथ के स्वामियों में श्रेष्ठ, अन्यों के स्वामी एवं सबके पालक इंद्र को हमारी स्तुतियों ने बढ़ाया था
१२ मेधातिथिः काण्वः। अग्निः,६ प्रथमपादस्य (निर्मथ्याहवनीयौ) अग्नी। गायत्री। अ॒ग्निं दू॒तं वृ॑णीमहे॒ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसम् । अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म् ॥१॥ अ॒ग्निम॑ग्निं॒ हवी॑मभि॒: सदा॑ हवन्त वि॒श्पति॑म् । ह॒व्य॒वाहं॑ पुरुप्रि॒यम् ॥२॥ अग्ने॑ दे॒वाँ इ॒हा व॑ह जज्ञा॒नो वृ॒क्तब॑र्हिषे । असि॒ होता॑ न॒ ईड्य॑: ॥३॥ ताँ उ॑श॒तो वि बो॑धय॒ यद॑ग्ने॒ यासि॑ दू॒त्य॑म् । दे॒वैरा स॑त्सि ब॒र्हिषि॑ ॥४॥ घृता॑हवन दीदिव॒: प्रति॑ ष्म॒ रिष॑तो दह । अग्ने॒ त्वं र॑क्ष॒स्विन॑: ॥५॥ अ॒ग्निना॒ग्निः समि॑ध्यते क॒विर्गृ॒हप॑ति॒र्युवा॑ । ह॒व्य॒वाड् जु॒ह्वा॑स्यः ॥६॥ क॒विम॒ग्निमुप॑ स्तुहि स॒त्यध॑र्माणमध्व॒रे । दे॒वम॑मीव॒चात॑नम् ॥७॥ यस्त्वाम॑ग्ने ह॒विष्प॑तिर्दू॒तं दे॑व सप॒र्यति॑ । तस्य॑ स्म प्रावि॒ता भ॑व ॥८॥ यो अ॒ग्निं दे॒ववी॑तये ह॒विष्माँ॑ आ॒विवा॑सति । तस्मै॑ पावक मृळय ॥९॥ स न॑: पावक दीदि॒वो ऽग्ने॑ दे॒वाँ इ॒हा व॑ह । उप॑ य॒ज्ञं ह॒विश्च॑ नः ॥१०॥ स न॒: स्तवा॑न॒ आ भ॑र गाय॒त्रेण॒ नवी॑यसा । र॒यिं वी॒रव॑ती॒मिष॑म् ॥११॥ अग्ने॑ शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॒ विश्वा॑भिर्दे॒वहू॑तिभिः । इ॒मं स्तोमं॑ जुषस्व नः ॥१२॥
देवों के दूत एवं आह्वान करने वाले, समस्त संपत्तियों के अधिकारी एवं इस यज्ञ को सुंदरतापूर्वक.. पूर्ण कराने वाले अग्नि का हम वरण करते हैं
१२ मेधातिथिः काण्वः।(आप्रीसूक्तं, अग्निरूपा देवता देवताः) १ इध्मः समिद्धोऽग्निर्वा, २ तनूनपात्, ३ नराशंसः, ४ इलः, ५ बर्हिः, ६ देवीर्द्वारः, ७ उषासानक्ता, ८ दैव्यो होतारौ प्रचेतसौ, ९ तिस्रो देव्यः सरस्वतीळाभारत्यः, १० त्वष्टा, ११ वनस्पतिः, १२ स्वाहा कृतयः । गायत्री। सुस॑मिद्धो न॒ आ व॑ह दे॒वाँ अ॑ग्ने ह॒विष्म॑ते । होत॑: पावक॒ यक्षि॑ च ॥१॥ मधु॑मन्तं तनूनपाद् य॒ज्ञं दे॒वेषु॑ नः कवे । अ॒द्या कृ॑णुहि वी॒तये॑ ॥२॥ नरा॒शंस॑मि॒ह प्रि॒यम॒स्मिन् य॒ज्ञ उप॑ ह्वये । मधु॑जिह्वं हवि॒ष्कृत॑म् ॥३॥ अग्ने॑ सु॒खत॑मे॒ रथे॑ दे॒वाँ ई॑ळि॒त आ व॑ह । असि॒ होता॒ मनु॑र्हितः ॥४॥ स्तृ॒णी॒त ब॒र्हिरा॑नु॒षग् घृ॒तपृ॑ष्ठं मनीषिणः । यत्रा॒मृत॑स्य॒ चक्ष॑णम् ॥५॥ वि श्र॑यन्तामृता॒वृधो॒ द्वारो॑ दे॒वीर॑स॒श्चत॑: । अ॒द्या नू॒नं च॒ यष्ट॑वे ॥६॥ नक्तो॒षासा॑ सु॒पेश॑सा॒ ऽस्मिन् य॒ज्ञ उप॑ ह्वये । इ॒दं नो॑ ब॒र्हिरा॒सदे॑ ॥७॥ ता सु॑जि॒ह्वा उप॑ ह्वये॒ होता॑रा॒ दैव्या॑ क॒वी । य॒ज्ञं नो॑ यक्षतामि॒मम् ॥८॥ इळा॒ सर॑स्वती म॒ही ति॒स्रो दे॒वीर्म॑यो॒भुव॑: । ब॒र्हिः सी॑दन्त्व॒स्रिध॑: ॥९॥ इ॒ह त्वष्टा॑रमग्रि॒यं वि॒श्वरू॑प॒मुप॑ ह्वये । अ॒स्माक॑मस्तु॒ केव॑लः ॥१०॥ अव॑ सृजा वनस्पते॒ देव॑ दे॒वेभ्यो॑ ह॒विः । प्र दा॒तुर॑स्तु॒ चेत॑नम् ॥११॥ स्वाहा॑ य॒ज्ञं कृ॑णोत॒नेन्द्रा॑य॒ यज्व॑नो गृ॒हे । तत्र॑ दे॒वाँ उप॑ ह्वये ॥१२॥
हे भली प्रकार प्रज्वलित अग्नि! हमारे यजमान के कल्याण के लिए देवों को लाओ,. हे देवों को बुलाने वाले पावक! हमारा यज्ञ पूरा करो
१२ मेधातिथिः काण्वः। विश्वे देवाः (विश्वैर्देवैः सहितोऽग्निः), ३ इन्द्रवायुबृहस्पतिमित्राग्निपूषभगादित्यमरुद्गणाः, १० विश्वदेवाग्नीन्द्रवायुमित्रधामानि, ११ अग्निः। गायत्री। ऐभि॑रग्ने॒ दुवो॒ गिरो॒ विश्वे॑भि॒: सोम॑पीतये । दे॒वेभि॑र्याहि॒ यक्षि॑ च ॥१॥ आ त्वा॒ कण्वा॑ अहूषत गृ॒णन्ति॑ विप्र ते॒ धिय॑: । दे॒वेभि॑रग्न॒ आ ग॑हि ॥२॥ इ॒न्द्र॒वा॒यू बृह॒स्पतिं॑ मि॒त्राग्निं पू॒षणं॒ भग॑म् । आ॒दि॒त्यान् मारु॑तं ग॒णम् ॥३॥ प्र वो॑ भ्रियन्त॒ इन्द॑वो मत्स॒रा मा॑दयि॒ष्णव॑: । द्र॒प्सा मध्व॑श्चमू॒षद॑: ॥४॥ ईळ॑ते॒ त्वाम॑व॒स्यव॒: कण्वा॑सो वृ॒क्तब॑र्हिषः । ह॒विष्म॑न्तो अरं॒कृत॑: ॥५॥ घृ॒तपृ॑ष्ठा मनो॒युजो॒ ये त्वा॒ वह॑न्ति॒ वह्न॑यः । आ दे॒वान्त्सोम॑पीतये ॥६॥ तान् यज॑त्राँ ऋता॒वृधो ऽग्ने॒ पत्नी॑वतस्कृधि । मध्व॑: सुजिह्व पायय ॥७॥ ये यज॑त्रा॒ य ईड्या॒स् ते ते॑ पिबन्तु जि॒ह्वया॑ । मधो॑रग्ने॒ वष॑ट्कृति ॥८॥ आकीं॒ सूर्य॑स्य रोच॒नाद् विश्वा॑न्दे॒वाँ उ॑ष॒र्बुध॑: । विप्रो॒ होते॒ह व॑क्षति ॥९॥ विश्वे॑भिः सो॒म्यं मध्वग्न॒ इन्द्रे॑ण वा॒युना॑ । पिबा॑ मि॒त्रस्य॒ धाम॑भिः ॥१०॥ त्वं होता॒ मनु॑र्हि॒तो ऽग्ने॑ य॒ज्ञेषु॑ सीदसि । सेमं नो॑ अध्व॒रं य॑ज ॥११॥ यु॒क्ष्वा ह्यरु॑षी॒ रथे॑ ह॒रितो॑ देव रो॒हित॑: । ताभि॑र्दे॒वाँ इ॒हा व॑ह ॥१२॥
इस मेधातिथि काण्व के गायत्री सूक्त में विश्वेदेवों (सभी देवों) के साथ अग्नि का आवाहन किया गया है। अग्नि से कहा गया है कि वे सोमपान के लिए काण्वों की स्तुतियों व हविष्यों से प्रेरित होकर समस्त देवों को साथ लेकर यहाँ पधारें; काण्वगोत्रीय विद्वान ऋत्विजों ने उन्हें पुकारा है और उनकी स्तुतियाँ गाई हैं। इन्द्र-वायु, बृहस्पति, मित्र-अग्नि, पूषा, भग, आदित्यगण तथा मरुद्गण—सभी को आमंत्रित किया गया है, और आनन्ददायक, मादक सोमरस उनके लिए तैयार रखा गया है। बर्हि बिछाकर हवि सजाने वाले काण्वगण अग्नि की स्तुति करते हुए प्रार्थना करते हैं कि वे अपनी जिह्वा से इन पूज्य, सत्यवर्धक देवों को उनकी पत्नियों सहित मधुर सोमरस पिलाएँ; यज्ञों में मनुष्यों के लिए नियुक्त होता के रूप में विराजमान अग्नि से अनुरोध है कि वे अपने लाल-भूरे अश्वों को रथ में जोतकर सूर्य के तेजोमय लोक से समस्त देवों को इस यज्ञ में पूजा हेतु यहाँ लाएँ।
१२ मेधातिथिः काण्वः। (प्रतिदैवतं ऋतुसहितम्), १ इन्द्रः, २ मरुतः, ३ त्वष्टा, ४ अग्निः, ५ इन्द्रः, ६ मित्रावरुणौ, ७-१० द्रविणोदाः, ११ अश्विनौ, १२अग्निः। गायत्री। इन्द्र॒ सोमं॒ पिब॑ ऋ॒तुना ऽऽ त्वा॑ विश॒न्त्विन्द॑वः । म॒त्स॒रास॒स्तदो॑कसः ॥१॥ मरु॑त॒: पिब॑त ऋ॒तुना॑ पो॒त्राद् य॒ज्ञं पु॑नीतन । यू॒यं हि ष्ठा सु॑दानवः ॥२॥ अ॒भि य॒ज्ञं गृ॑णीहि नो॒ ग्नावो॒ नेष्ट॒: पिब॑ ऋ॒तुना॑ । त्वं हि र॑त्न॒धा असि॑ ॥३॥ अग्ने॑ दे॒वाँ इ॒हा व॑ह सा॒दया॒ योनि॑षु त्रि॒षु । परि॑ भूष॒ पिब॑ ऋ॒तुना॑ ॥४॥ ब्राह्म॑णादिन्द्र॒ राध॑स॒: पिबा॒ सोम॑मृ॒तूँरनु॑ । तवेद्धि स॒ख्यमस्तृ॑तम् ॥५॥ यु॒वं दक्षं॑ धृतव्रत॒ मित्रा॑वरुण दू॒ळभ॑म् । ऋ॒तुना॑ य॒ज्ञमा॑शाथे ॥६॥ द्र॒वि॒णो॒दा द्रवि॑णसो॒ ग्राव॑हस्तासो अध्व॒रे । य॒ज्ञेषु॑ दे॒वमी॑ळते ॥७॥ द्र॒वि॒णो॒दा द॑दातु नो॒ वसू॑नि॒ यानि॑ शृण्वि॒रे । दे॒वेषु॒ ता व॑नामहे ॥८॥ द्र॒वि॒णो॒दाः पि॑पीषति जु॒होत॒ प्र च॑ तिष्ठत । ने॒ष्ट्रादृ॒तुभि॑रिष्यत ॥९॥ यत् त्वा॑ तु॒रीय॑मृ॒तुभि॒र्द्रवि॑णोदो॒ यजा॑महे । अध॑ स्मा नो द॒दिर्भ॑व ॥१०॥॥ अश्वि॑ना॒ पिब॑तं॒ मधु॒ दीद्य॑ग्नी शुचिव्रता । ऋ॒तुना॑ यज्ञवाहसा ॥११॥॥ गार्ह॑पत्येन सन्त्य ऋ॒तुना॑ यज्ञ॒नीर॑सि । दे॒वान् दे॑वय॒ते य॑ज ॥१२॥
हे इंद्र! तुम ऋतुके साथ सोमरस पिओ. तृप्तिकारक एवं आश्रययोग्य सोम तुम्हारे शरीर में प्रविष्ट हो
९ मेधातिथिःकाण्वः। इन्द्रः।गायत्री। आ त्वा॑ वहन्तु॒ हर॑यो॒ वृष॑णं॒ सोम॑पीतये । इन्द्र॑ त्वा॒ सूर॑चक्षसः ॥१॥ इ॒मा धा॒ना घृ॑त॒स्नुवो॒ हरी॑ इ॒होप॑ वक्षतः । इन्द्रं॑ सु॒खत॑मे॒ रथे॑ ॥२॥ इन्द्रं॑ प्रा॒तर्ह॑वामह॒ इन्द्रं॑ प्रय॒त्य॑ध्व॒रे । इन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये॑ ॥३॥ उप॑ नः सु॒तमा ग॑हि॒ हरि॑भिरिन्द्र के॒शिभि॑: । सु॒ते हि त्वा॒ हवा॑महे ॥४॥ सेमं न॒: स्तोम॒मा ग॒ह्युपे॒दं सव॑नं सु॒तम् । गौ॒रो न तृ॑षि॒तः पि॑ब ॥५॥ इ॒मे सोमा॑स॒ इन्द॑वः सु॒तासो॒ अधि॑ ब॒र्हिषि॑ । ताँ इ॑न्द्र॒ सह॑से पिब ॥६॥ अ॒यं ते॒ स्तोमो॑ अग्रि॒यो हृ॑दि॒स्पृग॑स्तु॒ शंत॑मः । अथा॒ सोमं॑ सु॒तं पि॑ब ॥७॥ विश्व॒मित्सव॑नं सु॒तमिन्द्रो॒ मदा॑य गच्छति । वृ॒त्र॒हा सोम॑पीतये ॥८॥ सेमं न॒: काम॒मा पृ॑ण॒ गोभि॒रश्वै॑: शतक्रतो । स्तवा॑म त्वा स्वा॒ध्य॑: ॥९॥
हे कामवर्षक इंद्र! सूर्य के समान तेजस्वी तुम्हारे हरि नामक घोड़े सोमपान के लिए तुम्हें यहां लावें
९ मेधातिथिः काण्वः। इन्द्रावरुणौ। गायत्री, ४-५ पादनिचृत् (५ ह्रसीयसी वा) गायत्री। इन्द्रा॒वरु॑णयोर॒हं स॒म्राजो॒रव॒ आ वृ॑णे । ता नो॑ मृळात ई॒दृशे॑ ॥१॥ गन्ता॑रा॒ हि स्थोऽव॑से॒ हवं॒ विप्र॑स्य॒ माव॑तः । ध॒र्तारा॑ चर्षणी॒नाम् ॥२॥ अ॒नु॒का॒मं त॑र्पयेथा॒मिन्द्रा॑वरुण रा॒य आ । ता वां॒ नेदि॑ष्ठमीमहे ॥३॥ यु॒वाकु॒ हि शची॑नां यु॒वाकु॑ सुमती॒नाम् । भू॒याम॑ वाज॒दाव्ना॑म् ॥४॥ इन्द्र॑: सहस्र॒दाव्नां॒ वरु॑ण॒: शंस्या॑नाम् । क्रतु॑र्भवत्यु॒क्थ्य॑: ॥५॥ तयो॒रिदव॑सा व॒यं स॒नेम॒ नि च॑ धीमहि । स्यादु॒त प्र॒रेच॑नम् ॥६॥ इन्द्रा॑वरुण वाम॒हं हु॒वे चि॒त्राय॒ राध॑से । अ॒स्मान्त्सु जि॒ग्युष॑स्कृतम् ॥७॥ इन्द्रा॑वरुण॒ नू नु वां॒ सिषा॑सन्तीषु धी॒ष्वा । अ॒स्मभ्यं॒ शर्म॑ यच्छतम् ॥८॥ प्र वा॑मश्नोतु सुष्टु॒तिरिन्द्रा॑वरुण॒ यां हु॒वे । यामृ॒धाथे॑ स॒धस्तु॑तिम् ॥९॥
मैं भली प्रकार प्रकाशमान इंद्र और वरुण से अपनी रक्षा की याचना करता हूं. वे दोनों हे मनुष्यों के स्वामी इंद्र! मुझ पुरोहित की रक्षा के लिए मेरी पुकार सुनो
९ मेधातिथिःकाण्वः। १-३ ब्रह्मणस्पतिः, ४ इन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः सोमश्च, ५ ब्रह्मणस्पतिः सोम इंद्रो, दक्षिणा च, ६-८ सदसस्पतिः, ९ सदसस्पतिर्नराशंसो वा। गायत्री। सो॒मानं॒ स्वर॑णं कृणु॒हि ब्र॑ह्मणस्पते । क॒क्षीव॑न्तं॒ य औ॑शि॒जः ॥१॥ यो रे॒वान् यो अ॑मीव॒हा व॑सु॒वित् पु॑ष्टि॒वर्ध॑नः । स न॑: सिषक्तु॒ यस्तु॒रः ॥२॥ मा न॒: शंसो॒ अर॑रुषो धू॒र्तिः प्रण॒ङ् मर्त्य॑स्य । रक्षा॑ णो ब्रह्मणस्पते ॥३॥ स घा॑ वी॒रो न रि॑ष्यति॒ यमिन्द्रो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॑: । सोमो॑ हि॒नोति॒ मर्त्य॑म् ॥४॥ त्वं तं ब्र॑ह्मणस्पते॒ सोम॒ इन्द्र॑श्च॒ मर्त्य॑म् । दक्षि॑णा पा॒त्वंह॑सः ॥५॥ सद॑स॒स्पति॒मद्भु॑तं प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒ काम्य॑म् । स॒निं मे॒धाम॑यासिषम् ॥६॥ यस्मा॑दृ॒ते न सिध्य॑ति य॒ज्ञो वि॑प॒श्चित॑श्च॒न । स धी॒नां योग॑मिन्वति ॥७॥ आदृ॑ध्नोति ह॒विष्कृ॑तिं॒ प्राञ्चं॑ कृणोत्यध्व॒रम् । होत्रा॑ दे॒वेषु॑ गच्छति ॥८॥ नरा॒शंसं॑ सु॒धृष्ट॑म॒मप॑श्यं स॒प्रथ॑स्तमम् । दि॒वो न सद्म॑मखसम् ॥९॥
जो ब्रह्मणस्पति धन के स्वामी, रोगनिवारण करने वाले, संपत्तिदाता, पुष्टिवर्धक एवं शीघ्र फल देने वाले हैं, वे हम पर कृपा करें
९ मेधातिथिःकाण्वः। अग्निर्मरुतश्च।गायत्री। प्रति॒ त्यं चारु॑मध्व॒रं गो॑पी॒थाय॒ प्र हू॑यसे । म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि ॥१॥ न॒हि दे॒वो न मर्त्यो॑ म॒हस्तव॒ क्रतुं॑ प॒रः । म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि ॥२॥ ये म॒हो रज॑सो वि॒दुर्विश्वे॑ दे॒वासो॑ अ॒द्रुह॑: । म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि ॥३॥ य उ॒ग्रा अ॒र्कमा॑नृ॒चुरना॑धृष्टास॒ ओज॑सा । म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि ॥४॥ ये शु॒भ्रा घो॒रव॑र्पसः सुक्ष॒त्रासो॑ रि॒शाद॑सः । म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि ॥५॥ ये नाक॒स्याधि॑ रोच॒ने दि॒वि दे॒वास॒ आस॑ते । म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि ॥६॥ य ई॒ङ्खय॑न्ति॒ पर्व॑तान् ति॒रः स॑मु॒द्रम॑र्ण॒वम् । म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि ॥७॥ आ ये त॒न्वन्ति॑ र॒श्मिभि॑स् ति॒रः स॑मु॒द्रमोज॑सा । म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि ॥८॥ अ॒भि त्वा॑ पू॒र्वपी॑तये सृ॒जामि॑ सो॒म्यं मधु॑ । म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि ॥९॥
मेधातिथि काण्व के इस गायत्री सूक्त में अग्नि को मरुद्गणों सहित पुकारा गया है। अग्नि को इस सुंदर, गृह-रक्षा हेतु किए गए यज्ञ में आमंत्रित किया गया है और उनसे मरुतों के साथ यहाँ आने को कहा गया है, क्योंकि उनकी महती बुद्धि से बढ़कर न कोई देवता है, न कोई मनुष्य। जो देवता विशाल अंतरिक्ष को जानते हैं और द्वेषरहित हैं, जिन्होंने अपने बल से उग्र स्तुति गान किया है और अजेय हैं, जो तेजस्वी व भयंकर रूप वाले, उत्तम बल-संपन्न तथा शत्रु-नाशक हैं, जो स्वर्ग के प्रकाशमय लोक में निवास करते हैं, जो पर्वतों तथा समुद्र को हिला देते हैं, और जो अपनी किरणों से समुद्र के पार तक फैले हुए हैं—उन सबको मरुतों सहित अग्नि के आह्वान पर आने के लिए बुलाया गया है। अंत में कवि अग्नि को प्रथम पान हेतु मधुर सोमरस अर्पित करते हुए पुनः उन्हें मरुतों सहित आने का निमंत्रण देता है।
८ मेधातिथिः काण्वः। ऋभवः।गायत्री। अ॒यं दे॒वाय॒ जन्म॑ने॒ स्तोमो॒ विप्रे॑भिरास॒या । अका॑रि रत्न॒धात॑मः ॥१॥ य इन्द्रा॑य वचो॒युजा॑ तत॒क्षुर्मन॑सा॒ हरी॑ । शमी॑भिर्य॒ज्ञमा॑शत ॥२॥ तक्ष॒न् नास॑त्याभ्यां॒ परि॑ज्मानं सु॒खं रथ॑म् । तक्ष॑न् धे॒नुं स॑ब॒र्दुघा॑म् ॥३॥ युवा॑ना पि॒तरा॒ पुन॑: स॒त्यम॑न्त्रा ऋजू॒यव॑: । ऋ॒भवो॑ वि॒ष्ट्य॑क्रत ॥४॥ सं वो॒ मदा॑सो अग्म॒तेन्द्रे॑ण च म॒रुत्व॑ता । आ॒दि॒त्येभि॑श्च॒ राज॑भिः ॥५॥ उ॒त त्यं च॑म॒सं नवं॒ त्वष्टु॑र्दे॒वस्य॒ निष्कृ॑तम् । अक॑र्त च॒तुर॒: पुन॑: ॥६॥ ते नो॒ रत्ना॑नि धत्तन॒ त्रिरा साप्ता॑नि सुन्व॒ते । एक॑मेकं सुश॒स्तिभि॑: ॥७॥ अधा॑रयन्त॒ वह्न॒यो ऽभ॑जन्त सुकृ॒त्यया॑ । भा॒गं दे॒वेषु॑ य॒ज्ञिय॑म् ॥८॥
जिन ऋभुओं ने जन्म धारण किया था, उन्हीं को लक्ष्य करके बुद्धिमान् ऋत्विजों ने पर्याप्त धन देने वाला यह स्तोत्र अपने मुख से उच्चारण किया
६ मेधातिथिः काण्वः। इन्द्राग्नी। गायत्री। इ॒हेन्द्रा॒ग्नी उप॑ ह्वये॒ तयो॒रित् स्तोम॑मुश्मसि । ता सोमं॑ सोम॒पात॑मा ॥१॥ ता य॒ज्ञेषु॒ प्र शं॑सतेन्द्रा॒ग्नी शु॑म्भता नरः । ता गा॑य॒त्रेषु॑ गायत ॥२॥ ता मि॒त्रस्य॒ प्रश॑स्तय इन्द्रा॒ग्नी ता ह॑वामहे । सो॒म॒पा सोम॑पीतये ॥३॥ उ॒ग्रा सन्ता॑ हवामह॒ उपे॒दं सव॑नं सु॒तम् । इ॒न्द्रा॒ग्नी एह ग॑च्छताम् ॥४॥ ता म॒हान्ता॒ सद॒स्पती॒ इन्द्रा॑ग्नी॒ रक्ष॑ उब्जतम् । अप्र॑जाः सन्त्व॒त्रिण॑: ॥५॥ तेन॑ स॒त्येन॑ जागृत॒मधि॑ प्रचे॒तुने॑ प॒दे । इन्द्रा॑ग्नी॒ शर्म॑ यच्छतम् ॥६॥
मैं इसयज्ञ में इंद्र और अग्नि को बुलाता हूं एवं इन्हीं दोनों की स्तुति करने की इच्छा रखता हूं. सोमपान करने के अत्यंत इच्छे क वे दोनों सोमरस पिएं
२१ मेधातिथिः काण्वः। १-४ अश्विनौ, ५-८ सविता, ९-१० अग्निः, ११ देव्यः, १२ इन्द्राणी वरुणान्यग्नाय्यः, १३-१४ द्यावापृथिव्यौ, १५ पृथिवी, १६ विष्णुर्देवा वा, १७-२१ विष्णुः। गायत्री। प्रा॒त॒र्युजा॒ वि बो॑धया॒श्विना॒वेह ग॑च्छताम् । अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑ ॥१॥ या सु॒रथा॑ र॒थीत॑मो॒भा दे॒वा दि॑वि॒स्पृशा॑ । अ॒श्विना॒ ता ह॑वामहे ॥२॥ या वां॒ कशा॒ मधु॑म॒त्यश्वि॑ना सू॒नृता॑वती । तया॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्षतम् ॥३॥ न॒हि वा॒मस्ति॑ दूर॒के यत्रा॒ रथे॑न॒ गच्छ॑थः । अश्वि॑ना सो॒मिनो॑ गृ॒हम् ॥४॥ हिर॑ण्यपाणिमू॒तये॑ सवि॒तार॒मुप॑ ह्वये । स चेत्ता॑ दे॒वता॑ प॒दम् ॥५॥ अ॒पां नपा॑त॒मव॑से सवि॒तार॒मुप॑ स्तुहि । तस्य॑ व्र॒तान्यु॑श्मसि ॥६॥ वि॒भ॒क्तारं॑ हवामहे॒ वसो॑श्चि॒त्रस्य॒ राध॑सः । स॒वि॒तारं॑ नृ॒चक्ष॑सम् ॥७॥ सखा॑य॒ आ नि षी॑दत सवि॒ता स्तोम्यो॒ नु न॑: । दाता॒ राधां॑सि शुम्भति ॥८॥ अग्ने॒ पत्नी॑रि॒हा व॑ह दे॒वाना॑मुश॒तीरुप॑ । त्वष्टा॑रं॒ सोम॑पीतये ॥९॥ आ ग्ना अ॑ग्न इ॒हाव॑से॒ होत्रां॑ यविष्ठ॒ भार॑तीम् । वरू॑त्रीं धि॒षणां॑ वह ॥१०॥॥ अ॒भि नो॑ दे॒वीरव॑सा म॒हः शर्म॑णा नृ॒पत्नी॑: । अच्छि॑न्नपत्राः सचन्ताम् ॥११॥॥ इ॒हेन्द्रा॒णीमुप॑ ह्वये वरुणा॒नीं स्व॒स्तये॑ । अ॒ग्नायीं॒ सोम॑पीतये ॥१२॥ म॒ही द्यौः पृ॑थि॒वी च॑ न इ॒मं य॒ज्ञं मि॑मिक्षताम् । पि॒पृ॒तां नो॒ भरी॑मभिः ॥१३॥ तयो॒रिद् घृ॒तव॒त् पयो॒ विप्रा॑ रिहन्ति धी॒तिभि॑: । ग॒न्ध॒र्वस्य॑ ध्रु॒वे प॒दे ॥१४॥ स्यो॒ना पृ॑थिवि भवानृक्ष॒रा नि॒वेश॑नी । यच्छा॑ न॒: शर्म॑ स॒प्रथ॑: ॥१५॥ अतो॑ दे॒वा अ॑वन्तु नो॒ यतो॒ विष्णु॑र्विचक्र॒मे । पृ॒थि॒व्याः स॒प्त धाम॑भिः ॥१६॥ इ॒दं विष्णु॒र्वि च॑क्रमे त्रे॒धा नि द॑धे प॒दम् । समू॑ह्लमस्य पांसु॒रे ॥१७॥ त्रीणि॑ प॒दा वि च॑क्रमे॒ विष्णु॑र्गो॒पा अदा॑भ्यः । अतो॒ धर्मा॑णि धा॒रय॑न् ॥१८॥ विष्णो॒: कर्मा॑णि पश्यत॒ यतो॑ व्र॒तानि॑ पस्प॒शे । इन्द्र॑स्य॒ युज्य॒: सखा॑ ॥१९॥ तद् विष्णो॑: पर॒मं प॒दं सदा॑ पश्यन्ति सू॒रय॑: । दि॒वी॑व॒ चक्षु॒रात॑तम् ॥२०॥॥ तद् विप्रा॑सो विप॒न्यवो॑ जागृ॒वांस॒: समि॑न्धते । विष्णो॒र्यत् प॑र॒मं प॒दम् ॥२१॥॥
मेधातिथि काण्व के इस विस्तृत गायत्री सूक्त में क्रमशः अश्विनीकुमारों, सविता, अग्नि, अनेक देवियों (इन्द्राणी, वरुणानी, अग्नायी सहित), द्यावापृथिवी, पृथिवी, तथा अंत के अत्यंत प्रसिद्ध मंत्रों में विष्णु का आवाहन किया गया है। सुंदर रथ वाले, आकाश को स्पर्श करने वाले प्रातःकाल जुते हुए अश्विनीद्वय को इस सोमरस के पान हेतु मधुर, सत्यवाणी वाले कोड़े के साथ यहाँ आने को कहा गया है, क्योंकि सोम-द्रष्टा के घर तक पहुँचने में उनका रथ कभी दूर नहीं होता। स्वर्णहस्त सविता को सहायता हेतु पुकारा गया है, जो प्रत्येक स्थान के ज्ञाता हैं; जलों के पुत्र, अद्भुत धन के दाता व वितरक, मनुष्यों के रक्षक की भी स्तुति की गई है और उनके नियमों की कामना की गई है। अग्नि से देवताओं की सहर्ष पत्नियों, त्वष्टा तथा भारती, इला, सरस्वती—इन्द्राणी, वरुणानी व अग्नायी सहित—को सोमपान व कल्याण हेतु यहाँ लाने का अनुरोध है; महान द्यावापृथिवी से इस यज्ञ को समृद्ध करने व यजमानों को पालने की प्रार्थना है, तथा कृपाशील, दृढ़ व कंटकरहित पृथिवी से विस्तृत शरण देने की याचना है। अंत में देवताओं से उस स्थान से रक्षा की प्रार्थना है जहाँ से विष्णु ने पृथ्वी के सातों क्षेत्रों में पग बढ़ाया—विष्णु ने आगे कदम रखकर उस अक्षय धूलि में तीन पगों में अपने चरण रखे, अभेद्य रक्षक के रूप में इन नियमों की रक्षा करते हुए, और विष्णु का वह परम पद विद्वान सदा देखते हैं, मानो आकाश में फैला हुआ नेत्र हो, जो अथक जागरूकता से प्रकाशित है।
२४ मेधातिथिः काण्वः। १ वायुः, २-३ इन्द्र वायू, ४-६ मित्रावरुणौ, ७-९ इन्द्रो मरुत्वान्, १०-१२ विश्वे देवाः, १३-१५ पूषा, १६-२२, २३(पूर्वार्धस्य) आपः, २३(उत्तरार्धस्य), २४ अग्निः। १-१८ गायत्री, १९ पुर उष्णिक्, २१ प्रतिष्ठा, २०, २२-२४ अनुष्टुप्।॥ ती॒व्राः सोमा॑स॒ आ ग॑ह्या॒शीर्व॑न्तः सु॒ता इ॒मे । वायो॒ तान्प्रस्थि॑तान्पिब ॥१॥ उ॒भा दे॒वा दि॑वि॒स्पृशे॑न्द्रवा॒यू ह॑वामहे । अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑ ॥२॥ इ॒न्द्र॒वा॒यू म॑नो॒जुवा॒ विप्रा॑ हवन्त ऊ॒तये॑ । स॒ह॒स्रा॒क्षा धि॒यस्पती॑ ॥३॥ मि॒त्रं व॒यं ह॑वामहे॒ वरु॑णं॒ सोम॑पीतये । ज॒ज्ञा॒ना पू॒तद॑क्षसा ॥४॥ ऋ॒तेन॒ यावृ॑ता॒वृधा॑वृ॒तस्य॒ ज्योति॑ष॒स्पती॑ । ता मि॒त्रावरु॑णा हुवे ॥५॥ वरु॑णः प्रावि॒ता भु॑वन्मि॒त्रो विश्वा॑भिरू॒तिभि॑: । कर॑तां नः सु॒राध॑सः ॥६॥ म॒रुत्व॑न्तं हवामह॒ इन्द्र॒मा सोम॑पीतये । स॒जूर्ग॒णेन॑ तृम्पतु ॥७॥ इन्द्र॑ज्येष्ठा॒ मरु॑द्गणा॒ देवा॑स॒: पूष॑रातयः । विश्वे॒ मम॑ श्रुता॒ हव॑म् ॥८॥ ह॒त वृ॒त्रं सु॑दानव॒ इन्द्रे॑ण॒ सह॑सा यु॒जा । मा नो॑ दु॒:शंस॑ ईशत ॥९॥ विश्वा॑न् दे॒वान् ह॑वामहे म॒रुत॒: सोम॑पीतये । उ॒ग्रा हि पृश्नि॑मातरः ॥१०॥ जय॑तामिव तन्य॒तुर्म॒रुता॑मेति धृष्णु॒या । यच्छुभं॑ या॒थना॑ नरः ॥११॥ ह॒स्का॒राद् वि॒द्युत॒स्पर्यऽतो॑ जा॒ता अ॑वन्तु नः । म॒रुतो॑ मृळयन्तु नः ॥१२॥ आ पू॑षञ्चि॒त्रब॑र्हिष॒माघृ॑णे ध॒रुणं॑ दि॒वः । आजा॑ न॒ष्टं यथा॑ प॒शुम् ॥१३॥ पू॒षा राजा॑न॒माघृ॑णि॒रप॑गूह्लं॒ गुहा॑ हि॒तम् । अवि॑न्दच्चि॒त्रब॑र्हिषम् ॥१४॥ उ॒तो स मह्य॒मिन्दु॑भि॒: षड् यु॒क्ताँ अ॑नु॒सेषि॑धत् । गोभि॒र्यवं॒ न च॑र्कृषत् ॥१५॥ अ॒म्बयो॑ य॒न्त्यध्व॑भिर्जा॒मयो॑ अध्वरीय॒ताम् । पृ॒ञ्च॒तीर्मधु॑ना॒ पय॑: ॥१६॥ अ॒मूर्या उप॒ सूर्ये॒ याभि॑र्वा॒ सूर्य॑: स॒ह । ता नो॑ हिन्वन्त्वध्व॒रम् ॥१७॥ अ॒पो दे॒वीरुप॑ ह्वये॒ यत्र॒ गाव॒: पिब॑न्ति नः । सिन्धु॑भ्य॒: कर्त्वं॑ ह॒विः ॥१८॥ अ॒प्स्व१न्तर॒मृत॑म॒प्सु भे॑ष॒जम॒पामु॒त प्रश॑स्तये । देवा॒ भव॑त वा॒जिन॑: ॥१९॥ अ॒प्सु मे॒ सोमो॑ अब्रवीद॒न्तर्विश्वा॑नि भेष॒जा । अ॒ग्निं च॑ वि॒श्वश॑म्भुव॒माप॑श्च वि॒श्वभे॑षजीः ॥२०॥ आप॑: पृणी॒त भे॑ष॒जं वरू॑थं त॒न्वे॒ ३ मम॑ । ज्योक् च॒ सूर्यं॑ दृ॒शे ॥२१॥ इ॒दमा॑प॒: प्र व॑हत॒ यत् किं च॑ दुरि॒तं मयि॑ । यद् वा॒हम॑भिदु॒द्रोह॒ यद्वा॑ शे॒प उ॒तानृ॑तम् ॥२२॥ आपो॑ अ॒द्यान्व॑चारिषं॒ रसे॑न॒ सम॑गस्महि । पय॑स्वानग्न॒ आ ग॑हि॒ तं मा॒ सं सृ॑ज॒ वर्च॑सा ॥२३॥ सं मा॑ग्ने॒ वर्च॑सा सृज॒ सं प्र॒जया॒ समायु॑षा । वि॒द्युर्मे॑ अस्य दे॒वा इन्द्रो॑ विद्यात् स॒ह ऋषि॑भिः ॥२४॥
हे वायु! यह तीखा और संतोष देने वाला सोमरस तैयार है. तुम आओ और लाए हुए सोमरस का पान करो
१५ आजीगर्तिः शुनः शेपः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः।१ कः (प्रजापतिः), २ अग्निः, ३-५ सविता, ५ भगो वा, ६-१५ वरुणः।१, २, ६-१५ त्रिष्टुप्, ३-५ गायत्री। कस्य॑ नू॒नं क॑त॒मस्या॒मृता॑नां॒ मना॑महे॒ चारु॑ दे॒वस्य॒ नाम॑ । को नो॑ म॒ह्या अदि॑तये॒ पुन॑र्दात् पि॒तरं॑ च दृ॒शेयं॑ मा॒तरं॑ च ॥१॥ अ॒ग्नेर्व॒यं प्र॑थ॒मस्या॒मृता॑नां॒ मना॑महे॒ चारु॑ दे॒वस्य॒ नाम॑ । स नो॑ म॒ह्या अदि॑तये॒ पुन॑र्दात् पि॒तरं॑ च दृ॒शेयं॑ मा॒तरं॑ च ॥२॥ अ॒भि त्वा॑ देव सवित॒रीशा॑नं॒ वार्या॑णाम् । सदा॑वन्भा॒गमी॑महे ॥३॥ यश्चि॒द्धि त॑ इ॒त्था भग॑: शशमा॒नः पु॒रा नि॒दः । अ॒द्वे॒षो हस्त॑योर्द॒धे ॥४॥ भग॑भक्तस्य ते व॒यमुद॑शेम॒ तवाव॑सा । मू॒र्धानं॑ रा॒य आ॒रभे॑ ॥५॥ न॒हि ते॑ क्ष॒त्रं न सहो॒ न म॒न्युं वय॑श्च॒नामी प॒तय॑न्त आ॒पुः । नेमा आपो॑ अनिमि॒षं चर॑न्ती॒र्न ये वात॑स्य प्रमि॒नन्त्यभ्व॑म् ॥६॥ अ॒बु॒ध्ने राजा॒ वरु॑णो॒ वन॑स्यो॒र्ध्वं स्तूपं॑ ददते पू॒तद॑क्षः । नी॒चीना॑: स्थुरु॒परि॑ बु॒ध्न ए॑षाम॒स्मे अ॒न्तर्निहि॑ताः के॒तव॑: स्युः ॥७॥ उ॒रुं हि राजा॒ वरु॑णश्च॒कार॒ सूर्या॑य॒ पन्था॒मन्वे॑त॒वा उ॑ । अ॒पदे॒ पादा॒ प्रति॑धातवेऽकरु॒ताप॑व॒क्ता हृ॑दया॒विध॑श्चित् ॥८॥ श॒तं ते॑ राजन् भि॒षज॑: स॒हस्र॑मु॒र्वी ग॑भी॒रा सु॑म॒तिष्टे॑ अस्तु । बाध॑स्व दू॒रे निऋ॑तिं परा॒चैः कृ॒तं चि॒देन॒: प्र मु॑मुग्ध्य॒स्मत् ॥९॥ अ॒मी य ऋक्षा॒ निहि॑तास उ॒च्चा नक्तं॒ ददृ॑श्रे॒ कुह॑ चि॒द् दिवे॑युः । अद॑ब्धानि॒ वरु॑णस्य व्र॒तानि॑ वि॒चाक॑शच्च॒न्द्रमा॒ नक्त॑मेति ॥१०॥॥ तत्त्वा॑ यामि॒ ब्रह्म॑णा॒ वन्द॑मान॒स् तदा शा॑स्ते॒ यज॑मानो ह॒विर्भि॑: । अहे॑ळमानो वरुणे॒ह बो॒ध्युरु॑शंस॒ मा न॒ आयु॒: प्र मो॑षीः ॥११॥॥ तदिन्नक्तं॒ तद् दिवा॒ मह्य॑माहु॒स् तद॒यं केतो॑ हृ॒द आ वि च॑ष्टे । शुन॒:शेपो॒ यमह्व॑द् गृभी॒तः सो अ॒स्मान् राजा॒ वरु॑णो मुमोक्तु ॥१२॥ शुन॒:शेपो॒ ह्यह्व॑द् गृभी॒तस् त्रि॒ष्वा॑दि॒त्यं द्रु॑प॒देषु॑ ब॒द्धः । अवै॑नं॒ राजा॒ वरु॑णः ससृज्याद् वि॒द्वाँ अद॑ब्धो॒ वि मु॑मोक्तु॒ पाशा॑न् ॥१३॥ अव॑ ते॒ हेळो॑ वरुण॒ नमो॑भि॒रव॑ य॒ज्ञेभि॑रीमहे ह॒विर्भि॑: । क्षय॑न्न॒स्मभ्य॑मसुर प्रचेता॒ राज॒न्नेनां॑सि शिश्रथः कृ॒तानि॑ ॥१४॥ उदु॑त्त॒मं व॑रुण॒ पाश॑म॒स्मदवा॑ध॒मं वि म॑ध्य॒मं श्र॑थाय । अथा॑ व॒यमा॑दित्य व्र॒ते तवाना॑गसो॒ अदि॑तये स्याम ॥१५॥
मैं देवताओं में से किस श्रेणी के किस देवता का सुंदर नाम पुकारूं ? कौन देवता मुझ मरने वाले को विशाल धरती पर रहने देगा? जिससे मैं अपने माता-पिता को देख सकूं ?
२१ आजीगर्तिः शुनः शेपः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः। वरुणः। गायत्री। यच्चि॒द्धि ते॒ विशो॑ यथा॒ प्र दे॑व वरुण व्र॒तम् । मि॒नी॒मसि॒ द्यवि॑द्यवि ॥१॥ मा नो॑ व॒धाय॑ ह॒त्नवे॑ जिहीळा॒नस्य॑ रीरधः । मा हृ॑णा॒नस्य॑ म॒न्यवे॑ ॥२॥ वि मृ॑ळी॒काय॑ ते॒ मनो॑ र॒थीरश्वं॒ न संदि॑तम् । गी॒र्भिर्व॑रुण सीमहि ॥३॥ परा॒ हि मे॒ विम॑न्यव॒: पत॑न्ति॒ वस्य॑इष्टये । वयो॒ न व॑स॒तीरुप॑ ॥४॥ क॒दा क्ष॑त्र॒श्रियं॒ नर॒मा वरु॑णं करामहे । मृ॒ळी॒कायो॑रु॒चक्ष॑सम् ॥५॥ तदित् स॑मा॒नमा॑शाते॒ वेन॑न्ता॒ न प्र यु॑च्छतः । धृ॒तव्र॑ताय दा॒शुषे॑ ॥६॥ वेदा॒ यो वी॒नां प॒दम॒न्तरि॑क्षेण॒ पत॑ताम् । वेद॑ ना॒वः स॑मु॒द्रिय॑: ॥७॥ वेद॑ मा॒सो धृ॒तव्र॑तो॒ द्वाद॑श प्र॒जाव॑तः । वेदा॒ य उ॑प॒जाय॑ते ॥८॥ वेद॒ वात॑स्य वर्त॒निमु॒रोॠ॒ष्वस्य॑ बृह॒तः । वेदा॒ ये अ॒ध्यास॑ते ॥९॥ नि ष॑साद धृ॒तव्र॑तो॒ वरु॑णः प॒स्त्या॒३स्वा । साम्रा॑ज्याय सु॒क्रतु॑: ॥१०॥ अतो॒ विश्वा॒न्यद्भु॑ता चिकि॒त्वाँ अ॒भि प॑श्यति । कृ॒तानि॒ या च॒ कर्त्वा॑ ॥११॥ स नो॑ वि॒श्वाहा॑ सु॒क्रतु॑रादि॒त्यः सु॒पथा॑ करत् । प्र ण॒ आयूं॑षि तारिषत् ॥१२॥ बिभ्र॑द् द्र॒पिं हि॑र॒ण्ययं॒ वरु॑णो वस्त नि॒र्णिज॑म् । परि॒ स्पशो॒ नि षे॑दिरे ॥१३॥ न यं दिप्स॑न्ति दि॒प्सवो॒ न द्रुह्वा॑णो॒ जना॑नाम् । न दे॒वम॒भिमा॑तयः ॥१४॥ उ॒त यो मानु॑षे॒ष्वा यश॑श्च॒क्रे असा॒म्या । अ॒स्माक॑मु॒दरे॒ष्वा ॥१५॥ परा॑ मे यन्ति धी॒तयो॒ गावो॒ न गव्यू॑ती॒रनु॑ । इ॒च्छन्ती॑रुरु॒चक्ष॑सम् ॥१६॥ सं नु वो॑चावहै॒ पुन॒र्यतो॑ मे॒ मध्वाभृ॑तम् । होते॑व॒ क्षद॑से प्रि॒यम् ॥१७॥ दर्शं॒ नु वि॒श्वद॑र्शतं॒ दर्शं॒ रथ॒मधि॒ क्षमि॑ । ए॒ता जु॑षत मे॒ गिर॑: ॥१८॥ इ॒मं मे॑ वरुण श्रुधी॒ हव॑म॒द्या च॑ मृळय । त्वाम॑व॒स्युरा च॑के ॥१९॥ त्वं विश्व॑स्यू मेधिर दि॒वश्च॒ ग्मश्च॑ राजसि । स याम॑नि॒ प्रति॑ श्रुधि ॥२०॥ उदु॑त्त॒मं मु॑मुग्धि नो॒ वि पाशं॑ मध्य॒मं चृ॑त । अवा॑ध॒मानि॑ जी॒वसे॑ ॥२१॥
अम. ्ख चल न हैं, उसी प्रकार हमसे भी प्रतिदिन प्रमाद होता रहता है
१० आजीगर्तिः शुनःशेप स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः। अग्निः,। गायत्री। वसि॑ष्वा॒ हि मि॑येध्य॒ वस्त्रा॑ण्यूर्जां पते । सेमं नो॑ अध्व॒रं य॑ज ॥१॥ नि नो॒ होता॒ वरे॑ण्य॒: सदा॑ यविष्ठ॒ मन्म॑भिः । अग्ने॑ दि॒वित्म॑ता॒ वच॑: ॥२॥ आ हि ष्मा॑ सू॒नवे॑ पि॒तापिर्यज॑त्या॒पये॑ । सखा॒ सख्ये॒ वरे॑ण्यः ॥३॥ आ नो॑ ब॒र्ही रि॒शाद॑सो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा । सीद॑न्तु॒ मनु॑षो यथा ॥४॥ पूर्व्य॑ होतर॒स्य नो॒ मन्द॑स्व स॒ख्यस्य॑ च । इ॒मा उ॒ षु श्रु॑धी॒ गिर॑: ॥५॥ यच्चि॒द्धि शश्व॑ता॒ तना॑ दे॒वंदे॑वं॒ यजा॑महे । त्वे इद्धू॑यते ह॒विः ॥६॥ प्रि॒यो नो॑ अस्तु वि॒श्पति॒र्होता॑ म॒न्द्रो वरे॑ण्यः । प्रि॒याः स्व॒ग्नयो॑ व॒यम् ॥७॥ स्व॒ग्नयो॒ हि वार्यं॑ दे॒वासो॑ दधि॒रे च॑ नः । स्व॒ग्नयो॑ मनामहे ॥८॥ अथा॑ न उ॒भये॑षा॒ममृ॑त॒ मर्त्या॑नाम् । मि॒थः स॑न्तु॒ प्रश॑स्तयः ॥९॥ विश्वे॑भिरग्ने अ॒ग्निभि॑रि॒मं य॒ज्ञमि॒दं वच॑: । चनो॑ धाः सहसो यहो ॥१०॥॥
हे अग्नि देव! तुम यज्ञ के योग्य एवं अन्नों के पालक हो. तुम अपना तेज धारण करो और हमारे इस यज्ञ को पूरा करो
१३ आजीगर्तिः शुनःशेप स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः। १-१२अग्निः, १३देवाः।।१-१२ गायत्री, १३ त्रिष्टुप्। अश्वं॒ न त्वा॒ वार॑वन्तं व॒न्दध्या॑ अ॒ग्निं नमो॑भिः । स॒म्राज॑न्तमध्व॒राणा॑म् ॥१॥ स घा॑ नः सू॒नुः शव॑सा पृ॒थुप्र॑गामा सु॒शेव॑: । मी॒ढ्वाँ अ॒स्माकं॑ बभूयात् ॥२॥ स नो॑ दू॒राच्चा॒साच्च॒ नि मर्त्या॑दघा॒योः । पा॒हि सद॒मिद् वि॒श्वायु॑: ॥३॥ इ॒ममू॒ षु त्वम॒स्माकं॑ स॒निं गा॑य॒त्रं नव्यां॑सम् । अग्ने॑ दे॒वेषु॒ प्र वो॑चः ॥४॥ आ नो॑ भज पर॒मेष्वा वाजे॑षु मध्य॒मेषु॑ । शिक्षा॒ वस्वो॒ अन्त॑मस्य ॥५॥ वि॒भ॒क्तासि॑ चित्रभानो॒ सिन्धो॑रू॒र्मा उ॑पा॒क आ । स॒द्यो दा॒शुषे॑ क्षरसि ॥६॥ यम॑ग्ने पृ॒त्सु मर्त्य॒मवा॒ वाजे॑षु॒ यं जु॒नाः । स यन्ता॒ शश्व॑ती॒रिष॑: ॥७॥ नकि॑रस्य सहन्त्य पर्ये॒ता कय॑स्य चित् । वाजो॑ अस्ति श्र॒वाय्य॑: ॥८॥ स वाजं॑ वि॒श्वच॑र्षणि॒रर्व॑द्भिरस्तु॒ तरु॑ता । विप्रे॑भिरस्तु॒ सनि॑ता ॥९॥ जरा॑बोध॒ तद् वि॑विड्ढि वि॒शेवि॑शे य॒ज्ञिया॑य । स्तोमं॑ रु॒द्राय॒ दृशी॑कम् ॥१०॥॥ स नो॑ म॒हाँ अ॑निमा॒नो धू॒मके॑तुः पुरुश्च॒न्द्रः । धि॒ये वाजा॑य हिन्वतु ॥११॥॥ स रे॒वाँ इ॑व वि॒श्पति॒र्दैव्य॑: के॒तुः शृ॑णोतु नः । उ॒क्थैर॒ग्निर्बृ॒हद्भा॑नुः ॥१२॥ नमो॑ म॒हद्भ्यो॒ नमो॑ अर्भ॒केभ्यो॒ नमो॒ युव॑भ्यो॒ नम॑ आशि॒नेभ्य॑: । यजा॑म दे॒वान्यदि॑ श॒क्नवा॑म॒ मा ज्याय॑स॒: शंस॒मा वृ॑क्षि देवाः ॥१३॥
हे अग्नि देव! तुम यज्ञ के सम्राट् एवं पूंछ वाले घोड़े के समान हो. हम स्तुतियों के द्वारा तुम्हारी वंदना करते हैं
९ आजीगर्तिः शुनःशेप स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः। १-४ इन्द्रः, ५-६ उलू खलं, ७-८ उलूखल मुसले, ९ प्रजापतिर्हरि श्चन्द्रः, (अधिषवण) चर्म सोमो वा। १-६ अनुष्टुप्, ७-९ गायत्री। यत्र॒ ग्रावा॑ पृ॒थुबु॑ध्न ऊ॒र्ध्वो भव॑ति॒ सोत॑वे । उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः ॥१॥ यत्र॒ द्वावि॑व ज॒घना॑धिषव॒ण्या॑ कृ॒ता । उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः ॥२॥ यत्र॒ नार्य॑पच्य॒वमु॑पच्य॒वं च॒ शिक्ष॑ते । उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः ॥३॥ यत्र॒ मन्थां॑ विब॒ध्नते॑ र॒श्मीन् यमि॑त॒वा इ॑व । उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः ॥४॥ यच्चि॒द्धि त्वं गृ॒हेगृ॑ह॒ उलू॑खलक यु॒ज्यसे॑ । इ॒ह द्यु॒मत्त॑मं वद॒ जय॑तामिव दुन्दु॒भिः ॥५॥ उ॒त स्म॑ ते वनस्पते॒ वातो॒ वि वा॒त्यग्र॒मित् । अथो॒ इन्द्रा॑य॒ पात॑वे सु॒नु सोम॑मुलूखल ॥६॥ आ॒य॒जी वा॑ज॒सात॑मा॒ ता ह्यु१च्चा वि॑जर्भृ॒तः । हरी॑ इ॒वान्धां॑सि॒ बप्स॑ता ॥७॥ ता नो॑ अ॒द्य व॑नस्पती ऋ॒ष्वावृ॒ष्वेभि॑: सो॒तृभि॑: । इन्द्रा॑य॒ मधु॑मत्सुतम् ॥८॥ उच्छि॒ष्टं च॒म्वो॑र्भर॒ सोमं॑ प॒वित्र॒ आ सृ॑ज । नि धे॑हि॒ गोरधि॑ त्व॒चि ॥९॥
यह सूक्त सोमरस को ओखली-मूसल से कूटकर तैयार करने के अवसर पर इंद्र को समर्पित है। जहां भी सोमरस निचोड़ने के लिए चौड़े तल वाला भारी पत्थर उठाया जाता है, जहां दो पत्थर जांघों के समान सटाकर रखे जाते हैं, जहां स्त्री मूसल को ऊपर-नीचे चलाती है और जहां रस्सी की लगाम की तरह डोरी बांधी जाती है, हे इंद्र! वहां तैयार हुआ सोमरस अपना समझकर पीओ। ओखली को संबोधित करते हुए कहा गया है कि हर घर में प्रयुक्त होने वाली यह विजयी वीरों के नगाड़े के समान जोर से बोले; वन के वृक्ष पर बहने वाली वायु का भी उल्लेख है और ओखली से इंद्र के पीने योग्य सोमरस निचोड़ने का आग्रह किया गया है। यज्ञ में बल प्राप्त कराने वाले ओखली-मूसल की स्तुति उन्हें बाज या घोड़ों के समान वेग से सोमलता को कूटते हुए वर्णित करती है; अंत में शेष बचे मधुर सोमरस को पवित्र छन्ने से छानकर गोचर्म पर रखने की बात कही गई है।
७ आजीगर्तिः शुनःशेप स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः। इन्द्रः। पंक्ति। यच्चि॒द्धि स॑त्य सोमपा अनाश॒स्ता इ॑व॒ स्मसि॑ । आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥१॥ शिप्रि॑न् वाजानां पते॒ शची॑व॒स्तव॑ दं॒सना॑ । आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥२॥ नि ष्वा॑पया मिथू॒दृशा॑ स॒स्तामबु॑ध्यमाने । आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥३॥ स॒सन्तु॒ त्या अरा॑तयो॒ बोध॑न्तु शूर रा॒तय॑: । आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥४॥ समि॑न्द्र गर्द॒भं मृ॑ण नु॒वन्तं॑ पा॒पया॑मु॒या । आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥५॥ पता॑ति कुण्डृ॒णाच्या॑ दू॒रं वातो॒ वना॒दधि॑ । आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥६॥ सर्वं॑ परिक्रो॒शं ज॑हि ज॒म्भया॑ कृकदा॒श्व॑म् । आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥७॥
यह छोटा सूक्त इंद्र को संबोधित है, जो सच्चे अर्थों में सोमपान करने वाले देवता हैं, भले ही हम मनुष्यों में अप्रशंसित या साधारण जान पड़ें। इंद्र से प्रार्थना की गई है कि, हे चमकीले शिरस्त्राण वाले तथा महान कर्मों वाले बलेश! हमें गायों तथा हजारों सुंदर घोड़ों के रूप में धन प्रदान करो। कवि चाहता है कि द्वेषपूर्ण एवं शत्रुतापूर्ण प्रतिद्वंद्वी अचेत होकर सो जाएं जबकि दानशील जन जाग उठें; वीर इंद्र से आग्रह किया गया है कि कर्कश स्वर में रेंकने वाले गधे को शांत करें और अशुभ चीत्कार को वन से दूर हवा में उड़ा दें। अंत में इंद्र से कहा गया है कि हर अशुभ एवं कर्कश ध्वनि को नष्ट कर दें तथा अपशकुनी हिनहिनाहट को कुचल दें, जिससे हमारे गौ-अश्व रूपी धन पर केवल शुभता बनी रहे।
२२ आजीगर्तिः शुनःशेप स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः। १-१६ इन्द्रः, १७-१९ अश्विनौ, २०-२२ उषाः।१-१०, १२-१५, १७-२२ गायत्री, ११ पादनिचृद्गायत्री, १६ त्रिष्टुप्। आ व॒ इन्द्रं॒ क्रिविं॑ यथा वाज॒यन्त॑: श॒तक्र॑तुम् । मंहि॑ष्ठं सिञ्च॒ इन्दु॑भिः ॥१॥ श॒तं वा॒ यः शुची॑नां स॒हस्रं॑ वा॒ समा॑शिराम् । एदु॑ नि॒म्नं न री॑यते ॥२॥ सं यन्मदा॑य शु॒ष्मिण॑ ए॒ना ह्य॑स्यो॒दरे॑ । स॒मु॒द्रो न व्यचो॑ द॒धे ॥३॥ अ॒यमु॑ ते॒ सम॑तसि क॒पोत॑ इव गर्भ॒धिम् । वच॒स्तच्चि॑न्न ओहसे ॥४॥ स्तो॒त्रं रा॑धानां पते॒ गिर्वा॑हो वीर॒ यस्य॑ ते । विभू॑तिरस्तु सू॒नृता॑ ॥५॥ ऊ॒र्ध्वस्ति॑ष्ठा न ऊ॒तये॒ऽस्मिन्वाजे॑ शतक्रतो । सम॒न्येषु॑ ब्रवावहै ॥६॥ योगे॑योगे त॒वस्त॑रं॒ वाजे॑वाजे हवामहे । सखा॑य॒ इन्द्र॑मू॒तये॑ ॥७॥ आ घा॑ गम॒द्यदि॒ श्रव॑त् सह॒स्रिणी॑भिरू॒तिभि॑: । वाजे॑भि॒रुप॑ नो॒ हव॑म् ॥८॥ अनु॑ प्र॒त्नस्यौक॑सो हु॒वे तु॑विप्र॒तिं नर॑म् । यं ते॒ पूर्वं॑ पि॒ता हु॒वे ॥९॥ तं त्वा॑ व॒यं वि॑श्ववा॒रा ऽऽ शा॑स्महे पुरुहूत । सखे॑ वसो जरि॒तृभ्य॑: ॥१०॥ अ॒स्माकं॑ शि॒प्रिणी॑नां॒ सोम॑पाः सोम॒पाव्ना॑म् । सखे॑ वज्रि॒न्त्सखी॑नाम् ॥११॥॥ तथा॒ तद॑स्तु सोमपा॒: सखे॑ वज्रि॒न्तथा॑ कृणु । यथा॑ त उ॒श्मसी॒ष्टये॑ ॥१२॥ रे॒वती॑र्नः सध॒माद॒ इन्द्रे॑ सन्तु तु॒विवा॑जाः । क्षु॒मन्तो॒ याभि॒र्मदे॑म ॥१३॥ आ घ॒ त्वावा॒न् त्मना॒प्तः स्तो॒तृभ्यो॑ धृष्णविया॒नः । ऋ॒णोरक्षं॒ न च॒क्र्यो॑: ॥१४॥ आ यद् दुव॑: शतक्रत॒वा कामं॑ जरितॄ॒णाम् । ऋ॒णोरक्षं॒ न शची॑भिः ॥१५॥ शश्व॒दिन्द्र॒: पोप्रु॑थद्भिर्जिगाय॒ नान॑दद्भि॒: शाश्व॑सद्भि॒र्धना॑नि । स नो॑ हिरण्यर॒थं दं॒सना॑वा॒न्त्स न॑: सनि॒ता स॒नये॒ स नो॑ऽदात् ॥१६॥ आश्वि॑ना॒वश्वा॑वत्ये॒षा या॑तं॒ शवी॑रया । गोम॑द् दस्रा॒ हिर॑ण्यवत् ॥१७॥ स॒मा॒नयो॑जनो॒ हि वां॒ रथो॑ दस्रा॒वम॑र्त्यः । स॒मु॒द्रे अ॑श्वि॒नेय॑ते ॥१८॥ न्य१घ्न्यस्य॑ मू॒र्धनि॑ च॒क्रं रथ॑स्य येमथुः । परि॒ द्याम॒न्यदी॑यते ॥१९॥ कस्त॑ उषः कधप्रिये भु॒जे मर्तो॑ अमर्त्ये । कं न॑क्षसे विभावरि ॥२०॥ व॒यं हि ते॒ अम॑न्म॒ह्याऽऽन्ता॒दा प॑रा॒कात् । अश्वे॒ न चि॑त्रे अरुषि ॥२१॥ त्वं त्येभि॒रा ग॑हि॒ वाजे॑भिर्दुहितर्दिवः । अ॒स्मे र॒यिं नि धा॑रय ॥२२॥॥
हे यजमानो एवं ऋत्विजो! जिस प्रकार कु एं को जल से भर देते हैं, उसी प्रकार हम अन्न की इच्छा से हजार यज्ञ करने वाले एवं महान् इंद्र को सोमरस से सींच देते हैं
१८ हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः। अग्निः। जगती, ८, १६, १८ त्रिष्टुप्। त्वम॑ग्ने प्रथ॒मो अङ्गि॑रा॒ ऋषि॑र्दे॒वो दे॒वाना॑मभवः शि॒वः सखा॑ ।तव॑ व्र॒ते क॒वयो॑ विद्म॒नाप॒सोऽजा॑यन्त म॒रुतो॒ भ्राज॑दृष्टयः ॥१॥ त्वम॑ग्ने प्रथ॒मो अङ्गि॑रस्तमः क॒विर्दे॒वानां॒ परि॑ भूषसि व्र॒तम् । वि॒भुर्विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय॒ मेधि॑रो द्विमा॒ता श॒युः क॑ति॒धा चि॑दा॒यवे॑ ॥२॥ त्वम॑ग्ने प्रथ॒मो मा॑त॒रिश्व॑न आ॒विर्भ॑व सुक्रतू॒या वि॒वस्व॑ते । अरे॑जेतां॒ रोद॑सी होतृ॒वूर्ये ऽस॑घ्नोर्भा॒रमय॑जो म॒हो व॑सो ॥३॥ त्वम॑ग्ने॒ मन॑वे॒ द्याम॑वाशयः पुरू॒रव॑से सु॒कृते॑ सु॒कृत्त॑रः । श्वा॒त्रेण॒ यत् पि॒त्रोर्मुच्य॑से॒ पर्या त्वा॒ पूर्व॑मनय॒न्नाप॑रं॒ पुन॑: ॥४॥ त्वम॑ग्ने वृष॒भः पु॑ष्टि॒वर्ध॑न॒ उद्य॑तस्रुचे भवसि श्र॒वाय्य॑: । य आहु॑तिं॒ परि॒ वेदा॒ वष॑ट्कृति॒मेका॑यु॒रग्रे॒ विश॑ आ॒विवा॑ससि ॥५॥ त्वम॑ग्ने वृजि॒नव॑र्तनिं॒ नरं॒ सक्म॑न् पिपर्षि वि॒दथे॑ विचर्षणे । यः शूर॑साता॒ परि॑तक्म्ये॒ धने॑ द॒भ्रेभि॑श्चि॒त् समृ॑ता॒ हंसि॒ भूय॑सः ॥६॥ त्वं तम॑ग्ने अमृत॒त्व उ॑त्त॒मे मर्तं॑ दधासि॒ श्रव॑से दि॒वेदि॑वे । यस्ता॑तृषा॒ण उ॒भया॑य॒ जन्म॑ने॒ मय॑: कृ॒णोषि॒ प्रय॒ आ च॑ सू॒रये॑ ॥७॥ त्वं नो॑ अग्ने स॒नये॒ धना॑नां य॒शसं॑ का॒रुं कृ॑णुहि॒ स्तवा॑नः । ऋ॒ध्याम॒ कर्मा॒पसा॒ नवे॑न दे॒वैर्द्या॑वापृथिवी॒ प्राव॑तं नः ॥८॥ त्वं नो॑ अग्ने पि॒त्रोरु॒पस्थ॒ आ दे॒वो दे॒वेष्व॑नवद्य॒ जागृ॑विः । त॒नू॒कृद् बो॑धि॒ प्रम॑तिश्च का॒रवे॒ त्वं क॑ल्याण॒ वसु॒ विश्व॒मोपि॑षे ॥९॥ त्वम॑ग्ने॒ प्रम॑ति॒स्त्वं पि॒तासि॑ न॒स्त्वं व॑य॒स्कृत् तव॑ जा॒मयो॑ व॒यम् । सं त्वा॒ राय॑: श॒तिन॒: सं स॑ह॒स्रिण॑: सु॒वीरं॑ यन्ति व्रत॒पाम॑दाभ्य ॥१०॥ त्वाम॑ग्ने प्रथ॒ममा॒युमा॒यवे॑ दे॒वा अ॑कृण्व॒न् नहु॑षस्य वि॒श्पति॑म् । इळा॑मकृण्व॒न् मनु॑षस्य॒ शास॑नीं पि॒तुर्यत् पु॒त्रो मम॑कस्य॒ जाय॑ते ॥११॥ त्वं नो॑ अग्ने॒ तव॑ देव पा॒युभि॑र्म॒घोनो॑ रक्ष त॒न्व॑श्च वन्द्य । त्रा॒ता तो॒कस्य॒ तन॑ये॒ गवा॑म॒स्यनि॑मेषं॒ रक्ष॑माण॒स्तव॑ व्र॒ते ॥१२॥ त्वम॑ग्ने॒ यज्य॑वे पा॒युरन्त॑रो ऽनिष॒ङ्गाय॑ चतुर॒क्ष इ॑ध्यसे । यो रा॒तह॑व्यो ऽवृ॒काय॒ धाय॑से की॒रेश्चि॒न् मन्त्रं॒ मन॑सा व॒नोषि॒ तम् ॥१३॥ त्वम॑ग्न उरु॒शंसा॑य वा॒घते॑ स्पा॒र्हं यद् रेक्ण॑: पर॒मं व॒नोषि॒ तत् । आ॒ध्रस्य॑ चि॒त् प्रम॑तिरुच्यसे पि॒ता प्र पाकं॒ शास्सि॒ प्र दिशो॑ वि॒दुष्ट॑रः ॥१४॥ त्वम॑ग्ने॒ प्रय॑तदक्षिणं॒ नरं॒ वर्मे॑व स्यू॒तं परि॑ पासि वि॒श्वत॑: । स्वा॒दु॒क्षद्मा॒ यो व॑स॒तौ स्यो॑न॒कृज् जी॑वया॒जं यज॑ते॒ सोप॒मा दि॒वः ॥१५॥ इ॒माम॑ग्ने श॒रणिं॑ मीमृषो न इ॒ममध्वा॑नं॒ यमगा॑म दू॒रात् । आ॒पिः पि॒ता प्रम॑तिः सो॒म्यानां॒ भृमि॑रस्यृषि॒कृन् मर्त्या॑नाम् ॥१६॥ म॒नु॒ष्वद॑ग्ने अङ्गिर॒स्वद॑ङ्गिरो ययाति॒वत् सद॑ने पूर्व॒वच्छु॑चे । अच्छ॑ या॒ह्या व॑हा॒ दैव्यं॒ जन॒मा सा॑दय ब॒र्हिषि॒ यक्षि॑ च प्रि॒यम् ॥१७॥ ए॒तेना॑ग्ने॒ ब्रह्म॑णा वावृधस्व॒ शक्ती॑ वा॒ यत्ते॑ चकृ॒मा वि॒दा वा॑ । उ॒त प्र णे॑ष्य॒भि वस्यो॑ अ॒स्मान् त्सं न॑: सृज सुम॒त्या वाज॑वत्या ॥१८॥
यह विस्तृत सूक्त अग्नि को अंगिरसों में सर्वप्रथम, देवताओं के मित्र एवं ऋषि के रूप में महिमामंडित करता है, जिनके व्रत में विद्वान ऋषि तथा चमकती बर्छियों वाले मरुद्गण उत्पन्न हुए। बुद्धिमानों में सर्वश्रेष्ठ अग्नि देवताओं के समस्त नियमों को धारण करते हैं, दो माताओं से उत्पन्न होकर सभी लोकों में व्याप्त हैं तथा सबसे पहले विवस्वान के लिए मातरिश्वा के रूप में प्रकट हुए; उन्होंने मनु के लिए आकाश को थामा, पुरूरवा के लिए सबसे बड़े उपकारी बने और पोषण बढ़ाने वाले बलशाली वृषभ के समान सदा स्तुति के योग्य हैं। अग्नि मनुष्य को माता-पिता की गोद से वृद्धावस्था तक ले जाते हैं, टेढ़े मार्ग पर चलने वाले की भी रक्षा करते हैं, दिव्य एवं मानव दोनों बंधुओं की सेवा करने वाले मर्त्य को अमरत्व तथा प्रतिदिन यश प्रदान करते हैं; कवि प्रार्थना करता है कि अग्नि उसकी रचना को प्रसिद्ध करें और द्यावा-पृथ्वी सहित उसके कर्मों को समृद्ध करें। उन्हें पिता, बंधु एवं मार्गदर्शक कहा गया है जो देवताओं में अथक प्रहरी हैं, जो कवि के शरीर एवं बुद्धि को गढ़ते हैं और प्रत्येक निधि प्रदान करते हैं; देवताओं ने अग्नि को नहुष की प्रजा का स्वामी बनाया तथा इला को मनु के नियम की शिक्षिका बनाया। अग्नि से प्रार्थना की जाती है कि वे यजमानों तथा उनकी संतानों की सतत जागरूक रक्षा करें, भक्त यजमान के लिए आंतरिक प्रहरी बनें, चोरों के विरुद्ध चार नेत्रों से प्रज्वलित हों, तथा उदार दानी की कवच के समान चारों ओर से रक्षा करें। सूक्त अग्नि से यात्रा किए मार्ग की क्षमा मांगता है, मनु, अंगिरसों तथा ययाति के समान पूर्वकाल की भांति आमंत्रित करता है कि वे देवताओं को कुश पर बिठाएं, तथा अंत में प्रार्थना करता है कि इस स्तुति से वे भक्तों को कल्याण, धन एवं सुबुद्धि की ओर ले जाएं।
१५ हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः। इन्द्रः। त्रिष्टुप्। इन्द्र॑स्य॒ नु वी॒र्या॑णि॒ प्र वो॑चं॒ यानि॑ च॒कार॑ प्रथ॒मानि॑ व॒ज्री । अह॒न्नहि॒मन्व॒पस्त॑तर्द॒ प्र व॒क्षणा॑ अभिन॒त् पर्व॑तानाम् ॥१॥ अह॒न्नहिं॒ पर्व॑ते शिश्रिया॒णं त्वष्टा॑स्मै॒ वज्रं॑ स्व॒र्यं॑ ततक्ष । वा॒श्रा इ॑व धे॒नव॒: स्यन्द॑माना॒ अञ्ज॑: समु॒द्रमव॑ जग्मु॒राप॑: ॥२॥ वृ॒षा॒यमा॑णो ऽवृणीत॒ सोमं॒ त्रिक॑द्रुकेष्वपिबत् सु॒तस्य॑ । आ साय॑कं म॒घवा॑दत्त॒ वज्र॒मह॑न्नेनं प्रथम॒जामही॑नाम् ॥३॥ यदि॒न्द्राह॑न् प्रथम॒जामही॑ना॒मान्मा॒यिना॒ममि॑ना॒: प्रोत मा॒याः । आत् सूर्यं॑ ज॒नय॒न् द्यामु॒षासं॑ ता॒दीत्ना॒ शत्रुं॒ न किला॑ विवित्से ॥४॥ अह॑न् वृ॒त्रं वृ॑त्र॒तरं॒ व्यं॑स॒मिन्द्रो॒ वज्रे॑ण मह॒ता व॒धेन॑ । स्कन्धां॑सीव॒ कुलि॑शेना॒ विवृ॒क्णाऽहि॑: शयत उप॒पृक् पृ॑थि॒व्याः ॥५॥ अ॒यो॒द्धेव॑ दु॒र्मद॒ आ हि जु॒ह्वे म॑हावी॒रं तु॑विबा॒धमृ॑जी॒षम् । नाता॑रीदस्य॒ समृ॑तिं व॒धानां॒ सं रु॒जाना॑: पिपिष॒ इन्द्र॑शत्रुः ॥६॥ अ॒पाद॑ह॒स्तो अ॑पृतन्य॒दिन्द्र॒मास्य॒ वज्र॒मधि॒ सानौ॑ जघान । वृष्णो॒ वध्रि॑: प्रति॒मानं॒ बुभू॑षन् पुरु॒त्रा वृ॒त्रो अ॑शय॒द्व्य॑ व्य॑स्तः ॥७॥ न॒दं न भि॒न्नम॑मु॒या शया॑नं॒ मनो॒ रुहा॑णा॒ अति॑ य॒न्त्याप॑: । याश्चि॑द् वृ॒त्रो म॑हि॒ना प॒र्यति॑ष्ठ॒त् तासा॒महि॑: पत्सुत॒:शीर्ब॑भूव ॥८॥ नी॒चाव॑या अभवद् वृ॒त्रपु॒त्रेन्द्रो॑ अस्या॒ अव॒ वध॑र्जभार । उत्त॑रा॒ सूरध॑रः पु॒त्र आ॑सी॒द् दानु॑: शये स॒हव॑त्सा॒ न धे॒नुः ॥९॥ अति॑ष्ठन्तीनामनिवेश॒नानां॒ काष्ठा॑नां॒ मध्ये॒ निहि॑तं॒ शरी॑रम् । वृ॒त्रस्य॑ नि॒ण्यं वि च॑र॒न्त्यापो॑ दी॒र्घं तम॒ आश॑य॒दिन्द्र॑शत्रुः ॥१०॥ दा॒सप॑त्नी॒रहि॑गोपा अतिष्ठ॒न् निरु॑द्धा॒ आप॑: प॒णिने॑व॒ गाव॑: । अ॒पां बिल॒मपि॑हितं॒ यदासी॑द् वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अप॒ तद् व॑वार ॥११॥ अश्व्यो॒ वारो॑ अभव॒स्तदि॑न्द्र सृ॒के यत् त्वा॑ प्र॒त्यह॑न् देव एक॑: । अज॑यो॒ गा अज॑यः शूर॒ सोम॒मवा॑सृज॒: सर्त॑वे स॒प्त सिन्धू॑न् ॥१२॥ नास्मै॑ वि॒द्युन्न त॑न्य॒तुः सि॑षेध॒ न यां मिह॒मकि॑रद् ध्रा॒दुनिं॑ च । इन्द्र॑श्च॒ यद् यु॑यु॒धाते॒ अहि॑श्चो॒ताप॒रीभ्यो॑ म॒घवा॒ वि जि॑ग्ये ॥१३॥ अहे॑र्या॒तारं॒ कम॑पश्य इन्द्र हृ॒दि यत्ते॑ ज॒घ्नुषो॒ भीरग॑च्छत् । नव॑ च॒ यन् न॑व॒तिं च॒ स्रव॑न्तीः श्ये॒नो न भी॒तो अत॑रो॒ रजां॑सि ॥१४॥ इन्द्रो॑ या॒तोऽव॑सितस्य॒ राजा॒ शम॑स्य च शृ॒ङ्गिणो॒ वज्र॑बाहुः । सेदु॒ राजा॑ क्षयति चर्षणी॒नाम॒रान् न ने॒मिः परि॒ ता ब॑भूव ॥१५॥
मैं वज्रधारी इंद्र के पूर्वकृत पराक्रमों का वर्णन करता हूं. उसने मेघ वृत्र का वध किया. इसके पश्चात् जलों को धरती पर गिराया. इसके बाद बहती हुई पहाड़ी नदियों का मार्ग बदल दिया
१५ हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः। इन्द्रः। त्रिष्टुप्। एताया॒मोप॑ ग॒व्यन्त॒ इन्द्र॑म॒स्माकं॒ सु प्रम॑तिं वावृधाति । अ॒ना॒मृ॒णः कु॒विदाद॒स्य रा॒यो गवां॒ केतं॒ पर॑मा॒वर्ज॑ते नः ॥१॥ उपेद॒हं ध॑न॒दामप्र॑तीतं॒ जुष्टां॒ न श्ये॒नो व॑स॒तिं प॑तामि । इन्द्रं॑ नम॒स्यन्नु॑प॒मेभि॑र॒र्कैर्यः स्तो॒तृभ्यो॒ हव्यो॒ अस्ति॒ याम॑न् ॥२॥ नि सर्व॑सेन इषु॒धीँर॑सक्त॒ सम॒र्यो गा अ॑जति॒ यस्य॒ वष्टि॑ । चो॒ष्कू॒यमा॑ण इन्द्र॒ भूरि॑ वा॒मं मा प॒णिर्भू॑र॒स्मदधि॑ प्रवृद्ध ॥३॥ वधी॒र्हि दस्युं॑ ध॒निनं॑ घ॒नेनँ॒ एक॒श्चर॑न्नुपशा॒केभि॑रिन्द्र । धनो॒रधि॑ विषु॒णक्ते व्या॑य॒न्नय॑ज्वानः सन॒काः प्रेति॑मीयुः ॥४॥ परा॑ चिच्छी॒र्षा व॑वृजु॒स्त इ॒न्द्राऽय॑ज्वानो॒ यज्व॑भि॒: स्पर्ध॑मानाः । प्र यद् दि॒वो ह॑रिवः स्थातरुग्र॒ निर॑व्र॒ताँ अ॑धमो॒ रोद॑स्योः ॥५॥ अयु॑युत्सन्ननव॒द्यस्य॒ सेना॒मया॑तयन्त क्षि॒तयो॒ नव॑ग्वाः । वृ॒षा॒युधो॒ न वध्र॑यो॒ निर॑ष्टाः प्र॒वद्भि॒रिन्द्रा॑च्चि॒तय॑न्त आयन् ॥६॥ त्वमे॒तान् रु॑द॒तो जक्ष॑त॒श्चायो॑धयो॒ रज॑स इन्द्र पा॒रे । अवा॑दहो दि॒व आ दस्यु॑मु॒च्चा प्र सु॑न्व॒तः स्तु॑व॒तः शंस॑मावः ॥ ७ च॒क्रा॒णास॑: परी॒णहं॑ पृथि॒व्या हिर॑ण्येन म॒णिना॒ शुम्भ॑मानाः । न हि॑न्वा॒नास॑स्तितिरु॒स्त इन्द्रं॒ परि॒ स्पशो॑ अदधा॒त् सूर्ये॑ण ॥८॥ परि॒ यदि॑न्द्र॒ रोद॑सी उ॒भे अबु॑भोजीर्महि॒ना वि॒श्वत॑: सीम् । अम॑न्यमानाँ अ॒भि मन्य॑मानै॒र्निर्ब्र॒ह्मभि॑रधमो॒ दस्यु॑मिन्द्र ॥९॥ न ये दि॒वः पृ॑थि॒व्या अन्त॑मा॒पुर्न मा॒याभि॑र्धन॒दां प॒र्यभू॑वन् । युजं॒ वज्रं॑ वृष॒भश्च॑क्र॒ इन्द्रो॒ निर्ज्योति॑षा॒ तम॑सो॒ गा अ॑दुक्षत् ॥१०॥ अनु॑ स्व॒धाम॑क्षर॒न्नापो॑ अ॒स्याव॑र्धत॒ मध्य॒ आ ना॒व्या॑नाम् । स॒ध्री॒चीने॑न॒ मन॑सा॒ तमिन्द्र॒ ओजि॑ष्ठेन॒ हन्म॑नाहन्न॒भि द्यून् ॥११॥ न्या॑विध्यदिली॒बिश॑स्य दृ॒ह्ला वि शृ॒ङ्गिण॑मभिन॒च्छुष्ण॒मिन्द्र॑: । याव॒त्तरो॑ मघव॒न् याव॒दोजो॒ वज्रे॑ण॒ शत्रु॑मवधीः पृत॒न्युम् ॥१२॥ अ॒भि सि॒ध्मो अ॑जिगादस्य॒ शत्रू॒न् वि ति॒ग्मेन॑ वृष॒भेणा॒ पुरो॑ऽभेत् । सं वज्रे॑णासृजद् वृ॒त्रमिन्द्र॒: प्र स्वां म॒तिम॑तिर॒च्छाश॑दानः ॥१३॥ आव॒: कुत्स॑मिन्द्र॒ यस्मि॑ञ्चा॒कन् प्रावो॒ युध्य॑न्तं वृष॒भं दश॑द्युम् । श॒फच्यु॑तो रे॒णुर्न॑क्षत॒ द्यामुच्छ्वै॑त्रे॒यो नृ॒षाह्या॑य तस्थौ ॥१४॥ आव॒: शमं॑ वृष॒भं तुग्सु क्षेत्रजे॒षे म॑घव॒ञ्छ्वित्र्यं॒ गाम् । ज्योक् च॒क्चि॒ चि॒दत्र॑ तस्थि॒वांसो॑ अक्रञ्छत्रूय॒तामध॑रा॒ वेद॑नाकः ॥१५॥
हम पणि असुर द्वारा रोकी हुई गायों को पाने की इच्छा से इंद्र के पास चलें. इंद्र हिंसारहित हैं एवं हमारी उत्तम बुद्धि को बढ़ाते हैं. इसके बाद वे इस गोरूप धन के विषय में हमें उत्तम ज्ञान देते हैं
१२ हरिण्यस्तूप आङिरसः। अश्विनौ। जगती, ९-,१२ त्रिष्टुप्। त्रिश्चि॑न् नो अ॒द्या भ॑वतं नवेदसा वि॒भुर्वां॒ याम॑ उ॒त रा॒तिर॑श्विना । यु॒वोर्हि य॒न्त्रं हि॒म्येव॒ वास॑सो ऽभ्यायं॒सेन्या॑ भवतं मनी॒षिभि॑: ॥१॥ त्रय॑: प॒वयो॑ मधु॒वाह॑ने॒ रथे॒ सोम॑स्य वे॒नामनु॒ विश्व॒ इद् वि॑दुः । त्रय॑: स्क॒म्भास॑: स्कभि॒तास॑ आ॒रभे॒ त्रिर्नक्तं॑ या॒थस्त्रिर्व॑श्विना॒ दिवा॑ ॥२॥ स॒मा॒ने अह॒न् त्रिर॑वद्यगोहना॒ त्रिर॒द्य य॒ज्ञं मधु॑ना मिमिक्षतम् । त्रिर्वाज॑वती॒रिषो॑ अश्विना यु॒वं दो॒षा अ॒स्मभ्य॑मु॒षस॑श्च पिन्वतम् ॥३॥ त्रिर्व॒र्तिर्या॑तं॒ त्रिरनु॑व्रते ज॒ने त्रिः सु॑प्रा॒व्ये॑ त्रे॒धेव॑ शिक्षतम् । त्रिर्ना॒न्द्यं॑ वहतमश्विना यु॒वं त्रिः पृक्षो॑ अ॒स्मे अ॒क्षरे॑व पिन्वतम् ॥४॥ त्रिर्नो॑ र॒यिं व॑हतमश्विना यु॒वं त्रिर्दे॒वता॑ता॒ त्रिरु॒ताव॑तं॒ धिय॑: । त्रिः सौ॑भग॒त्वं त्रिरु॒त श्रवां॑सि नस् त्रि॒ष्ठं वां॒ सूरे॑ दुहि॒ता रु॑ह॒द् रथ॑म् ॥५॥ त्रिर्नो॑ अश्विना दि॒व्यानि॑ भेष॒जा त्रिः पार्थि॑वानि॒ त्रिरु॑ दत्तम॒द्भ्यः । ओ॒मानं॑ शं॒योर्मम॑काय सू॒नव॑ त्रि॒धातु॒ शर्म॑ वहतं शुभस्पती ॥६॥ त्रिर्नो॑ अश्विना यज॒ता दि॒वेदि॑वे॒ परि॑ त्रि॒धातु॑ पृथि॒वीम॑शायतम् । ति॒स्रो ना॑सत्या रथ्या परा॒वत॑ आ॒त्मेव॒ वात॒: स्वस॑राणि गच्छतम् ॥७॥ त्रिर॑श्विना॒ सिन्धु॑भिः स॒प्तमा॑तृभि॒स्त्रय॑ आहा॒वास्त्रे॒धा ह॒विष्कृ॒तम् । ति॒स्रः पृ॑थि॒वीरु॒परि॑ प्र॒वा दि॒वो नाकं॑ रक्षेथे॒ द्युभि॑र॒क्तुभि॑र्हि॒तम् ॥८॥ क्व१ त्री च॒क्रा त्रि॒वृतो॒ रथ॑स्य॒ क्व१ त्रयो॑ व॒न्धुरो॒ ये सनी॑ळाः । क॒दा योगो॑ वा॒जिनो॒ रास॑भस्य॒ येन॑ य॒ज्ञं ना॑सत्योपया॒थः ॥ ९ आ ना॑सत्या॒ गच्छ॑तं हू॒यते॑ ह॒विर्मध्व॑: पिबतं मधु॒पेभि॑रा॒सभि॑: । यु॒वोर्हि पूर्वं॑ सवि॒तोषसो॒ रथ॑मृ॒ताय॑ चि॒त्रं घृ॒तव॑न्त॒मिष्य॑ति ॥१०॥ आ ना॑सत्या त्रि॒भिरे॑काद॒शैरि॒ह दे॒वेभि॑र्यातं मधु॒पेय॑मश्विना । प्रायु॒स्तारि॑ष्टं॒ नी रपां॑सि मृक्षतं॒ सेध॑तं॒ द्वेषो॒ भव॑तं सचा॒भुवा॑ ॥११॥ आ नो॑ अश्विना त्रि॒वृता॒ रथे॑ना॒ऽर्वाञ्चं॑ र॒यिं व॑हतं सु॒वीर॑म् । शृ॒ण्वन्ता॑ वा॒मव॑से जोहवीमि वृ॒धे च॑ नो भवतं॒ वाज॑सातौ ॥१२॥
समस्त देवता चंद्रमा और उसकी सुंदरी पत्नी वेना के विवाह में जा रहे थे, तब उन्हें पता लगा कि मधुर भोज्य-पदार्थ को ढोने वाले रथ में तीन पहिए हैं. उस रथ के ऊपर सहारा लेने के लिए खंभे हैं. हे अश्विनीकुमारो! इस प्रकार के रथ द्वारा तुम दिन में तीन बार आओ और रात में भी तीन बार आओ समाने अहन्त्रिवद्यगोहना त्रिरद्य यज्ञ मधुना मिमिक्षतम्, त्रिवाजवतीरिषो अश्विना युवं दोषा अस्मभ्यमुषसश्च पिन्वतम्
११ हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः। १ (पादानां क्रमेण) अग्निः, मित्रावरुणौ, रात्रिः, सविता च। २-११ सविता। त्रिष्टुप्, १, ९ जगती। ह्वया॑म्य॒ग्निं प्र॑थ॒मं स्व॒स्तये॒ ह्वया॑मि मि॒त्रावरु॑णावि॒हाव॑से । ह्वया॑मि॒ रात्रीं॒ जग॑तो नि॒वेश॑नीं॒ ह्वया॑मि दे॒वं स॑वि॒तार॑मू॒तये॑ ॥१॥ आ कृ॒ष्णेन॒ रज॑सा॒ वर्त॑मानो निवे॒शय॑न्न॒मृतं॒ मर्त्यं॑ च । हि॒र॒ण्यये॑न सवि॒ता रथे॒नाऽऽ दे॒वो या॑ति॒ भुव॑नानि॒ पश्य॑न् ॥२॥ याति॑ दे॒वः प्र॒वता॒ यात्यु॒द्वता॒ याति॑ शु॒भ्राभ्यां॑ यज॒तो हरि॑भ्याम् । आ दे॒वो या॑ति सवि॒ता प॑रा॒वतो ऽप॒ विश्वा॑ दुरि॒ता बाध॑मानः ॥३॥ अ॒भीवृ॑तं॒ कृश॑नैर्वि॒श्वरू॑पं॒ हिर॑ण्यशम्यं यज॒तो बृ॒हन्त॑म् । आस्था॒द् रथं॑ सवि॒ता चि॒त्रभा॑नुः कृ॒ष्णा रजां॑सि॒ तवि॑षीं॒ दधा॑नः ॥४॥ वि जना॑ञ्छ्या॒वाः शि॑ति॒पादो॑ अख्य॒न् रथं॒ हिर॑ण्यप्रउगं॒ वह॑न्तः । शश्व॒द् विश॑: सवि॒तुर्दैव्य॑स्यो॒पस्थे॒ विश्वा॒ भुव॑नानि तस्थुः ॥ ५ ति॒स्रो द्याव॑: सवि॒तुर्द्वा उ॒पस्थाँ॒ एका॑ य॒मस्य॒ भुव॑ने विरा॒षाट् । आ॒णिं न रथ्य॑म॒मृताधि॑ तस्थुरि॒ह ब्र॑वीतु॒ य उ॒ तच्चिके॑तत् ॥६॥ वि सु॑प॒र्णो अ॒न्तरि॑क्षाण्यख्यद्ग गभी॒रवे॑पा॒ असु॑रः सुनी॒थः । क्वे॒३दानीं॒ सूर्य॒: कश्चि॑केत कत॒मां द्यां र॒श्मिर॒स्या त॑तान ॥७॥ अ॒ष्टौ व्य॑ख्यत् क॒कुभ॑: पृथि॒व्यास् त्री धन्व॒ योज॑ना स॒प्त सिन्धू॑न् । हि॒र॒ण्या॒क्षः स॑वि॒ता दे॒व आगा॒द् दध॒द्रत्ना॑ दा॒शुषे॒ वार्या॑णि ॥८॥ हिर॑ण्यपाणिः सवि॒ता विच॑र्षणिरु॒भे द्यावा॑पृथि॒वी अ॒न्तरी॑यते । अपामी॑वां॒ बाध॑ते॒ वेति॒ सूर्य॑म॒भि कृ॒ष्णेन॒ रज॑सा॒ द्यामृ॑णोति ॥९॥ हिर॑ण्यहस्तो॒ असु॑रः सुनी॒थः सु॑मृळी॒कः स्ववाँ॑ यात्व॒र्वाङ् । अ॒प॒सेध॑न् र॒क्षसो॑ यातु॒धाना॒नस्था॑द् दे॒वः प्र॑तिदो॒षं गृ॑णा॒नः ॥१०॥ ये ते॒ पन्था॑: सवितः पू॒र्व्यासो॑ ऽरे॒णव॒: सुकृ॑ता अ॒न्तरि॑क्षे । तेभि॑र्नो अ॒द्य प॒थिभि॑: सु॒गेभी॒ रक्षा॑ च नो॒ अधि॑ च ब्रूहि देव ॥११॥
मैं अपनी रक्षा के लिए सबसे पहले अग्नि को बुलाता हूं. मैं अपनी रक्षा के लिए मित्र और वरुण को यहां बुलाता हूं. मैं संसार के सभी प्राणियों को विश्राम देने वाली रात को बुलाता हूं. मैं अपनी रक्षा के लिए सविता को बुलाता हूं
२० कण्वो घौरः। अग्निः, १३-१४ यूपो वा। प्रगाथः – विषमा बृहत्यः, समाः सतोबृहंत्यः (१३ उपरिष्टाद् बृहती। ऐ० ब्रा० २-२ चरणच्छेदः) प्र वो॑ य॒ह्वं पु॑रू॒णां वि॒शां दे॑वय॒तीना॑म् । अ॒ग्निं सू॒क्तेभि॒र्वचो॑भिरीमहे॒ यं सी॒मिद॒न्य ईळ॑ते ॥१॥ जना॑सो अ॒ग्निं द॑धिरे सहो॒वृधं॑ ह॒विष्म॑न्तो विधेम ते । स त्वं नो॑ अ॒द्य सु॒मना॑ इ॒हावि॒ता भवा॒ वाजे॑षु सन्त्य ॥२॥ प्र त्वा॑ दू॒तं वृ॑णीमहे॒ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसम् । म॒हस्ते॑ स॒तो वि च॑रन्त्य॒र्चयो॑ दि॒वि स्पृ॑शन्ति भा॒नव॑: ॥३॥ दे॒वास॑स्त्वा॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा सं दू॒तं प्र॒त्नमि॑न्धते । विश्वं॒ सो अ॑ग्ने जयति॒ त्वया॒ धनं॒ यस्ते॑ द॒दाश॒ मर्त्य॑: ॥४॥ म॒न्द्रो होता॑ गृ॒हप॑ति॒रग्ने॑ दू॒तो वि॒शाम॑सि । त्वे विश्वा॒ संग॑तानि व्र॒ता ध्रु॒वा यानि॑ दे॒वा अकृ॑ण्वत ॥५॥ त्वे इद॑ग्ने सु॒भगे॑ यविष्ठ्य॒ विश्व॒मा हू॑यते ह॒विः । स त्वं नो॑ अ॒द्य सु॒मना॑ उ॒ताप॒रं यक्षि॑ दे॒वान्त्सु॒वीर्या॑ ॥६॥ तं घे॑मि॒त्था न॑म॒स्विन॒ उप॑ स्व॒राज॑मासते । होत्रा॑भिर॒ग्निं मनु॑ष॒: समि॑न्धते तिति॒र्वांसो॒ अति॒ स्रिध॑: ॥७॥ घ्नन्तो॑ वृ॒त्रम॑तर॒न् रोद॑सी अ॒प उ॒रु क्षया॑य चक्रिरे । भुव॒त् कण्वे॒ वृषा॑ द्यु॒म्न्याहु॑त॒: क्रन्द॒दश्वो॒ गवि॑ष्टिषु ॥८॥ सं सी॑दस्व म॒हाँ अ॑सि॒ शोच॑स्व देव॒वीत॑मः । वि धू॒मम॑ग्ने अरु॒षं मि॑येध्य सृ॒ज प्र॑शस्त दर्श॒तम् ॥९॥ यं त्वा॑ दे॒वासो॒ मन॑वे द॒धुरि॒ह यजि॑ष्ठं हव्यवाहन । यं कण्वो॒ मेध्या॑तिथिर्धन॒स्पृतं॒ यं वृषा॒ यमु॑पस्तु॒तः ॥१०॥ यम॒ग्निं मेध्या॑तिथि॒: कण्व॑ ई॒ध ऋ॒तादधि॑ । तस्य॒ प्रेषो॑ दीदियु॒स्तमि॒मा ऋच॒स् तम॒ग्निं व॑र्धयामसि ॥११॥ रा॒यस्पू॑र्धि स्वधा॒वोऽस्ति॒ हि ते ऽग्ने॑ दे॒वेष्वाप्य॑म् । त्वं वाज॑स्य॒ श्रुत्य॑स्य राजसि॒ स नो॑ मृळ म॒हाँ अ॑सि ॥१२॥ ऊ॒र्ध्व ऊ॒ षु ण॑ ऊ॒तये॒ तिष्ठा॑ दे॒वो न स॑वि॒ता । ऊ॒र्ध्वो वाज॑स्य॒ सनि॑ता॒ यद॒ञ्जिभि॑र्वा॒घद्भि॑र्वि॒ह्वया॑महे ॥१३॥ ऊ॒र्ध्वो न॑: पा॒ह्यंह॑सो॒ नि के॒तुना॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह । कृ॒धी न॑ ऊ॒र्ध्वाञ्च॒रथा॑य जी॒वसे॑ वि॒दा दे॒वेषु॑ नो॒ दुव॑: ॥१४॥ पा॒हि नो॑ अग्ने र॒क्षस॑: पा॒हि धू॒र्तेररा॑व्णः । पा॒हि रीष॑त उ॒त वा॒ जिघां॑सतो॒ बृह॑द्भानो॒ यवि॑ष्ठ्य ॥१५॥ घ॒नेव॒ विष्व॒ग्वि ज॒ह्यरा॑व्ण॒स् तपु॑र्जम्भ॒ यो अ॑स्म॒ध्रुक् । यो मर्त्य॒: शिशी॑ते॒ अत्य॒क्तुभि॒र्मा न॒: स रि॒पुरी॑शत ॥१६॥ अ॒ग्निर्व॑व्ने सु॒वीर्य॑म॒ग्निः कण्वा॑य॒ सौभ॑गम् । अ॒ग्निः प्राव॑न् मि॒त्रोत मेध्या॑तिथिम॒ग्निः सा॒ता उ॑पस्तु॒तम् ॥१७॥ अ॒ग्निना॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॑ परा॒वत॑ उ॒ग्रादे॑वं हवामहे । अ॒ग्निर्न॑य॒न्नव॑वास्त्वं बृ॒हद्र॑थं तु॒र्वीतिं॒ दस्य॑वे॒ सह॑: ॥१८॥ नि त्वाम॑ग्ने॒ मनु॑र्दधे॒ ज्योति॒र्जना॑य॒ शश्व॑ते । दी॒देथ॒ कण्व॑ ऋ॒तजा॑त उक्षि॒तो यं न॑म॒स्यन्ति॑ कृ॒ष्टय॑: ॥१९॥ त्वे॒षासो॑ अ॒ग्नेरम॑वन्तो अ॒र्चयो॑ भी॒मासो॒ न प्रती॑तये । र॒क्ष॒स्विन॒: सद॒मिद् या॑तु॒माव॑तो॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह ॥२०॥
यह कण्व घौर ऋषि का दीर्घ सूक्त अग्नि को महान एवं पुरातन देवता के रूप में स्तुत करता है, जिन्हें अनेक भक्तिपरायण जनजातियां सुंदर स्तुतियों एवं वचनों से खोजती हैं, वही अग्नि जिन्हें अन्य लोग भी पूजते हैं। लोगों ने बल के वर्धक अग्नि को स्थापित किया है और हम भी हविष्यों सहित उनकी उपासना करते हैं; वे आज सुमन होकर बल की प्राप्ति में हमारे सहायक बनें, हे धनवान् देव! उन्हें दूत तथा सर्वज्ञ होता चुना गया है, जिनकी ज्वालाएं महानता में दूर तक फैलती हैं और जिनका तेज आकाश को स्पर्श करता है; वरुण, मित्र एवं अर्यमा उन्हें अपने पुरातन दूत के रूप में प्रज्वलित करते हैं, और जो भी मर्त्य उन्हें अर्पण करता है, वह उनके द्वारा समस्त प्रकार का धन प्राप्त करता है। हर्षदायक होता एवं गृहपति अग्नि जनजातियों के दूत हैं; उन्हीं में देवताओं द्वारा स्थापित समस्त व्रत स्थिर एवं दृढ़ रहते हैं, और सारी आहुति उन्हीं में डाली जाती है। लोग श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए उस स्वराट के समीप बैठते हैं; वृत्र का वध करके उन्होंने दोनों लोकों तथा जलों को पार किया और निवास के लिए विस्तृत स्थान बनाया, और अग्नि गौओं की खोज में युद्ध के घोड़े के समान गर्जना करते हुए कण्व के घर प्रकट हुए। यज्ञ के सर्वाधिक योग्य, हविवाहक अग्नि, जिन्हें देवताओं ने मनु के लिए स्थापित किया, जिन्हें कण्व मेध्यातिथि ने धन-विजेता के रूप में प्रज्वलित किया, जिनकी प्रेरणाएं चमक उठी हैं, उसी अग्नि को यहां इन्हीं स्तुतियों से बढ़ाया गया है। उनसे प्रार्थना की जाती है कि वे भक्तों के लिए धन जीतने का प्रयास करें, सविता देव के समान उनकी रक्षा के लिए ऊर्ध्व खड़े रहें, उन्हें संकट से बचाएं, हर भक्षक शत्रु को भस्म करें, उन्हें सक्रिय जीवन के लिए सीधा रखें तथा देवताओं में उनके प्रति अनुग्रह जानें; उनसे यह भी प्रार्थना की जाती है कि वे भक्तों को राक्षस से, कपटी एवं निर्दयी शत्रु से, हानि पहुंचाने वाले तथा वध के इच्छुक से बचाएं, और कृपण शत्रु को अपने प्रज्वलित जबड़े से नष्ट कर दें। अग्नि ने कण्व के लिए वीरता एवं सौभाग्य जीता, मित्र एवं मेध्यातिथि की सहायता की, तथा स्तुत जन की उपलब्धियों में सहायता की; अग्नि के द्वारा भक्त दूर से तुर्वश एवं यदु के लिए महान देव को बुलाते हैं, और अग्नि ने नववास्त्व, बृहद्रथ एवं तुर्वीति को दस्यु के विरुद्ध बल प्रदान किया। मनु ने अग्नि को यहां अपनी समस्त स्थायी प्रजा के लिए प्रकाश बनाकर स्थापित किया, जो सत्य से उत्पन्न एवं पोषित हैं तथा जिन्हें जनजातियां नमन करती हैं; उनकी प्रचंड, दीप्तिमान ज्वालाएं देखने में जितनी भयकारी हैं उतनी ही भीषण भी हैं, जो सदैव हर भक्षक शत्रु से रक्षा करती हैं।
१५ कण्वो घौरः। मरुतः। गायत्री। क्री॒ळं व॒: शर्धो॒ मारु॑तमन॒र्वाणं॑ रथे॒शुभ॑म् । कण्वा॑ अ॒भि प्र गा॑यत ॥१॥ ये पृष॑तीभिर्ऋ॒ष्टिभि॑: सा॒कं वाशी॑भिर॒ञ्जिभि॑: । अजा॑यन्त॒ स्वभा॑नवः ॥२॥ इ॒हेव॑ शृण्व एषां॒ कशा॒ हस्ते॑षु॒ यद् वदा॑न् । नि याम॑ञ्चि॒त्रमृ॑ञ्जते ॥३॥ प्र व॒: शर्धा॑य॒ घृष्व॑ये त्वे॒षद्यु॑म्नाय शु॒ष्मिणे॑ । दे॒वत्तं॒ ब्रह्म॑ गायत ॥४॥ प्र शं॑सा॒ गोष्वघ्न्यं॑ क्री॒ळं यच्छर्धो॒ मारु॑तम् । जम्भे॒ रस॑स्य वावृधे ॥५॥ को वो॒ वर्षि॑ष्ठ॒ आ न॑रो दि॒वश्च॒ ग्मश्च॑ धूतयः । यत्सी॒मन्तं॒ न धू॑नु॒थ ॥६॥ नि वो॒ यामा॑य॒ मानु॑षो द॒ध्र उ॒ग्राय॑ म॒न्यवे॑ । जिही॑त॒ पर्व॑तो गि॒रिः ॥७॥ येषा॒मज्मे॑षु पृथि॒वी जु॑जु॒र्वाँ इ॑व वि॒श्पति॑: । भि॒या यामे॑षु॒ रेज॑ते ॥८॥ स्थि॒रं हि जान॑मेषां॒ वयो॑ मा॒तुर्निरे॑तवे । यत् सी॒मनु॑ द्वि॒ता शव॑: ॥९॥ उदु॒ त्ये सू॒नवो॒ गिर॒: काष्ठा॒ अज्मे॑ष्वत्नत । वा॒श्रा अ॑भि॒ज्ञु यात॑वे ॥१०॥ त्यं चि॑द् घा दी॒र्घं पृ॒थुं मि॒हो नपा॑त॒ममृ॑ध्रम् । प्र च्या॑वयन्ति॒ याम॑भिः ॥११॥ मरु॑तो॒ यद्ध॑ वो॒ बलं॒ जनाँ॑ अचुच्यवीतन । गि॒रीँर॑चुच्यवीतन ॥१२॥ यद्ध॒ यान्ति॑ म॒रुत॒: सं ह॑ ब्रुव॒तेऽध्व॒न्ना । शृ॒णोति॒ कश्चि॑देषाम् ॥१३॥ प्र या॑त॒ शीभ॑मा॒शुभि॒: सन्ति॒ कण्वे॑षु वो॒ दुव॑: । तत्रो॒ षु मा॑दयाध्वै ॥१४॥ अस्ति॒ हि ष्मा॒ मदा॑य व॒: स्मसि॑ ष्मा व॒यमे॑षाम् । विश्वं॑ चि॒दायु॑र्जी॒वसे॑ ॥१५॥
हे कण्व गोत्रोत्पन्न ऋषियो! विहरणशील एवं शत्रुरहित मरुतों को लक्ष्य करके स्तुति करो. वे अपने रथ पर सुशोभित होते हैं
१५ कण्वो घौरः। मरुतः। गायत्री। कद्ध॑ नू॒नं क॑धप्रियः पि॒ता पु॒त्रं न हस्त॑योः । द॒धि॒ध्वे वृ॑क्तबर्हिषः ॥१ क्व॑ नू॒नं कद् वो॒ अर्थं॒ गन्ता॑ दि॒वो न पृ॑थि॒व्याः । क्व॑ वो॒ गावो॒ न र॑ण्यन्ति ॥२ क्व॑ वः सु॒म्ना नव्यां॑सि॒ मरु॑त॒: क्व॑ सुवि॒ता । क्वो॒३ विश्वा॑नि॒ सौभ॑गा ॥३ यद् यू॒यं पृ॑श्निमातरो॒ मर्ता॑स॒: स्यात॑न । स्तो॒ता वो॑ अ॒मृत॑: स्यात् ॥४ मा वो॑ मृ॒गो न यव॑से जरि॒ता भू॒दजो॑ष्यः । प॒था य॒मस्य॑ गा॒दुप॑ ॥५ मो षु ण॒: परा॑परा॒ निऋ॑तिर्दु॒र्हणा॑ वधीत् । प॒दी॒ष्ट तृष्ण॑या स॒ह ॥६ स॒त्यं त्वे॒षा अम॑वन्तो॒ धन्व॑ञ्चि॒दा रु॒द्रिया॑सः । मिहं॑ कृण्वन्त्यवा॒ताम् ॥७ वा॒श्रेव॑ वि॒द्युन्मि॑माति व॒त्सं न मा॒ता सि॑षक्ति । यदे॑षां वृ॒ष्टिरस॑र्जि ॥८ दिवा॑ चि॒त्तम॑: कृण्वन्ति प॒र्जन्ये॑नोदवा॒हेन॑ । यत्पृ॑थि॒वीं व्यु॒न्दन्ति॑ ॥९ अध॑ स्व॒नान्म॒रुतां॒ विश्व॒मा सद्म॒ पार्थि॑वम् । अरे॑जन्त॒ प्र मानु॑षाः ॥१० मरु॑तो वीळुपा॒णिभि॑श् चि॒त्रा रोध॑स्वती॒रनु॑ । या॒तेमखि॑द्रयामभिः ॥११ स्थि॒रा व॑: सन्तु ने॒मयो॒ रथा॒ अश्वा॑स एषाम् । सुसं॑स्कृता अ॒भीश॑वः ॥१२ अच्छा॑ वदा॒ तना॑ गि॒रा ज॒रायै॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॑म् । अ॒ग्निं मि॒त्रं न द॑र्श॒तम् ॥१३ मि॒मी॒हि श्लोक॑मा॒स्ये॑ प॒र्जन्य॑ इव ततनः । गाय॑ गाय॒त्रमु॒क्थ्य॑म् ॥१४ वन्द॑स्व॒ मारु॑तं ग॒णं त्वे॒षं प॑न॒स्युम॒र्किण॑म् । अ॒स्मे वृ॒द्धा अ॑सन्नि॒ह ॥१५
हे मरुदूग णो! प्रार्थना चाहने वाले तुम लोगों के लिए कुश बिछा दिए गए हैं. जिस प्रकार पिता पुत्र को हाथों पर धारण करता है, क्या तुम भी हमें उसी प्रकार धारण करोगे?
१० कण्वौ घौरः। मरुतः। प्रगाथः – विषमा बृहत्यः, समाः सतोबृहत्यः। प्र यदि॒त्था प॑रा॒वत॑: शो॒चिर्न मान॒मस्य॑थ । कस्य॒ क्रत्वा॑ मरुत॒: कस्य॒ वर्प॑सा॒ कं या॑थ॒ कं ह॑ धूतयः ॥१ स्थि॒रा व॑: स॒न्त्वायु॑धा परा॒णुदे॑ वी॒ळू उ॒त प्र॑ति॒ष्कभे॑ । यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ पनी॑यसी॒ मा मर्त्य॑स्य मा॒यिन॑: ॥२ परा॑ ह॒ यत् स्थि॒रं ह॒थ नरो॑ व॒र्तय॑था गु॒रु । वि या॑थन व॒निन॑: पृथि॒व्या व्याशा॒: पर्व॑तानाम् ॥३ न॒हि व॒: शत्रु॑र्विवि॒दे अधि॒ द्यवि॒ न भूम्यां॑ रिशादसः । यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ तना॑ यु॒जा रुद्रा॑सो॒ नू चि॑दा॒धृषे॑ ॥४ प्र वे॑पयन्ति॒ पर्व॑ता॒न्वि वि॑ञ्चन्ति॒ वन॒स्पती॑न् । प्रो आ॑रत मरुतो दु॒र्मदा॑ इव॒ देवा॑स॒: सर्व॑या वि॒शा ॥५ उपो॒ रथे॑षु॒ पृष॑तीरयुग्ध्वं॒ प्रष्टि॑र्वहति॒ रोहि॑तः । आ वो॒ यामा॑य पृथि॒वी चि॑दश्रो॒दबी॑भयन्त॒ मानु॑षाः ॥६ आ वो॑ म॒क्षू तना॑य॒ कं रुद्रा॒ अवो॑ वृणीमहे । गन्ता॑ नू॒नं नोऽव॑सा॒ यथा॑ पु॒रेत्था कण्वा॑य बि॒भ्युषे॑ ॥७ यु॒ष्मेषि॑तो मरुतो॒ मर्त्ये॑षित॒ आ यो नो॒ अभ्व॒ ईष॑ते । वि तं यु॑योत॒ शव॑सा॒ व्योज॑सा॒ वि यु॒ष्माका॑भिरू॒तिभि॑: ॥८ असा॑मि॒ हि प्र॑यज्यव॒: कण्वं॑ द॒द प्र॑चेतसः । असा॑मिभिर्मरुत॒ आ न॑ ऊ॒तिभि॒र्गन्ता॑ वृ॒ष्टिं न वि॒द्युत॑: ॥९ असा॒म्योजो॑ बिभृथा सुदान॒वो ऽसा॑मि धूतय॒: शव॑: । ऋ॒षि॒द्विषे॑ मरुतः परिम॒न्यव॒ इषुं॒ न सृ॑जत॒ द्विष॑म् ॥१०
हे मरुतो! जब तुम दूर देश से अपनी ज्वाला-जैसी कान्ति दिखाते हो, तो तुम किसके कर्म से, किसके रूप से आते हो, हे कंपन करने वाले वीरो! तुम किसके पास जाते हो? तुम्हारे शत्रुओं को दूर हटाने वाले तथा दृढ़ता से थामने वाले शस्त्र सुदृढ़ हों; तुम्हारा बल मायावी मनुष्य से भी अधिक प्रशंसनीय हो। जब तुम बलवान पुरुष स्थिर एवं भारी वस्तुओं को उलट देते हो, वृक्षों और पर्वतों की चौड़ी शाखाओं को छिन्न-भिन्न कर देते हो, तब भी हे शत्रुनाशक वीरो! तुम्हारा कोई शत्रु न आकाश में मिलता है न पृथ्वी पर; तुम्हारा बल रुद्रों के साथ मिलकर सदा प्रबल बना रहे। तुम पर्वतों को कंपा देते हो, वनों को उखाड़ देते हो, हे मरुतो! तुम आनंदित पुरुषों के समान समस्त प्रजा के साथ आगे बढ़ते हो, चितकबरे मृगों को रथ में जोतकर, जिससे पृथ्वी भी कांप उठी और मनुष्य भयभीत हो गए। हम भयभीत कण्व की भाँति तुम्हारी दूरगामी कृपा अपनी संतति के लिए वरण करते हैं; तुमसे प्रेरित हे मरुतो, जो कोई राक्षस हम पर आक्रमण करे, उसे अपने बल और तेज से दूर भगाओ, तथा ऋषिद्वेषी क्रोधी शत्रु के विरुद्ध अपना बाण उसी प्रकार छोड़ो जैसे तुमने अनुपम दान कण्व को दिया था।
८ कण्वो घौरः। ब्रह्मणस्पतिः। प्रगाथः – विषमा बृहत्यः, समाः सतोबृहत्यः। उत्ति॑ष्ठ ब्रह्मणस्पते देव॒यन्त॑स्त्वेमहे । उप॒ प्र य॑न्तु म॒रुत॑: सु॒दान॑व॒ इन्द्र॑ प्रा॒शूर्भ॑वा॒ सचा॑ ॥१॥ त्वामिद्धि स॑हसस्पुत्र॒ मर्त्य॑ उपब्रू॒ते धने॑ हि॒ते । सु॒वीर्यं॑ मरुत॒ आ स्वश्व्यं॒ दधी॑त॒ यो व॑ आच॒के ॥२॥ प्रैतु॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॒: प्र दे॒व्ये॑तु सू॒नृता॑ । अच्छा॑ वी॒रं नर्यं॑ प॒ङ्क्तिरा॑धसं दे॒वा य॒ज्ञं न॑यन्तु नः ॥३॥ यो वा॒घते॒ ददा॑ति सू॒नरं॒ वसु॒ स ध॑त्ते॒ अक्षि॑ति॒ श्रव॑: । तस्मा॒ इळां॑ सु॒वीरा॒मा य॑जामहे सु॒प्रतू॑र्तिमने॒हस॑म् ॥४॥ प्र नू॒नं ब्रह्म॑ण॒स्पति॒र्मन्त्रं॑ वदत्यु॒क्थ्य॑म् । यस्मि॒न्निन्द्रो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा दे॒वा ओकां॑सि चक्रि॒रे ॥५॥ तमिद् वो॑चेमा वि॒दथे॑षु श॒म्भुवं॒ मन्त्रं॑ देवा अने॒हस॑म् । इ॒मां च॒ वाचं॑ प्रति॒हर्य॑था नरो॒ विश्वेद् वा॒मा वो॑ अश्नवत् ॥६॥ को दे॑व॒यन्त॑मश्नव॒ज् जनं॒ को वृ॒क्तब॑र्हिषम् । प्रप्र॑ दा॒श्वान् प॒स्त्या॑भिरस्थितान्त॒र्वाव॒त् क्षयं॑ दधे ॥७॥ उप॑ क्ष॒त्रं पृ॑ञ्ची॒त हन्ति॒ राज॑भिर्भ॒ये चि॑त् सुक्षि॒तिं द॑धे । नास्य॑ व॒र्ता न त॑रु॒ता म॑हाध॒ने नार्भे॑ अस्ति व॒ज्रिण॑: ॥८॥
हे ब्रह्मणस्पते! उठो, देवभक्त हम तुम्हारा आवाहन करते हैं; कल्याणकारी मरुत तुम्हारे साथ आएं, हे इन्द्र! तुम भी उनके साथ शीघ्रगामी बनो। हे बलपुत्र! जब धन दांव पर हो तब मनुष्य तुम्हीं को पुकारता है; जो तुम्हें चाहता है उसे उत्तम वीरता और श्रेष्ठ अश्व मरुतों द्वारा प्राप्त हों। ब्रह्मणस्पति आगे बढ़ें, दिव्य सुवाणी आगे बढ़े, देवगण हमारे यज्ञ को उस वीर्यवान, दानशील नर के समीप ले जाएं। जो यजमान गायक को उत्तम धन देता है वह अक्षय यश प्राप्त करता है; उसके लिए हम वीरतायुक्त, अभेद्य अन्न की कामना करते हैं। अब ब्रह्मणस्पति वह उत्तम मन्त्र कहते हैं जिसमें इन्द्र, वरुण, मित्र, अर्यमा और अन्य देवों ने अपना निवास बनाया है। हे देवो! हम सभाओं में वही कल्याणकारी, निर्दोष मन्त्र कहें; तुम इस वाणी को स्वीकार करो, तुम्हें सब शुभ वस्तुएं प्राप्त हों। देवभक्त तथा कुश बिछाने वाले जन को कौन पाता है? जो दानी पुरुष कई घरों में बसा हो वह भरा-पूरा घर रखता है। जो क्षत्र (शासन) को धारण करता है और राजाओं सहित शत्रु को नष्ट करता है वह भय में भी सुखद निवास पाता है; वज्रधारी इन्द्र को बड़े अथवा छोटे धन-संग्राम में कोई रोक या हरा नहीं सकता।
९ कण्वो घौरः। वरुणमित्रार्यमणः, ४-६ आदित्याः। गायत्री। यं रक्ष॑न्ति॒ प्रचे॑तसो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा । नू चि॒त्स द॑भ्यते॒ जन॑: ॥१॥ यं बा॒हुते॑व॒ पिप्र॑ति॒ पान्ति॒ मर्त्यं॑ रि॒षः । अरि॑ष्ट॒: सर्व॑ एधते ॥२॥ वि दु॒र्गा वि द्विष॑: पु॒रो घ्नन्ति॒ राजा॑न एषाम् । नय॑न्ति दुरि॒ता ति॒रः ॥३॥ सु॒गः पन्था॑ अनृक्ष॒र आदि॑त्यास ऋ॒तं य॒ते । नात्रा॑वखा॒दो अ॑स्ति वः ॥४॥ यं य॒ज्ञं नय॑था नर॒ आदि॑त्या ऋ॒जुना॑ प॒था । प्र व॒: स धी॒तये॑ नशत् ॥५॥ स रत्नं॒ मर्त्यो॒ वसु॒ विश्वं॑ तो॒कमु॒त त्मना॑ । अच्छा॑ गच्छ॒त्यस्तृ॑तः ॥६॥ क॒था रा॑धाम सखाय॒: स्तोमं॑ मि॒त्रस्या॑र्य॒म्णः । महि॒ प्सरो॒ वरु॑णस्य ॥७॥ मा वो॒ घ्नन्तं॒ मा शप॑न्तं॒ प्रति॑ वोचे देव॒यन्त॑म् । सु॒म्नैरिद् व॒ आ वि॑वासे ॥८॥ च॒तुर॑श्चि॒द् दद॑मानाद् बिभी॒यादा निधा॑तोः । न दु॑रु॒क्ताय॑ स्पृहयेत् ॥९॥
उत्तम ज्ञान से संपन्न वरुण, मित्र और अर्यमा देवता जिसकी रक्षा करते हैं, वह शीघ्र ही सब शत्रुओं को मार डालता है
१० कण्वो घौरः। पूषा। गायत्री। सं पू॑ष॒न्नध्व॑नस्तिर॒ व्यंहो॑ विमुचो नपात् । सक्ष्वा॑ देव॒ प्र ण॑स्पु॒रः ॥१॥ यो न॑: पूषन्न॒घो वृको॑ दु॒:शेव॑ आ॒दिदे॑शति । अप॑ स्म॒ तं प॒थो ज॑हि ॥२॥ अप॒ त्यं प॑रिप॒न्थिनं॑ मुषी॒वाणं॑ हुर॒श्चित॑म् । दू॒रमधि॑ स्रु॒तेर॑ज ॥३॥ त्वं तस्य॑ द्वया॒विनो॒ ऽघशं॑सस्य॒ कस्य॑ चित् । प॒दाभि ति॑ष्ठ॒ तपु॑षिम् ॥४॥ आ तत्ते॑ दस्र मन्तुम॒: पूष॒न्नवो॑ वृणीमहे । येन॑ पि॒तॄनचो॑दयः ॥५॥ अधा॑ नो विश्वसौभग॒ हिर॑ण्यवाशीमत्तम । धना॑नि सु॒षणा॑ कृधि ॥६॥ अति॑ नः स॒श्चतो॑ नय सु॒गा न॑: सु॒पथा॑ कृणु । पूष॑न्नि॒ह क्रतुं॑ विदः ॥७॥ अ॒भि सू॒यव॑सं नय॒ न न॑वज्वा॒रो अध्व॑ने । पूष॑न्नि॒ह क्रतुं॑ विदः ॥८॥ श॒ग्धि पू॒र्धि प्र यं॑सि च शिशी॒हि प्रास्यु॒दर॑म् । पूष॑न्नि॒ह क्रतुं॑ विदः ॥९॥ न पू॒षणं॑ मेथामसि सू॒क्तैर॒भि गृ॑णीमसि । वसू॑नि द॒स्ममी॑महे ॥१०॥
हे पूषा! हमें मार्ग के पार लगा दो. पाप विघ्नों का कारण है, तुम उसे नष्ट करो. हे जलवर्षक मेघ के पुत्र! हमारे आगे चलो. हे पूषा! जो कोई दुष्ट, आक्रमणकारी भेड़िया हमारे मार्ग में विघ्न डालने आए, उसे मार्ग से दूर भगा दो; जो चोर छिपकर धन हरण करता है और छल करता है उसे मार्ग से दूर हटाओ, और किसी भी छली, दुर्वचन बोलने वाले के जलते हुए पैर को अपने पैरों तले कुचल दो। हे प्रभावशाली पूषा! तुम्हारी प्राचीन कृपा, जिससे तुमने हमारे पूर्वजों को मार्गदर्शन दिया, हम वरण करते हैं; हे सर्वसौभाग्यशाली, स्वर्णकुठारधारी! हमारे धनों को सरलता से प्राप्त कराओ, हमें छिपे शत्रुओं से आगे ले चलो, हमारे मार्ग सुगम बनाओ, हे पूषा! हमारा उद्देश्य जानो। हमें हरी-भरी चरागाहों की ओर ले चलो, मार्ग में थकान न हो; हमें तृप्त करो, भरपूर करो, प्रदान करो और हमारी शक्ति तीक्ष्ण करके भूख को दूर भगाओ; हम पूषा से विरोध नहीं करते बल्कि सूक्तों से उसकी स्तुति करते और उस अद्भुत देव से धन की याचना करते हैं।
९ कण्वो घौरः। रुद्रः, मित्रावरुणौ च, ७-९ सोमः। गायत्री, ९ अनुष्टप्। कद् रु॒द्राय॒ प्रचे॑तसे मी॒ह्ळुष्ट॑माय॒ तव्य॑से । वो॒चेम॒ शंत॑मं हृ॒दे ॥१॥ यथा॑ नो॒ अदि॑ति॒: कर॒त् पश्वे॒ नृभ्यो॒ यथा॒ गवे॑ । यथा॑ तो॒काय॑ रु॒द्रिय॑म् ॥२॥ यथा॑ नो मि॒त्रो वरु॑णो॒ यथा॑ रु॒द्रश्चिके॑तति । यथा॒ विश्वे॑ स॒जोष॑सः ॥३॥ गा॒थप॑तिं मे॒धप॑तिं रु॒द्रं जला॑षभेषजम् । तच्छं॒योः सु॒म्नमी॑महे ॥४॥ यः शु॒क्र इ॑व॒ सूर्यो॒ हिर॑ण्यमिव॒ रोच॑ते । श्रेष्ठो॑ दे॒वानां॒ वसु॑: ॥५॥ शं न॑: कर॒त्यर्व॑ते सु॒गं मे॒षाय॑ मे॒ष्ये॑ । नृभ्यो॒ नारि॑भ्यो॒ गवे॑ ॥६॥ अ॒स्मे सो॑म॒ श्रिय॒मधि॒ नि धे॑हि श॒तस्य॑ नृ॒णाम् । महि॒ श्रव॑स्तुविनृ॒म्णम् ॥७॥ मा न॑: सोमपरि॒बाधो॒ मारा॑तयो जुहुरन्त । आ न॑ इन्दो॒ वाजे॑ भज ॥८॥ यास्ते॑ प्र॒जा अ॒मृत॑स्य॒ पर॑स्मि॒न्धाम॑न्नृ॒तस्य॑ । मू॒र्धा नाभा॑ सोम वेन आ॒भूष॑न्तीः सोम वेदः ॥९॥
अदिति येन-के न प्रकारेण हमें, पशुओं को, मनुष्यों को, गायों को और हमारी संतान को रुद्र संबंधी ओषधि प्रदान करें
१४ प्रस्कण्वः काण्वः। अग्निः, १-२ अग्निः, अश्विनौ, उषाश्च। प्रगाथः – विषमा बृहत्यः, समाः सतोबृहत्यः। अग्ने॒ विव॑स्वदु॒षस॑श् चि॒त्रं राधो॑ अमर्त्य । आ दा॒शुषे॑ जातवेदो वहा॒ त्वम॒द्या दे॒वाँ उ॑ष॒र्बुध॑: ॥१॥ जुष्टो॒ हि दू॒तो असि॑ हव्य॒वाह॒नो ऽग्ने॑ र॒थीर॑ध्व॒राणा॑म् । स॒जूर॒श्विभ्या॑मु॒षसा॑ सु॒वीर्य॑म॒स्मे धे॑हि॒ श्रवो॑ बृ॒हत् ॥२॥ अ॒द्या दू॒तं वृ॑णीमहे॒ वसु॑म॒ग्निं पु॑रुप्रि॒यम् । धू॒मके॑तुं॒ भाऋ॑जीकं॒ व्यु॑ष्टिषु य॒ज्ञाना॑मध्वर॒श्रिय॑म् ॥३॥ श्रेष्ठं॒ यवि॑ष्ठ॒मति॑थिं॒ स्वा॑हुतं॒ जुष्टं॒ जना॑य दा॒शुषे॑ । दे॒वाँ अच्छा॒ यात॑वे जा॒तवे॑दसम॒ग्निमी॑ळे॒ व्यु॑ष्टिषु ॥४॥ स्त॒वि॒ष्यामि॒ त्वाम॒हं विश्व॑स्यामृत भोजन । अग्ने॑ त्रा॒तार॑म॒मृतं॑ मियेध्य॒ यजि॑ष्ठं हव्यवाहन ॥५॥ सु॒शंसो॑ बोधि गृण॒ते य॑विष्ठ्य॒ मधु॑जिह्व॒: स्वा॑हुतः । प्रस्क॑ण्वस्य प्रति॒रन्नायु॑र्जी॒वसे॑ नम॒स्या दैव्यं॒ जन॑म् ॥६॥ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसं॒ सं हि त्वा॒ विश॑ इ॒न्धते॑ । स आ व॑ह पुरुहूत॒ प्रचे॑त॒सो ऽग्ने॑ दे॒वाँ इ॒ह द्र॒वत् ॥७॥ स॒वि॒तार॑मु॒षस॑म॒श्विना॒ भग॑म॒ग्निं व्यु॑ष्टिषु॒ क्षप॑: । कण्वा॑सस्त्वा सु॒तसो॑मास इन्धते हव्य॒वाहं॑ स्वध्वर ॥८॥ पति॒र्ह्य॑ध्व॒राणा॒मग्ने॑ दू॒तो वि॒शामसि॑ । उ॒ष॒र्बुध॒ आ व॑ह॒ सोम॑पीतये दे॒वाँ अ॒द्य स्व॒र्दृश॑: ॥९॥ अग्ने॒ पूर्वा॒ अनू॒षसो॑ विभावसो दी॒देथ॑ वि॒श्वद॑र्शतः । असि॒ ग्रामे॑ष्ववि॒ता पु॒रोहि॒तो ऽसि॑ य॒ज्ञेषु॒ मानु॑षः ॥१०॥ नि त्वा॑ य॒ज्ञस्य॒ साध॑न॒मग्ने॒ होता॑रमृ॒त्विज॑म् । म॒नु॒ष्वद् दे॑व धीमहि॒ प्रचे॑तसं जी॒रं दू॒तमम॑र्त्यम् ॥११॥ यद् दे॒वानां॑ मित्रमहः पु॒रोहि॒तो ऽन्त॑रो॒ यासि॑ दू॒त्य॑म् । सिन्धो॑रिव॒ प्रस्व॑नितास ऊ॒र्मयो॒ ऽग्नेर्भ्रा॑जन्ते अ॒र्चय॑: ॥१२॥ श्रु॒धि श्रु॑त्कर्ण॒ वह्नि॑भिर्दे॒वैर॑ग्ने स॒याव॑भिः । आ सी॑दन्तु ब॒र्हिषि॑ मि॒त्रो अ॑र्य॒मा प्रा॑त॒र्यावा॑णो अध्व॒रम् ॥१३॥ शृ॒ण्वन्तु॒ स्तोमं॑ म॒रुत॑: सु॒दान॑वो ऽग्निजि॒ह्वा ऋ॑ता॒वृध॑: । पिब॑तु॒ सोमं॒ वरु॑णो धृ॒तव्र॑तो॒ ऽश्विभ्या॑मु॒षसा॑ स॒जूः ॥१४॥
हे अमर अग्नि! आज उषा के समान अद्भुत धन लेकर दानी यजमान के पास प्रात:काल जागने वाले देवों को ले आओ। हे जातवेद! तुम यज्ञों के रथी, प्रिय दूत एवं हविवाहक हो; अश्विनी और उषा के साथ मिलकर हमें उत्तम वीर्य और महान यश प्रदान करो। आज हम धूमकेतु, तेजस्वी, यज्ञ की शोभा बढ़ाने वाले, वसुस्वरूप, अनेक जनों के प्रिय अग्नि को दूत रूप में वरण करते हैं। हम श्रेष्ठ, युवतम, भलीभाँति हवि पाने वाले, दानी यजमान के प्रिय अतिथि, सर्वज्ञ अग्नि को प्रभात-वेला में देवों के पास जाने के लिए स्तुति करते हैं। हे अमृत के भोक्ता अग्नि! मैं तुम्हारी स्तुति करूँगा, तुम रक्षक, अमर, पूज्यतम एवं हविवाहक हो। हे युवतम! स्तोता के प्रति सुप्रसन्न रहो, मधुर जिह्वा वाले, भलीभाँति आहुति पाने वाले तुम प्रस्कण्व की आयु बढ़ाते हुए दिव्य जनों का सम्मान करो। तुम सबके ज्ञाता होता हो, प्रजाजन तुम्हें प्रज्वलित करते हैं; हे बहुपूजित अग्नि! बुद्धिमान देवों को यहाँ शीघ्र लाओ। सविता, उषा, अश्विनीकुमार, भग और अग्नि को रात्रि की समाप्ति पर लाओ; सोमयुक्त कण्वगण तुम्हें, हविवाहक को, प्रज्वलित करते हैं। तुम अध्वरों के स्वामी, प्रजाओं के दूत, प्रात:जागरणशील अग्नि हो; सोमपान हेतु स्वर्गदर्शी देवों को आज यहाँ लाओ। हे प्रकाशमय अग्नि! तुम समस्त उषाओं से पहले प्रकट होकर सबको दिखाई देते रहे हो; तुम ग्रामों के रक्षक, यज्ञों के पुरोहित एवं मानवों के सखा हो। हम तुम्हें यज्ञ के सिद्धिकर्ता, होता, ऋत्विज, बुद्धिमान, वेगवान अमर दूत के रूप में मनु के समान ध्यान करते हैं। हे मित्रवत महान अग्नि! जब तुम देवों में पुरोहित एवं दूतकर्म हेतु जाते हो, तब तुम्हारी ज्वालाएं सिन्धु की गर्जनशील तरंगों-सी चमकती हैं। हे तीक्ष्णकर्ण अग्नि! अपने सहचर देवों सहित हमारी सुनो; मित्र और अर्यमा, प्रात:आगमनशील, कुशासन पर बैठकर यज्ञ में सम्मिलित हों। कल्याणकारी, अग्निजिह्व, ऋत को बढ़ाने वाले मरुत हमारी स्तुति सुनें; व्रतधारी वरुण अश्विनी और उषा के साथ मिलकर सोमपान करें।
१० प्रस्कण्वः काण्वः। अग्निः, १० (उत्तरार्धस्य) देवाः। अनुष्टुप्। त्वम॑ग्ने॒ वसूँ॑रि॒ह रु॒द्राँ आ॑दि॒त्याँ उ॒त । यजा॑ स्वध्व॒रं जनं॒ मनु॑जातं घृत॒प्रुष॑म् ॥१॥ श्रु॒ष्टी॒वानो॒ हि दा॒शुषे॑ दे॒वा अ॑ग्ने॒ विचे॑तसः । तान् रो॑हिदश्व गिर्वण॒स् त्रय॑स्त्रिंशत॒मा व॑ह ॥२॥ प्रि॒य॒मे॒ध॒वद॑त्रि॒वज् जात॑वेदो विरूप॒वत् । अ॒ङ्गि॒र॒स्वन्म॑हिव्रत॒ प्रस्क॑ण्वस्य श्रुधी॒ हव॑म् ॥३॥ महि॑केरव ऊ॒तये॑ प्रि॒यमे॑धा अहूषत । राज॑न्तमध्व॒राणा॑म॒ग्निं शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑ ॥४॥ घृता॑हवन सन्त्ये॒मा उ॒ षु श्रु॑धी॒ गिर॑: । याभि॒: कण्व॑स्य सू॒नवो॒ हव॒न्तेऽव॑से त्वा ॥५॥ त्वां चि॑त्रश्रवस्तम॒ हव॑न्ते वि॒क्षु ज॒न्तव॑: । शो॒चिष्के॑शं पुरुप्रि॒याग्ने॑ ह॒व्याय॒ वोह्ळ॑वे ॥६॥ नि त्वा॒ होता॑रमृ॒त्विजं॑ दधि॒रे व॑सु॒वित्त॑मम् । श्रुत्क॑र्णं स॒प्रथ॑स्तमं॒ विप्रा॑ अग्ने॒ दिवि॑ष्टिषु ॥७॥ आ त्वा॒ विप्रा॑ अचुच्यवुः सु॒तसो॑मा अ॒भि प्रय॑: । बृ॒हद् भा बिभ्र॑तो ह॒विरग्ने॒ मर्ता॑य दा॒शुषे॑ ॥८॥ प्रा॒त॒र्याव्ण॑: सहस्कृत सोम॒पेया॑य सन्त्य । इ॒हाद्य दैव्यं॒ जनं॑ ब॒र्हिरा सा॑दया वसो ॥९॥ अ॒र्वाञ्चं॒ दैव्यं॒ जन॒मग्ने॒ यक्ष्व॒ सहू॑तिभिः । अ॒यं सोम॑: सुदानव॒स् तं पा॑त ति॒रोअ॑ह्न्यम् ॥१०॥
हे अग्नि! तुम इस अनुष्ठान में वसुओं, रुद्रों और आदित्यों का यजन करो. तुम शोभन यज्ञ करने वाले, प्रजापति मनुद्वारा उत्पादित एवं जल सींचने वालों की भी अर्चना करो
१५ प्रस्कण्वः काण्वः। अश्विनौ। गायत्री। ए॒षो उ॒षा अपू॑र्व्या॒ व्यु॑च्छति प्रि॒या दि॒वः । स्तु॒षे वा॑मश्विना बृ॒हत् ॥१॥ या द॒स्रा सिन्धु॑मातरा मनो॒तरा॑ रयी॒णाम् । धि॒या दे॒वा व॑सु॒विदा॑ ॥२॥ व॒च्यन्ते॑ वां ककु॒हासो॑ जू॒र्णाया॒मधि॑ वि॒ष्टपि॑ । यद् वां॒ रथो॒ विभि॒ष्पता॑त् ॥३॥ ह॒विषा॑ जा॒रो अ॒पां पिप॑र्ति॒ पपु॑रिर्नरा । पि॒ता कुट॑स्य चर्ष॒णिः ॥४॥ आ॒दा॒रो वां॑ मती॒नां नास॑त्या मतवचसा । पा॒तं सोम॑स्य धृष्णु॒या ॥५॥ या न॒: पीप॑रदश्विना॒ ज्योति॑ष्मती॒ तम॑स्ति॒रः । ताम॒स्मे रा॑साथा॒मिष॑म् ॥६॥ आ नो॑ ना॒वा म॑ती॒नां या॒तं पा॒राय॒ गन्त॑वे । यु॒ञ्जाथा॑मश्विना॒ रथ॑म् ॥७॥ अ॒रित्रं॑ वां दि॒वस्पृ॒थु ती॒र्थे सिन्धू॑नां॒ रथ॑: । धि॒या यु॑युज्र॒ इन्द॑वः ॥८॥ दि॒वस्क॑ण्वास॒ इन्द॑वो॒ वसु॒ सिन्धू॑नां प॒दे । स्वं व॒व्रिं कुह॑ धित्सथः ॥९॥ अभू॑दु॒ भा उ॑ अं॒शवे॒ हिर॑ण्यं॒ प्रति॒ सूर्य॑: । व्य॑ख्यज्जि॒ह्वयासि॑तः ॥१०॥ अभू॑दु पा॒रमेत॑वे॒ पन्था॑ ऋ॒तस्य॑ साधु॒या । अद॑र्शि॒ वि स्रु॒तिर्दि॒वः ॥११॥ तत्त॒दिद॒श्विनो॒रवो॑ जरि॒ता प्रति॑ भूषति । मदे॒ सोम॑स्य॒ पिप्र॑तोः ॥१२॥ वा॒व॒सा॒ना वि॒वस्व॑ति॒ सोम॑स्य पी॒त्या गि॒रा । म॒नु॒ष्वच्छ॑म्भू॒ आ ग॑तम् ॥१३॥ यु॒वोरु॒षा अनु॒ श्रियं॒ परि॑ज्मनोरु॒पाच॑रत् । ऋ॒ता व॑नथो अ॒क्तुभि॑: ॥१४॥ उ॒भा पि॑बतमश्विनो॒भा न॒: शर्म॑ यच्छतम् । अ॒वि॒द्रि॒याभि॑रू॒तिभि॑: ॥१५॥
यह अपूर्व, प्रिय, स्वर्ग की उषा प्रकट हो रही है; हे अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हारी महान स्तुति करता हूँ। हे कुशल देवो! तुम सिन्धु के सहचर, बुद्धि द्वारा धनों के ज्ञाता एवं धन प्राप्त कराने वाले हो। तुम्हारे बलशाली अश्व पुरानी भूमि पर गरजते हैं जब तुम्हारा पंखयुक्त रथ उड़ान भरता है। हवि द्वारा जलों का प्रेमी, भरपूर करने वाला, मनुष्यों का पिता एवं द्रष्टा तृप्त होता है। हे नासत्यो! स्तुतियों के दाता, विचारशील वाणी वाले, साहसपूर्वक सोम का पान करो। जो ज्योतिर्मयी वस्तु अंधकार को पार करके हमें तृप्त करती है, हे अश्विनो! वही अन्न हमें प्रदान करो। हमारे स्तोत्रों की नौका में बैठकर पार जाने के लिए आओ, हे अश्विनो! अपना रथ जोतो। तुम्हारा चप्पू आकाश जितना विस्तृत है, नदियों के तीर्थ पर तुम्हारा रथ है; बुद्धि से धनरूपी सोमबिंदु जुते हैं, नदियों के तट पर कण्वों के समीप। सूर्य की किरण के लिए प्रकाश एवं स्वर्ण प्रकट हुआ, अंधकार जिह्वा से चमक उठा। सत्य का पार जाने का मार्ग सीधा प्रकट हुआ, स्वर्ग का मार्ग दिखाई दिया। स्तुतिकर्ता अश्विनों की वही कृपा सोमपान के आनंद में सदा प्राप्त करता है। दिन के जागरण में सोमपान की वाणी से गाते हुए, हे मनु के समान कल्याणकारी अश्विनो! यहाँ आओ। तुम दोनों के चारों ओर विचरण करती उषा तुम्हारी शोभा का अनुसरण करती है, तुम रात्रि की किरणों से सत्य में रमते हो। हे अश्विनो! दोनों सोमपान करो, दोनों हमें शरण दो, अपनी अटूट सहायता से।
१० प्रस्कण्वः काण्वः। अश्विनौ। प्रगाथः – विषमा बृहत्यः, समा सतोबृहत्यः। अ॒यं वां॒ मधु॑मत्तमः सु॒तः सोम॑ ऋतावृधा । तम॑श्विना पिबतं ति॒रोअ॑ह्न्यं ध॒त्तं रत्ना॑नि दा॒शुषे॑ ॥१॥ त्रि॒व॒न्धु॒रेण॑ त्रि॒वृता॑ सु॒पेश॑सा॒ रथे॒ना या॑तमश्विना । कण्वा॑सो वां॒ ब्रह्म॑ कृण्वन्त्यध्व॒रे तेषां॒ सु शृ॑णुतं॒ हव॑म् ॥२॥ अश्वि॑ना॒ मधु॑मत्तमं पा॒तं सोम॑मृतावृधा । अथा॒द्य द॑स्रा॒ वसु॒ बिभ्र॑ता॒ रथे॑ दा॒श्वांस॒मुप॑ गच्छतम् ॥३॥ त्रि॒ष॒ध॒स्थे ब॒र्हिषि॑ विश्ववेदसा॒ मध्वा॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्षतम् । कण्वा॑सो वां सु॒तसो॑मा अ॒भिद्य॑वो यु॒वां ह॑वन्ते अश्विना ॥४॥ याभि॒: कण्व॑म॒भिष्टि॑भि॒: प्राव॑तं यु॒वम॑श्विना । ताभि॒: ष्व१स्माँ अ॑वतं शुभस्पती पा॒तं सोम॑मृतावृधा ॥५॥ सु॒दासे॑ दस्रा॒ वसु॒ बिभ्र॑ता॒ रथे॒ पृक्षो॑ वहतमश्विना । र॒यिं स॑मु॒द्रादु॒त वा॑ दि॒वस्पर्य॒स्मे ध॑त्तं पुरु॒स्पृह॑म् ॥६॥ यन्ना॑सत्या परा॒वति॒ यद्वा॒ स्थो अधि॑ तु॒र्वशे॑ । अतो॒ रथे॑न सु॒वृता॑ न॒ आ ग॑तं सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॑: ॥७॥ अ॒र्वाञ्चा॑ वां॒ सप्त॑योऽध्वर॒श्रियो॒ वह॑न्तु॒ सव॒नेदुप॑ । इषं॑ पृ॒ञ्चन्ता॑ सु॒कृते॑ सु॒दान॑व॒ आ ब॒र्हिः सी॑दतं नरा ॥८॥ तेन॑ नास॒त्या ग॑तं॒ रथे॑न॒ सूर्य॑त्वचा । येन॒ शश्व॑दू॒हथु॑र्दा॒शुषे॒ वसु॒ मध्व॒: सोम॑स्य पी॒तये॑ ॥९॥ उ॒क्थेभि॑र॒र्वागव॑से पुरू॒वसू॑ अ॒र्कैश्च॒ नि ह्व॑यामहे । शश्व॒त् कण्वा॑नां॒ सद॑सि प्रि॒ये हि कं॒ सोमं॑ प॒पथु॑रश्विना ॥१०॥
हे सत्य को बढ़ाने वाले अश्विनो! यह अत्यंत मधुर सोम तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है; इसे कल का पड़ा हुआ भी पान करो और दानी यजमान को रत्न प्रदान करो। तीन आसनों वाले, तीन पहियों वाले, सुंदर रथ पर सवार होकर आओ, हे अश्विनो! कण्वगण यज्ञ में तुम्हारे लिए स्तुति करते हैं, उनकी पुकार भलीभाँति सुनो। हे सत्यवर्धक अश्विनो! अत्यंत मधुर सोम का पान करो; फिर हे कुशल देवो! धन धारण करते हुए रथ पर दानी यजमान के पास आज ही आओ। त्रिस्तरीय कुशासन पर, हे सर्वज्ञ देवो! यज्ञ को मधु से सींचो; सोमयुक्त, स्वर्गाभिलाषी कण्वगण तुम्हें बुलाते हैं। जिन सहायताओं से तुमने कण्व की रक्षा की, उन्हीं से हमारी भी रक्षा करो, हे कल्याण के स्वामियो! और सत्यवर्धक सोम का पान करो। हे कुशल अश्विनो! सुदास के लिए धन धारण करते हुए रथ पर अन्न लाओ; समुद्र से अथवा स्वर्ग से बहुप्रार्थित धन हमें प्रदान करो। हे नासत्यो! चाहे तुम दूर देश में हो या तुर्वश के समीप हो, वहाँ से अपने सुगमगामी रथ द्वारा सूर्य की किरणों के साथ हमारे पास आओ। तुम्हारे यज्ञशोभी सात अश्व हमारी सोमधाराओं के समीप हमें लाएं; हे वीरो! अन्न से तृप्त करते हुए सुकृती, दानी यजमान के कुशासन पर बैठो। हे नासत्यो! उसी सूर्यत्वचा रथ से आओ जिससे तुमने सदा दानी यजमान को सोमपान हेतु धन दिया। हम स्तुतियों और अर्चनाओं से तुम्हें, हे अत्यंत धनी देवो! समीप बुलाते हैं; कण्वों के प्रिय सदन में तुमने सदा सोम पिया है, हे अश्विनो!
१६ प्रस्कण्वः काण्वः। उषाः। प्रगाथः – विषमा बृहत्यः, समाः सतोबृहत्यः। स॒ह वा॒मेन॑ न उषो॒ व्यु॑च्छा दुहितर्दिवः । स॒ह द्यु॒म्नेन॑ बृह॒ता वि॑भावरि रा॒या दे॑वि॒ दास्व॑ती ॥१॥ अश्वा॑वती॒र्गोम॑तीर्विश्वसु॒विदो॒ भूरि॑ च्यवन्त॒ वस्त॑वे । उदी॑रय॒ प्रति॑ मा सू॒नृता॑ उष॒श् चोद॒ राधो॑ म॒घोना॑म् ॥२॥ उ॒वासो॒षा उ॒च्छाच्च॒ नु दे॒वी जी॒रा रथा॑नाम् । ये अ॑स्या आ॒चर॑णेषु दध्रि॒रे स॑मु॒द्रे न श्र॑व॒स्यव॑: ॥३॥ उषो॒ ये ते॒ प्र यामे॑षु यु॒ञ्जते॒ मनो॑ दा॒नाय॑ सू॒रय॑: । अत्राह॒ तत्कण्व॑ एषां॒ कण्व॑तमो॒ नाम॑ गृणाति नृ॒णाम् ॥४॥ आ घा॒ योषे॑व सू॒नर्यु॒षा या॑ति प्रभुञ्ज॒ती । ज॒रय॑न्ती॒ वृज॑नं प॒द्वदी॑यत॒ उत्पा॑तयति प॒क्षिण॑: ॥५॥ वि या सृ॒जति॒ सम॑नं॒ व्य१र्थिन॑: प॒दं न वे॒त्योद॑ती । वयो॒ नकि॑ष्टे पप्ति॒वांस॑ आसते॒ व्यु॑ष्टौ वाजिनीवति ॥६॥ ए॒षायु॑क्त परा॒वत॒: सूर्य॑स्यो॒दय॑ना॒दधि॑ । श॒तं रथे॑भिः सु॒भगो॒षा इ॒यं वि या॑त्य॒भि मानु॑षान् ॥७॥ विश्व॑मस्या नानाम॒ चक्ष॑से॒ जग॒ज् ज्योति॑ष्कृणोति सू॒नरी॑ । अप॒ द्वेषो॑ म॒घोनी॑ दुहि॒ता दि॒व उ॒षा उ॑च्छ॒दप॒ स्रिध॑: ॥८॥ उष॒ आ भा॑हि भा॒नुना॑ च॒न्द्रेण॑ दुहितर्दिवः । आ॒वह॑न्ती॒ भूर्य॒स्मभ्यं॒ सौभ॑गं व्यु॒च्छन्ती॒ दिवि॑ष्टिषु ॥९॥ विश्व॑स्य॒ हि प्राण॑नं॒ जीव॑नं॒ त्वे वि यदु॒च्छसि॑ सूनरि । सा नो॒ रथे॑न बृह॒ता वि॑भावरि श्रु॒धि चि॑त्रामघे॒ हव॑म् ॥१०॥ उषो॒ वाजं॒ हि वंस्व॒ यश्चि॒त्रो मानु॑षे॒ जने॑ । तेना व॑ह सु॒कृतो॑ अध्व॒राँ उप॒ ये त्वा॑ गृ॒णन्ति॒ वह्न॑यः ॥११॥ विश्वा॑न् दे॒वाँ आ व॑ह॒ सोम॑पीतये॒ ऽन्तरि॑क्षादुष॒स्त्वम् । सास्मासु॑ धा॒ गोम॒दश्वा॑वदु॒क्थ्य१मुषो॒ वाजं॑ सु॒वीर्य॑म् ॥१२॥ यस्या॒ रुश॑न्तो अ॒र्चय॒: प्रति॑ भ॒द्रा अदृ॑क्षत । सा नो॑ र॒यिं वि॒श्ववा॑रं सु॒पेश॑समु॒षा द॑दातु॒ सुग्म्य॑म् ॥१३॥ ये चि॒द्धि त्वामृष॑य॒: पूर्व॑ ऊ॒तये॑ जुहू॒रेऽव॑से महि । सा न॒: स्तोमाँ॑ अ॒भि गृ॑णीहि॒ राध॒सोष॑: शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑ ॥१४॥ उषो॒ यद॒द्य भा॒नुना॒ वि द्वारा॑वृ॒णवो॑ दि॒वः । प्र नो॑ यच्छतादवृ॒कं पृ॒थु च्छ॒र्दिः प्र दे॑वि॒ गोम॑ती॒रिष॑: ॥१५॥ सं नो॑ रा॒या बृ॑ह॒ता वि॒श्वपे॑शसा मिमि॒क्ष्वा समिळा॑भि॒रा । सं द्यु॒म्नेन॑ विश्व॒तुरो॑षो महि॒ सं वाजै॑र्वाजिनीवति ॥१६॥
हे स्वर्गपुत्री उषा! हमारे धन के साथ प्रभात करो. हे विभावरी! पर्याप्त अन्न के साथ प्रभात करो. हे देवि! तुम दानशील होकर पशुरूपी धन के साथ प्रभात करो
४ प्रस्कण्वः काण्वः। उषाः। अनुष्टुप्। उषो॑ भ॒द्रेभि॒रा ग॑हि दि॒वश्चि॑द् रोच॒नादधि॑ । वह॑न्त्वरु॒णप्स॑व॒ उप॑ त्वा सो॒मिनो॑ गृ॒हम् ॥१॥ सु॒पेश॑सं सु॒खं रथं॒ यम॒ध्यस्था॑ उष॒स्त्वम् । तेना॑ सु॒श्रव॑सं॒ जनं॒ प्रावा॒द्य दु॑हितर्दिवः ॥२॥ वय॑श्चित् ते पत॒त्रिणो॑ द्वि॒पच्चतु॑ष्पदर्जुनि । उष॒: प्रार॑न्नृ॒तूँरनु॑ दि॒वो अन्ते॑भ्य॒स्परि॑ ॥३॥ व्यु॒च्छन्ती॒ हि र॒श्मिभि॒र्विश्व॑मा॒भासि॑ रोच॒नम् । तां त्वामु॑षर्वसू॒यवो॑ गी॒र्भिः कण्वा॑ अहूषत ॥४॥
हे उषा! प्रकाशमान आकाश से सुंदर मार्ग द्वारा आओ. लाल रंग की गाय तुम्हें सोमयुक्त यजमान के यज्ञ में ले जाए
१३ प्रस्कण्वः काण्वः। सूर्यः (११-१३ रोगघ्न्य उपनिषदः, १३ अन्त्योऽर्धर्चः द्विषद् घ्नश्च)। गायत्री, १०-१३ अनुष्टुप्। उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तव॑: । दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म् ॥१॥ अप॒ त्ये ता॒यवो॑ यथा॒ नक्ष॑त्रा यन्त्य॒क्तुभि॑: । सूरा॑य वि॒श्वच॑क्षसे ॥२॥ अदृ॑श्रमस्य के॒तवो॒ वि र॒श्मयो॒ जनाँ॒ अनु॑ । भ्राज॑न्तो अ॒ग्नयो॑ यथा ॥३॥ त॒रणि॑र्वि॒श्वद॑र्शतो ज्योति॒ष्कृद॑सि सूर्य । विश्व॒मा भा॑सि रोच॒नम् ॥४॥ प्र॒त्यङ् दे॒वानां॒ विश॑: प्र॒त्यङ्ङुदे॑षि॒ मानु॑षान् । प्र॒त्यङ् विश्वं॒ स्व॑र्दृ॒शे ॥५॥ येना॑ पावक॒ चक्ष॑सा भुर॒ण्यन्तं॒ जनाँ॒ अनु॑ । त्वं व॑रुण॒ पश्य॑सि ॥६॥ वि द्यामे॑षि॒ रज॑स्पृ॒थ्वहा॒ मिमा॑नो अ॒क्तुभि॑: । पश्य॒ञ्जन्मा॑नि सूर्य ॥७॥ स॒प्त त्वा॑ ह॒रितो॒ रथे॒ वह॑न्ति देव सूर्य । शो॒चिष्के॑शं विचक्षण ॥८॥ अयु॑क्त स॒प्त शु॒न्ध्युव॒: सूरो॒ रथ॑स्य न॒प्त्य॑: । ताभि॑र्याति॒ स्वयु॑क्तिभिः ॥९॥ उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ ज्योति॒ष्पश्य॑न्त॒ उत्त॑रम् । दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम् ॥१०॥ उ॒द्यन्न॒द्य मि॑त्रमह आ॒रोह॒न्नुत्त॑रां॒ दिव॑म् । हृ॒द्रो॒गं मम॑ सूर्य हरि॒माणं॑ च नाशय ॥११॥ शुके॑षु मे हरि॒माणं॑ रोप॒णाका॑सु दध्मसि । अथो॑ हारिद्र॒वेषु॑ मे हरि॒माणं॒ नि द॑ध्मसि ॥१२॥ उद॑गाद॒यमा॑दि॒त्यो विश्वे॑न॒ सह॑सा स॒ह । द्वि॒षन्तं॒ मह्यं॑ र॒न्धय॒न् मो अ॒हं द्वि॑ष॒ते र॑धम् ॥१३॥
सूर्य के घोड़े सब प्राणियों को जानने वाले हैं, वे प्रकाशयुक्त सूर्य को इसलिए ऊपर ले जाते हैं कि सारा संसार उन्हें देख सके
१५ सव्य आङ्गिरसः। इन्द्रः। जगती, १४-१५ त्रिष्टुप्। अ॒भि त्यं मे॒षं पु॑रुहू॒तमृ॒ग्मिय॒मिन्द्रं॑ गी॒र्भिर्म॑दता॒ वस्वो॑ अर्ण॒वम् । यस्य॒ द्यावो॒ न वि॒चर॑न्ति॒ मानु॑षा भु॒जे मंहि॑ष्ठम॒भि विप्र॑मर्चत ॥१॥ अ॒भीम॑वन्वन्त्स्वभि॒ष्टिमू॒तयो॑ ऽन्तरिक्ष॒प्रां तवि॑षीभि॒रावृ॑तम् । इन्द्रं॒ दक्षा॑स ऋ॒भवो॑ मद॒च्युतं॑ श॒तक्र॑तुं॒ जव॑नी सू॒नृतारु॑हत् ॥२॥ त्वं गो॒त्रमङ्गि॑रोभ्योऽवृणो॒रपो॒तात्र॑ये श॒तदु॑रेषु गातु॒वित् । स॒सेन॑ चिद् विम॒दाया॑वहो॒ वस्वा॒जावद्रिं॑ वावसा॒नस्य॑ न॒र्तय॑न् ॥३॥ त्वम॒पाम॑पि॒धाना॑वृणो॒रपाधा॑रय॒: पर्व॑ते॒ दानु॑म॒द्वसु॑ । वृ॒त्रं यदि॑न्द्र॒ शव॒साव॑धी॒रहि॒मादित् सूर्यं॑ दि॒व्यारो॑हयो दृ॒शे ॥४॥ त्वं मा॒याभि॒रप॑ मा॒यिनो॑ऽधमः स्व॒धाभि॒र्ये अधि॒ शुप्ता॒वजु॑ह्वत । त्वं पिप्रो॑र्नृमण॒: प्रारु॑ज॒: पुर॒: प्र ऋ॒जिश्वा॑नं दस्यु॒हत्ये॑ष्वाविथ ॥५॥ त्वं कुत्सं॑ शुष्ण॒हत्ये॑ष्वावि॒थार॑न्धयोऽतिथि॒ग्वाय॒ शम्ब॑रम् । म॒हान्तं॑ चिदर्बु॒दं नि क्र॑मीः प॒दा स॒नादे॒व द॑स्यु॒हत्या॑य जज्ञिषे ॥६॥ त्वे विश्वा॒ तवि॑षी स॒ध्र्य॑ग्घि॒ता तव॒ राध॑: सोमपी॒थाय॑ हर्षते । तव॒ वज्र॑श्चिकिते बा॒ह्वोर्हि॒तो वृ॒श्चा शत्रो॒रव॒ विश्वा॑नि॒ वृष्ण्या॑ ॥७॥ वि जा॑नी॒ह्यार्या॒न्ये च॒ दस्य॑वो ब॒र्हिष्म॑ते रन्धया॒ शास॑दव्र॒तान् । शाकी॑ भव॒ यज॑मानस्य चोदि॒ता विश्वेत् ता ते॑ सध॒मादे॑षु चाकन ॥८॥ अनु॑व्रताय र॒न्धय॒न्नप॑व्रताना॒भूभि॒रिन्द्र॑: श्न॒थय॒न्नना॑भुवः । वृ॒द्धस्य॑ चि॒द् वर्ध॑तो॒ द्यामिन॑क्षत॒: स्तवा॑नो व॒म्रो वि ज॑घान सं॒दिह॑: ॥९॥ तक्ष॒द् यत्त॑ उ॒शना॒ सह॑सा॒ सहो॒ वि रोद॑सी म॒ज्मना॑ बाधते॒ शव॑: । आ त्वा॒ वात॑स्य नृमणो मनो॒युज॒ आ पूर्य॑माणमवहन्न॒भि श्रव॑: ॥१०॥ मन्दि॑ष्ट॒ यदु॒शने॑ का॒व्ये सचाँ॒ इन्द्रो॑ व॒ङ्कू व॑ङ्कु॒तराधि॑ तिष्ठति । उ॒ग्रो य॒यिं निर॒पः स्रोत॑सासृज॒द्वि शुष्ण॑स्य दृंहि॒ता ऐ॑रय॒त्पुर॑: ॥११॥ आ स्मा॒ रथं॑ वृष॒पाणे॑षु तिष्ठसि शार्या॒तस्य॒ प्रभृ॑ता॒ येषु॒ मन्द॑से । इन्द्र॒ यथा॑ सु॒तसो॑मेषु चा॒कनो॑ऽन॒र्वाणं॒ श्लोक॒मा रो॑हसे दि॒वि ॥१२॥ अद॑दा॒ अर्भां॑ मह॒ते व॑च॒स्यवे॑ क॒क्षीव॑ते वृच॒यामि॑न्द्र सुन्व॒ते । मेना॑भवो वृषण॒श्वस्य॑ सुक्रतो॒ विश्वेत् ता ते॒ सव॑नेषु प्र॒वाच्या॑ ॥१३॥ इन्द्रो॑ अश्रायि सु॒ध्यो॑ निरे॒के प॒ज्रेषु॒ स्तोमो॒ दुर्यो॒ न यूप॑: । अ॒श्व॒युर्ग॒व्यू र॑थ॒युर्व॑सू॒युरिन्द्र॒ इद्रा॒यः क्ष॑यति प्रय॒न्ता ॥१४॥ इ॒दं नमो॑ वृष॒भाय॑ स्व॒राजे॑ स॒त्यशु॑ष्माय त॒वसे॑ऽवाचि । अ॒स्मिन्नि॑न्द्र वृ॒जने॒ सर्व॑वीरा॒: स्मत्सू॒रिभि॒स्तव॒ शर्म॑न्त्स्याम ॥१५॥
सबका रक्षण एवं प्रवर्धन करने वाले ऋभुगण नामक मरुतों ने शोभन, आगमनशील, अपने तेज से आकाश को पूर्ण करने वाले, अति बली, शत्रुओं का गर्व नष्ट करने वाले एवं शतक्रतु इंद्र के सम्मुख आकर उनकी सहायता की
१५ सव्य आङ्गिरसः। इन्द्रः। जगती, १३-१५ त्रिष्टुप्। त्यं सु मे॒षं म॑हया स्व॒र्विदं॑ श॒तं यस्य॑ सु॒भ्व॑: सा॒कमीर॑ते । अत्यं॒ न वाजं॑ हवन॒स्यदं॒ रथ॒मेन्द्रं॑ ववृत्या॒मव॑से सुवृ॒क्तिभि॑: ॥१॥ स पर्व॑तो॒ न ध॒रुणे॒ष्वच्यु॑तः स॒हस्र॑मूति॒स्तवि॑षीषु वावृधे । इन्द्रो॒ यद् वृत्रमव॑धीन्नदी॒वृत॑मु॒ब्जन्नर्णां॑सि॒ जर्हृ॑षाणो॒ अन्ध॑सा ॥२॥ स हि द्व॒रो द्व॒रिषु॑ व॒व्र ऊध॑नि च॒न्द्रबु॑ध्नो॒ मद॑वृद्धो मनी॒षिभि॑: । इन्द्रं॒ तम॑ह्वे स्वप॒स्यया॑ धि॒या मंहि॑ष्ठरातिं॒ स हि पप्रि॒रन्ध॑सः ॥३॥ आ यं पृ॒णन्ति॑ दि॒वि सद्म॑बर्हिषः समु॒द्रं न सु॒भ्व१: स्वा अ॒भिष्ट॑यः । तं वृ॑त्र॒हत्ये॒ अनु॑ तस्थुरू॒तय॒: शुष्मा॒ इन्द्र॑मवा॒ता अह्रु॑तप्सवः ॥४॥ अ॒भि स्ववृ॑ष्टिं॒ मदे॑ अस्य॒ युध्य॑तो र॒घ्वीरि॑व प्रव॒णे स॑स्रुरू॒तय॑: । इन्द्रो॒ यद् व॒ज्री धृ॒षमा॑णो॒ अन्ध॑सा भि॒नद् व॒लस्य॑ परि॒धीँरि॑व त्रि॒तः ॥५॥ परीं॑ घृ॒णा च॑रति तित्वि॒षे शवो॒ ऽपो वृ॒त्वी रज॑सो बु॒ध्नमाश॑यत् । वृ॒त्रस्य॒ यत् प्र॑व॒णे दु॒र्गृभि॑श्वनो निज॒घन्थ॒ हन्वो॑रिन्द्र तन्य॒तुम् ॥६॥ ह्र॒दं न हि त्वा॑ न्यृ॒षन्त्यू॒र्मयो॒ ब्रह्मा॑णीन्द्र॒ तव॒ यानि॒ वर्ध॑ना । त्वष्टा॑ चित्ते॒ युज्यं॑ वावृधे॒ शव॑स्त॒तक्ष॒ वज्र॑म॒भिभू॑त्योजसम् ॥७॥ ज॒घ॒न्वाँ उ॒ हरि॑भिः सम्भृतक्रत॒विन्द्र॑ वृ॒त्रं मनु॑षे गातु॒यन्न॒पः । अय॑च्छथा बा॒ह्वोर्वज्र॑माय॒समधा॑रयो दि॒व्या सूर्यं॑ दृ॒शे ॥८॥ बृ॒हत् स्वश्च॑न्द्र॒मम॑व॒द् यदु॒क्थ्य १ मकृ॑ण्वत भि॒यसा॒ रोह॑णं दि॒वः । यन्मानु॑षप्रधना॒ इन्द्र॑मू॒तय॒: स्व॑र्नृ॒षाचो॑ म॒रुतोऽम॑द॒न्ननु॑ ॥९॥ द्यौश्चि॑द॒स्याम॑वाँ॒ अहे॑: स्व॒नादयो॑यवीद् भि॒यसा॒ वज्र॑ इन्द्र ते । वृ॒त्रस्य॒ यद् ब॑द्बधा॒नस्य॑ रोदसी॒ मदे॑ सु॒तस्य॒ शव॒साभि॑न॒च्छिर॑: ॥१०॥ यदिन्न्वि॑न्द्र पृथि॒वी दश॑भुजि॒रहा॑नि॒ विश्वा॑ त॒तन॑न्त कृ॒ष्टय॑: । अत्राह॑ ते मघव॒न् विश्रु॑तं॒ सहो॒ द्यामनु॒ शव॑सा ब॒र्हणा॑ भुवत् ॥११॥ त्वम॒स्य पा॒रे रज॑सो॒ व्यो॑मन॒: स्वभू॑त्योजा॒ अव॑से धृषन्मनः । च॒कृ॒षे भूमिं॑ प्रति॒मान॒मोज॑सो॒ ऽपः स्व॑: परि॒भूरे॒ष्या दिव॑म् ॥१२॥ त्वं भु॑वः प्रति॒मानं॑ पृथि॒व्या ऋ॒ष्ववी॑रस्य बृह॒तः पति॑र्भूः । विश्व॒माप्रा॑ अ॒न्तरि॑क्षं महि॒त्वा स॒त्यम॒द्धा नकि॑र॒न्यस्त्वावा॑न् ॥१३॥ न यस्य॒ द्यावा॑पृथि॒वी अनु॒ व्यचो॒ न सिन्ध॑वो॒ रज॑सो॒ अन्त॑मान॒शुः । नोत स्ववृ॑ष्टिं॒ मदे॑ अस्य॒ युध्य॑त॒ एको॑ अ॒न्यच्च॑कृषे॒ विश्व॑मानु॒षक् ॥१४॥ आर्च॒न्नत्र॑ म॒रुत॒: सस्मि॑न्ना॒जौ विश्वे॑ दे॒वासो॑ अमद॒न्ननु॑ त्वा । वृ॒त्रस्य॒ यद् भृ॑ष्टि॒मता॑ व॒धेन॒ नि त्वमि॑न्द्र॒ प्रत्या॒नं ज॒घन्थ॑ ॥१५॥
हे अध्वर्युगणो! उन बली इंद्र की पूजा करो, जिनकी स्तुति सौ स्तोता एक साथ मिलकर करते हैं और जो स्वर्ग प्राप्त करा देते हैं. इंद्र का रथ तेज दौड़ते हुए घोड़े के समान अत्यंत वेगपूर्वक यज्ञ की ओर चलता है. मैं अपनी स्तुतियों के द्वारा इंद्र से अनुरोध करता हूं कि वे उसी रथ पर चढ़कर मेरी रक्षा करें
११ सव्य आङ्गिरसः। इन्द्रः। जगती, १०-११ त्रिष्टुप्। न्यू॒ ३ षु वाचं॒ प्र म॒हे भ॑रामहे॒ गिर॒ इन्द्रा॑य॒ सद॑ने वि॒वस्व॑तः । नू चि॒द्धि रत्नं॑ सस॒तामि॒वावि॑द॒न्न दु॑ष्टु॒तिर्द्र॑विणो॒देषु॑ शस्यते ॥१॥ दु॒रो अश्व॑स्य दु॒र इ॑न्द्र॒ गोर॑सि दु॒रो यव॑स्य॒ वसु॑न इ॒नस्पति॑: । शि॒क्षा॒न॒रः प्र॒दिवो॒ अका॑मकर्शन॒: सखा॒ सखि॑भ्य॒स्तमि॒दं गृ॑णीमसि ॥२॥ शची॑व इन्द्र पुरुकृद् द्युमत्तम॒ तवेदि॒दम॒भित॑श्चेकिते॒ वसु॑ । अत॑: सं॒गृभ्या॑भिभूत॒ आ भ॑र॒ मा त्वा॑य॒तो ज॑रि॒तुः काम॑मूनयीः ॥३॥ ए॒भिर्द्युभि॑: सु॒मना॑ ए॒भिरिन्दु॑भिर्निरुन्धा॒नो अम॑तिं॒ गोभि॑र॒श्विना॑ । इन्द्रे॑ण॒ दस्युं॑ द॒रय॑न्त॒ इन्दु॑भिर्यु॒तद्वे॑षस॒: समि॒षा र॑भेमहि ॥४॥ समि॑न्द्र रा॒या समि॒षा र॑भेमहि॒ सं वाजे॑भिः पुरुश्च॒न्द्रैर॒भिद्यु॑भिः । सं दे॒व्या प्रम॑त्या वी॒रशु॑ष्मया॒ गोअ॑ग्र॒याश्वा॑वत्या रभेमहि ॥५॥ ते त्वा॒ मदा॑ अमद॒न् तानि॒ वृष्ण्या॒ ते सोमा॑सो वृत्र॒हत्ये॑षु सत्पते । यत् का॒रवे॒ दश॑ वृ॒त्राण्य॑प्र॒ति ब॒र्हिष्म॑ते॒ नि स॒हस्रा॑णि ब॒र्हय॑: ॥६॥ यु॒धा युध॒मुप॒ घेदे॑षि धृष्णु॒या पु॒रा पुरं॒ समि॒दं हं॒स्योज॑सा । नम्या॒ यदि॑न्द्र॒ सख्या॑ परा॒वति॑ निब॒र्हयो॒ नमु॑चिं॒ नाम॑ मा॒यिन॑म् ॥७॥ त्वं कर॑ञ्जमु॒त प॒र्णयं॑ वधी॒स्तेजि॑ष्ठयातिथि॒ग्वस्य॑ वर्त॒नी । त्वं श॒ता वङ्गृ॑दस्याभिन॒त् पुरो॑ ऽनानु॒दः परि॑षूता ऋ॒जिश्व॑ना ॥८॥ त्वमे॒ताञ्ज॑न॒राज्ञो॒ द्विर्दशा॑ऽब॒न्धुना॑ सु॒श्रव॑सोपज॒ग्मुष॑: । ष॒ष्टिं स॒हस्रा॑ नव॒तिं नव॑ श्रु॒तो नि च॒क्रेण॒ रथ्या॑ दु॒ष्पदा॑वृणक् ॥९॥ त्वमा॑विथ सु॒श्रव॑सं॒ तवो॒तिभि॒स्तव॒ त्राम॑भिरिन्द्र॒ तूर्व॑याणम् । त्वम॑स्मै॒ कुत्स॑मतिथि॒ग्वमा॒युं म॒हे राज्ञे॒ यूने॑ अरन्धनायः ॥१०॥ य उ॒दृची॑न्द्र दे॒वगो॑पा॒: सखा॑यस्ते शि॒वत॑मा॒ असा॑म । त्वां स्तो॑षाम॒ त्वया॑ सु॒वीरा॒ द्राघी॑य॒ आयु॑: प्रत॒रं दधा॑नाः ॥११॥
हम महान् इंद्र के लिए शोभन स्तुतियों का प्रयोग करते हैं, क्योंकि परिचर्या करने वाले यजमान के घर में इंद्र की स्तुतियां की जाती हैं. जिस प्रकार चोर सोए हुए लोगों की संपत्ति छीन लेते हैं, उसी प्रकार इंद्र असुरों के धन पर तुरंत अधिकार कर लेते हैं. धन देने वालों के विषय में अनुचित स्तुति नहीं की जाती
११ सव्य आङ्गिरसः। इन्द्रः। जगती, ६, ८-९, ११ त्रिष्टुप्। मा नो॑ अ॒स्मिन् म॑घवन् पृ॒त्स्वंह॑सि न॒हि ते॒ अन्त॒: शव॑सः परी॒णशे॑ । अक्र॑न्दयो न॒द्यो॒ ३ रोरु॑व॒द् वना॑ क॒था न क्षो॒णीर्भि॒यसा॒ समा॑रत ॥१॥ अर्चा॑ श॒क्राय॑ शा॒किने॒ शची॑वते शृ॒ण्वन्त॒मिन्द्रं॑ म॒हय॑न्न॒भि ष्टु॑हि । यो धृ॒ष्णुना॒ शव॑सा॒ रोद॑सी उ॒भे वृषा॑ वृष॒त्वा वृ॑ष॒भो न्यृ॒ञ्जते॑ ॥२॥ अर्चा॑ दि॒वे बृ॑ह॒ते शू॒ष्यं १ वच॒: स्वक्ष॑त्रं॒ यस्य॑ धृष॒तो धृ॒षन्मन॑: । बृ॒हच्छ्र॑वा॒ असु॑रो ब॒र्हणा॑ कृ॒तः पु॒रो हरि॑भ्यां वृष॒भो रथो॒ हि षः ॥३॥ त्वं दि॒वो बृ॑ह॒तः सानु॑ कोप॒यो ऽव॒ त्मना॑ धृष॒ता शम्ब॑रं भिनत् । यन्मा॒यिनो॑ व्र॒न्दिनो॑ म॒न्दिना॑ धृ॒षच्छि॒तां गभ॑स्तिम॒शनिं॑ पृत॒न्यसि॑ ॥४॥ नि यद् वृ॒णक्षि॑ श्वस॒नस्य॑ मू॒र्धनि॒ शुष्ण॑स्य चिद् व्र॒न्दिनो॒ रोरु॑व॒द् वना॑ । प्रा॒चीने॑न॒ मन॑सा ब॒र्हणा॑वता॒ यद॒द्या चि॑त्कृ॒णव॒: कस्त्वा॒ परि॑ ॥५॥ त्वमा॑विथ॒ नर्यं॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॒ त्वं तु॒र्वीतिं॑ व॒य्यं॑ शतक्रतो । त्वं रथ॒मेत॑शं॒ कृत्व्ये॒ धने॒ त्वं पुरो॑ नव॒तिं द॑म्भयो॒ नव॑ ॥६॥ स घा॒ राजा॒ सत्प॑तिः शूशुव॒ज्जनो॑ रा॒तह॑व्य॒: प्रति॒ यः शास॒मिन्व॑ति । उ॒क्था वा॒ यो अ॑भिगृ॒णाति॒ राध॑सा॒ दानु॑रस्मा॒ उप॑रा पिन्वते दि॒वः ॥७॥ अस॑मं क्ष॒त्रमस॑मा मनी॒षा प्र सो॑म॒पा अप॑सा सन्तु॒ नेमे॑ । ये त॑ इन्द्र द॒दुषो॑ व॒र्धय॑न्ति॒ महि॑ क्ष॒त्रं स्थवि॑रं॒ वृष्ण्यं॑ च ॥८॥ तुभ्येदे॒ते ब॑हु॒ला अद्रि॑दुग्धाश्चमू॒षद॑श्चम॒सा इ॑न्द्र॒पाना॑: । व्य॑श्नुहि त॒र्पया॒ काम॑मेषा॒मथा॒ मनो॑ वसु॒देया॑य कृष्व ॥९॥ अ॒पाम॑तिष्ठद्ध॒रुण॑ह्वरं॒ तमो॒ ऽन्तर्वृ॒त्रस्य॑ ज॒ठरे॑षु॒ पर्व॑तः । अ॒भीमिन्द्रो॑ न॒द्यो॑ व॒व्रिणा॑ हि॒ता विश्वा॑ अनु॒ष्ठाः प्र॑व॒णेषु॑ जिघ्नते ॥१०॥ स शेवृ॑ध॒मधि॑ धा द्यु॒म्नम॒स्मे महि॑ क्ष॒त्रं ज॑ना॒षाळि॑न्द्र॒ तव्य॑म् । रक्षा॑ च नो म॒घोन॑: पा॒हि सू॒रीन् रा॒ये च॑ नः स्वप॒त्या इ॒षे धा॑: ॥११॥
हे धन के स्वामी इंद्र! इस पाप में एवं पाप के परिणाम रूप युद्ध में हमें मत फंसाओ, क्योंकि कोई भी तुम्हारी शक्ति का अतिक्रमण नहीं कर सकता. अंतरिक्ष में वर्तमान तुम महती ध्वनि करते हुए नदी के जल को शब्दायमान कर देते हो तो फिर पृथ्वी भय से क्यों न कांपे?
८ सव्य आङ्गिरसः। इन्द्रः। जगती। दि॒वश्चि॑दस्य वरि॒मा वि प॑प्रथ॒ इन्द्रं॒ न म॒ह्ना पृ॑थि॒वी च॒न प्रति॑ । भी॒मस्तुवि॑ष्माञ्चर्ष॒णिभ्य॑ आत॒पः शिशी॑ते॒ वज्रं॒ तेज॑से॒ न वंस॑गः ॥१॥ सो अ॑र्ण॒वो न न॒द्य॑: समु॒द्रिय॒: प्रति॑ गृभ्णाति॒ विश्रि॑ता॒ वरी॑मभिः । इन्द्र॒: सोम॑स्य पी॒तये॑ वृषायते स॒नात् स यु॒ध्म ओज॑सा पनस्यते ॥२॥ त्वं तमि॑न्द्र॒ पर्व॑तं॒ न भोज॑से म॒हो नृ॒म्णस्य॒ धर्म॑णामिरज्यसि । प्र वी॒र्ये॑ण दे॒वताति॑ चेकिते॒ विश्व॑स्मा उ॒ग्रः कर्म॑णे पु॒रोहि॑तः ॥३॥ स इद् वने॑ नम॒स्युभि॑र्वचस्यते॒ चारु॒ जने॑षु प्रब्रुवा॒ण इ॑न्द्रि॒यम् । वृषा॒ छन्दु॑र्भवति हर्य॒तो वृषा॒ क्षेमे॑ण॒ धेनां॑ म॒घवा॒ यदिन्व॑ति ॥४॥ स इन्म॒हानि॑ समि॒थानि॑ म॒ज्मना॑ कृ॒णोति॑ यु॒ध्म ओज॑सा॒ जने॑भ्यः । अधा॑ च॒न श्रद् द॑धति॒ त्विषी॑मत॒ इन्द्रा॑य॒ वज्रं॑ नि॒घनि॑घ्नते व॒धम् ॥५॥ स हि श्र॑व॒स्युः सद॑नानि कृ॒त्रिमा॑ क्ष्म॒या वृ॑धा॒न ओज॑सा विना॒शय॑न् । ज्योतीं॑षि कृ॒ण्वन्न॑वृ॒काणि॒ यज्य॒वे ऽव॑ सु॒क्रतु॒: सर्त॒वा अ॒पः सृ॑जत् ॥६॥ दा॒नाय॒ मन॑: सोमपावन्नस्तु ते॒ ऽर्वाञ्चा॒ हरी॑ वन्दनश्रु॒दा कृ॑धि । यमि॑ष्ठास॒: सार॑थयो॒ य इ॑न्द्र ते॒ न त्वा॒ केता॒ आ द॑भ्नुवन्ति॒ भूर्ण॑यः ॥७॥ अप्र॑क्षितं॒ वसु॑ बिभर्षि॒ हस्त॑यो॒रषा॑ह्ळं॒ सह॑स्त॒न्वि॑ श्रु॒तो द॑धे । आवृ॑तासोऽव॒तासो॒ न क॒र्तृभि॑स्त॒नूषु॑ ते॒ क्रत॑व इन्द्र॒ भूर॑यः ॥८॥
इंद्र का प्रभाव आकाश की अपेक्षा अधिक विस्तृत है. पृथ्वी भी इंद्र की महत्ता की समानता नहीं कर सकती. शत्रुओं के लिए भयंकर एवं बुद्धिमान् इंद्र अपने भक्तजनों के निमित्त शत्रुओं को संताप देते हैं. जैसे सांड़ युद्ध के लिए अपने सींग तेज करता है, उसी प्रकार इंद्र अपने वध को तेज करने के लिए रगड़ते हैं
६ सव्य आङ्गिरसः। इन्द्रः। जगती। ए॒ष प्र पू॒र्वीरव॒ तस्य॑ च॒म्रिषो ऽत्यो॒ न योषा॒मुद॑यंस्त भु॒र्वणि॑: । दक्षं॑ म॒हे पा॑ययते हिर॒ण्ययं॒ रथ॑मा॒वृत्या॒ हरि॑योग॒मृभ्व॑सम् ॥१॥ तं गू॒र्तयो॑ नेम॒न्निष॒: परी॑णसः समु॒द्रं न सं॒चर॑णे सनि॒ष्यव॑: । पतिं॒ दक्ष॑स्य वि॒दथ॑स्य॒ नू सहो॑ गि॒रिं न वे॒ना अधि॑ रोह॒ तेज॑सा ॥२॥ स तु॒र्वणि॑र्म॒हाँ अ॑रे॒णु पौंस्ये॑ गि॒रेर्भृ॒ष्टिर्न भ्रा॑जते तु॒जा शव॑: । येन॒ शुष्णं॑ मा॒यिन॑माय॒सो मदे॑ दु॒ध्र आ॒भूषु॑ रा॒मय॒न्नि दाम॑नि ॥३॥ दे॒वी यदि॒ तवि॑षी॒ त्वावृ॑धो॒तय॒ इन्द्रं॒ सिष॑क्त्यु॒षसं॒ न सूर्य॑: । यो धृ॒ष्णुना॒ शव॑सा॒ बाध॑ते॒ तम॒ इय॑र्ति रे॒णुं बृ॒हद॑र्हरि॒ष्वणि॑: ॥४॥ वि यत् ति॒रो ध॒रुण॒मच्यु॑तं॒ रजो ऽति॑ष्ठिपो दि॒व आता॑सु ब॒र्हणा॑ । स्व॑र्मीह्ले॒ यन्मद॑ इन्द्र॒ हर्ष्याह॑न् वृ॒त्रं निर॒पामौ॑ब्जो अर्ण॒वम् ॥५॥ त्वं दि॒वो ध॒रुणं॑ धिष॒ ओज॑सा पृथि॒व्या इ॑न्द्र॒ सद॑नेषु॒ माहि॑नः । त्वं सु॒तस्य॒ मदे॑ अरिणा अ॒पो वि वृ॒त्रस्य॑ स॒मया॑ पा॒ष्या॑रुजः ॥६॥
यह स्तुति सव्य आंगिरस की है और इंद्र को समर्पित है। यहाँ बताया गया है कि इंद्र, स्वर्ण के समान चमकीले, सुसज्जित रथ को महाबल के लिए आगे बढ़ाते हैं, जैसे तेज घोड़ा घोड़ी को आगे बढ़ाता है। जो लोग स्तुति और हविष्य से उन्हें ढूंढते हैं, वे समुद्र में मिलने वाली नदियों के समान इंद्र के पास पहुंचते हैं—बल और सभा के स्वामी, अब विजयी। वे धूल रहित, महान् पराक्रमी हैं, पर्वत-शिखर के समान अपने अकस्मात् बल से चमकते हैं, जिससे उन्होंने मायावी, क्रुद्ध शुष्ण की सेनाओं को बाँध कर रोका। जब देवी, बलवर्धक शक्ति इंद्र का साथ देती है, जैसे सूर्य उषा का साथ देता है, तब वे अपने बल से अंधकार को दूर हटाते हुए अपने वेगवान् घोड़ों से महान् धूलि उड़ाते हैं। जब उन्होंने आकाश के अटल आधार को अपने बल से पूरे विस्तार में स्थिर किया, तब प्रसन्न होकर, स्वर्ग-लोक प्राप्त कर, उन्होंने वृत्र को मारा और जल की धारा को खोल दिया। हे इंद्र! तुम अपने बल से आकाश के आधार को धारण करते हो, पृथ्वी के निवासों में महान् रूप से उपस्थित रहते हो; सोमपान से हर्षित होकर तुमने जल को मुक्त किया और वृत्र के दुर्गों को पूर्णतः तोड़ डाला।
६ सव्य आङ्गिरसः। इन्द्रः। जगती। प्र मंहि॑ष्ठाय बृह॒ते बृ॒हद्र॑ये स॒त्यशु॑ष्माय त॒वसे॑ म॒तिं भ॑रे । अ॒पामि॑व प्रव॒णे यस्य॑ दु॒र्धरं॒ राधो॑ वि॒श्वायु॒ शव॑से॒ अपा॑वृतम् ॥१॥ अध॑ ते॒ विश्व॒मनु॑ हासदि॒ष्टय॒ आपो॑ नि॒म्नेव॒ सव॑ना ह॒विष्म॑तः । यत् पर्व॑ते॒ न स॒मशी॑त हर्य॒त इन्द्र॑स्य॒ वज्र॒: श्नथि॑ता हिर॒ण्यय॑: ॥२॥ अ॒स्मै भी॒माय॒ नम॑सा॒ सम॑ध्व॒र उषो॒ न शु॑भ्र॒ आ भ॑रा॒ पनी॑यसे । यस्य॒ धाम॒ श्रव॑से॒ नामे॑न्द्रि॒यं ज्योति॒रका॑रि ह॒रितो॒ नाय॑से ॥३॥ इ॒मे त॑ इन्द्र॒ ते व॒यं पु॑रुष्टुत॒ ये त्वा॒रभ्य॒ चरा॑मसि प्रभूवसो । न॒हि त्वद॒न्यो गि॑र्वणो॒ गिर॒: सघ॑त् क्षो॒णीरि॑व॒ प्रति॑ नो हर्य॒ तद् वच॑: ॥४॥ भूरि॑ त इन्द्र वी॒र्यं १ तव॑ स्मस्य॒स्य स्तो॒तुर्म॑घव॒न् काम॒मा पृ॑ण । अनु॑ ते॒ द्यौर्बृ॑ह॒ती वी॒र्यं॑ मम इ॒यं च॑ ते पृथि॒वी ने॑म॒ ओज॑से ॥५॥ त्वं तमि॑न्द्र॒ पर्व॑तं म॒हामु॒रुं वज्रे॑ण वज्रिन् पर्व॒शश्च॑कर्तिथ । अवा॑सृजो॒ निवृ॑ता॒: सर्त॒वा अ॒पः स॒त्रा विश्वं॑ दधिषे॒ केव॑लं॒ सह॑: ॥६॥
यह स्तुति सव्य आंगिरस की है और इंद्र को समर्पित है। यहाँ इंद्र को सबसे उदार, महान्, धनदाता, सत्य-बलशाली एवं शक्तिशाली कहकर उनकी स्तुति की गई है, जिनका दुर्लभ किंतु सबके लिए जीवनदायी वरदान बल-प्राप्ति हेतु वैसे ही खुला है जैसे जल नीचे की ओर बहता है। स्तोता के सभी संकल्प वैसे ही पूर्ण होंगे जैसे जल हविष्य देने वाले की आहुतियों की ओर बहता है, जब इंद्र का स्वर्णिम, पर्वत से जुड़ा हुआ वज्र प्रहार करता है। इस भयानक, परम स्तुति योग्य देव के लिए स्तोता श्रद्धा एवं यज्ञ में अपनी भेंट लाता है, जैसे उषा अपना प्रकाश लाती है; जिनकी कीर्ति यश के लिए विख्यात है, जिनका इंद्रत्व और तेज तीव्रगामी अश्वों के समान प्रकट है। हम अनेकों द्वारा स्तुत, धनवान इंद्र से लिपटे हुए, उनका अनुसरण करते हैं; क्योंकि तुम्हारे अतिरिक्त हे स्तुतिप्रिय! कोई अन्य हमारी वाणी स्वीकार नहीं करता—हमारे इस वचन की ओर वैसे ही कृपादृष्टि करो जैसे पृथ्वी नदियों को ग्रहण करने के लिए मुड़ती है। हे इंद्र! तुम्हारा पराक्रम महान् है; इस स्तोता एवं हम सबकी कामना पूर्ण करो, हे उदार! विशाल आकाश तुम्हारे बल के आगे नमन करता है, और यह पृथ्वी भी तुम्हारी शक्ति के आगे झुकती है। हे वज्रधारी इंद्र! तुमने उस विशाल, विस्तृत पर्वत को अपने वज्र से खंड-खंड कर दिया; तुमने बंधे हुए जल को मुक्त होकर बहने के लिए छोड़ दिया, और तुम अकेले ही सारा बल पूर्णतः अपने अधिकार में रखते हो।
९ नोधा गौतमः। अग्निः। जगती, ६-९ त्रिष्टुप्। नू चि॑त् सहो॒जा अ॒मृतो॒ नि तु॑न्दते॒ होता॒ यद् दू॒तो अभ॑वद् वि॒वस्व॑तः । वि साधि॑ष्ठेभिः प॒थिभी॒ रजो॑ मम॒ आ दे॒वता॑ता ह॒विषा॑ विवासति ॥१॥ आ स्वमद्म॑ यु॒वमा॑नो अ॒जर॑स्तृ॒ष्व॑वि॒ष्यन्न॑त॒सेषु॑ तिष्ठति । अत्यो॒ न पृ॒ष्ठं प्रु॑षि॒तस्य॑ रोचते दि॒वो न सानु॑ स्त॒नय॑न्नचिक्रदत् ॥२॥ क्रा॒णा रु॒द्रेभि॒र्वसु॑भिः पु॒रोहि॑तो॒ होता॒ निष॑त्तो रयि॒षाळम॑र्त्यः । रथो॒ न वि॒क्ष्वृ॑ञ्जसा॒न आ॒युषु॒ व्या॑नु॒षग्वार्या॑ दे॒व ऋ॑ण्वति ॥३॥ वि वात॑जूतो अत॒सेषु॑ तिष्ठते॒ वृथा॑ जु॒हूभि॒: सृण्या॑ तुवि॒ष्वणि॑: । तृ॒षु यद॑ग्ने व॒निनो॑ वृषा॒यसे॑ कृ॒ष्णं त॒ एम॒ रुश॑दूर्मे अजर ॥४॥ तपु॑र्जम्भो॒ वन॒ आ वात॑चोदितो यू॒थे न सा॒ह्वाँ अव॑ वाति॒ वंस॑गः । अ॒भि॒व्रज॒न्नक्षि॑तं॒ पाज॑सा॒ रज॑: स्था॒तुश्च॒रथं॑ भयते पत॒त्रिण॑: ॥५॥ द॒धुष्ट्वा॒ भृग॑वो॒ मानु॑षे॒ष्वा र॒यिं न चारुं॑ सु॒हवं॒ जने॑भ्यः । होता॑रमग्ने॒ अति॑थिं॒ वरे॑ण्यं मि॒त्रं न शेवं॑ दि॒व्याय॒ जन्म॑ने ॥६॥ होता॑रं स॒प्त जु॒ह्वो॒ ३ यजि॑ष्ठं॒ यं वा॒घतो॑ वृ॒णते॑ अध्व॒रेषु॑ । अ॒ग्निं विश्वे॑षामर॒तिं वसू॑नां सप॒र्यामि॒ प्रय॑सा॒ यामि॒ रत्न॑म् ॥७॥ अच्छि॑द्रा सूनो सहसो नो अ॒द्य स्तो॒तृभ्यो॑ मित्रमह॒: शर्म॑ यच्छ । अग्ने॑ गृ॒णन्त॒मंह॑स उरु॒ष्योर्जो॑ नपात् पू॒र्भिराय॑सीभिः ॥८॥ भवा॒ वरू॑थं गृण॒ते वि॑भावो॒ भवा॑ मघवन् म॒घव॑द्भ्य॒: शर्म॑ । उ॒रु॒ष्याग्ने॒ अंह॑सो गृ॒णन्तं॑ प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥९॥
यह स्तुति ऋषि नोधा गौतम की है और अग्नि को समर्पित है। इसमें कहा गया है कि बलशाली, अमर अग्नि, जब विवस्वान के दूत और होता बनते हैं, तब कभी विचलित नहीं होते; वे श्रेष्ठतम मार्गों से अंतरिक्ष में गमन करते हैं और देवताओं की सभा में हविष्य द्वारा उनकी कृपा प्राप्त करते हैं। अजर, अपना भोजन स्वयं ग्रहण करते हुए वे शुष्क झाड़ियों के बीच खड़े रहते हैं; उनकी पीठ सिंचित अश्व के समान चमकती है, और वे आकाश की चोटी के समान गरजते हैं। रुद्रों और वसुओं के साथ अग्रणी, होता के रूप में स्थापित, अमर, धनविजयी अग्नि रथ के समान समस्त प्रजाओं में निरंतर गतिमान रहते हैं और सभी वांछित वस्तुएं प्रकट करते हैं। वायु से प्रेरित होकर वे सूखी झाड़ियों में फैलते हैं, हँसिये के समान अपनी ज्वालाओं से गरजते हुए; हे अग्नि! जब तुम वृक्षों पर बैल के समान उतावले होकर टूट पड़ते हो, तब तुम्हारे प्रकाशमान मार्ग के पीछे सब कुछ काला पड़ जाता है। भृगुओं ने तुम्हें, हे अग्नि! मनुष्यों के बीच सुंदर, सहज आमंत्रित धन के समान, श्रेष्ठ अतिथि-पुरोहित के रूप में, मित्र के समान प्रिय, दिव्य जन्म के लिए स्थापित किया। हम यज्ञ के सर्वाधिक योग्य, सात आहुति-धाराओं सहित होता रूप में आमंत्रित अग्नि की पूजा करते हैं, जिन्हें पुरोहित यज्ञों में चुनते हैं; वे समस्त धन के प्रेरक हैं, और मैं अपनी भेंट से उनका रत्न मांगता हूं। हे बलपुत्र! आज हमारे स्तोताओं के लिए अखंड शरण प्रदान करो; हे अग्नि! अपने लौह-दृढ़ दुर्गों से स्तुतिकर्ता को संकट से बचाओ। हे तेजस्वी! स्तोता के लिए आश्रय बनो; हे उदार स्वामी! उदारजनों के लिए शरण बनो, संकट से स्तोता की रक्षा करो, और बुद्धिमान्, धनदाता देव प्रातःकाल शीघ्र हमारे पास आएं।
७ नोधा गौतमः। अग्निर्वैश्वानरः।त्रिष्टुप्। व॒या इद॑ग्ने अ॒ग्नय॑स्ते अ॒न्ये त्वे विश्वे॑ अ॒मृता॑ मादयन्ते । वैश्वा॑नर॒ नाभि॑रसि क्षिती॒नां स्थूणे॑व॒ जनाँ॑ उप॒मिद् य॑यन्थ ॥१॥ मू॒र्धा दि॒वो नाभि॑र॒ग्निः पृ॑थि॒व्या अथा॑भवदर॒ती रोद॑स्योः । तं त्वा॑ दे॒वासो॑ऽजनयन्त दे॒वं वैश्वा॑नर॒ ज्योति॒रिदार्या॑य ॥२॥ आ सूर्ये॒ न र॒श्मयो॑ ध्रु॒वासो॑ वैश्वान॒रे द॑धिरे॒ऽग्ना वसू॑नि । या पर्व॑ते॒ष्वोष॑धीष्व॒प्सु या मानु॑षे॒ष्वसि॒ तस्य॒ राजा॑ ॥३॥ बृ॒ह॒ती इ॑व सू॒नवे॒ रोद॑सी॒ गिरो॒ होता॑ मनु॒ष्यो॒ ३ न दक्ष॑: । स्व॑र्वते स॒त्यशु॑ष्माय पू॒र्वीर्वै॑श्वान॒राय॒ नृत॑माय य॒ह्वीः ॥४॥ दि॒वश्चि॑त् ते बृह॒तो जा॑तवेदो॒ वैश्वा॑नर॒ प्र रि॑रिचे महि॒त्वम् । राजा॑ कृष्टी॒नाम॑सि॒ मानु॑षीणां यु॒धा दे॒वेभ्यो॒ वरि॑वश्चकर्थ ॥५॥ प्र नू म॑हि॒त्वं वृ॑ष॒भस्य॑ वोचं॒ यं पू॒रवो॑ वृत्र॒हणं॒ सच॑न्ते । वै॒श्वा॒न॒रो दस्यु॑म॒ग्निर्ज॑घ॒न्वाँ अधू॑नो॒त् काष्ठा॒ अव॒ शम्ब॑रं भेत् ॥६॥ वै॒श्वा॒न॒रो म॑हि॒म्ना वि॒श्वकृ॑ष्टिर्भ॒रद्वा॑जेषु यज॒तो वि॒भावा॑ । शा॒त॒व॒ने॒ये श॒तिनी॑भिर॒ग्निः पु॑रुणी॒थे ज॑रते सू॒नृता॑वान् ॥७॥
यह स्तुति नोधा गौतम की है और अग्नि वैश्वानर को समर्पित है। इसमें कहा गया है कि यद्यपि अन्य अग्नियां भी हैं, किंतु सभी अमर देव इस एक अग्नि वैश्वानर में ही आनंदित होते हैं, जो समस्त प्रजाओं की नाभि अर्थात केंद्र हैं और उन्हें वैसे ही थामे रखते हैं जैसे स्तंभ मनुष्यों को सहारा देता है। अग्नि आकाश का सिर तथा पृथ्वी की नाभि हैं, इस प्रकार वे दोनों लोकों के प्रेरक बने; हे दिव्य वैश्वानर! देवों ने तुम्हें आर्य के लिए साक्षात प्रकाश के रूप में उत्पन्न किया। जैसे सूर्य की स्थिर किरणें एकत्र होती हैं, वैसे ही वैश्वानर अग्नि में समस्त कल्याणकारी वस्तुएं स्थित हैं; पर्वतों, औषधियों, जल तथा मनुष्यों में जो कुछ भी है, उसके वे राजा हैं। जैसे विशाल द्युलोक व पृथ्वी अपने पुत्र की सेवा करते हैं, वैसे ही बुद्धिमान, मनुष्यों के पुरोहित अग्नि, स्वर्गाधिकारी, सत्य-बलशाली, अत्यंत पराक्रमी वैश्वानर को अर्पित प्रचुर, नवीन स्तुतियां ग्रहण करते हैं। हे सभी जन्मों को जानने वाले वैश्वानर! तुम्हारी महिमा विशाल आकाश की महिमा से भी बढ़कर है; तुम मानव जातियों के राजा हो और युद्ध द्वारा तुमने देवताओं के लिए स्थान प्राप्त किया है। ऋषि इस वृषभ समान देव की महिमा का वर्णन करते हैं, जिनका अनुसरण पुरुवंशी, वृत्रहंता करते हैं; वैश्वानर अग्नि ने दस्यु का नाश करके दिशाओं को कंपित किया और शंबर को पराजित किया। भरद्वाज वंशजों में तेजस्वी, सभी प्रजाओं द्वारा दृष्ट, पूजनीय वैश्वानर महान् हैं; शतवनेय तथा पुरुणीति जनों के बीच सत्यवादी अग्नि सैकड़ों स्तुतियों से पूजित होते हैं।
५ नोधा गौतमः। अग्निः।त्रिष्टुप्। वह्निं॑ य॒शसं॑ वि॒दथ॑स्य के॒तुं सु॑प्रा॒व्यं॑ दू॒तं स॒द्योअ॑र्थम् । द्वि॒जन्मा॑नं र॒यिमि॑व प्रश॒स्तं रा॒तिं भ॑र॒द् भृग॑वे मात॒रिश्वा॑ ॥१॥ अ॒स्य शासु॑रु॒भया॑सः सचन्ते ह॒विष्म॑न्त उ॒शिजो॒ ये च॒ मर्ता॑: । दि॒वश्चि॒त् पूर्वो॒ न्य॑सादि॒ होता॒ ऽऽपृच्छ्यो॑ वि॒श्पति॑र्वि॒क्षु वे॒धाः ॥२॥ तं नव्य॑सी हृ॒द आ जाय॑मानम॒स्मत् सु॑की॒र्तिर्मधु॑जिह्वमश्याः । यमृ॒त्विजो॑ वृ॒जने॒ मानु॑षास॒: प्रय॑स्वन्त आ॒यवो॒ जीज॑नन्त ॥३॥ उ॒शिक् पा॑व॒को वसु॒र्मानु॑षेषु॒ वरे॑ण्यो॒ होता॑धायि वि॒क्षु । दमू॑ना गृ॒हप॑ति॒र्दम॒ आँ अ॒ग्निर्भु॑वद् रयि॒पती॑ रयी॒णाम् ॥४॥ तं त्वा॑ व॒यं पति॑मग्ने रयी॒णां प्र शं॑सामो म॒तिभि॒र्गोत॑मासः । आ॒शुं न वा॑जम्भ॒रं म॒र्जय॑न्तः प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥५॥
यह स्तुति नोधा गौतम की है और अग्नि को समर्पित है। इसमें अग्नि को हविष्य के तेजस्वी वाहक, यज्ञ के ध्वजरूप, सुमार्गदर्शक तथा शीघ्र-संकल्प दूत कहा गया है; मातरिश्वा उन्हें द्विजन्मा, धन के समान श्रेष्ठ भेंट स्वरूप भृगु के पास लाए। उत्सुक, हविष्यदाता उशिज जन तथा सामान्य मनुष्य दोनों उनका अनुसरण करते हैं; सृष्टि के आरंभ से ही वे सबसे पहले प्रजाओं के पूछे जाने योग्य स्वामी एवं व्यवस्थापक होता के रूप में स्थापित हुए। हृदय में नवजात होते हुए उन तक हमारी नवीन, मधुर-जिह्वा स्तुति पहुंचे, जिन्हें यज्ञकारी मनुष्य हविष्य अर्पण करते हुए यज्ञ-सभा में उत्पन्न करते हैं। उत्सुक, पवित्र करने वाले, मनुष्यों में धनरूप, चयन योग्य अग्नि प्रजाओं के बीच होता रूप में स्थापित हुए हैं; उत्तम गृहस्थ, घर के स्वामी अग्नि धनों के अधिपति बने हैं। हे अग्नि! हम गौतमवंशी अपनी स्तुतियों से तुम्हें धन के स्वामी के रूप में प्रशस्त करते हैं; शीघ्रगामी, अन्नवाहक अश्व के समान तुम्हें अलंकृत करते हुए, बुद्धिमान्, धनदाता देव प्रातःकाल शीघ्र हमारे पास आएं।
१६ नोधा गौतमः। इन्द्रः।त्रिष्टुप्। अ॒स्मा इदु॒ प्र त॒वसे॑ तु॒राय॒ प्रयो॒ न ह॑र्मि॒ स्तोमं॒ माहि॑नाय । ऋची॑षमा॒याध्रि॑गव॒ ओह॒मिन्द्रा॑य॒ ब्रह्मा॑णि रा॒तत॑मा ॥१॥ अ॒स्मा इदु॒ प्रय॑ इव॒ प्र यं॑सि॒ भरा॑म्याङ्गू॒षं बाधे॑ सुवृ॒क्ति । इन्द्रा॑य हृ॒दा मन॑सा मनी॒षा प्र॒त्नाय॒ पत्ये॒ धियो॑ मर्जयन्त ॥२॥ अ॒स्मा इदु॒ त्यमु॑प॒मं स्व॒र्षां भरा॑म्याङ्गू॒षमा॒स्ये॑न । मंहि॑ष्ठ॒मच्छो॑क्तिभिर्मती॒नां सु॑वृ॒क्तिभि॑: सू॒रिं वा॑वृ॒धध्यै॑ ॥३॥ अ॒स्मा इदु॒ स्तोमं॒ सं हि॑नोमि॒ रथं॒ न तष्टे॑व॒ तत्सि॑नाय । गिर॑श्च॒ गिर्वा॑हसे सुवृ॒क्तीन्द्रा॑य विश्वमि॒न्वं मेधि॑राय ॥४॥ अ॒स्मा इदु॒ सप्ति॑मिव श्रव॒स्येन्द्रा॑या॒र्कं जु॒ह्वा॒ ३ सम॑ञ्जे । वी॒रं दा॒नौक॑सं व॒न्दध्यै॑ पु॒रां गू॒र्तश्र॑वसं द॒र्माण॑म् ॥५॥ अ॒स्मा इदु॒ त्वष्टा॑ तक्ष॒द् वज्रं॒ स्वप॑स्तमं स्व॒र्यं १ रणा॑य । वृ॒त्रस्य॑ चिद् वि॒दद्येन॒ मर्म॑ तु॒जन्नीशा॑नस्तुज॒ता कि॑ये॒धाः ॥६॥ अ॒स्येदु॑ मा॒तुः सव॑नेषु स॒द्यो म॒हः पि॒तुं प॑पि॒वाञ्चार्वन्ना॑ । मु॒षा॒यद् विष्णु॑: पच॒तं सही॑या॒न् विध्य॑द् वरा॒हं ति॒रो अद्रि॒मस्ता॑ ॥७॥ अ॒स्मा इदु॒ ग्नाश्चि॑द् दे॒वप॑त्नी॒रिन्द्रा॑या॒र्कम॑हि॒हत्य॑ ऊवुः । परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी ज॑भ्र उ॒र्वी नास्य॒ ते म॑हि॒मानं॒ परि॑ ष्टः ॥८॥ अ॒स्येदे॒व प्र रि॑रिचे महि॒त्वं दि॒वस्पृ॑थि॒व्याः पर्य॒न्तरि॑क्षात् । स्व॒राळिन्द्रो॒ दम॒ आ वि॒श्वगू॑र्तः स्व॒रिरम॑त्रो ववक्षे॒ रणा॑य ॥९॥ अ॒स्येदे॒व शव॑सा शु॒षन्तं॒ वि वृ॑श्च॒द् वज्रे॑ण वृ॒त्रमिन्द्र॑: । गा न व्रा॒णा अ॒वनी॑रमुञ्चद॒भि श्रवो॑ दा॒वने॒ सचे॑ताः ॥१०॥ अ॒स्येदु॑ त्वे॒षसा॑ रन्त॒ सिन्ध॑व॒: परि॒ यद् वज्रे॑ण सी॒मय॑च्छत् । ई॒शा॒न॒कृद् दा॒शुषे॑ दश॒स्यन् तु॒र्वीत॑ये गा॒धं तु॒र्वणि॑: कः ॥११॥ अ॒स्मा इदु॒ प्र भ॑रा॒ तूतु॑जानो वृ॒त्राय॒ वज्र॒मीशा॑नः किये॒धाः । गोर्न पर्व॒ वि र॑दा तिर॒श्चेष्य॒न्नर्णां॑स्य॒पां च॒रध्यै॑ ॥१२॥ अ॒स्येदु॒ प्र ब्रू॑हि पू॒र्व्याणि॑ तु॒रस्य॒ कर्मा॑णि॒ नव्य॑ उ॒क्थैः । यु॒धे यदि॑ष्णा॒न आयु॑धान्यृघा॒यमा॑णो निरि॒णाति॒ शत्रू॑न् ॥१३॥ अ॒स्येदु॑ भि॒या गि॒रय॑श्च दृ॒ह्ला द्यावा॑ च॒ भूमा॑ ज॒नुष॑स्तुजेते । उपो॑ वे॒नस्य॒ जोगु॑वान ओ॒णिं स॒द्यो भु॑वद् वी॒र्या॑य नो॒धाः ॥१४॥ अ॒स्मा इदु॒ त्यदनु॑ दाय्येषा॒मेको॒ यद् व॒व्ने भूरे॒रीशा॑नः । प्रैत॑शं॒ सूर्ये॑ पस्पृधा॒नं सौव॑श्व्ये॒ सुष्वि॑माव॒दिन्द्र॑: ॥१५॥ ए॒वा ते॑ हारियोजना सुवृ॒क्तीन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि॒ गोत॑मासो अक्रन् । ऐषु॑ वि॒श्वपे॑शसं॒ धियं॑ धाः प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥१६॥
यह सूक्त नोधा गौतम ऋषि द्वारा बलशाली एवं वेगवान् इंद्र की स्तुति में रचा गया है, जिन्हें कवि उत्कृष्ट स्तोत्र एवं ज्ञानपूर्ण प्रार्थनाएं अर्पित करता है। त्वष्टा ने इंद्र के लिए वज्र का निर्माण किया, जिससे इंद्र ने वृत्र के गुप्त मर्मस्थल को खोजकर उसका वध किया, और विष्णु ने पर्वत के पीछे छिपे पकते हुए वराह को पकड़कर सहायता की। देवपत्नियों ने सर्पवध करते इंद्र के लिए स्तुतिगान किया, और उनकी महिमा को द्यावा-पृथिवी भी समाहित नहीं कर सके, क्योंकि वह आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष तीनों से बढ़कर है। अपने घर में स्वराट् इंद्र ने वज्र से गौओं को बंधन से मुक्त किया और उपासक के लिए जल-नदियां प्राप्त कीं। गौतम-वंशज उन्हें सुंदर स्तोत्र अर्पित करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि हरित अश्वों वाले, ज्ञान और धन से संपन्न इंद्र प्रातःकाल शीघ्र उनके पास पधारें।
१३ नोधा गौतमः। इन्द्रः।त्रिष्टुप्। प्र म॑न्महे शवसा॒नाय॑ शू॒षमा॑ङ्गू॒षं गिर्व॑णसे अङ्गिर॒स्वत् । सु॒वृ॒क्तिभि॑: स्तुव॒त ऋ॑ग्मि॒यायाऽर्चा॑मा॒र्कं नरे॒ विश्रु॑ताय ॥१॥ प्र वो॑ म॒हे महि॒ नमो॑ भरध्वमाङ्गू॒ष्यं॑ शवसा॒नाय॒ साम॑ । येना॑ न॒: पूर्वे॑ पि॒तर॑: पद॒ज्ञा अर्च॑न्तो॒ अङ्गि॑रसो॒ गा अवि॑न्दन् ॥२॥ इन्द्र॒स्याङ्गि॑रसां चे॒ष्टौ वि॒दत् स॒रमा॒ तन॑याय धा॒सिम् । बृह॒स्पति॑र्भि॒नदद्रिं॑ वि॒दद् गाः समु॒स्रिया॑भिर्वावशन्त॒ नर॑: ॥३॥ स सु॒ष्टुभा॒ स स्तु॒भा स॒प्त विप्रै॑: स्व॒रेणाद्रिं॑ स्व॒र्यो॒ ३ नव॑ग्वैः । स॒र॒ण्युभि॑: फलि॒गमि॑न्द्र शक्र व॒लं रवे॑ण दरयो॒ दश॑ग्वैः ॥४॥ गृ॒णा॒नो अङ्गि॑रोभिर्दस्म॒ वि व॑रु॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ गोभि॒रन्ध॑: । वि भूम्या॑ अप्रथय इन्द्र॒ सानु॑ दि॒वो रज॒ उप॑रमस्तभायः ॥५॥ तदु॒ प्रय॑क्षतममस्य॒ कर्म॑ द॒स्मस्य॒ चारु॑तममस्ति॒ दंस॑: । उ॒प॒ह्व॒रे यदुप॑रा॒ अपि॑न्व॒न् मध्व॑र्णसो न॒द्य १ श्चत॑स्रः ॥६॥ द्वि॒ता वि व॑व्रे स॒नजा॒ सनी॑ळे अ॒यास्य॒: स्तव॑मानेभिर॒र्कैः । भगो॒ न मेने॑ पर॒मे व्यो॑म॒न्नधा॑रय॒द् रोद॑सी सु॒दंसा॑: ॥७॥ स॒नाद् दिवं॒ परि॒ भूमा॒ विरू॑पे पुन॒र्भुवा॑ युव॒ती स्वेभि॒रेवै॑: । कृ॒ष्णेभि॑र॒क्तोषा रुश॑द्भि॒र्वपु॑र्भि॒रा च॑रतो अ॒न्यान्या॑ ॥८॥ सने॑मि स॒ख्यं स्व॑प॒स्यमा॑नः सू॒नुर्दा॑धार॒ शव॑सा सु॒दंसा॑: । आ॒मासु॑ चिद् दधिषे प॒क्वम॒न्तः पय॑: कृ॒ष्णासु॒ रुश॒द् रोहि॑णीषु ॥९॥ स॒नात् सनी॑ळा अ॒वनी॑रवा॒ता व्र॒ता र॑क्षन्ते अ॒मृता॒: सहो॑भिः । पु॒रू स॒हस्रा॒ जन॑यो॒ न पत्नी॑र्दुव॒स्यन्ति॒ स्वसा॑रो॒ अह्र॑याणम् ॥१०॥ स॒ना॒युवो॒ नम॑सा॒ नव्यो॑ अ॒र्कैर्व॑सू॒यवो॑ म॒तयो॑ दस्म दद्रुः । पतिं॒ न पत्नी॑रुश॒तीरु॒शन्तं॑ स्पृ॒शन्ति॑ त्वा शवसावन् मनी॒षाः ॥११॥ स॒नादे॒व तव॒ रायो॒ गभ॑स्तौ॒ न क्षीय॑न्ते॒ नोप॑ दस्यन्ति दस्म । द्यु॒माँ अ॑सि॒ क्रतु॑माँ इन्द्र॒ धीर॒: शिक्षा॑ शचीव॒स्तव॑ न॒: शची॑भिः ॥१२॥ स॒ना॒य॒ते गोत॑म इन्द्र॒ नव्य॒मत॑क्ष॒द् ब्रह्म॑ हरि॒योज॑नाय । सु॒नी॒थाय॑ नः शवसान नो॒धाः प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥१३॥
हम अंगिरा ऋषि के समान शत्रुनाशक एवं स्तुतिपात्र इंद्र को सुख देनेवाली स्तुतियों को भली प्रकार जानते हैं. शोभन स्तोत्रों द्वारा स्तुति करने वाले ऋषियों के अर्चनीय एवं सबके नेता रूप इंद्र की हम स्तोत्रों द्वारा पूजा करते हैं
९ नोधा गौतमः। इन्द्रः। त्रिष्टुप्। त्वं म॒हाँ इ॑न्द्र॒ यो ह॒ शुष्मै॒र्द्यावा॑ जज्ञा॒नः पृ॑थि॒वी अमे॑ धाः । यद्ध॑ ते॒ विश्वा॑ गि॒रय॑श्चि॒दभ्वा॑ भि॒या दृ॒ह्लास॑: कि॒रणा॒ नैज॑न् ॥१॥ आ यद्धरी॑ इन्द्र॒ विव्र॑ता॒ वेरा ते॒ वज्रं॑ जरि॒ता बा॒ह्वोर्धा॑त् । येना॑विहर्यतक्रतो अ॒मित्रा॒न् पुर॑ इ॒ष्णासि॑ पुरुहूत पू॒र्वीः ॥२॥ त्वं स॒त्य इ॑न्द्र धृ॒ष्णुरे॒तान् त्वमृ॑भु॒क्षा नर्य॒स्त्वं षाट् । त्वं शुष्णं॑ वृ॒जने॑ पृ॒क्ष आ॒णौ यूने॒ कुत्सा॑य द्यु॒मते॒ सचा॑हन् ॥३॥ त्वं ह॒ त्यदि॑न्द्र चोदी॒: सखा॑ वृ॒त्रं यद् व॑ज्रिन् वृषकर्मन्नु॒भ्नाः । यद्ध॑ शूर वृषमणः परा॒चैर्वि दस्यूँ॒र्योना॒वकृ॑तो वृथा॒षाट् ॥४॥ त्वं ह॒ त्यदि॒न्द्रारि॑षण्यन् दृ॒ह्लस्य॑ चि॒न्मर्ता॑ना॒मजु॑ष्टौ । व्य १ स्मदा काष्ठा॒ अर्व॑ते वर्घ॒नेव॑ वज्रिञ्छ्नथिह्य॒मित्रा॑न् ॥५॥ त्वां ह॒ त्यदि॒न्द्रार्ण॑सातौ॒ स्व॑र्मीह्ले॒ नर॑ आ॒जा ह॑वन्ते । तव॑ स्वधाव इ॒यमा स॑म॒र्य ऊ॒तिर्वाजे॑ष्वत॒साय्या॑ भूत् ॥६॥ त्वं ह॒ त्यदि॑न्द्र स॒प्त युध्य॒न्पु पुरो॑ वज्रिन् पुरु॒कुत्सा॑य दर्दः । ब॒र्हिर्न यत् सु॒दासे॒ वृथा॒ वर्गं॒हो रा॑ज॒न् वरि॑वः पू॒रवे॑ कः ॥७॥ त्वं त्यां न॑ इन्द्र देव चि॒त्रामिष॒मापो॒ न पी॑पय॒: परि॑ज्मन् । यया॑ शूर॒ प्रत्य॒स्मभ्यं॒ यंसि॒ त्मन॒मूर्जं॒ न वि॒श्वध॒ क्षर॑ध्यै ॥८॥ अका॑रि त इन्द्र॒ गोत॑मेभि॒र्ब्रह्मा॒ण्योक्ता॒ नम॑सा॒ हरि॑भ्याम् । सु॒पेश॑सं॒ वाज॒मा भ॑रा नः प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥९॥
हे इंद्र! तुम गुणों की महत्ता में सबसे अधिक हो, क्योंकि तुमने असुरजन्य भय उत्पन्न होते ही जल ग्रहण किया एवं अपने शत्रुशोषक बल द्वारा धरती और आकाश को धारण किया. विश्व में व्याप्त समस्त प्राणी, पर्वत तथा अन्य महान् एवं दृढ़ पदार्थ तुम्हारे भय से उसी प्रकार कांपते हैं, जिस प्रकार आकाश में सूर्य की किरणें कांपती हैं
१५ नेधा गौतमः। मरुतः। जगती, १५ त्रिष्टुप्। वृष्णे॒ शर्धा॑य॒ सुम॑खाय वे॒धसे॒ नोध॑: सुवृ॒क्तिं प्र भ॑रा म॒रुद्भ्य॑: । अ॒पो न धीरो॒ मन॑सा सु॒हस्त्यो॒ गिर॒: सम॑ञ्जे वि॒दथे॑ष्वा॒भुव॑: ॥१॥ ते ज॑ज्ञिरे दि॒व ऋ॒ष्वास॑ उ॒क्षणो॑ रु॒द्रस्य॒ मर्या॒ असु॑रा अरे॒पस॑: । पा॒व॒कास॒: शुच॑य॒: सूर्या॑ इव॒ सत्वा॑नो॒ न द्र॒प्सिनो॑ घो॒रव॑र्पसः ॥२॥ युवा॑नो रु॒द्रा अ॒जरा॑ अभो॒ग्घनो॑ वव॒क्षुरध्रि॑गाव॒: पर्व॑ता इव । दृ॒ह्ला चि॒द् विश्वा॒ भुव॑नानि॒ पार्थि॑वा॒ प्र च्या॑वयन्ति दि॒व्यानि॑ म॒ज्मना॑ ॥३॥ चि॒त्रैर॒ञ्जिभि॒र्वपु॑षे॒ व्य॑ञ्जते॒ वक्षः॑सु रु॒क्माँ अधि॑ येतिरे शु॒भे । अंसे॑ष्वेषां॒ नि मि॑मृक्षृर्ऋ॒ष्टय॑: सा॒कं ज॑ज्ञिरे स्व॒धया॑ दि॒वो नर॑: ॥४॥ ई॒शा॒न॒कृतो॒ धुन॑यो रि॒शाद॑सो॒ वाता॑न् वि॒द्युत॒स्तवि॑षीभिरक्रत । दु॒हन्त्यूध॑र्दि॒व्यानि॒ धूत॑यो॒ भूमिं॑ पिन्वन्ति॒ पय॑सा॒ परि॑ज्रयः ॥५॥ पिन्व॑न्त्य॒पो म॒रुत॑: सु॒दान॑व॒: पयो॑ घृ॒तव॑द् विदथे॑ष्वा॒भुव॑: । अत्यं॒ न मि॒हे वि न॑यन्ति वा॒जिन॒मुत्सं॑ दुहन्ति स्त॒नय॑न्त॒मक्षि॑तम् ॥६॥ म॒हि॒षासो॑ मा॒यिन॑श्चि॒त्रभा॑नवो गि॒रयो॒ न स्वत॑वसो रघु॒ष्यद॑: । मृ॒गा इ॑व ह॒स्तिन॑: खादथा॒ वना॒ यदारु॑णीषु॒ तवि॑षी॒रयु॑ग्ध्वम् ॥७॥ सिं॒हा इ॑व नानदति॒ प्रचे॑तसः पि॒शा इ॑व सु॒पिशो॑ वि॒श्ववे॑दसः । क्षपो॒ जिन्व॑न्त॒: पृष॑तीभिर्ऋ॒ष्टिभि॒: समित्स॒बाध॒: शव॒साहि॑मन्यवः ॥८॥ रोद॑सी॒ आ व॑दता गणश्रियो॒ नृषा॑चः शूरा॒: शव॒साहि॑मन्यवः । आ व॒न्धुरे॑ष्व॒मति॒र्न द॑र्श॒ता वि॒द्युन्न त॑स्थौ मरुतो॒ रथे॑षु वः ॥९॥ वि॒श्ववे॑दसो र॒यिभि॒: समो॑कस॒: संमि॑श्लास॒स्तवि॑षीभिर्विर॒प्शिन॑: । अस्ता॑र॒ इषं॑ दधिरे॒ गभ॑स्त्योरन॒न्तशु॑ष्मा॒ वृष॑खादयो॒ नर॑: ॥१०॥ हि॒र॒ण्यये॑भिः प॒विभि॑: पयो॒वृध॒ उज्जि॑घ्नन्त आप॒थ्यो॒ ३ न पर्व॑तान् । म॒खा अ॒यास॑: स्व॒सृतो॑ ध्रुव॒च्युतो॑ दुध्र॒कृतो॑ म॒रुतो॒ भ्राज॑दृष्टयः ॥११॥ घृषुं॑ पाव॒कं व॒निनं॒ विच॑र्षणिं रु॒द्रस्य॑ सू॒नुं ह॒वसा॑ गृणीमसि । र॒ज॒स्तुरं॑ त॒वसं॒ मारु॑तं ग॒णमृ॑जी॒षिणं॒ वृष॑णं सश्चत श्रि॒ये ॥१२॥ प्र नू स मर्त॒: शव॑सा॒ जनाँ॒ अति॑ त॒स्थौ व॑ ऊ॒ती म॑रुतो॒ यमाव॑त । अर्व॑द्भि॒र्वाजं॑ भरते॒ धना॒ नृभि॑रा॒पृच्छ्यं॒ क्रतु॒मा क्षे॑ति॒ पुष्य॑ति ॥१३॥ च॒र्कृत्यं॑ मरुतः पृ॒त्सु दु॒ष्टरं॑ द्यु॒मन्तं॒ शुष्मं॑ म॒घव॑त्सु धत्तन । ध॒न॒स्पृत॑मु॒क्थ्यं॑ वि॒श्वच॑र्षणिं तो॒कं पु॑ष्येम॒ तन॑यं श॒तं हिमा॑: ॥१४॥ नू ष्ठि॒रं म॑रुतो वी॒रव॑न्तमृती॒षाहं॑ र॒यिम॒स्मासु॑ धत्त । स॒ह॒स्रिणं॑ श॒तिनं॑ शूशु॒वांसं॑ प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥१५॥
पराशर शाक्त्य द्वारा रचित अग्निदेव का यह लघु सूक्त द्विपदा छंद में उन्हें उस चोर के समान वर्णित करता है, जो गुफा में छिपकर गति करता है, श्रद्धा से युक्त होकर स्वयं भी श्रद्धा को धारण किए रहता है। समस्त धीर देवगण एकमत होकर उनके पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं और उनके निकट बैठते हैं, क्योंकि पूजनीय समस्त देवता उनके समीप आते हैं; जिस प्रकार आकाश पृथ्वी को घेरे रहता है, उसी प्रकार देवगण ऋत के नियमानुसार उनकी वृद्धि करते हैं, और बढ़ते हुए जल उन्हें ऋत की कोख में सुंदर रूप से उत्पन्न हुआ पोषित करते हैं। वे पोषण के समान आनंददायक, विस्तृत पृथ्वी के समान विशाल, पर्वत के समान आश्रयदाता और प्रवाहित जल के समान शांतिदायक हैं; मुक्त किए गए अश्व के समान वेगवान् होकर वे उस नदी की भांति आगे बढ़ते हैं, जिसे कोई रोक नहीं सकता। नदियों के भाई के समान बंधुत्व रखते हुए वे उसी प्रकार वनों को भस्म करते हैं, जिस प्रकार राजा भेंट ग्रहण करता है; वायु द्वारा प्रेरित होकर वे वनों में फैल जाते हैं और मानो पृथ्वी के रोमों को ही भक्षण कर लेते हैं। वे हंस के समान जल में विश्राम करते हुए श्वास लेते हैं, अत्यंत जाग्रत एवं प्रज्ञावान् होकर प्रातःकाल प्रजा को जगाने वाले हैं - सोम के समान बुद्धिमान्, ऋत से उत्पन्न, नवजात शिशु के समान कोमल, फिर भी सर्वव्यापी एवं दूर-दूर तक पहुंचने वाले हैं।
१० पराशरः शाक्त्यः। अग्निः। द्विपदा विराट्। प॒श्वा न ता॒युं, गुहा॒ चत॑न्तं॒ नमो॑ युजा॒नं, नमो॒ वह॑न्तम् ॥१॥ स॒जोषा॒ धीरा॑:, प॒दैरनु॑ ग्म॒न्नुप॑ त्वा सीद॒न्, विश्वे॒ यज॑त्राः ॥१॥ २ ऋ॒तस्य॑ दे॒वा, अनु॑ व्र॒ता गु॒र्भुव॒त् परि॑ष्टि॒र्द्यौर्न भूम॑ ॥३॥ वर्ध॑न्ती॒माप॑:, प॒न्वा सुशि॑श्विमृ॒तस्य॒ योना॒, गर्भे॒ सुजा॑तम् ॥२॥ ४ पु॒ष्टिर्न र॒ण्वा, क्षि॒तिर्न पृ॒थ्वी गि॒रिर्न भुज्म॒, क्षोदो॒ न श॒म्भु ॥५॥ अत्यो॒ नाज्म॒न्, त्सर्ग॑प्रतक्त॒: सिन्धु॒र्न क्षोद॒:, क ईं॑ वराते ॥३॥ ६ जा॒मिः सिन्धू॑नां॒, भ्राते॑व॒ स्वस्रा॒मिभ्या॒न्न राजा॒, वना॑न्यत्ति ॥७॥ यद् वात॑जूतो॒, वना॒ व्यस्था॑द॒ग्निर्ह॑ दाति॒, रोमा॑ पृथि॒व्याः ॥४॥ ८ श्वसि॑त्य॒प्सु, हं॒सो न सीद॒न् क्रत्वा॒ चेति॑ष्ठो, वि॒शामु॑ष॒र्भुत् ॥९॥ सोमो॒ न वे॒धा, ऋ॒तप्र॑जातः प॒शुर्न शिश्वा॑, वि॒भुर्दू॒रेभा॑: ॥५॥ १०
पराशर शाक्त्य द्वारा रचित यह अग्निस्तुति उन्हें विचित्र धन के समान दृश्यमान, सूर्य के समान प्रकाशमान, आयु एवं प्राण के समान तथा प्रिय पुत्र के समान नित्य बताती है। वे वन में शीघ्रगामी पक्षी के समान, पवित्र एवं प्रकाशमान् गौ के दुग्ध के समान शुद्ध हैं; वे प्रिय गृह के समान सुख देते हैं और पके हुए यव के समान प्रजाओं पर विजय पाते हैं, समाज में प्रशंसित ऋषि के समान तथा प्रसन्न अश्व के समान बल प्रदान करते हैं। दुर्गम तेजयुक्त, नित्य यज्ञकर्म के समान, वे उसी प्रकार प्रत्येक गृह में प्रवेश करते हैं, जिस प्रकार वधू अपने वर के घर में; वे प्रजा में श्वेत प्रकाश के समान विचित्र एवं संग्रामों में स्वर्णभूषित रथ के समान तेजस्वी हैं। संगठित सेना के समान स्थिर, वेगवान् बाण के समान तेजोमय, वे स्वयं यम रूप में उत्पन्न हुए - जन्मदाता, कन्याओं के प्रियतम एवं पत्नियों के स्वामी। उनके निकट रहने वाले हम उनके पास उसी प्रकार जाते हैं, जैसे गौएं प्रज्वलित अग्नि के पास जाती हैं; उनकी ज्वालाएं प्रवाहित जल के समान गर्जन करती हुई, सूर्य के समान चमकती हुई फैलती हैं।
१० पराशरः शाक्त्यः। अग्निः। द्विपदा विराट्। र॒यिर्न चि॒त्रा, सूरो॒ न सं॒दृगायु॒र्न प्रा॒णो, नित्यो॒ न सू॒नुः १ तक्वा॒ न भूर्णि॒र्वना॑ सिषक्ति॒ पयो॒ न धे॒नुः, शुचि॑र्वि॒भावा॑ ॥१॥ २ दा॒धार॒ क्षेम॒मोको॒ न र॒ण्वो यवो॒ न प॒क्वो, जेता॒ जना॑नाम् ३ ऋषि॒र्न स्तुभ्वा॑, वि॒क्षु प्र॑श॒स्तो वा॒जी न प्री॒तो, वयो॑ दधाति ॥२॥ ४ दु॒रोक॑शोचि॒:, क्रतु॒र्न नित्यो॑ जा॒येव॒ योना॒वरं॒ विश्व॑स्मै ५ चि॒त्रो यदभ्रा॑ट्, छ्वे॒तो न वि॒क्षु रथो॒ न रु॒क्मी, त्वे॒षः स॒मत्सु॑ ॥३॥ ६ सेने॑व सृ॒ष्टामं॑ दधा॒त्यस्तु॒र्न दि॒द्युत्, त्वे॒षप्र॑तीका ७ य॒मो ह॑ जा॒तो, य॒मो जनि॑त्वं जा॒रः क॒नीनां॒, पति॒र्जनी॑नाम् ॥४॥ ८ तं व॑श्च॒राथा॑, व॒यं व॑स॒त्यास्तं॒ न गावो॒, नक्ष॑न्त इ॒द्धम् ९ सिन्धु॒र्न क्षोद॒:, प्र नीची॑रैनो॒न्नव॑न्त॒ गाव॒:, स्व १ र्दृशी॑के ॥५॥ १०
यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है, जो वनों में विजय प्राप्त करते हैं और मनुष्यों के मध्य विश्वसनीय मित्र के रूप में चुने जाते हैं, मानो अजर राजा शीघ्र स्वागत करने वाला हो। सरल आचरण के समान ऋजु, शुभ मंत्रणा के समान कल्याणकारी, वे प्रज्ञावान् हविर्वाहक पुरोहित बनते हैं, अपने हाथ में समस्त वीर्यशक्ति धारण करते हुए, और छिपकर बैठे हुए समस्त देवताओं की स्थापना करते हैं। जिन ऋषियों ने हृदय में मंत्र रचकर उन्हें सुंदर स्तोत्रों में उच्चारित किया, उन्होंने उन्हें वहीं विराजमान पाया, उनकी गुप्त प्रज्ञा को पहचानते हुए। अजन्मा होते हुए भी पृथ्वी को धारण करने वाले उन्होंने सत्यमंत्रों से आकाश को स्तंभित किया; हे अग्नि, समस्त प्राणियों के रक्षक, प्रत्येक जीव के प्रिय पदचिह्नों की रक्षा करो, जो गुप्त स्थानों में छिपे हुए हैं। जो कोई उस गुप्त स्थान में विद्यमान उन्हें पहचान लेता है, जिसने ऋत की धारा को खोज लिया है, उसे अग्नि प्रचुर धन प्रदान करने की घोषणा करते हैं; और जो अपनी महिमा से वनस्पतियों एवं समस्त संतानों में व्याप्त हैं, उन प्रज्ञावान् ज्ञानसंपन्न ऋषियों ने मिलकर बहते जलों को उसी प्रकार सुव्यवस्थित किया, जिस प्रकार कोई सुव्यवस्थित गृह बनाता है।
१० पराशरः शाक्त्यः। अग्निः। द्विपदा विराट्। वने॑षु जा॒युर्मर्ते॑षु मि॒त्रो वृ॑णी॒ते श्रु॒ष्टिं, राजे॑वाजु॒र्यम् १ क्षेमो॒ न सा॒धुः, क्रतु॒र्न भ॒द्रो भुव॑त्स्वा॒धी, र्होता॑ हव्य॒वाट् ॥१॥ २ हस्ते॒ दधा॑नो, नृ॒म्णा विश्वा॒न्यमे॑ दे॒वान् धा॒द् गुहा॑ नि॒षीद॑न् ३ वि॒दन्ती॒मत्र॒, नरो॑ धियं॒धा हृ॒दा यत् त॒ष्टान् मन्त्राँ॒ अशं॑सन् ॥२॥ ४ अ॒जो न क्षां, दा॒धार॑ पृथि॒वीं त॒स्तम्भ॒ द्यां मन्त्रे॑भिः स॒त्यैः ५ प्रि॒या प॒दानि॑, प॒श्वो नि पा॑हि वि॒श्वायु॑रग्ने, गु॒हा गुहं॑ गाः ॥३॥ ६ य ईं॑ चि॒केत॒, गुहा॒ भव॑न्त॒मा यः स॒साद॒ धारा॑मृ॒तस्य॑ ७ वि ये चृ॒तन्त्यृ॒ता सप॑न्त॒ आदिद् वसू॑नि॒ प्र व॑वाचास्मै ॥४॥ ८ वि यो वी॒रुत्सु॒, रोध॑न्महि॒त्वोत प्र॒जा, उ॒त प्र॒सूष्व॒न्तः ९ चित्ति॑र॒पां, दमे॑ वि॒श्वायु॒: सद्मे॑व॒ धीरा॑:, सं॒माय॑ चक्रुः ॥५॥ १०
यह सूक्त अग्नि को आकाश की शोभा बढ़ाते हुए ऊपर उठते वर्णित करता है, वे शीघ्रगामी हैं जिन्होंने स्थावर और जंगम समस्त प्राणियों के लिए रात्रियों को उद्घाटित किया। समस्त देवताओं में केवल वे ही अपनी महिमा से समस्त देवताओं के देव बन जाते हैं; शुष्क काष्ठ से प्रज्वलित होकर वे सजीव रूप में जन्म लेते हैं, और तत्पश्चात समस्त देवगण उनके कर्म को अपनाते हैं, ऋत के नियम का पालन करते हुए अमृतत्व में सहभागी होते हैं। सत्य की प्रेरणा तथा सत्य का चिंतन उन्हीं का है; जीवनदायी होकर समस्त देवताओं ने उन्हीं के द्वारा अपने कर्म संपन्न किए। हे अग्नि, जो तुम्हें हव्य अर्पित करता है अथवा तुम्हारी सेवा करता है, हे प्रज्ञावान्, उसे धन प्रदान करो; मनु की संतानों के मध्य पुरोहित रूप में विराजमान होकर वे ही इन धनों के स्वामी बनते हैं। अपने शरीरों में एक-दूसरे का बीज खोजते हुए, प्रज्ञावान् एवं निष्कपट जन अपने-अपने कौशल से एकजुट हुए, मानो पुत्र पिता की इच्छा के प्रति समर्पित हों, और वेगवान् जनों ने उनके नियम का पालन किया; अन्नसंपन्न अग्नि ने धन के द्वार खोल दिए और, उत्तम गृहस्वामी के समान, आकाश को तारों से अलंकृत किया।
१० पराशरः शाक्त्यः। अग्निः। द्विपदा विराट्। श्री॒णन्नुप॑ स्था॒द्, दिवं॑ भुर॒ण्युः स्था॒तुश्च॒रथ॑म॒क्तून् व्यू॑र्णोत् ॥१॥ परि॒ यदे॑षा॒मेको॒ विश्वे॑षां॒ भुव॑द् दे॒वो, दे॒वानां॑ महि॒त्वा ॥१२॥ आदित् ते विश्वे॒ क्रतुं॑ जुषन्त॒ शुष्का॒द् यद् दे॑व, जी॒वो जनि॑ष्ठाः ॥३॥ भज॑न्त॒ विश्वे॑, देव॒त्वं नाम॑ ऋ॒तं सप॑न्तो, अ॒मृत॒मेवै॑: ॥२४॥ ऋ॒तस्य॒ प्रेषा॑ ऋ॒तस्य॑ धी॒तिर्वि॒श्वायु॒र्विश्वे॒ अपां॑सि चक्रुः ॥५॥ यस्तुभ्यं॒ दाशा॒द्, यो वा॑ ते॒ शिक्षा॒त् तस्मै॑ चिकि॒त्वान् र॒यिं द॑यस्व ॥३॥६॥ होता॒ निष॑त्तो॒, मनो॒रप॑त्ये॒ स चि॒न्न्वा॑सां॒, पती॑ रयी॒णाम् ॥७॥ इ॒च्छन्त॒ रेतो॑, मि॒थस्त॒नूषु॒ सं जा॑नत॒ स्वैर्दक्षै॒रमू॑राः ॥४॥८॥ पि॒तुर्न पु॒त्राः, क्रतुं॑ जुषन्त॒ श्रोष॒न् ये अ॑स्य॒, शासं॑ तु॒रास॑: ॥९॥ वि राय॑ और्णो॒द्, दुर॑: पुरु॒क्षुः पि॒पेश॒ नाकं॒, स्तृभि॒र्दमू॑नाः ॥५॥१०॥
यह सूक्त कहता है कि अग्नि उषा के प्रियतम के समान तेजस्वी एवं प्रज्वलित होकर आकाश के प्रकाश के समान समस्त दिशाओं को एक साथ भर देते हैं। समस्त प्राणियों से उत्पन्न होते हुए भी वे अपनी प्रज्ञा से सबसे बढ़कर हैं, तथा स्वयं पुत्र होते हुए भी देवताओं के पिता बन जाते हैं। निरभिमान, प्रज्ञावान् विधाता अग्नि गौओं के थन तथा अन्न की मधुरता को जानते हैं; वे प्रजा में आनंद के समान स्वागत योग्य होकर, उनके मध्य सुखपूर्वक विराजमान होकर, नवजात पुत्र के समान गृह को आनंदित करते हैं। जब अपने ही कुल के प्रमुख जनों द्वारा आवाहित किए गए, तब अग्नि ने अपने देवत्व से समस्त वस्तुओं में व्याप्ति की, और उन नियमों को कोई भी भंग नहीं कर सकता, जो उन्होंने अपने समर्पित उपासकों को प्रदान किए हैं। हे अग्नि, यह तुम्हारा ही अद्भुत कर्म है कि अपने समान सहयोगियों के साथ मिलकर तुम प्रत्येक कष्ट पर विजय पाते हो; उषा के प्रियतम दूत के समान तेजस्वी एवं सुपरिचित रूप वाले वे हमें अपना परिचय दें - और आगे बढ़ते हुए समस्त प्राणियों ने द्वार खोल दिए तथा उनके सूर्यसम तेज पर हर्षध्वनि की।
१० पराशरः शाक्त्यः। अग्निः। द्विपदा विराट्। शु॒क्रः शु॑शु॒क्वाँ, उ॒षो न जा॒रः प॒प्रा स॑मी॒ची, दि॒वो न ज्योति॑: ॥१॥ परि॒ प्रजा॑त॒:, क्रत्वा॑ बभूथ॒ भुवो॑ दे॒वानां॑, पि॒ता पु॒त्रः सन् ॥१२॥ वे॒धा अदृ॑प्तो, अ॒ग्निर्वि॑जा॒नन्नूध॒र्न गोनां॒, स्वाद्मा॑ पितू॒नाम् ॥३॥ जने॒ न शेव॑, आ॒हूर्य॒: सन् मध्ये॒ निष॑त्तो, र॒ण्वो दु॑रो॒णे ॥२४॥ पु॒त्रो न जा॒तो, र॒ण्वो दु॑रो॒णे वा॒जी न प्री॒तो विशो॒ वि ता॑रीत् ॥५॥ विशो॒ यदह्वे॒, नृभि॒: सनी॑ळा अ॒ग्निर्दे॑व॒त्वा, विश्वा॑न्यश्याः ॥३॥६॥ नकि॑ष्ट ए॒ता, व्र॒ता मि॑नन्ति॒ नृभ्यो॒ यदे॒भ्यः, श्रु॒ष्टिं च॒कर्थ॑ ॥७॥ तत् तु ते॒ दंसो॒, यदह॑न्त्समा॒नैर्नृभि॒र्यद् यु॒क्तो, वि॒वे रपां॑सि ॥४॥८॥ उ॒षो न जा॒रो, वि॒भावो॒स्रः संज्ञा॑तरूप॒श्चिके॑तदस्मै ॥९॥ त्मना॒ वह॑न्तो॒ दुरो॒ व्यृ॑ण्व॒न् नव॑न्त॒ विश्वे॒ स्व १ र्दृशी॑के ॥५॥१०॥
यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है, जो उषा के प्रियतम के समान तेजस्वी एवं प्रज्वलित होकर आकाश के प्रकाश के समान क्षितिज को एक साथ भर देते हैं। दूसरों से उत्पन्न होते हुए भी अपने ही सामर्थ्य से वे सबसे बढ़कर हैं, स्वयं संतान होते हुए भी देवताओं के पिता बन जाते हैं। निरभिमान, प्रज्ञावान्, अचूक विधाता अग्नि गौओं के थन तथा अन्न के स्वाद को जानते हैं, प्रजा में आनंद के समान स्वागत योग्य होकर, उनके मध्य सुखपूर्वक विराजमान होकर, नवजात पुत्र के समान गृह को आनंदित करते हैं। जब अपने ही बंधु प्रमुख जनों द्वारा आवाहित किए गए, तब अग्नि ने अपने देवत्व से सब कुछ प्राप्त किया, और कोई भी उन नियमों को भंग नहीं कर सकता, जो उन्होंने अपने समर्पित उपासकों के लिए स्थापित किए हैं। हे अग्नि, यह तुम्हारा ही अद्भुत कर्म है कि अपने समान सहयोगियों के साथ मिलकर तुमने प्रत्येक कष्ट को भस्म कर दिया; उषा के प्रियतम दूत के सुपरिचित तेजस्वी रूप के समान वे हमें अपना परिचय दें, जैसे आगे बढ़ते हुए समस्त प्राणियों ने द्वार खोल दिए तथा उनके सूर्यसम तेज पर हर्षध्वनि की।
११ पराशरः शाक्त्यः। अग्निः। द्विपदा विराट्। व॒नेम॑ पू॒र्वीर॒र्यो म॑नी॒षा अ॒ग्निः सु॒शोको॒, विश्वा॑न्यश्याः ॥१॥ आ दैव्या॑नि, व्र॒ता चि॑कि॒त्वाना मानु॑षस्य॒, जन॑स्य॒ जन्म॑ ॥१२॥ गर्भो॒ यो अ॒पां, गर्भो॒ वना॑नां॒ गर्भ॑श्च स्था॒तां, गर्भ॑श्च॒रथा॑म् ॥३॥ अद्रौ॑ चिदस्मा, अ॒न्तर्दु॑रो॒णे वि॒शां न विश्वो॑, अ॒मृत॑: स्वा॒धीः ॥२४॥ स हि क्ष॒पावाँ॑, अ॒ग्नी र॑यी॒णां दाश॒द् यो अ॑स्मा॒, अरं॑ सू॒क्तैः ॥५॥ ए॒ता चि॑कित्वो॒, भूमा॒ नि पा॑हि दे॒वानां॒ जन्म॒, मर्तां॑श्च वि॒द्वान् ॥३॥६॥ वर्धा॒न्यं पू॒र्वीः, क्ष॒पो विरू॑पाः स्था॒तुश्च॒ रथ॑मृ॒तप्र॑वीतम् ॥७॥ अरा॑धि॒ होता॒, स्व १र्निष॑त्तः कृ॒ण्वन् विश्वा॒न्यपां॑सि स॒त्या ॥४॥८॥ गोषु॒ प्रश॑स्तिं॒, वने॑षु धिषे॒ भर॑न्त॒ विश्वे॑, ब॒लिं स्व॑र्णः ॥९॥ वि त्वा॒ नर॑:, पुरु॒त्रा स॑पर्यन् पि॒तुर्न जिव्रे॒र्वि वेदो॑ भरन्त ॥५॥१०॥ सा॒धुर्न गृ॒ध्नुरस्ते॑व॒ शूरो॒ याते॑व भी॒मस्त्वे॒षः स॒मत्सु॑ ॥६॥११॥
अग्नि साधक के समान समस्त हव्य स्वीकार करते हैं. वे धानुष्क के समान शूर, शत्रुके समान भयंकर एवं संग्रामों में दीप्त होकर हमारी सहायता करें
१० पराशरः शाक्त्यः। अग्निः। त्रिष्टुप्। उप॒ प्र जि॑न्वन्नुश॒तीरु॒शन्तं॒ पतिं॒ न नित्यं॒ जन॑य॒: सनी॑ळाः । स्वसा॑र॒: श्यावी॒मरु॑षीमजुष्रञ् चि॒त्रमु॒च्छन्ती॑मु॒षसं॒ न गाव॑: ॥१॥ वी॒ळु चि॑द् दृ॒ह्ला पि॒तरो॑ न उ॒क्थैरद्रिं॑ रुज॒न्नङ्गि॑रसो॒ रवे॑ण । च॒क्रुर्दि॒वो बृ॑ह॒तो गा॒तुम॒स्मे अह॒: स्व॑र्विविदुः के॒तुमु॒स्राः ॥२॥ दध॑न्नृ॒तं ध॒नय॑न्नस्य धी॒तिमादिद॒र्यो दि॑धि॒ष्वो॒ ३ विभृ॑त्राः । अतृ॑ष्यन्तीर॒पसो॑ य॒न्त्यच्छा॑ दे॒वाञ्जन्म॒ प्रय॑सा व॒र्धय॑न्तीः ॥३॥ मथी॒द् यदीं॒ विभृ॑तो मात॒रिश्वा॑ गृ॒हेगृ॑हे श्ये॒तो जेन्यो॒ भूत् । आदीं॒ राज्ञे॒ न सही॑यसे॒ सचा॒ सन्ना दू॒त्यं १ भृग॑वाणो विवाय ॥४॥ म॒हे यत् पि॒त्र ईं॒ रसं॑ दि॒वे करव॑ त्सरत् पृश॒न्य॑श्चिकि॒त्वान् । सृ॒जदस्ता॑ धृष॒ता दि॒द्युम॑स्मै॒ स्वायां॑ दे॒वो दु॑हि॒तरि॒ त्विषिं॑ धात् ॥५॥ स्व आ यस्तुभ्यं॒ दम॒ आ वि॒भाति॒ नमो॑ वा॒ दाशा॑दुश॒तो अनु॒ द्यून् । वर्धो॑ अग्ने॒ वयो॑ अस्य द्वि॒बर्हा॒ यास॑द् रा॒या स॒रथं॒ यं जु॒नासि॑ ॥६॥ अ॒ग्निं विश्वा॑ अ॒भि पृक्ष॑: सचन्ते समु॒द्रं न स्र॒वत॑: स॒प्त य॒ह्वीः । न जा॒मिभि॒र्वि चि॑किते॒ वयो॑ नो वि॒दा दे॒वेषु॒ प्रम॑तिं चिकि॒त्वान् ॥७॥ आ यदि॒षे नृ॒पतिं॒ तेज॒ आन॒ट् छुचि॒ रेतो॒ निषि॑क्तं॒ द्यौर॒भीके॑ । अ॒ग्निः शर्ध॑मनव॒द्यं युवा॑नं स्वा॒ध्यं॑ जनयत् सू॒दय॑च्च ॥८॥ मनो॒ न योऽध्व॑नः स॒द्य एत्येक॑: स॒त्रा सूरो॒ वस्व॑ ईशे । राजा॑ना मि॒त्रावरु॑णा सुपा॒णी गोषु॑ प्रि॒यम॒मृतं॒ रक्ष॑माणा ॥९॥ मा नो॑ अग्ने स॒ख्या पित्र्या॑णि॒ प्र म॑र्षिष्ठा अ॒भि वि॒दुष्क॒विः सन् । नभो॒ न रू॒पं ज॑रि॒मा मि॑नाति पु॒रा तस्या॑ अ॒भिश॑स्ते॒रधी॑हि ॥१०॥
कामना करने वाली एवं एक साथ निवास करने वाली उंगलियां हव्य की अभिलाषा करने वाले अग्नि को हव्य देकर उसी प्रकार प्रसन्न करती हैं, जिस प्रकार विवाहिता नारी अपने पति को प्रसन्न करती है. पहले कृष्णवर्ण धारण करने वाली उषा की सेवा जिस प्रकार सूर्यकिरणें करती हैं, उसी प्रकार उंगलियां पूजनीय अग्नि की अंजलिबंधन से सेवा करती हैं हमारे पितर अंगिराओं ने मंत्र द्वारा अग्नि की स्तुति करके उस स्तुति शब्द द्वारा ही बलवान् एवं दृढ़ पणि असुर को समाप्त किया था एवं हमारे लिए महान् द्युलोक का मार्ग बनाया था. इसके पश्चात उन्होंने सखपर्वक प्राप्य दिवस, संसार प्रकाशक सूर्य एवं को धारण किया था. जो यजमान धन के स्वामी हैं जो अन्य विषयों की तृष्णा से रहित होकर अग्नि को धारण करते हुए यज्ञकर्म में संलग्न रहते हैं, वे हविरूप अन्न के द्वारा देवों और मानवों की वृद्धि करते हुए अग्नि के सम्मुख जाते हैं
१० पराशरः शाक्त्यः। अग्निः। त्रिष्टुप्। नि काव्या॑ वे॒धस॒: शश्व॑तस्क॒र्हस्ते॒ दधा॑नो॒ नर्या॑ पु॒रूणि॑ । अ॒ग्निर्भु॑वद् रयि॒पती॑ रयी॒णां स॒त्रा च॑क्रा॒णो अ॒मृता॑नि॒ विश्वा॑ ॥१॥ अ॒स्मे व॒त्सं परि॒ षन्तं॒ न वि॑न्दन्नि॒च्छन्तो॒ विश्वे॑ अ॒मृता॒ अमू॑राः । श्र॒म॒युव॑: पद॒व्यो॑ धियं॒धास्त॒स्थुः प॒दे प॑र॒मे चार्व॒ग्नेः ॥२॥ ति॒स्रो यद॑ग्ने श॒रद॒स्त्वामिच्छुचिं॑ घृ॒तेन॒ शुच॑यः सप॒र्यान् । नामा॑नि चिद् दधिरे य॒ज्ञिया॒न्यसू॑दयन्त त॒न्व १: सुजा॑ताः ॥३॥ आ रोद॑सी बृह॒ती वेवि॑दाना॒: प्र रु॒द्रिया॑ जभ्रिरे य॒ज्ञिया॑सः । वि॒दन्मर्तो॑ ने॒मधि॑ता चिकि॒त्वान॒ग्निं प॒दे प॑र॒मे त॑स्थि॒वांस॑म् ॥४॥ सं॒जा॒ना॒ना उप॑ सीदन्नभि॒ज्ञु पत्नी॑वन्तो नम॒स्यं॑ नमस्यन् । रि॒रि॒क्वांस॑स्त॒न्व॑: कृण्वत॒ स्वाः सखा॒ सख्यु॑र्नि॒मिषि॒ रक्ष॑माणाः ॥५॥ त्रिः स॒प्त यद् गुह्या॑नि॒ त्वे इत् प॒दावि॑द॒न्निहि॑ता य॒ज्ञिया॑सः । तेभी॑ रक्षन्ते अ॒मृतं॑ स॒जोषा॑: प॒शूञ्च॑ स्था॒तॄञ्च॒रथं॑ च पाहि ॥६॥ वि॒द्वाँ अ॑ग्ने व॒युना॑नि क्षिती॒नां व्या॑नु॒षक् छु॒रुधो॑ जी॒वसे॑ धाः । अ॒न्त॒र्वि॒द्वाँ अध्व॑नो देव॒याना॒नत॑न्द्रो दू॒तो अ॑भवो हवि॒र्वाट् ॥७॥ स्वा॒ध्यो॑ दि॒व आ स॒प्त य॒ह्वी रा॒यो दुरो॒ व्यृ॑त॒ज्ञा अ॑जानन् । वि॒दद् गव्यं॑ स॒रमा॑ दृ॒ह्लमू॒र्वं येना॒ नु कं॒ मानु॑षी॒ भोज॑ते॒ विट् ॥८॥ आ ये विश्वा॑ स्वप॒त्यानि॑ त॒स्थुः कृ॑ण्वा॒नासो॑ अमृत॒त्वाय॑ गा॒तुम् । म॒ह्ना म॒हद्भि॑: पृथि॒वी वि त॑स्थे मा॒ता पु॒त्रैरदि॑ति॒र्धाय॑से॒ वेः ॥९॥ अधि॒ श्रियं॒ नि द॑धु॒श्चारु॑मस्मिन् दि॒वो यद॒क्षी अ॒मृता॒ अकृ॑ण्वन् । अध॑ क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वो॒ न सृ॒ष्टाः प्र नीची॑रग्ने॒ अरु॑षीरजानन् ॥१०॥
मनुष्यों के लिए हितकारक धन हाथ में धारण करते हुए, नित्य एवं ज्ञानसंपन्न अग्निदेव ब्रह्म संबंधी मंत्रों को स्वीकार करते हैं। स्तुतिकर्ताओं को अमृत प्रदान करते हुए अग्निदेव उत्कृष्ट धन के स्वामी होते हैं - इस प्रकार यह सूक्त अग्नि की महिमा, उनकी प्रिय आवास-स्थली, तथा उनके द्वारा देवों और मनुष्यों को प्रदत्त धन एवं अमरत्व का वर्णन करता है।
१० पराशरः शाक्त्यः। अग्निः। त्रिष्टुप्। र॒यिर्न यः पि॑तृवि॒त्तो व॑यो॒धाः सु॒प्रणी॑तिश्चिकि॒तुषो॒ न शासु॑: । स्यो॒न॒शीरति॑थि॒र्न प्री॑णा॒नो होते॑व॒ सद्म॑ विध॒तो वि ता॑रीत् ॥१॥ दे॒वो न यः स॑वि॒ता स॒त्यम॑न्मा॒ क्रत्वा॑ नि॒पाति॑ वृ॒जना॑नि॒ विश्वा॑ । पु॒रु॒प्र॒श॒स्तो अ॒मति॒र्न स॒त्य आ॒त्मेव॒ शेवो॑ दिधि॒षाय्यो॑ भूत् ॥२॥ दे॒वो न यः पृ॑थि॒वीं वि॒श्वधा॑या उप॒क्षेति॑ हि॒तमि॑त्रो॒ न राजा॑ । पु॒र॒:सद॑: शर्म॒सदो॒ न वी॒रा अ॑नव॒द्या पति॑जुष्टेव॒ नारी॑ ॥३॥ तं त्वा॒ नरो॒ दम॒ आ नित्य॑मि॒द्धमग्ने॒ सच॑न्त क्षि॒तिषु॑ ध्रु॒वासु॑ । अधि॑ द्यु॒म्नं नि द॑धु॒र्भूर्य॑स्मि॒न् भवा॑ वि॒श्वायु॑र्ध॒रुणो॑ रयी॒णाम् ॥४॥ वि पृक्षो॑ अग्ने म॒घवा॑नो अश्यु॒र्वि सू॒रयो॒ दद॑तो॒ विश्व॒मायु॑: । स॒नेम॒ वाजं॑ समि॒थेष्व॒र्यो भा॒गं दे॒वेषु॒ श्रव॑से॒ दधा॑नाः ॥५॥ ऋ॒तस्य॒ हि धे॒नवो॑ वावशा॒नाः स्मदू॑ध्नीः पी॒पय॑न्त॒ द्युभ॑क्ताः । प॒रा॒वत॑: सुम॒तिं भिक्ष॑माणा॒ वि सिन्ध॑वः स॒मया॑ सस्रु॒रद्रि॑म् ॥६॥ त्वे अ॑ग्ने सुम॒तिं भिक्ष॑माणा दि॒वि श्रवो॑ दधिरे य॒ज्ञिया॑सः । नक्ता॑ च च॒क्रुरु॒षसा॒ विरू॑पे कृ॒ष्णं च॒ वर्ण॑मरु॒णं च॒ सं धु॑: ॥७॥ यान् रा॒ये मर्ता॒न्त्सुषू॑दो अग्ने॒ ते स्या॑म म॒घवा॑नो व॒यं च॑ । छा॒येव॒ विश्वं॒ भुव॑नं सिसक्ष्यापप्रि॒वान् रोद॑सी अ॒न्तरि॑क्षम् ॥८॥ अर्व॑द्भिरग्ने॒ अर्व॑तो॒ नृभि॒र्नॄन् वी॒रैर्वी॒रान् व॑नुयामा॒ त्वोता॑: । ई॒शा॒नास॑: पितृवि॒त्तस्य॑ रा॒यो वि सू॒रय॑: श॒तहि॑मा नो अश्युः ॥९॥ ए॒ता ते॑ अग्न उ॒चथा॑नि वेधो॒ जुष्टा॑नि सन्तु॒ मन॑से हृ॒दे च॑ । श॒केम॑ रा॒यः सु॒धुरो॒ यमं॒ ते ऽधि॒ श्रवो॑ दे॒वभ॑क्तं॒ दधा॑नाः ॥१०॥
अग्नि पैतृक धन के समान अन्न दान करते हैं. वे धर्मशास्त्र के विद्वान् व्यक्ति के समान सरल नेता हैं. वे सुखासन से बैठे हुए अतिथि के समान तर्पणीय एवं होमकर्त्ता के समान यजमान के घर की उन्नति करते हैं
९ गोतमो राहूगणः। अग्निः। गायत्री। उ॒प॒प्र॒यन्तो॑ अध्व॒रं मन्त्रं॑ वोचेमा॒ग्नये॑ । आ॒रे अ॒स्मे च॑ शृण्व॒ते ॥१॥ यः स्नीहि॑तीषु पू॒र्व्यः सं॑जग्मा॒नासु॑ कृ॒ष्टिषु॑ । अर॑क्षद् दा॒शुषे॒ गय॑म् ॥२॥ उ॒त ब्रु॑वन्तु ज॒न्तव॒ उद॒ग्निर्वृ॑त्र॒हाज॑नि । ध॒नं॒ज॒यो रणे॑रणे ॥३॥ यस्य॑ दू॒तो असि॒ क्षये॒ वेषि॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑ । द॒स्मत् कृ॒णोष्य॑ध्व॒रम् ॥४॥ तमित् सु॑ह॒व्यम॑ङ्गिरः सुदे॒वं स॑हसो यहो । जना॑ आहुः सुब॒र्हिष॑म् ॥५॥ आ च॒ वहा॑सि॒ ताँ इ॒ह दे॒वाँ उप॒ प्रश॑स्तये । ह॒व्या सु॑श्चन्द्र वी॒तये॑ ॥६॥ न योरु॑प॒ब्दिरश्व्य॑: शृ॒ण्वे रथ॑स्य॒ कच्च॒न । यद॑ग्ने॒ यासि॑ दू॒त्य॑म् ॥७॥ त्वोतो॑ वा॒ज्यह्र॑यो॒ ऽभि पूर्व॑स्मा॒दप॑रः । प्र दा॒श्वाँ अ॑ग्ने अस्थात् ॥८॥ उ॒त द्यु॒मत् सु॒वीर्यं॑ बृ॒हद॑ग्ने विवाससि । दे॒वेभ्यो॑ देव दा॒शुषे॑ ॥९॥
दूर रहकर भी हमारी स्तुतियां सुनने वाले एवं यज्ञ में शीघ्रता से उपस्थित होने वाले अग्नि की हम स्तुति करते हैं
५ गोतमो राहूगणः। अग्निः। गायत्री। जु॒षस्व॑ स॒प्रथ॑स्तमं॒ वचो॑ दे॒वप्स॑रस्तमम् । ह॒व्या जुह्वा॑न आ॒सनि॑ ॥१॥ अथा॑ ते अङ्गिरस्त॒माग्ने॑ वेधस्तम प्रि॒यम् । वो॒चेम॒ ब्रह्म॑ सान॒सि ॥२॥ कस्ते॑ जा॒मिर्जना॑ना॒मग्ने॒ को दा॒श्व॑ध्वरः । को ह॒ कस्मि॑न्नसि श्रि॒तः ॥३॥ त्वं जा॒मिर्जना॑ना॒मग्ने॑ मि॒त्रो अ॑सि प्रि॒यः । सखा॒ सखि॑भ्य॒ ईड्य॑: ॥४॥ यजा॑ नो मि॒त्रावरु॑णा॒ यजा॑ दे॒वाँ ऋ॒तं बृ॒हत् । अग्ने॒ यक्षि॒ स्वं दम॑म् ॥५॥
हे अग्नि देव! अपने मुख में हव्य ग्रहण करते हुए देवों को भली प्रकार प्रसन्न करो एवं हमारी विस्तीर्ण स्तुतियां स्वीकार करो
५ गोतमो राहूगणः। अग्निः। त्रिष्टुप्। का त॒ उपे॑ति॒र्मन॑सो॒ वरा॑य॒ भुव॑दग्ने॒ शंत॑मा॒ का म॑नी॒षा । को वा॑ य॒ज्ञैः परि॒ दक्षं॑ त आप॒ केन॑ वा ते॒ मन॑सा दाशेम ॥१॥ एह्य॑ग्न इ॒ह होता॒ नि षी॒दाद॑ब्ध॒: सु पु॑रए॒ता भ॑वा नः । अव॑तां त्वा॒ रोद॑सी विश्वमि॒न्वे यजा॑ म॒हे सौ॑मन॒साय॑ दे॒वान् ॥२॥ प्र सु विश्वा॑न् र॒क्षसो॒ धक्ष्य॑ग्ने॒ भवा॑ य॒ज्ञाना॑मभिशस्ति॒पावा॑ । अथा व॑ह॒ सोम॑पतिं॒ हरि॑भ्यामाति॒थ्यम॑स्मै चकृमा सु॒दाव्ने॑ ॥३॥ प्र॒जाव॑ता॒ वच॑सा॒ वह्नि॑रा॒सा ऽऽ च॑ हु॒वे नि च॑ सत्सी॒ह दे॒वैः । वेषि॑ हो॒त्रमु॒त पो॒त्रं य॑जत्र बो॒धि प्र॑यन्तर्जनित॒र्वसू॑नाम् ॥४॥ यथा॒ विप्र॑स्य॒ मनु॑षो ह॒विर्भि॑र्दे॒वाँ अय॑जः क॒विभि॑: क॒विः सन् । ए॒वा हो॑तः सत्यतर॒ त्वम॒द्याग्ने॑ म॒न्द्रया॑ जु॒ह्वा॑ यजस्व ॥५॥
गोतम राहूगण ऋषि के इस त्रिष्टुप सूक्त में कवि अग्नि से पूछता है कि उनके मन को कौन-सा उपाय, कौन-सी सबसे सुखद बुद्धि प्रसन्न करेगी, कौन यज्ञों द्वारा उनकी पूर्ण उत्कृष्टता को प्राप्त कर चुका है, और किस भक्ति से स्तोता को उनका सम्मान करना चाहिए। हे अग्नि! यहाँ हमारे होता बनकर आओ, निर्भय होकर विराजो और हमारे अच्छे अगुआ बनो; दोनों लोक तुम्हारी रक्षा करें, हमारी प्रसन्नता के लिए महान देवों की पूजा करो। हे अग्नि! सब राक्षसों को भस्म कर दो और यज्ञों के निन्दा-रहित रक्षक बनो; फिर सोम के स्वामी को उनके दोनों बलिष्ठ अश्वों सहित यहाँ लाओ, क्योंकि हमने इस उदार देव के लिए आतिथ्य तैयार किया है। संतानयुक्त वाणी से मैं तुम्हें यहाँ देवों के बीच बुलाता और बैठाता हूँ; हे पूज्य! होता और पोता के कर्तव्यों को पूर्ण करो और स्वयं को धनों का दाता व जनक जानो। जैसे तुमने ज्ञानियों में ज्ञानी होकर मनु ऋषि के हविष्यों से देवों की पूजा की थी, वैसे ही, हे सत्यतम पुरोहित, आज अपनी मधुर जिह्वा से पूजा करो, हे अग्नि।
५ गोतमो राहूगणः। अग्निः। त्रिष्टुप्। क॒था दा॑शेमा॒ग्नये॒ कास्मै॑ दे॒वजु॑ष्टोच्यते भा॒मिने॒ गीः । यो मर्त्ये॑ष्व॒मृत॑ ऋ॒तावा॒ होता॒ यजि॑ष्ठ॒ इत् कृ॒णोति॑ दे॒वान् ॥१॥ यो अ॑ध्व॒रेषु॒ शंत॑म ऋ॒तावा॒ होता॒ तमू॒ नमो॑भि॒रा कृ॑णुध्वम् । अ॒ग्निर्यद् वेर्मर्ता॑य दे॒वान्त्स चा॒ बोधा॑ति॒ मन॑सा यजाति ॥२॥ स हि क्रतु॒: स मर्य॒: स सा॒धुर्मि॒त्रो न भू॒दद्भु॑तस्य र॒थीः । तं मेधे॑षु प्रथ॒मं दे॑व॒यन्ती॒र्विश॒ उप॑ ब्रुवते द॒स्ममारी॑: ॥३॥ स नो॑ नृ॒णां नृत॑मो रि॒शादा॑ अ॒ग्निर्गिरोऽव॑सा वेतु धी॒तिम् । तना॑ च॒ ये म॒घवा॑न॒: शवि॑ष्ठा॒ वाज॑प्रसूता इ॒षय॑न्त॒ मन्म॑ ॥४॥ ए॒वाग्निर्गोत॑मेभिर्ऋ॒तावा॒ विप्रे॑भिरस्तोष्ट जा॒तवे॑दाः । स ए॑षु द्यु॒म्नं पी॑पय॒त् स वाजं॒ स पु॒ष्टिं या॑ति॒ जोष॒मा चि॑कि॒त्वान् ॥५॥
कथा दाशेमाग्नये कास्मै देवजुष्टोच्यते भामिने गीः. यो मर्त्येष्चमत ्रतावा होता यजिष्नल दत्क णोति टेवान... (श)- मरणरहित, सत्ययुक्त, देवों का आह्वान करने वाले, यज्ञ पूर्ण कराने वाले एवं मनुष्यों के बीच निवास करके भी देवों को हवियुक्त करने वाले अग्नि के अनुरूप हव्य हम कैसे दे सकेंगे? हम तेजस्वी अग्नि के प्रति देवोचित स्तुति किस प्रकार करेंगे
५ गोतमो राहूगणः। अग्निः। गायत्री। अ॒भि त्वा॒ गोत॑मा गि॒रा जात॑वेदो॒ विच॑र्षणे । द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः ॥१॥ तमु॑ त्वा॒ गोत॑मो गि॒रा रा॒यस्का॑मो दुवस्यति । द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः ॥२॥ तमु॑ त्वा वाज॒सात॑ममङ्गिर॒स्वद्ध॑वामहे । द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः ॥३॥ तमु॑ त्वा वृत्र॒हन्त॑मं॒ यो दस्यूँ॑रवधूनु॒षे । द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः ॥४॥ अवो॑चाम॒ रहू॑गणा अ॒ग्नये॒ मधु॑म॒द् वच॑: । द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः ॥५॥
धन की इच्छा वाले गौतम ऋषि जिस अग्नि की स्तोत्र द्वारा सेवा करते हैं, हम भी गुणप्रकाशक स्तोत्र द्वारा उसी अग्नि की बार-बार स्तुति करते हैं
१२ गोतमो राहूगणः। १-३अग्निः मध्यमोऽ ग्निर्वा, ४-१२ अग्निः। १-३ त्रिष्टुप्, ४-६ उष्णिक्, ७-१२ गायत्री । हिर॑ण्यकेशो॒ रज॑सो विसा॒रे ऽहि॒र्धुनि॒र्वात॑ इव॒ ध्रजी॑मान् । शुचि॑भ्राजा उ॒षसो॒ नवे॑दा॒ यश॑स्वतीरप॒स्युवो॒ न स॒त्याः ॥१॥ आ ते॑ सुप॒र्णा अ॑मिनन्तँ॒ एवै॑: कृ॒ष्णो नो॑नाव वृष॒भो यदी॒दम् । शि॒वाभि॒र्न स्मय॑मानाभि॒रागा॒त् पत॑न्ति॒ मिह॑: स्त॒नय॑न्त्य॒भ्रा ॥२॥ यदी॑मृ॒तस्य॒ पय॑सा॒ पिया॑नो॒ नय॑न्नृ॒तस्य॑ प॒थिभी॒ रजि॑ष्ठैः । अ॒र्य॒मा मि॒त्रो वरु॑ण॒: परि॑ज्मा॒ त्वचं॑ पृञ्च॒न्त्युप॑रस्य॒ योनौ॑ ॥३॥ अग्ने॒ वाज॑स्य॒ गोम॑त॒ ईशा॑नः सहसो यहो । अ॒स्मे धे॑हि जातवेदो॒ महि॒ श्रव॑: ॥४॥ स इ॑धा॒नो वसु॑ष्क॒विर॒ग्निरी॒ळेन्यो॑ गि॒रा । रे॒वद॒स्मभ्यं॑ पुर्वणीक दीदिहि ॥५॥ क्ष॒पो रा॑जन्नु॒त त्मनाग्ने॒ वस्तो॑रु॒तोषस॑: । स ति॑ग्मजम्भ र॒क्षसो॑ दह॒ प्रति॑ ॥६॥ अवा॑ नो अग्न ऊ॒तिभि॑र्गाय॒त्रस्य॒ प्रभ॑र्मणि । विश्वा॑सु धी॒षु व॑न्द्य ॥७॥ आ नो॑ अग्ने र॒यिं भ॑र सत्रा॒साहं॒ वरे॑ण्यम् । विश्वा॑सु पृ॒त्सु दु॒ष्टर॑म् ॥८॥ आ नो॑ अग्ने सुचे॒तुना॑ र॒यिं वि॒श्वायु॑पोषसम् । मा॒र्डी॒कं धे॑हि जी॒वसे॑ ॥९॥ प्र पू॒तास्ति॒ग्मशो॑चिषे॒ वाचो॑ गोतमा॒ग्नये॑ । भर॑स्व सुम्न॒युर्गिर॑: ॥१०॥ यो नो॑ अग्नेऽभि॒दास॒त्यन्ति॑ दू॒रे प॑दी॒ष्ट सः । अ॒स्माक॒मिद् वृ॒धे भ॑व ॥११॥ स॒ह॒स्रा॒क्षो विच॑र्षणिर॒ग्नी रक्षां॑सि सेधति । होता॑ गृणीत उ॒क्थ्य॑: ॥१२॥
इस मिश्रित सूक्त के आरम्भ में अग्नि को स्वर्णकेश, फैलते अंधकार में फुफकारते सर्प के समान गतिशील, वायु-सम वेगवान तथा सत्यनिष्ठ, यशस्वी उषाओं के समान तेजस्वी बताया गया है। उनकी ज्वालाएं गरुड़ पक्षियों के समान अचूक वेग से बढ़ती हैं; काला गरजने वाला वृषभ हुंकार भरता है और सौम्य, मुस्कुराते मेघ जल बरसाते हुए गरजते हैं। सत्य (ऋत) के दूध से पोषित होकर वे सीधे मार्गों से ले जाए जाते हैं, और सर्वव्यापी अर्यमा, मित्र तथा वरुण जलों के स्थान पर आकाश की त्वचा का लेप करते हैं। इसके बाद सूक्त सीधी प्रार्थना की ओर मुड़ता है: हे अग्नि, गोधन-युक्त बल के स्वामी, बलपुत्र! हे समस्त उत्पत्तियों के ज्ञाता, हमें महान यश प्रदान करो। हे प्रज्वलित, ज्ञानी, धन-दाता, स्तुत्य, अनेक ध्वजाओं वाले! हम पर धन का प्रकाश डालो। रात्रियों के राजा बनो, और स्वयं दिनों तथा उषाओं के भी; हे तीक्ष्ण-दंत! हमारे सामने से राक्षसों को भस्म कर दो। हे अग्नि, गायत्र स्तोत्र के उच्चारण में अपनी सहायता से हमारी रक्षा करो, जो हर उपासना में स्तुत्य है। हमें सर्व-विजयी, अत्यंत वांछनीय, हर युद्ध में अजेय धन प्रदान करो; सुबुद्धि से हमारे समस्त जीवन का पोषण करने वाला धन दो, और जीवन हेतु दया प्रदान करो। गोतम तीक्ष्ण-ज्वाला अग्नि को शुद्ध वचन अर्पित करते हैं; सुख चाहने वाले स्तोत्रों को आगे बढ़ाओ। जो कोई हम पर आक्रमण करे, निकट हो या दूर, वह ठोकर खाकर गिर जाए; केवल हमारी वृद्धि के लिए बने रहो। सहस्र-नेत्र, सर्वदर्शी अग्नि राक्षसों को दूर भगाते हैं; स्तुत्य वे होता के रूप में आहूत किए जाते हैं।
१६ गोतमो राहूगणः। इन्द्रः, १६ इन्द्रः, (अथर्वा, मनुः दध्यङ् च)। पंक्तिः। इ॒त्था हि सोम॒ इन्मदे॑ ब्र॒ह्मा च॒कार॒ वर्ध॑नम् । शवि॑ष्ठ वज्रि॒न्नोज॑सा पृथि॒व्या निः श॑शा॒ अहि॒मर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥१॥ स त्वा॑मद॒द् वृषा॒ मद॒: सोम॑: श्ये॒नाभृ॑तः सु॒तः । येना॑ वृ॒त्रं निर॒द्भ्यो ज॒घन्थ॑ वज्रि॒न्नोज॒सार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥२॥ प्रेह्य॒भी॑हि धृष्णु॒हि न ते॒ वज्रो॒ नि यं॑सते । इन्द्र॑ नृ॒म्णं हि ते॒ शवो॒ हनो॑ वृ॒त्रं जया॑ अ॒पो ऽर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥३॥ निरि॑न्द्र॒ भूम्या॒ अधि॑ वृ॒त्रं ज॑घन्थ॒ निर्दि॒वः । सृ॒जा म॒रुत्व॑ती॒रव॑ जी॒वध॑न्या इ॒मा अ॒पो ऽर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥४॥ इन्द्रो॑ वृ॒त्रस्य॒ दोध॑त॒: सानुं॒ वज्रे॑ण हीळि॒तः । अ॒भि॒क्रम्याव॑ जिघ्नते॒ ऽपः सर्मा॑य चो॒दय॒न्नर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥५॥ अधि॒ सानौ॒ नि जि॑घ्नते॒ वज्रे॑ण श॒तप॑र्वणा । म॒न्दा॒न इन्द्रो॒ अन्ध॑स॒: सखि॑भ्यो गा॒तुमि॑च्छ॒त्यर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥६॥ इन्द्र॒ तुभ्य॒मिद॑द्रि॒वो ऽनु॑त्तं वज्रिन् वी॒र्य॑म् । यद्ध॒ त्यं मा॒यिनं॑ मृ॒गं तमु॒ त्वं मा॒यया॑वधी॒रर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥७॥ वि ते॒ वज्रा॑सो अस्थिरन्नव॒तिं ना॒व्या॒ ३ अनु॑ । म॒हत् त॑ इन्द्र वी॒र्यं॑ बा॒ह्वोस्ते॒ बलं॑ हि॒तमर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥८॥ स॒हस्रं॑ सा॒कम॑र्चत॒ परि॑ ष्टोभत विंश॒तिः । श॒तैन॒मन्व॑नोनवु॒रिन्द्रा॑य॒ ब्रह्मोद्य॑त॒मर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥९॥ इन्द्रो॑ वृ॒त्रस्य॒ तवि॑षीं॒ निर॑ह॒न्त्सह॑सा॒ सह॑: । म॒हत् तद॑स्य॒ पौंस्यं॑ वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अ॑सृज॒दर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥१०॥ इ॒मे चि॒त् तव॑ म॒न्यवे॒ वेपे॑ते भि॒यसा॑ म॒ही । यदि॑न्द्र वज्रि॒न्नोज॑सा वृ॒त्रं म॒रुत्वाँ॒ अव॑धी॒रर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥११॥ न वेप॑सा॒ न त॑न्य॒तेन्द्रं॑ वृ॒त्रो वि बी॑भयत् । अ॒भ्ये॑नं॒ वज्र॑ आय॒सः स॒हस्र॑भृष्टिराय॒तार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥१२॥ यद् वृ॒त्रं तव॑ चा॒शनिं॒ वज्रे॑ण स॒मयो॑धयः । अहि॑मिन्द्र॒ जिघां॑सतो दि॒वि ते॑ बद्बधे॒ शवो ऽर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥१३॥ अ॒भि॒ष्ट॒ने ते॑ अद्रिवो॒ यत् स्था जग॑च्च रेजते । त्वष्टा॑ चि॒त् तव॑ म॒न्यव॒ इन्द्र॑ वेवि॒ज्यते॑ भि॒यार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥१४॥ न॒हि नु याद॑धी॒मसीन्द्रं॒ को वी॒र्या॑ प॒रः । तस्मि॑न्नृ॒म्णमु॒त क्रतुं॑ दे॒वा ओजां॑सि॒ सं द॑धु॒रर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥१५॥ यामथ॑र्वा॒ मनु॑ष्पि॒ता द॒ध्यङ् धिय॒मत्न॑त । तस्मि॒न् ब्रह्मा॑णि पू॒र्वथेन्द्र॑ उ॒क्था सम॑ग्म॒तार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥१६॥
हे अतिशय शक्तिशाली एवं वखधारी इंद्र! जब तुमने प्रसन्नतादायक सोमरस पी लिया तो स्तोता ने तुम्हारी वृद्धि करने वाली स्तुतियां कीं इसीलिए तुमने अपनी शक्ति से धरती पर खड़े होकर अहि नामक राक्षस को पीटते हुए अपना अधिकार प्रकट किया था
९ गोतमो राहूगणः। इन्द्रः। पंक्तिः। इन्द्रो॒ मदा॑य वावृधे॒ शव॑से वृत्र॒हा नृभि॑: । तमिन्म॒हत्स्वा॒जिषू॒तेमर्भे॑ हवामहे॒ स वाजे॑षु॒ प्र नो॑ऽविषत् ॥१॥ असि॒ हि वी॑र॒ सेन्यो ऽसि॒ भूरि॑ पराद॒दिः । असि॑ द॒भ्रस्य॑ चिद् वृ॒धो यज॑मानाय शिक्षसि सुन्व॒ते भूरि॑ ते॒ वसु॑ ॥२॥ यदु॒दीर॑त आ॒जयो॑ धृ॒ष्णवे॑ धीयते॒ धना॑ । यु॒क्ष्वा म॑द॒च्युता॒ हरी॒ कं हन॒: कं वसौ॑ दधो॒ ऽस्माँ इ॑न्द्र॒ वसौ॑ दधः ॥३॥ क्रत्वा॑ म॒हाँ अ॑नुष्व॒धं भी॒म आ वा॑वृधे॒ शव॑: । श्रि॒य ऋ॒ष्व उ॑पा॒कयो॒र्नि शि॒प्री हरि॑वान् दधे॒ हस्त॑यो॒र्वज्र॑माय॒सम् ॥४॥ आ प॑प्रौ॒ पार्थि॑वं॒ रजो॑ बद्ब॒धे रो॑च॒ना दि॒वि । न त्वावाँ॑ इन्द्र॒ कश्च॒न न जा॒तो न ज॑निष्य॒ते ऽति॒ विश्वं॑ ववक्षिथ ॥५॥ यो अ॒र्यो म॑र्त॒भोज॑नं परा॒ददा॑ति दा॒शुषे॑ । इन्द्रो॑ अ॒स्मभ्यं॑ शिक्षतु॒ वि भ॑जा॒ भूरि॑ ते॒ वसु॑ भक्षी॒य तव॒ राध॑सः ॥६॥ मदे॑मदे॒ हि नो॑ द॒दिर्यू॒था गवा॑मृजु॒क्रतु॑: । सं गृ॑भाय पु॒रू श॒तोभ॑याह॒स्त्या वसु॑ शिशी॒हि रा॒य आ भ॑र ॥७॥ मा॒दय॑स्व सु॒ते सचा॒ शव॑से शूर॒ राध॑से । वि॒द्मा हि त्वा॑ पुरू॒वसु॒मुप॒ कामा॑न्त्ससृ॒ज्महे ऽथा॑ नोऽवि॒ता भ॑व ॥८॥ ए॒ते त॑ इन्द्र ज॒न्तवो॒ विश्वं॑ पुष्यन्ति॒ वार्य॑म् । अ॒न्तर्हि ख्यो जना॑नाम॒र्यो वेदो॒ अदा॑शुषां॒ तेषां॑ नो॒ वेद॒ आ भ॑र ॥९॥
वृत्रहंता इंद्र ऋत्विजों की स्तुति द्वारा बल और हर्ष पाने के लिए बढ़ें. हम उन्हें बड़े और छोटे युद्धों में बुलाते हैं. वे युद्ध में हमारी रक्षा करें
६ गोतमो राहूगणः। इन्द्रः। पंक्तिः, ६ जगती। उपो॒ षु शृ॑णु॒ही गिरो॒ मघ॑व॒न् मात॑था इव । य॒दा न॑: सू॒नृता॑वत॒: कर॒ आद॒र्थया॑स॒ इद् योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑ ॥१॥ अक्ष॒न्नमी॑मदन्त॒ ह्यव॑ प्रि॒या अ॑धूषत । अस्तो॑षत॒ स्वभा॑नवो॒ विप्रा॒ नवि॑ष्ठया म॒ती योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑ ॥२॥ सु॒सं॒दृशं॑ त्वा व॒यं मघ॑वन् वन्दिषी॒महि॑ । प्र नू॒नं पू॒र्णव॑न्धुरः स्तु॒तो या॑हि॒ वशाँ॒ अनु॒ योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑ ॥३॥ स घा॒ तं वृष॑णं॒ रथ॒मधि॑ तिष्ठाति गो॒विद॑म् । यः पात्रं॑ हारियोज॒नं पू॒र्णमि॑न्द्र॒ चिके॑तति॒ योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑ ॥४॥ यु॒क्तस्ते॑ अस्तु॒ दक्षि॑ण उ॒त स॒व्यः श॑तक्रतो । तेन॑ जा॒यामुप॑ प्रि॒यां म॑न्दा॒नो या॒ह्यन्ध॑सो॒ योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑ ॥५॥ यु॒नज्मि॑ ते॒ ब्रह्म॑णा के॒शिना॒ हरी॒ उप॒ प्र या॑हि दधि॒षे गभ॑स्त्योः । उत् त्वा॑ सु॒तासो॑ रभ॒सा अ॑मन्दिषुः पूष॒ण्वान् व॑ज्रि॒न्त्समु॒ पत्न्या॑मदः ॥६॥
हे धनपति इंद्र! हमारे समीप आकर ही हमारी स्तुतियां सुनो. तुम पहले से भिन्न मत हो जाना. तुम जब हमें सत्य, प्रिया एवं स्तुतिरूपी वाणी से युक्त करते हो तभी हम तुम्हारी प्रार्थना करते हैं. इस कारण अपने हरि नामक दोनों घोड़ों को रथ में जोड़ो
६ गोतमो राहूगणः। इन्द्रः। जगती। अश्वा॑वति प्रथ॒मो गोषु॑ गच्छति सुप्रा॒वीरि॑न्द्र॒ मर्त्य॒स्तवो॒तिभि॑: । तमित् पृ॑णक्षि॒ वसु॑ना॒ भवी॑यसा॒ सिन्धु॒मापो॒ यथा॒भितो॒ विचे॑तसः ॥१॥ आपो॒ न दे॒वीरुप॑ यन्ति हो॒त्रिय॑म॒वः प॑श्यन्ति॒ वित॑तं॒ यथा॒ रज॑: । प्रा॒चैर्दे॒वास॒: प्र ण॑यन्ति देव॒युं ब्र॑ह्म॒प्रियं॑ जोषयन्ते व॒रा इ॑व ॥२॥ अधि॒ द्वयो॑रदधा उ॒क्थ्यं १ वचो॑ य॒तस्रु॑चा मिथु॒ना या स॑प॒र्यत॑: । असं॑यत्तो व्र॒ते ते॑ क्षेति॒ पुष्य॑ति भ॒द्रा श॒क्तिर्यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥३॥ आदङ्गि॑राः प्रथ॒मं द॑धिरे॒ वय॑ इ॒द्धाग्न॑य॒: शम्या॒ ये सु॑कृ॒त्यया॑ । सर्वं॑ प॒णेः सम॑विन्दन्त॒ भोज॑न॒मश्वा॑वन्तं॒ गोम॑न्त॒मा प॒शुं नर॑: ॥४॥ य॒ज्ञैरथ॑र्वा प्रथ॒मः प॒थस्त॑ते॒ तत॒: सूर्यो॑ व्रत॒पा वे॒न आज॑नि । आ गा आ॑जदु॒शना॑ का॒व्यः सचा॑ य॒मस्य॑ जा॒तम॒मृतं॑ यजामहे ॥५॥ ब॒र्हिर्वा॒ यत् स्व॑प॒त्याय॑ वृ॒ज्यते॒ ऽर्को वा॒ श्लोक॑मा॒घोष॑ते दि॒वि । ग्रावा॒ यत्र॒ वद॑ति का॒रुरु॒क्थ्य १ स्तस्येदिन्द्रो॑ अभिपि॒त्वेषु॑ रण्यति ॥६॥
हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा रक्षित मनुष्य बहुत से घोड़ों वाले घर में रहता हुआ सबसे पहले गाएं प्राप्त करता है. जिस प्रकार विचरणशील सरिताएं सभी दिशाओं में समुद्र को भरती हैं, उसी प्रकार तुम भी अपने द्वारा रक्षित मनुष्य को विविध प्रकार के धन से युक्त करते हो
२० गोतमो राहूगणः। इन्द्रः। १-६ अनुष्टप्, ७-९ उष्णिक्, १०-१२ पंक्तिः, १३-१५गायत्री, १६-१८ त्रिष्टुप्(प्रगा थः-) १९ बृहती, २० सतोबृहती। असा॑वि॒ सोम॑ इन्द्र ते॒ शवि॑ष्ठ धृष्ण॒वा ग॑हि । आ त्वा॑ पृणक्त्विन्द्रि॒यं रज॒: सूर्यो॒ न र॒श्मिभि॑: ॥१॥ इन्द्र॒मिद्धरी॑ वह॒तो ऽप्र॑तिधृष्टशवसम् । ऋषी॑णां च स्तु॒तीरुप॑ य॒ज्ञं च॒ मानु॑षाणाम् ॥२॥ आ ति॑ष्ठ वृत्रह॒न् रथं॑ यु॒क्ता ते॒ ब्रह्म॑णा॒ हरी॑ । अ॒र्वा॒चीनं॒ सु ते॒ मनो॒ ग्रावा॑ कृणोतु व॒ग्नुना॑ ॥३॥ इ॒ममि॑न्द्र सु॒तं पि॑ब॒ ज्येष्ठ॒मम॑र्त्यं॒ मद॑म् । शु॒क्रस्य॑ त्वा॒भ्य॑क्षर॒न् धारा॑ ऋ॒तस्य॒ साद॑ने ॥४॥ इन्द्रा॑य नू॒नम॑र्चतो॒क्थानि॑ च ब्रवीतन । सु॒ता अ॑मत्सु॒रिन्द॑वो॒ ज्येष्ठं॑ नमस्यता॒ सह॑: ॥५॥ नकि॒ष्ट्वद् र॒थीत॑रो॒ हरी॒ यदि॑न्द्र॒ यच्छ॑से । नकि॒ष्ट्वानु॑ म॒ज्मना॒ नकि॒: स्वश्व॑ आनशे ॥६॥ य एक॒ इद् वि॒दय॑ते॒ वसु॒ मर्ता॑य दा॒शुषे॑ । ईशा॑नो॒ अप्र॑तिष्कुत॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग ॥७॥ क॒दा मर्त॑मरा॒धसं॑ प॒दा क्षुम्प॑मिव स्फुरत् । क॒दा न॑: शुश्रव॒द् गिर॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग ॥८॥ यश्चि॒द्धि त्वा॑ ब॒हुभ्य॒ आ सु॒तावाँ॑ आ॒विवा॑सति । उ॒ग्रं तत् प॑त्यते॒ शव॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग ॥९॥ स्वा॒दोरि॒त्था वि॑षू॒वतो॒ मध्व॑: पिबन्ति गौ॒र्य॑: । या इन्द्रे॑ण स॒याव॑री॒र्वृष्णा॒ मद॑न्ति शो॒भसे॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥१०॥ ता अ॑स्य पृशना॒युव॒: सोमं॑ श्रीणन्ति॒ पृश्न॑यः । प्रि॒या इन्द्र॑स्य धे॒नवो॒ वज्रं॑ हिन्वन्ति॒ साय॑कं॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥११॥ ता अ॑स्य॒ नम॑सा॒ सह॑: सप॒र्यन्ति॒ प्रचे॑तसः । व्र॒तान्य॑स्य सश्चिरे पु॒रूणि॑ पू॒र्वचि॑त्तये॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥१२॥ इन्द्रो॑ दधी॒चो अ॒स्थभि॑र्वृ॒त्राण्यप्र॑तिष्कुतः । ज॒घान॑ नव॒तीर्नव॑ ॥१३॥ इ॒च्छन्नश्व॑स्य॒ यच्छिर॒: पर्व॑ते॒ष्वप॑श्रितम् । तद् वि॑दच्छर्य॒णाव॑ति ॥१४॥ अत्राह॒ गोर॑मन्वत॒ नाम॒ त्वष्टु॑रपी॒च्य॑म् । इ॒त्था च॒न्द्रम॑सो गृ॒हे ॥१५॥ को अ॒द्य यु॑ङ्क्ते धु॒रि गा ऋ॒तस्य॒ शिमी॑वतो भा॒मिनो॑ दुर्हृणा॒यून् । आ॒सन्नि॑षून् हृ॒त्स्वसो॑ मयो॒भून् य ए॑षां भृ॒त्यामृ॒णध॒त् स जी॑वात् ॥१६॥ क ई॑षते तु॒ज्यते॒ को बि॑भाय॒ को मं॑सते॒ सन्त॒मिन्द्रं॒ को अन्ति॑ । कस्तो॒काय॒ क इभा॑यो॒त रा॒ये ऽधि॑ ब्रवत् त॒न्वे॒ ३ को जना॑य ॥१७॥ को अ॒ग्निमी॑ट्टे ह॒विषा॑ घृ॒तेन॑ स्रु॒चा य॑जाता ऋ॒तुभि॑र्ध्रु॒वेभि॑: । कस्मै॑ दे॒वा आ व॑हाना॒शु होम॒ को मं॑सते वी॒तिहो॑त्रः सुदे॒वः ॥१८॥ त्वम॒ङ्ग प्र शं॑सिषो दे॒वः श॑विष्ठ॒ मर्त्य॑म् । न त्वद॒न्यो म॑घवन्नस्ति मर्डि॒तेन्द्र॒ ब्रवी॑मि ते॒ वच॑: ॥१९॥ मा ते॒ राधां॑सि॒ मा त॑ ऊ॒तयो॑ वसो॒ ऽस्मान् कदा॑ च॒ना द॑भन् । विश्वा॑ च न उपमिमी॒हि मा॑नुष॒ वसू॑नि चर्ष॒णिभ्य॒ आ ॥२०॥
हे इंद्र! तुम्हारे निमित्त सोम निचोड़ लिया गया है, अतएव हे बलशाली एवं शत्रुघर्षक! यज्ञस्थल में आओ. जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों द्वारा आकाश को भर देते हैं, उसी प्रकार सोमपान से उत्पन्न शक्ति तुम्हें पूर्ण करे
१२ गोतमो राहूगणः। मरुतः। जगती, ५, १२ त्रिष्टुप्। प्र ये शुम्भ॑न्ते॒ जन॑यो॒ न सप्त॑यो॒ याम॑न् रु॒द्रस्य॑ सू॒नव॑: सु॒दंस॑सः । रोद॑सी॒ हि म॒रुत॑श्चक्रि॒रे वृ॒धे मद॑न्ति वी॒रा वि॒दथे॑षु॒ घृष्व॑यः ॥१॥ त उ॑क्षि॒तासो॑ महि॒मान॑माशत दि॒वि रु॒द्रासो॒ अधि॑ चक्रिरे॒ सद॑: । अर्च॑न्तो अ॒र्कं ज॒नय॑न्त इन्द्रि॒यमधि॒ श्रियो॑ दधिरे॒ पृश्नि॑मातरः ॥२॥ गोमा॑तरो॒ यच्छु॒भय॑न्ते अ॒ञ्जिभि॑स्त॒नूषु॑ शु॒भ्रा द॑धिरे वि॒रुक्म॑तः । बाध॑न्ते॒ विश्व॑मभिमा॒तिन॒मप॒ वर्त्मा॑न्येषा॒मनु॑ रीयते घृ॒तम् ॥३॥ वि ये भ्राज॑न्ते॒ सुम॑खास ऋ॒ष्टिभि॑: प्रच्या॒वय॑न्तो॒ अच्यु॑ता चि॒दोज॑सा । म॒नो॒जुवो॒ यन्म॑रुतो॒ रथे॒ष्वा वृष॑व्रातास॒: पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वम् ॥४॥ प्र यद् रथे॑षु॒ पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वं॒ वाजे॒ अद्रिं॑ मरुतो रं॒हय॑न्तः । उ॒तारु॒षस्य॒ वि ष्य॑न्ति॒ धारा॒श्चर्मे॑वो॒दभि॒र्व्यु॑न्दन्ति॒ भूम॑ ॥५॥ आ वो॑ वहन्तु॒ सप्त॑यो रघु॒ष्यदो॑ रघु॒पत्वा॑न॒: प्र जि॑गात बा॒हुभि॑: । सीद॒ता ब॒र्हिरु॒रु व॒: सद॑स्कृ॒तं मा॒दय॑ध्वं मरुतो॒ मध्वो॒ अन्ध॑सः ॥६॥ ते॑ऽवर्धन्त॒ स्वत॑वसो महित्व॒ना नाकं॑ त॒स्थुरु॒रु च॑क्रिरे॒ सद॑: । विष्णु॒र्यद्धाव॒द्वृष॑णं मद॒च्युतं॒ वयो॒ न सी॑द॒न्नधि॑ ब॒र्हिषि॑ प्रि॒ये ॥७॥ शूरा॑ इ॒वेद्यु युयु॑धयो॒ न जग्म॑यः श्रव॒स्यवो॒ न पृत॑नासु येतिरे । भय॑न्ते॒ विश्वा॒ भुव॑ना म॒रुद्भ्यो॒ राजा॑न इव त्वे॒षसं॑दृशो॒ नर॑: ॥८॥ त्वष्टा॒ यद् वज्रं॒ सुकृ॑तं हिर॒ण्ययं॑ स॒हस्र॑भृष्टिं॒ स्वपा॒ अव॑र्तयत् । ध॒त्त इन्द्रो॒ नर्यपां॑सि॒ कर्त॒वे ऽह॑न् वृ॒त्रं निर॒पामौ॑ब्जदर्ण॒वम् ॥९॥ ऊ॒र्ध्वं नु॑नुद्रेऽव॒तं त ओज॑सा दादृहा॒णं चि॑द् बिभिदु॒र्वि पर्व॑तम् । धम॑न्तो वा॒णं म॒रुत॑: सु॒दान॑वो॒ मदे॒ सोम॑स्य॒ रण्या॑नि चक्रिरे ॥१०॥ जि॒ह्मं नु॑नुद्रेऽव॒तं तया॑ दि॒शासि॑ञ्च॒न्नुत्सं॒ गोत॑माय तृ॒ष्णजे॑ । आ ग॑च्छन्ती॒मव॑सा चि॒त्रभा॑नव॒: कामं॒ विप्र॑स्य तर्पयन्त॒ धाम॑भिः ॥११॥ या व॒: शर्म॑ शशमा॒नाय॒ सन्ति॑ त्रि॒धातू॑नि दा॒शुषे॑ यच्छ॒ताधि॑ । अ॒स्मभ्यं॒ तानि॑ मरुतो॒ वि य॑न्त र॒यिं नो॑ धत्त वृषणः सु॒वीर॑म् ॥१२॥
गमन के निमित्त अपने शरीर को नारियों के समान अलंकृत करने वाले, गमनशील, रुद्र के पुत्र, धरती और आकाश की वृद्धि करने के कारण शोभन कर्मा, शत्रुओं को भगाने वाले एवं वृक्षादि के भंजनकर्त्ता मरुद्ग ण यज्ञ में सोमपान के कारण प्रसन्न होते हैं
१० गोतमो राहूगणः। मरुतः। गायत्री। मरु॑तो॒ यस्य॒ हि क्षये॑ पा॒था दि॒वो वि॑महसः । स सु॑गो॒पात॑मो॒ जन॑: ॥१॥ य॒ज्ञैर्वा॑ यज्ञवाहसो॒ विप्र॑स्य वा मती॒नाम् । मरु॑तः शृणु॒ता हव॑म् ॥२॥ उ॒त वा॒ यस्य॑ वा॒जिनो ऽनु॒ विप्र॒मत॑क्षत । स गन्ता॒ गोम॑ति व्र॒जे ॥३॥ अ॒स्य वी॒रस्य॑ ब॒र्हिषि॑ सु॒तः सोमो॒ दिवि॑ष्टिषु । उ॒क्थं मद॑श्च शस्यते ॥४॥ अ॒स्य श्रो॑ष॒न्त्वा भुवो॒ विश्वा॒ यश्च॑र्ष॒णीर॒भि । सूरं॑ चित् स॒स्रुषी॒रिष॑: ॥५॥ पू॒र्वीभि॒र्हि द॑दाशि॒म श॒रद्भि॑र्मरुतो व॒यम् । अवो॑भिश्चर्षणी॒नाम् ॥६॥ सु॒भग॒: स प्र॑यज्यवो॒ मरु॑तो अस्तु॒ मर्त्य॑: । यस्य॒ प्रयां॑सि॒ पर्ष॑थ ॥७॥ श॒श॒मा॒नस्य॑ वा नर॒: स्वेद॑स्य सत्यशवसः । वि॒दा काम॑स्य॒ वेन॑तः ॥८॥ यू॒यं तत् स॑त्यशवस आ॒विष्क॑र्त महित्व॒ना । विध्य॑ता वि॒द्युता॒ रक्ष॑: ॥९॥ गूह॑ता॒ गुह्यं॒ तमो॒ वि या॑त॒ विश्व॑म॒त्रिण॑म् । ज्योति॑ष्कर्ता॒ यदु॒श्मसि॑ ॥१०॥
हे विशिष्ट प्रकाश वाले मरुतो! तुम अंतरिक्ष से आकर जिस यजमान के यज्ञगृह में सोमपान करते हो, वह शोभन रक्षकों वाला हो जाता है
६ गोतमो राहूगणः। मरुतः। जगती। प्रत्व॑क्षस॒: प्रत॑वसो विर॒प्शिनो ऽना॑नता॒ अवि॑थुरा ऋजी॒षिण॑: । जुष्ट॑तमासो॒ नृत॑मासो अ॒ञ्जिभि॒र्व्या॑नज्रे॒ के चि॑दु॒स्रा इ॑व॒ स्तृभि॑: ॥१॥ उ॒प॒ह्व॒रेषु॒ यदचि॑ध्वं य॒यिं वय॑ इव मरुत॒: केन॑ चित् प॒था । श्चोत॑न्ति॒ कोशा॒ उप॑ वो॒ रथे॒ष्वा घृ॒तमु॑क्षता॒ मधु॑वर्ण॒मर्च॑ते ॥२॥ प्रैषा॒मज्मे॑षु विथु॒रेव॑ रेजते॒ भूमि॒र्यामे॑षु॒ यद्ध॑ यु॒ञ्जते॑ शु॒भे । ते क्री॒ळयो॒ धुन॑यो॒ भ्राज॑दृष्टयः स्व॒यं म॑हि॒त्वं प॑नयन्त॒ धूत॑यः ॥३॥ स हि स्व॒सृत् पृष॑दश्वो॒ युवा॑ ग॒णो॒ ३ ऽया ई॑शा॒नस्तवि॑षीभि॒रावृ॑तः । असि॑ स॒त्य ऋ॑ण॒यावाने॑द्यो॒ ऽस्या धि॒यः प्रा॑वि॒ताथा॒ वृषा॑ ग॒णः ॥४॥ पि॒तुः प्र॒त्नस्य॒ जन्म॑ना वदामसि॒ सोम॑स्य जि॒ह्वा प्र जि॑गाति॒ चक्ष॑सा । यदी॒मिन्द्रं॒ शम्यृक्वा॑ण॒ आश॒तादिन्नामा॑नि य॒ज्ञिया॑नि दधिरे ॥५॥ श्रि॒यसे॒ कं भा॒नुभि॒: सं मि॑मिक्षिरे॒ ते र॒श्मिभि॒स्त ऋक्व॑भिः सुखा॒दय॑: । ते वाशी॑मन्त इ॒ष्मिणो॒ अभी॑रवो वि॒द्रे प्रि॒यस्य॒ मारु॑तस्य॒ धाम्न॑: ॥६॥
शत्रुनाश में अति कुशल, प्रकृष्ट बलयुक्त, विविध जयघोषों से युक्त सर्वोत्कृष्ट, संघीभूत, यज्ञकर्त्ताओं द्वारा अतिशय सेवित, अवशिष्ट सोमरस का सेवन करने वाले, मेघ आदि के नेता मरुद्गण अपने शरीर पर धारण किए आशभूषणों से आकाश में सूर्यकिरणों के समान चमकते हैं
६ गोतमो राहूगणः। मरुतः। त्रिष्टुप्, १, ६ प्रस्तारपंक्तिः, ५ विराड् रुपा। आ वि॒द्युन्म॑द्भिर्मरुतः स्व॒र्कै रथे॑भिर्यात ऋष्टि॒मद्भि॒रश्व॑पर्णैः । आ वर्षि॑ष्ठया न इ॒षा वयो॒ न प॑प्तता सुमायाः ॥१॥ ते॑ऽरु॒णेभि॒र्वर॒मा पि॒शङ्गै॑: शु॒भे कं या॑न्ति रथ॒तूर्भि॒रश्वै॑: । रु॒क्मो न चि॒त्रः स्वधि॑तीवान् प॒व्या रथ॑स्य जङ्घनन्त॒ भूम॑ ॥२॥ श्रि॒ये कं वो॒ अधि॑ त॒नूषु॒ वाशी॑र्मे॒धा वना॒ न कृ॑णवन्त ऊ॒र्ध्वा । यु॒ष्मभ्यं॒ कं म॑रुतः सुजातास्तुविद्यु॒म्नासो॑ धनयन्ते॒ अद्रि॑म् ॥३॥ अहा॑नि॒ गृध्रा॒: पर्या व॒ आगु॑रि॒मां धियं॑ वार्का॒र्यां च॑ दे॒वीम् । ब्रह्म॑ कृ॒ण्वन्तो॒ गोत॑मासो अ॒र्कैरू॒र्ध्वं नु॑नुद्र उत्स॒धिं पिब॑ध्यै ॥४॥ ए॒तत् त्यन्न योज॑नमचेति स॒स्वर्ह॒ यन्म॑रुतो॒ गोत॑मो वः । पश्य॒न् हिर॑ण्यचक्रा॒नयो॑दंष्ट्रान् वि॒धाव॑तो व॒राहू॑न् ॥५॥ ए॒षा स्या वो॑ मरुतोऽनुभ॒र्त्री प्रति॑ ष्टोभति वा॒घतो॒ न वाणी॑ । अस्तो॑भय॒द् वृथा॑सा॒मनु॑ स्व॒धां गभ॑स्त्योः ॥६॥
हे मरुद्गणो! तुम अपने दीप्तिशाली, शोभन गति वाले, शस्त्रसंपन्न एवं घोड़ों वाले रथ पर चढ़कर हमारे यज्ञ में आओ. हे शोभनकर्मा मरुतो! हमें देने के लिए अन्न लेकर सुंदर पक्षी के समान आओ
१० गोतमो राहूगणः। विश्वेदेवाः, (१-२, ८-९ देवाः, १० अदितिः)। जगती, ६ विराट्-स्थाना, ८-१० त्रिष्टुप्। आ नो॑ भ॒द्राः क्रत॑वो यन्तु वि॒श्वतो ऽद॑ब्धासो॒ अप॑रीतास उ॒द्भिद॑: । दे॒वा नो॒ यथा॒ सद॒मिद् वृ॒धे अस॒न्नप्रा॑युवो रक्षि॒तारो॑ दि॒वेदि॑वे ॥१॥ दे॒वानां॑ भ॒द्रा सु॑म॒तिर्ऋ॑जूय॒तां दे॒वानां॑ रा॒तिर॒भि नो॒ नि व॑र्तताम् । दे॒वानां॑ स॒ख्यमुप॑ सेदिमा व॒यं दे॒वा न॒ आयु॒: प्र ति॑रन्तु जी॒वसे॑ ॥२॥ तान् पूर्व॑या नि॒विदा॑ हूमहे व॒यं भगं॑ मि॒त्रमदि॑तिं॒ दक्ष॑म॒स्रिध॑म् । अ॒र्य॒मणं॒ वरु॑णं॒ सोम॑म॒श्विना॒ सर॑स्वती नः सु॒भगा॒ मय॑स्करत् ॥३॥ तन्नो॒ वातो॑ मयो॒भु वा॑तु भेष॒जं तन्मा॒ता पृ॑थि॒वी तत् पि॒ता द्यौः । तद् ग्रावा॑णः सोम॒सुतो॑ मयो॒भुव॒स्तद॑श्विना शृणुतं धिष्ण्या यु॒वम् ॥४॥ तमीशा॑नं॒ जग॑तस्त॒स्थुष॒स्पतिं॑ धियंजि॒न्वमव॑से हूमहे व॒यम् । पू॒षा नो॒ यथा॒ वेद॑सा॒मस॑द् वृ॒धे र॑क्षि॒ता पा॒युरद॑ब्धः स्व॒स्तये॑ ॥५॥ स्व॒स्ति न॒ इन्द्रो॑ वृ॒द्धश्र॑वाः स्व॒स्ति न॑: पू॒षा वि॒श्ववे॑दाः । स्व॒स्ति न॒स्तार्क्ष्यो॒ अरि॑ष्टनेमिः स्व॒स्ति नो॒ बृह॒स्पति॑र्दधातु ॥६॥ पृष॑दश्वा म॒रुत॒: पृश्नि॑मातरः शुभं॒यावा॑नो वि॒दथे॑षु॒ जग्म॑यः । अ॒ग्नि॒जि॒ह्वा मन॑व॒: सूर॑चक्षसो॒ विश्वे॑ नो दे॒वा अव॒सा ग॑मन्नि॒ह ॥७॥ भ॒द्रं कर्णे॑भिः शृणुयाम देवा भ॒द्रं प॑श्येमा॒क्षभि॑र्यजत्राः । स्थि॒रैरङ्गै॑स्तुष्टु॒वांस॑स्त॒नूभि॒र्व्य॑शेम दे॒वहि॑तं॒ यदायु॑: ॥८॥ श॒तमिन्नु श॒रदो॒ अन्ति॑ देवा॒ यत्रा॑ नश्च॒क्रा ज॒रसं॑ त॒नूना॑म् । पु॒त्रासो॒ यत्र॑ पि॒तरो॒ भव॑न्ति॒ मा नो॑ म॒ध्या री॑रिष॒तायु॒र्गन्तो॑: ॥९॥ अदि॑ति॒र्द्यौरदि॑तिर॒न्तरि॑क्ष॒मदि॑तिर्मा॒ता स पि॒ता स पु॒त्रः । विश्वे॑ दे॒वा अदि॑ति॒: पञ्च॒ जना॒ अदि॑तिर्जा॒तमदि॑ति॒र्जनि॑त्वम् ॥१०॥
समस्त कल्याणकारक, असुरों द्वारा अहिंसित एवं शत्रुनाश में समर्थ यज्ञ सब ओर से हमें प्राप्त हों. अपने रक्षण कार्य का त्याग न करने वाले एवं प्रतिदिन हमारी रक्षा करने वाले देवगण हमें सदा बढ़ावें अपने यजमानों से प्रेम करने वाले देवों का कल्याणकारक अनुग्रह एवं दान हमें प्राप्त न्भ्् ः््् ् न्भ्् ल् न्भ्् सोम, अश्विनीकुमार आदि देवों को बुलाते हैं. शोभन धन से युक्त सरस्वती हमें सुखी करें
९ गोतमो राहूगणः। विश्वेदेवाः,। गायत्री, ९ अनुष्टुप्। ऋ॒जु॒नी॒ती नो॒ वरु॑णो मि॒त्रो न॑यतु वि॒द्वान् । अ॒र्य॒मा दे॒वैः स॒जोषा॑: ॥१॥ ते हि वस्वो॒ वस॑वाना॒स्ते अप्र॑मूरा॒ महो॑भिः । व्र॒ता र॑क्षन्ते वि॒श्वाहा॑ ॥२॥ ते अ॒स्मभ्यं॒ शर्म॑ यंसन्न॒मृता॒ मर्त्ये॑भ्यः । बाध॑माना॒ अप॒ द्विष॑: ॥३॥ वि न॑: प॒थः सु॑वि॒ताय॑ चि॒यन्त्विन्द्रो॑ म॒रुत॑: । पू॒षा भगो॒ वन्द्या॑सः ॥४॥ उ॒त नो॒ धियो॒ गोअ॑ग्रा॒: पूष॒न् विष्ण॒वेव॑यावः । कर्ता॑ नः स्वस्ति॒मत॑: ॥५॥ मधु॒ वाता॑ ऋताय॒ते मधु॑ क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वः । माध्वी॑र्नः स॒न्त्वोष॑धीः ॥६॥ मधु॒ नक्त॑मु॒तोषसो॒ मधु॑म॒त् पार्थि॑वं॒ रज॑: । मधु॒ द्यौर॑स्तु नः पि॒ता ॥७॥ मधु॑मान्नो॒ वन॒स्पति॒र्मधु॑माँ अस्तु॒ सूर्य॑: । माध्वी॒र्गावो॑ भवन्तु नः ॥८॥ शं नो॑ मि॒त्रः शं वरु॑ण॒: शं नो॑ भवत्वर्य॒मा । शं न॒ इन्द्रो॒ बृह॒स्पति॒: शं नो॒ विष्णु॑रुरुक्र॒मः ॥९॥
उत्तम स्थान को जानने वाले वरुण, मित्र एवं इंद्र आदि देवों के साथ समान प्रेम रखने वाले अर्यमा हमें सरल मार्ग से गंतव्य पर पहुंचावें
२३ गोतमो राहूगणः। सोमः। त्रिष्टुप्, ५-१६ गायत्री, १७ उष्णिक्। त्वं सो॑म॒ प्र चि॑कितो मनी॒षा त्वं रजि॑ष्ठ॒मनु॑ नेषि॒ पन्था॑म् । तव॒ प्रणी॑ती पि॒तरो॑ न इन्दो दे॒वेषु॒ रत्न॑मभजन्त॒ धीरा॑: ॥१॥ त्वं सो॑म॒ क्रतु॑भिः सु॒क्रतु॑र्भू॒स्त्वं दक्षै॑: सु॒दक्षो॑ वि॒श्ववे॑दाः । त्वं वृषा॑ वृष॒त्वेभि॑र्महि॒त्वा द्यु॒म्नेभि॑र्द्यु॒म्न्य॑भवो नृ॒चक्षा॑: ॥२॥ राज्ञो॒ नु ते॒ वरु॑णस्य व्र॒तानि॑ बृ॒हद् ग॑भी॒रं तव॑ सोम॒ धाम॑ । शुचि॒ष्ट्वम॑सि प्रि॒यो न मि॒त्रो द॒क्षाय्यो॑ अर्य॒मेवा॑सि सोम ॥३॥ या ते॒ धामा॑नि दि॒वि या पृ॑थि॒व्यां या पर्व॑ते॒ष्वोष॑धीष्व॒प्सु । तेभि॑र्नो॒ विश्वै॑: सु॒मना॒ अहे॑ळ॒न् राज॑न्त्सोम॒ प्रति॑ ह॒व्या गृ॑भाय ॥४॥ त्वं सो॑मासि॒ सत्प॑ति॒स्त्वं राजो॒त वृ॑त्र॒हा । त्वं भ॒द्रो अ॑सि॒ क्रतु॑: ॥५॥ त्वं च॑ सोम नो॒ वशो॑ जी॒वातुं॒ न म॑रामहे । प्रि॒यस्तो॑त्रो॒ वन॒स्पति॑: ॥६॥ त्वं सो॑म म॒हे भगं॒ त्वं यून॑ ऋताय॒ते । दक्षं॑ दधासि जी॒वसे॑ ॥७॥ त्वं न॑: सोम वि॒श्वतो॒ रक्षा॑ राजन्नघाय॒तः । न रि॑ष्ये॒त् त्वाव॑त॒: सखा॑ ॥८॥ सोम॒ यास्ते॑ मयो॒भुव॑ ऊ॒तय॒: सन्ति॑ दा॒शुषे॑ । ताभि॑र्नोऽवि॒ता भ॑व ॥९॥ इ॒मं य॒ज्ञमि॒दं वचो॑ जुजुषा॒ण उ॒पाग॑हि । सोम॒ त्वं नो॑ वृ॒धे भ॑व ॥१०॥ सोम॑ गी॒र्भिष्ट्वा॑ व॒यं व॒र्धया॑मो वचो॒विद॑: । सु॒मृ॒ळी॒को न॒ आ वि॑श ॥११॥ ग॒य॒स्फानो॑ अमीव॒हा व॑सु॒वित् पु॑ष्टि॒वर्ध॑नः । सु॒मि॒त्रः सो॑म नो भव ॥१२॥ सोम॑ रार॒न्धि नो॑ हृ॒दि गावो॒ न यव॑से॒ष्वा । मर्य॑ इव॒ स्व ओ॒क्ये॑ ॥१३॥ यः सो॑म स॒ख्ये तव॑ रा॒रण॑द् देव॒ मर्त्य॑: । तं दक्ष॑: सचते क॒विः ॥१४॥ उ॒रु॒ष्या णो॑ अ॒भिश॑स्ते॒: सोम॒ नि पा॒ह्यंह॑सः । सखा॑ सु॒शेव॑ एधि नः ॥१५॥ आ प्या॑यस्व॒ समे॑तु ते वि॒श्वत॑: सोम॒ वृष्ण्य॑म् । भवा॒ वाज॑स्य संग॒थे ॥१६॥ आ प्या॑यस्व मदिन्तम॒ सोम॒ विश्वे॑भिरं॒शुभि॑: । भवा॑ नः सु॒श्रव॑स्तम॒: सखा॑ वृ॒धे ॥१७॥ सं ते॒ पयां॑सि॒ समु॑ यन्तु॒ वाजा॒: सं वृष्ण्या॑न्यभिमाति॒षाह॑: । आ॒प्याय॑मानो अ॒मृता॑य सोम दि॒वि श्रवां॑स्युत्त॒मानि॑ धिष्व ॥१८॥ या ते॒ धामा॑नि ह॒विषा॒ यज॑न्ति॒ ता ते॒ विश्वा॑ परि॒भूर॑स्तु य॒ज्ञम् । ग॒य॒स्फान॑: प्र॒तर॑णः सु॒वीरो ऽवी॑रहा॒ प्र च॑रा सोम॒ दुर्या॑न् ॥१९॥ सोमो॑ धे॒नुं सोमो॒ अर्व॑न्तमा॒शुं सोमो॑ वी॒रं क॑र्म॒ण्यं॑ ददाति । सा॒द॒न्यं॑ विद॒थ्यं॑ स॒भेयं॑ पितृ॒श्रव॑णं॒ यो ददा॑शदस्मै ॥२०॥ अषा॑ह्लं यु॒त्सु पृत॑नासु॒ पप्रिं॑ स्व॒र्षाम॒प्सां वृ॒जन॑स्य गो॒पाम् । भ॒रे॒षु॒जां सु॑क्षि॒तिं सु॒श्रव॑सं॒ जय॑न्तं॒ त्वामनु॑ मदेम सोम ॥२१॥ त्वमि॒मा ओष॑धीः सोम॒ विश्वा॒स्त्वम॒पो अ॑जनय॒स्त्वं गाः । त्वमा त॑तन्थो॒र्व १ न्तरि॑क्षं॒ त्वं ज्योति॑षा॒ वि तमो॑ ववर्थ ॥२२॥ दे॒वेन॑ नो॒ मन॑सा देव सोम रा॒यो भा॒गं स॑हसावन्न॒भि यु॑ध्य । मा त्वा त॑न॒दीशि॑षे वी॒र्य॑स्यो॒भये॑भ्य॒: प्र चि॑कित्सा॒ गवि॑ष्टौ ॥२३॥
हे सोम! तुम हमारी बुद्धि द्वारा भली-भांति ज्ञात हो. तुम हमें सरल मार्ग से ले चलो. हे विश्व को अमृतमय करने वाले सोम! तुम्हारे निर्देश के अनुसार चलकर हमारे पितरों ने देवों के मध्य धन प्राप्त किया था
१८ गोतमो राहूगणः। उषाः, १६-१८ अश्विनौ । १-४ जगती, ५-१२ त्रिष्टुप्, १३-१८ उष्णिक्। ए॒ता उ॒ त्या उ॒षस॑: के॒तुम॑क्रत॒ पूर्वे॒ अर्धे॒ रज॑सो भा॒नुम॑ञ्जते । नि॒ष्कृ॒ण्वा॒ना आयु॑धानीव धृ॒ष्णव॒: प्रति॒ गावोऽरु॑षीर्यन्ति मा॒तर॑: ॥१॥ उद॑पप्तन्नरु॒णा भा॒नवो॒ वृथा॑ स्वा॒युजो॒ अरु॑षी॒र्गा अ॑युक्षत । अक्र॑न्नु॒षासो॑ व॒युना॑नि पू॒र्वथा॒ रुश॑न्तं भा॒नुमरु॑षीरशिश्रयुः ॥२॥ अर्च॑न्ति॒ नारी॑र॒पसो॒ न वि॒ष्टिभि॑: समा॒नेन॒ योज॑ने॒ना प॑रा॒वत॑: । इषं॒ वह॑न्तीः सु॒कृते॑ सु॒दान॑वे॒ विश्वेदह॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥३॥ अधि॒ पेशां॑सि वपते नृ॒तूरि॒वापो॑र्णुते॒ वक्ष॑ उ॒स्रेव॒ बर्ज॑हम् । ज्योति॒र्विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय कृण्व॒ती गावो॒ न व्र॒जं व्यु १ षा आ॑व॒र्तम॑: ॥४॥ प्रत्य॒र्ची रुश॑दस्या अदर्शि॒ वि ति॑ष्ठते॒ बाध॑ते कृ॒ष्णमभ्व॑म् । स्वरुं॒ न पेशो॑ वि॒दथे॑ष्व॒ञ्जञ् चि॒त्रं दि॒वो दु॑हि॒ता भा॒नुम॑श्रेत् ॥५॥ अता॑रिष्म॒ तम॑सस्पा॒रम॒स्योषा उ॒च्छन्ती॑ व॒युना॑ कृणोति । श्रि॒ये छन्दो॒ न स्म॑यते विभा॒ती सु॒प्रती॑का सौमन॒साया॑जीगः ॥६॥ भास्व॑ती ने॒त्री सू॒नृता॑नां दि॒वः स्त॑वे दुहि॒ता गोत॑मेभिः । प्र॒जाव॑तो नृ॒वतो॒ अश्व॑बुध्या॒नुषो॒ गोअ॑ग्राँ॒ उप॑ मासि॒ वाजा॑न् ॥७॥ उष॒स्तम॑श्यां य॒शसं॑ सु॒वीरं॑ दा॒सप्र॑वर्गं र॒यिमश्व॑बुध्यम् । सु॒दंस॑सा॒ श्रव॑सा॒ या वि॒भासि॒ वाज॑प्रसूता सुभगे बृ॒हन्त॑म् ॥८॥ विश्वा॑नि दे॒वी भुव॑नाभि॒चक्ष्या॑ प्रती॒ची चक्षु॑रुर्वि॒या वि भा॑ति । विश्वं॑ जी॒वं च॒रसे॑ बो॒धय॑न्ती॒ विश्व॑स्य॒ वाच॑मविदन्मना॒योः ॥९॥ पुन॑:पुन॒र्जाय॑माना पुरा॒णी स॑मा॒नं वर्ण॑म॒भि शुम्भ॑माना । श्व॒घ्नीव॑ कृ॒त्नुर्विज॑ आमिना॒ना मर्त॑स्य दे॒वी ज॒रय॒न्त्यायु॑: ॥१०॥ व्यू॒र्ण्व॒ती दि॒वो अन्ताँ॑ अबो॒ध्यप॒ स्वसा॑रं सनु॒तर्यु॑योति । प्र॒मि॒न॒ती म॑नु॒ष्या॑ यु॒गानि॒ योषा॑ जा॒रस्य॒ चक्ष॑सा॒ वि भा॑ति ॥११॥ प॒शून्न चि॒त्रा सु॒भगा॑ प्रथा॒ना सिन्धु॒र्न क्षोद॑ उर्वि॒या व्य॑श्वैत् । अमि॑नती॒ दैव्या॑नि व्र॒तानि॒ सूर्य॑स्य चेति र॒श्मिभि॑र्दृशा॒ना ॥१२॥ उष॒स्तच्चि॒त्रमा भ॑रा॒स्मभ्यं॑ वाजिनीवति । येन॑ तो॒कं च॒ तन॑यं च॒ धाम॑हे ॥१३॥ उषो॑ अ॒द्येह गो॑म॒त्यश्वा॑वति विभावरि । रे॒वद॒स्मे व्यु॑च्छ सूनृतावति ॥१४॥ यु॒क्ष्वा हि वा॑जिनीव॒त्यश्वाँ॑ अ॒द्यारु॒णाँ उ॑षः । अथा॑ नो॒ विश्वा॒ सौभ॑गा॒न्या व॑ह ॥१५॥ अश्वि॑ना व॒र्तिर॒स्मदा गोम॑द् दस्रा॒ हिर॑ण्यवत् । अ॒र्वाग्रथं॒ सम॑नसा॒ नि य॑च्छतम् ॥१६॥ यावि॒त्था श्लोक॒मा दि॒वो ज्योति॒र्जना॑य च॒क्रथु॑: । आ न॒ ऊर्जं॑ वहतमश्विना यु॒वम् ॥१७॥ एह दे॒वा म॑यो॒भुवा॑ द॒स्रा हिर॑ण्यवर्तनी । उ॒ष॒र्बुधो॑ वहन्तु॒ सोम॑पीतये ॥१८॥
उषाओं ने अंधकार से ढके संसार का ज्ञान कराने वाला प्रकाश किया है. ये आकाश के पूर्व भाग में सूर्य का प्रकाश करती हैं. जैसे आक्रमणशील योद्धा अपने आयुधों का संस्कार करते हैं, उसी प्रकार गतिशील, चमकीली एवं सूर्यप्रकाश का निर्माण करने वाली उषाएं अपने प्रकाश से संसार का सुधार करती हुई प्रतिदिन आती हैं उदपप्तन्नरुणा भानवो वृथा स्वायुजो अरूषीर्गा अयुक्षत. अक्रन्लुघासो वयुनानि पूर्वथा रुशन्तं भानुमरुषीरशिश्रयु:
१२ गोतमो राहूगणः। अग्निषोमौ। १-३ अनुष्टुप्, ४-७, १२ त्रिष्टुप्, ८ जगती त्रिष्टुब्वा, ९-११ गायत्री । अग्नी॑षोमावि॒मं सु मे॑ शृणु॒तं वृ॑षणा॒ हव॑म् । प्रति॑ सू॒क्तानि॑ हर्यतं॒ भव॑तं दा॒शुषे॒ मय॑: ॥१॥ अग्नी॑षोमा॒ यो अ॒द्य वा॑मि॒दं वच॑: सप॒र्यति॑ । तस्मै॑ धत्तं सु॒वीर्यं॒ गवां॒ पोषं॒ स्वश्व्य॑म् ॥२॥ अग्नी॑षोमा॒ य आहु॑तिं॒ यो वां॒ दाशा॑द्ध॒विष्कृ॑तिम् । स प्र॒जया॑ सु॒वीर्यं॒ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नवत् ॥३॥ अग्नी॑षोमा॒ चेति॒ तद् वी॒र्यं॑ वां॒ यदमु॑ष्णीतमव॒सं प॒णिं गाः । अवा॑तिरतं॒ बृस॑यस्य॒ शेषो ऽवि॑न्दतं॒ ज्योति॒रेकं॑ ब॒हुभ्य॑: ॥४॥ यु॒वमे॒तानि॑ दि॒वि रो॑च॒नान्य॒ग्निश्च॑ सोम॒ सक्र॑तू अधत्तम् । यु॒वं सिन्धूँ॑र॒भिश॑स्तेरव॒द्यादग्नी॑षोमा॒वमु॑ञ्चतं गृभी॒तान् ॥५॥ आन्यं दि॒वो मा॑त॒रिश्वा॑ जभा॒राम॑थ्नाद॒न्यं परि॑ श्ये॒नो अद्रे॑: । अग्नी॑षोमा॒ ब्रह्म॑णा वावृधा॒नोरुं य॒ज्ञाय॑ चक्रथुरु लो॒कम् ॥६॥ अग्नी॑षोमा ह॒विष॒: प्रस्थि॑तस्य वी॒तं हर्य॑तं वृषणा जु॒षेथा॑म् । सु॒शर्मा॑णा॒ स्वव॑सा॒ हि भू॒तमथा॑ धत्तं॒ यज॑मानाय॒ शं योः ॥७॥ यो अ॒ग्नीषोमा॑ ह॒विषा॑ सप॒र्याद् दे॑व॒द्रीचा॒ मन॑सा॒ यो घृ॒तेन॑ । तस्य॑ व्र॒तं र॑क्षतं पा॒तमंह॑सो वि॒शे जना॑य॒ महि॒ शर्म॑ यच्छतम् ॥८॥ अग्नी॑षोमा॒ सवे॑दसा॒ सहू॑ती वनतं॒ गिर॑: । सं दे॑व॒त्रा ब॑भूवथुः ॥९॥ अग्नी॑षोमाव॒नेन॑ वां॒ यो वां॑ घृ॒तेन॒ दाश॑ति । तस्मै॑ दीदयतं बृ॒हत् ॥१०॥ अग्नी॑षोमावि॒मानि॑ नो यु॒वं ह॒व्या जु॑जोषतम् । आ या॑त॒मुप॑ न॒: सचा॑ ॥११॥ अग्नी॑षोमा पिपृ॒तमर्व॑तो न॒ आ प्या॑यन्तामु॒स्रिया॑ हव्य॒सूद॑: । अ॒स्मे बला॑नि म॒घव॑त्सु धत्तं कृणु॒तं नो॑ अध्व॒रं श्रु॑ष्टि॒मन्त॑म् ॥१२॥
हे कामवर्षक अग्नि एवं सोम! इस आह्वान को सुनो, हमारी स्तुतियों को स्वीकार करो एवं हव्य देने वाले यजमान को सुख देने वाले बनो
१६ कुत्स आङ्गिरसः। अग्निः(जातवेदाः), ८ (त्रयः पादाः) देवाः, १६ उत्तरार्धस्य अग्निः, मित्रवरुणादितिसिन्धु पृथिवीद्यावो वा। जगती, १५-१६ त्रिष्टुप् । इ॒मं स्तोम॒मर्ह॑ते जा॒तवे॑दसे॒ रथ॑मिव॒ सं म॑हेमा मनी॒षया॑ । भ॒द्रा हि न॒: प्रम॑तिरस्य सं॒सद्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥१॥ यस्मै॒ त्वमा॒यज॑से॒ स सा॑धत्यन॒र्वा क्षे॑ति॒ दध॑ते सु॒वीर्य॑म् । स तू॑ताव॒ नैन॑मश्नोत्यंह॒तिरग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥२॥ श॒केम॑ त्वा स॒मिधं॑ सा॒धया॒ धिय॒स्त्वे दे॒वा ह॒विर॑द॒न्त्याहु॑तम् । त्वमा॑दि॒त्याँ आ व॑ह॒ तान्ह्यु १ श्मस्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥३॥ भरा॑मे॒ध्मं कृ॒णवा॑मा ह॒वींषि॑ ते चि॒तय॑न्त॒: पर्व॑णापर्वणा व॒यम् । जी॒वात॑वे प्रत॒रं सा॑धया॒ धियो ऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥४॥ वि॒शां गो॒पा अ॑स्य चरन्ति ज॒न्तवो॑ द्वि॒पच्च॒ यदु॒त चतु॑ष्पद॒क्तुभि॑: । चि॒त्रः प्र॑के॒त उ॒षसो॑ म॒हाँ अ॒स्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥५॥ त्वम॑ध्व॒र्युरु॒त होता॑सि पू॒र्व्यः प्र॑शा॒स्ता पोता॑ ज॒नुषा॑ पु॒रोहि॑तः । विश्वा॑ वि॒द्वाँ आर्त्वि॑ज्या धीर पुष्य॒स्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥६॥ यो वि॒श्वत॑: सु॒प्रती॑कः स॒दृङ्ङसि॑ दू॒रे चि॒त्सन्त॒ळिदि॒वाति॑ रोचसे । रात्र्या॑श्चि॒दन्धो॒ अति॑ देव पश्य॒स्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥७॥ पूर्वो॑ देवा भवतु सुन्व॒तो रथो॒ ऽस्माकं॒ शंसो॑ अ॒भ्य॑स्तु दू॒ढ्य॑: । तदा जा॑नीतो॒त पु॑ष्यता॒ वचो ऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥८॥ व॒धैर्दु॒:शंसाँ॒ अप॑ दू॒ढ्यो॑ जहि दू॒रे वा॒ ये अन्ति॑ वा॒ के चि॑द॒त्रिण॑: । अथा॑ य॒ज्ञाय॑ गृण॒ते सु॒गं कृ॒ध्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥९॥ यदयु॑क्था अरु॒षा रोहि॑ता॒ रथे॒ वात॑जूता वृष॒भस्ये॑व ते॒ रव॑: । आदि॑न्वसि व॒निनो॑ धू॒मके॑तु॒ना ऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥१०॥ अध॑ स्व॒नादु॒त बि॑भ्युः पत॒त्रिणो॑ द्र॒प्सा यत्ते॑ यव॒सादो॒ व्यस्थि॑रन् । सु॒गं तत्ते॑ ताव॒केभ्यो॒ रथे॒भ्यो ऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥११॥ अ॒यं मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धाय॑से ऽवया॒तां म॒रुतां॒ हेळो॒ अद्भु॑तः । मृ॒ळा सु नो॒ भूत्वे॑षां॒ मन॒: पुन॒रग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥१२॥ दे॒वो दे॒वाना॑मसि मि॒त्रो अद्भु॑तो॒ वसु॒र्वसू॑नामसि॒ चारु॑रध्व॒रे । शर्म॑न्त्स्याम॒ तव॑ स॒प्रथ॑स्त॒मे ऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥१३॥ तत्ते॑ भ॒द्रं यत् समि॑द्ध॒: स्वे दमे॒ सोमा॑हुतो॒ जर॑से मृळ॒यत्त॑मः । दधा॑सि॒ रत्नं॒ द्रवि॑णं च दा॒शुषे ऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥१४॥ यस्मै॒ त्वं सु॑द्रविणो॒ ददा॑शो ऽनागा॒स्त्वम॑दिते स॒र्वता॑ता । यं भ॒द्रेण॒ शव॑सा चो॒दया॑सि प्र॒जाव॑ता॒ राध॑सा॒ ते स्या॑म ॥१५॥ स त्वम॑ग्ने सौभग॒त्वस्य॑ वि॒द्वान॒स्माक॒मायु॒: प्र ति॑रे॒ह दे॑व । तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑ति॒: सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः ॥१६॥
जिस प्रकार बढ़ई रथ का निर्माण करता है, उसी प्रकार हम पूज्य एवं सब प्राणियों को जानने वाले अग्नि के प्रति बुद्धि निर्मित यह स्तुति समर्पित करते हैं. इस अग्नि की सेवा से हमारी बुद्धि कल्याणी बनती है. हे अग्नि! तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेने पर हम हिंसा को प्राप्त न हों
११ कुत्स आङ्गिरसः। अग्निः, औषसोऽग्निर्वा । त्रिष्टुप् द्वे विरू॑पे चरत॒: स्वर्थे॑ अ॒न्यान्या॑ व॒त्समुप॑ धापयेते । हरि॑र॒न्यस्यां॒ भव॑ति स्व॒धावा॑ञ् छु॒क्रो अ॒न्यस्यां॑ ददृशे सु॒वर्चा॑: ॥१॥ दशे॒मं त्वष्टु॑र्जनयन्त॒ गर्भ॒मत॑न्द्रासो युव॒तयो॒ विभृ॑त्रम् । ति॒ग्मानी॑कं॒ स्वय॑शसं॒ जने॑षु वि॒रोच॑मानं॒ परि॑ षीं नयन्ति ॥२॥ त्रीणि॒ जाना॒ परि॑ भूषन्त्यस्य समु॒द्र एकं॑ दि॒व्येक॑म॒प्सु । पूर्वा॒मनु॒ प्र दिशं॒ पार्थि॑वानामृ॒तून् प्र॒शास॒द् वि द॑धावनु॒ष्ठु ॥३॥ क इ॒मं वो॑ नि॒ण्यमा चि॑केत व॒त्सो मा॒तॄर्ज॑नयत स्व॒धाभि॑: । ब॒ह्वी॒नां गर्भो॑ अ॒पसा॑मु॒पस्था॑न्म॒हान् क॒विर्निश्च॑रति स्व॒धावा॑न् ॥४॥ आ॒विष्ट्यो॑ वर्धते॒ चारु॑रासु जि॒ह्माना॑मू॒र्ध्वः स्वय॑शा उ॒पस्थे॑ । उ॒भे त्वष्टु॑र्बिभ्यतु॒र्जाय॑मानात् प्रती॒ची सिं॒हं प्रति॑ जोषयेते ॥५॥ उ॒भे भ॒द्रे जो॑षयेते॒ न मेने॒ गावो॒ न वा॒श्रा उप॑ तस्थु॒रेवै॑: । स दक्षा॑णां॒ दक्ष॑पतिर्बभूवा॒ञ्जन्ति॒ यं द॑क्षिण॒तो ह॒विर्भि॑: ॥६॥ उद् यं॑यमीति सवि॒तेव॑ बा॒हू उ॒भे सिचौ॑ यतते भी॒म ऋ॒ञ्जन् । उच्छु॒क्रमत्क॑मजते सि॒मस्मा॒न्नवा॑ मा॒तृभ्यो॒ वस॑ना जहाति ॥७॥ त्वे॒षं रू॒पं कृ॑णुत॒ उत्त॑रं॒ यत् सं॑पृञ्चा॒नः सद॑ने॒ गोभि॑र॒द्भिः । क॒विर्बु॒ध्नं परि॑ मर्मृज्यते॒ धीः सा दे॒वता॑ता॒ समि॑तिर्बभूव ॥८॥ उ॒रु ते॒ ज्रय॒: पर्ये॑ति बु॒ध्नं वि॒रोच॑मानं महि॒षस्य॒ धाम॑ । विश्वे॑भिरग्ने॒ स्वय॑शोभिरि॒द्धो ऽद॑ब्धेभिः पा॒युभि॑: पाह्य॒स्मान् ॥९॥ धन्व॒न्त्स्रोत॑: कृणुते गा॒तुमू॒र्मिं शु॒क्रैरू॒र्मिभि॑र॒भि न॑क्षति॒ क्षाम् । विश्वा॒ सना॑नि ज॒ठरे॑षु धत्ते॒ ऽन्तर्नवा॑सु चरति प्र॒सूषु॑ ॥१०॥ ए॒वा नो॑ अग्ने स॒मिधा॑ वृधा॒नो रे॒वत् पा॑वक॒ श्रव॑से॒ वि भा॑हि । तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑ति॒: सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः ॥११॥
हे दिवस और रात्रि! तुम सुंदर प्रयोजन वाले एवं परस्पर विरुद्ध रूप से युक्त होकर चलते हो. रात और दिन दोनों, दोनों के पुत्रों-अग्नि और सूर्य की रक्षा करते हैं. रात्रि के पास से सूर्य हवि रूप अन्न प्राप्त करता है एवं दूसरा दिन के पास से शोभन प्रकाश वाला दिखाई देता है
९ कुत्स आङ्गिरसः। अग्निः, द्रविणोदा अग्निर्वा। त्रिष्टुप्। स प्र॒त्नथा॒ सह॑सा॒ जाय॑मानः स॒द्यः काव्या॑नि॒ बळ॑धत्त॒ विश्वा॑ । आप॑श्च मि॒त्रं धि॒षणा॑ च साधन् दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन् द्रविणो॒दाम् ॥१॥ स पूर्व॑या नि॒विदा॑ क॒व्यता॒योरि॒माः प्र॒जा अ॑जनय॒न्मनू॑नाम् । वि॒वस्व॑ता॒ चक्ष॑सा॒ द्याम॒पश्च॑ दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन् द्रविणो॒दाम् ॥२॥ तमी॑ळत प्रथ॒मं य॑ज्ञ॒साधं॒ विश॒ आरी॒राहु॑तमृञ्जसा॒नम् । ऊ॒र्जः पु॒त्रं भ॑र॒तं सृ॒प्रदा॑नुं दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन् द्रविणो॒दाम् ॥३॥ स मा॑त॒रिश्वा॑ पुरु॒वार॑पुष्टिर्वि॒दद् गा॒तुं तन॑याय स्व॒र्वित् । वि॒शां गो॒पा ज॑नि॒ता रोद॑स्योर्दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन् द्रविणो॒दाम् ॥४॥ नक्तो॒षासा॒ वर्ण॑मा॒मेम्या॑ने धा॒पये॑ते॒ शिशु॒मेकं॑ समी॒ची । द्यावा॒क्षामा॑ रु॒क्मो अ॒न्तर्वि भा॑ति दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन् द्रविणो॒दाम् ॥५॥ रा॒यो बु॒ध्नः सं॒गम॑नो॒ वसू॑नां य॒ज्ञस्य॑ के॒तुर्म॑न्म॒साध॑नो॒ वेः । अ॒मृ॒त॒त्वं रक्ष॑माणास एनं दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन् द्रविणो॒दाम् ॥६॥ नू च॑ पु॒रा च॒ सद॑नं रयी॒णां जा॒तस्य॑ च॒ जाय॑मानस्य च॒ क्षाम् । स॒तश्च॑ गो॒पां भव॑तश्च॒ भूरे॑र्दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन् द्रविणो॒दाम् ॥७॥ द्र॒वि॒णो॒दा द्रवि॑णसस्तु॒रस्य॑ द्रविणो॒दाः सन॑रस्य॒ प्र यं॑सत् । द्र॒वि॒णो॒दा वी॒रव॑ती॒मिषं॑ नो द्रविणो॒दा रा॑सते दी॒र्घमायु॑: ॥८॥ ए॒वा नो॑ अग्ने स॒मिधा॑ वृधा॒नो रे॒वत् पा॑वक॒ श्रव॑स॒॒ वि भा॑हि । तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑ति॒: सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः ॥९॥
बलपूर्वक काष्ठ घर्षण से उत्पन्न अग्नि शीघ्र ही चिरंतन के समान क्रांतदर्शियों के समस्त यज्ञकर्मों को धारण करते हैं. उस विद्युत्रूप अग्नि को वायु और जल मित्र बना लेते हैं. ऋत्विजों ने धनदाता अग्नि को धारण किया है अग्नि को धारण किया है
८ कुत्स आङ्गिरसः। अग्निः, शुचिरग्निर्वा। गायत्री। अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घमग्ने॑ शुशु॒ग्ध्या र॒यिम् । अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥१॥ सु॒क्षे॒त्रि॒या सु॑गातु॒या व॑सू॒या च॑ यजामहे । अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥२॥ प्र यद् भन्दि॑ष्ठ एषां॒ प्रास्माका॑सश्च सू॒रय॑: । अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥३॥ प्र यत्ते॑ अग्ने सू॒रयो॒ जाये॑महि॒ प्र ते॑ व॒यम् । अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥४॥ प्र यद॒ग्नेः सह॑स्वतो वि॒श्वतो॒ यन्ति॑ भा॒नव॑: । अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥५॥ त्वं हि वि॑श्वतोमुख वि॒श्वत॑: परि॒भूरसि॑ । अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥६॥ द्विषो॑ नो विश्वतोमु॒खाति॑ ना॒वेव॑ पारय । अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥७॥ स न॒: सिन्धु॑मिव ना॒वयाति॑ पर्षा स्व॒स्तये॑ । अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥८॥
हे अग्नि! हमारा पाप नष्ट हो. तुम हमारे धन को सब ओर से प्रकाशित करो. हमारा पाप नष्ट हो
३ कुत्स आङ्गिरसः। अग्निः, वैश्वानरोऽग्निर्वा । त्रिष्टुप्। वै॒श्वा॒न॒रस्य॑ सुम॒तौ स्या॑म॒ राजा॒ हि कं॒ भुव॑नानामभि॒श्रीः । इ॒तो जा॒तो विश्व॑मि॒दं वि च॑ष्टे वैश्वान॒रो य॑तते॒ सूर्ये॑ण ॥१॥ पृ॒ष्टो दि॒वि पृ॒ष्टो अ॒ग्निः पृ॑थि॒व्यां पृ॒ष्टो विश्वा॒ ओष॑धी॒रा वि॑वेश । वै॒श्वा॒न॒रः सह॑सा पृ॒ष्टो अ॒ग्निः स नो॒ दिवा॒ स रि॒षः पा॑तु॒ नक्त॑म् ॥२॥ वैश्वा॑नर॒ तव॒ तत् स॒त्यम॑स्त्व॒स्मान् रायो॑ म॒घवा॑नः सचन्ताम् । तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑ति॒: सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः ॥३॥
वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवनानामभिश्री:. इतो जातो विश्वमिदं वि चष्टे वैश्वानरो यतते सूर्यण
१ कश्यपो मारीचः। अग्निः, जातवेदा अग्निर्वा। त्रिष्टुप्। जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑मरातीय॒तो नि द॑हाति॒ वेद॑: । स न॑: पर्ष॒दति॑ दु॒र्गाणि॒ विश्वा॑ ना॒वेव॒ सिन्धुं॑ दुरि॒तात्य॒ग्निः ॥१॥
हम सब भूतों को जानने वाले अग्नि के निमित्त सोमरस निचोड़ते हैं. अग्नि हमारे प्रतिशत्रुता का व्यवहार करने वालों का धन नष्ट करें. जिस प्रकार नाव की सहायता से नदी पार- करते हैं, वैसे ही अग्नि हमें दुःखों एवं पापों से पार करावें
१९ वार्षागिराः ऋज्रा श्वाऽम्बरीष-सहदेव-भयमान-सुराधसः। इन्द्रः। त्रिष्टुप्। स यो वृषा॒ वृष्ण्ये॑भि॒: समो॑का म॒हो दि॒वः पृ॑थि॒व्याश्च॑ स॒म्राट् । स॒ती॒नस॑त्वा॒ हव्यो॒ भरे॑षु म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥१॥ यस्याना॑प्त॒: सूर्य॑स्येव॒ यामो॒ भरे॑भरे वृत्र॒हा शुष्मो॒ अस्ति॑ । वृष॑न्तम॒: सखि॑भि॒: स्वेभि॒रेवै॑र्म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥२॥ दि॒वो न यस्य॒ रेत॑सो॒ दुघा॑ना॒: पन्था॑सो॒ यन्ति॒ शव॒साप॑रीताः । त॒रद्द्वे॑षाः सास॒हिः पौंस्ये॑भिर्म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥३॥ सो अङ्गि॑रोभि॒रङ्गि॑रस्तमो भू॒द् वृषा॒ वृष॑भि॒: सखि॑भि॒: सखा॒ सन् । ऋ॒ग्मिभि॑र्ऋग्मी गा॒तुभि॒र्ज्येष्ठो॑ म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥४॥ स सू॒नुभि॒र्न रु॒द्रेभि॒र्ऋभ्वा॑ नृ॒षाह्ये॑ सास॒ह्वाँ अ॒मित्रा॑न् । सनी॑ळेभिः श्रव॒स्या॑नि॒ तूर्व॑न् म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥५॥ स म॑न्यु॒मीः स॒मद॑नस्य क॒र्ता ऽस्माके॑भि॒र्नृभि॒: सूर्यं॑ सनत् । अ॒स्मिन्नह॒न्त्सत्प॑तिः पुरुहू॒तो म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥६॥ तमू॒तयो॑ रणय॒ञ्छूर॑सातौ॒ तं क्षेम॑स्य क्षि॒तय॑: कृण्वत॒ त्राम् । स विश्व॑स्य क॒रुण॑स्येश॒ एको॑ म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥७॥ तम॑प्सन्त॒ शव॑स उत्स॒वेषु॒ नरो॒ नर॒मव॑से॒ तं धना॑य । सो अ॒न्धे चि॒त् तम॑सि॒ ज्योति॑र्विदन् म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥८॥ स स॒व्येन॑ यमति॒ व्राध॑तश्चि॒त् स द॑क्षि॒णे संगृ॑भीता कृ॒तानि॑ । स की॒रिणा॑ चि॒त् सनि॑ता॒ धना॑नि म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥९॥ स ग्रामे॑भि॒: सनि॑ता॒ स रथे॑भिर्वि॒दे विश्वा॑भिः कृ॒ष्टिभि॒र्न्व१द्य । स पौंस्ये॑भिरभि॒भूरश॑स्तीर्म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥१०॥ स जा॒मिभि॒र्यत् स॒मजा॑ति मी॒ह्ले ऽजा॑मिभिर्वा पुरुहू॒त एवै॑: । अ॒पां तो॒कस्य॒ तन॑यस्य जे॒षे म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥ स व॑ज्र॒भृद् द॑स्यु॒हा भी॒म उ॒ग्रः स॒हस्र॑चेताः श॒तनी॑थ॒ ऋभ्वा॑ । च॒म्री॒षो न शव॑सा॒ पाञ्च॑जन्यो म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥१२॥ तस्य॒ वज्र॑: क्रन्दति॒ स्मत् स्व॒र्षा दि॒वो न त्वे॒षो र॒वथ॒: शिमी॑वान् । तं स॑चन्ते स॒नय॒स्तं धना॑नि म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥१३॥ यस्याज॑स्रं॒ शव॑सा॒ मान॑मु॒क्थं प॑रिभु॒जद् रोद॑सी वि॒श्वत॑: सीम् । स पा॑रिष॒त् क्रतु॑भिर्मन्दसा॒नो म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥१४॥ न यस्य॑ दे॒वा दे॒वता॒ न मर्ता॒ आप॑श्च॒न शव॑सो॒ अन्त॑मा॒पुः । स प्र॒रिक्वा॒ त्वक्ष॑सा॒ क्ष्मो दि॒वश्च॑ म॒रुत्वा॑न् नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥१५॥ रो॒हिच्छ्या॒वा सु॒मदं॑शुर्लला॒मीर्द्यु॒क्षा रा॒य ऋ॒ज्राश्व॑स्य । वृष॑ण्वन्तं॒ बिभ्र॑ती धू॒र्षु रथं॑ म॒न्द्रा चि॑केत॒ नाहु॑षीषु वि॒क्षु ॥१६॥ ए॒तत् त्यत् त॑ इन्द्र॒ वृष्ण॑ उ॒क्थं वा॑र्षागि॒रा अ॒भि गृ॑णन्ति॒ राध॑: । ऋ॒ज्राश्व॒: प्रष्टि॑भिरम्ब॒रीष॑: स॒हदे॑वो॒ भय॑मानः सु॒राधा॑: ॥१७॥ दस्यू॒ञ्छिम्यूँ॑श्च पुरुहू॒त एवै॑र्ह॒त्वा पृ॑थि॒व्यां शर्वा॒ नि ब॑र्हीत् । सन॒त् क्षेत्रं॒ सखि॑भिः श्वि॒त्न्येभि॒: सन॒त् सूर्यं॒ सन॑द॒पः सु॒वज्र॑: ॥१८॥ वि॒श्वाहेन्द्रो॑ अधिव॒क्ता नो॑ अ॒स्त्वप॑रिह्वृताः सनुयाम॒ वाज॑म् । तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑ति॒: सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः ॥१९॥
जो इंद्र कामवर्षी, शक्तिसंपन्न, महानू, आकाश और धरती के ईश्वर, जल बरसाने वाले तथा संग्राम में स्तुतिकर्त्ताओं द्वारा बुलाने योग्य हैं, वे मरुतों के साथ मिलकर हमारे रक्षक बनें
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Common questions
What is Mandala 1 of the Rig Veda?
The first and largest book — hymns by many rishis to Agni, Indra, the Ashvins, the Maruts, Ushas and the devas. The Rigveda is the oldest of the four Vedas and the foundational scripture of Sanatana Dharma — a collection of over a thousand suktas (hymns) in praise of Agni, Indra, Soma, the Ashvins and the devas, seen by the rishis and preserved in unbroken oral tradition.
What is the Rig Veda?
The Rigveda is the oldest of the four Vedas and the foundational scripture of Sanatana Dharma — a collection of over a thousand suktas (hymns) in praise of Agni, Indra, Soma, the Ashvins and the devas, seen by the rishis and preserved in unbroken oral tradition.
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