सुन्दरकाण्ड के बारे में
महाकाव्य का हृदय और सर्वाधिक मंगलकारी काण्ड, जिसके केंद्र में हनुमान हैं। वे समुद्र लाँघकर लंका पहुँचते हैं, नगरी खोजते हैं, अशोक वाटिका में सीता को पाकर राम की अँगूठी देते हैं, बंदी बनते हैं, जलती पूँछ से लंका दहन करते हैं, और सीता का संदेश लेकर लौटते हैं। सुन्दरकाण्ड का पाठ साहस, आशा और विघ्न-नाश हेतु किया जाता है।
पाठ कैसे करें
सुन्दरकाण्ड नीचे उसकी मूल संस्कृत में (देवनागरी में), सर्ग और श्लोक क्रम से दिया गया है। श्लोक-दर-श्लोक पढ़ें; विशेषकर सुन्दरकाण्ड का पाठ साहस और रक्षा हेतु किया जाता है।
मूल पाठ
श्लोक और अर्थ
ततो रावणनीतायाः सीतायाः शत्रुकर्शनः ।इयेष पदमन्वेष्टुं चारणाचरिते पथि ॥५-१-१॥
तब शत्रुओं को पीड़ा देने वाले हनुमान ने रावण द्वारा हरी गई सीता का पता लगाने के लिए चारणों द्वारा विचरण किए जाने वाले आकाश-मार्ग से जाने का निश्चय किया।
दुष्करं निष्प्रतिद्वन्द्वं चिकीर्षन् कर्म वानरः ।समुदग्रशिरोग्रीवो गवांपतिरिवाबभौ ॥५-१-२॥
वह वानर, अद्वितीय और कठिन कार्य करने का निश्चय किए हुए, ऊँची गर्दन और सिर उठाए हुए बैलों के स्वामी के समान शोभित हो रहा था।
अथ वैडूर्यवर्णेषु शाद्वलेषु महाबलः ।धीरः सलिलकल्पेषु विच्चार यथासुखम् ॥५-१-३॥
तब वह महाबली और धीर हनुमान बैडूर्यमणि के समान चमकते और जल के समान हरे-भरे घास के मैदानों में सुखपूर्वक विचरण करने लगा।
द्विजान् वित्रासयन् धीमानुरसा पादपान् हरन् ।मृगांश्च सुबाहुन्निघ्नन् प्रवृद्ध इव केसरी॥५-१-४॥
वह बुद्धिमान वानर पक्षियों को डराता, अपने वक्षस्थल से वृक्षों को उखाड़ता और अनेक मृगों को मारता हुआ प्रौढ़ सिंह के समान विचर रहा था।
नीललोहितमाञ्जिष्ठपत्रवर्णैः सितासितैः ।स्वभावविहितैश्चित्रैर्धातुभिः समलंकृतम् ॥५-१-५॥
वह पर्वत नीले, लाल, मंजिष्ठा-वर्ण, श्वेत और श्याम रंगों की प्राकृतिक अद्भुत धातुओं से, मानो चित्र-विचित्र पत्तों से सुशोभित था।
कामरूपिभिराविष्टमभीक्ष्णं सपरिच्छिदैः ।यक्षकिन्नरगन्धर्वैर्देवक्ल्पैश्च पन्नगैः ॥५-१-६॥
वह पर्वत स्वेच्छा से रूप धारण करने वाले यक्षों, किन्नरों, गन्धर्वों तथा अपने परिवार सहित देवतुल्य नागों से सदा भरा रहता था।
स तस्य गिरिवर्यस्य तले नागवरायुते ।तिष्ठन् कपिवरस्तत्र ह्रदे नाग इवाबभौ ॥५-१-७॥
उत्तम नागों से भरे उस श्रेष्ठ पर्वत के तल पर खड़ा वह वानरश्रेष्ठ मानो सरोवर में खड़े गजराज के समान शोभा पा रहा था।
स सूर्याय महेन्द्राय पवनाय स्वयंभुवे ।भूतेभ्यश्चाञ्जलिं कृत्वा चकार गमने मतिम् ॥५-१-८॥
उसने सूर्य, महेन्द्र, वायु, स्वयंभू ब्रह्मा और समस्त प्राणियों को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और फिर यात्रा पर जाने का निश्चय किया।
अञ्जलिं प्राङ्मुखः कृत्वा पवनायात्मयोओनयो ।ततो हि ववृधे गन्तुं दक्षिणो दक्षिणां दिश्म् ॥५-१-९॥
पूर्वाभिमुख होकर उसने अपने उत्पत्ति-स्रोत पवनदेव को हाथ जोड़े और फिर संयत होकर दक्षिण दिशा में जाने के लिए अपना शरीर बढ़ाना आरम्भ किया।
प्लवङ्गप्रवरैर्दृष्टः प्लवने कृतनिश्चयः ।ववृधे रामवृद्ध्यर्थम् समुद्र इव पर्वसु ॥५-१-१०॥
श्रेष्ठ वानरों द्वारा देखा जाता हुआ, उड़ने का दृढ़ निश्चय किए हुए, वह राम के कार्य की सिद्धि के लिए पर्व के दिनों में उमड़ते समुद्र के समान अपना शरीर बढ़ाने लगा।
निष्प्रमाणशरीरः सन् लिलङ्घयिषुरर्णवम् ।बाहुभ्यां पीडयामास चरणाभ्यां च पर्वतम् ॥५-१-११॥
असीम शरीर धारण करके समुद्र को लाँघने की इच्छा से उसने अपनी भुजाओं और चरणों से उस पर्वत को दबाया।
स चचालाचलश्चापि मुहूर्तं कपिपीडितः ।तरूणां पुष्पिताग्राणां सर्वं पुष्पमशातयत् ॥५-१-१२॥
वानर के दबाव से वह अचल पर्वत भी क्षणभर के लिए हिल गया और पुष्पित वृक्षों की सारी टहनियों के फूल झड़ पड़े।
तेन पादपमुक्तेन पुष्पौघेन सुगन्धिना ।सर्वतः संवृतः शैलो बभौ पुष्पमयो यथा ॥५-१-१३॥
वृक्षों से झरे उस सुगन्धित पुष्प-समूह से चारों ओर ढका हुआ पर्वत मानो पुष्पमय ही दिखाई देने लगा।
तेन चोत्तमवीर्येण पीड्यमानः स पर्वतः ।सलिलं संप्रसुस्राव मदं मत्त इव द्विपः ॥५-१-१४॥
उस परम पराक्रमी के दबाव से पीड़ित होकर वह पर्वत मदमस्त गजराज के समान जलधारा बहाने लगा।
पीड्यमानस्तु बलिना महेन्द्रस्तेन पर्वतः ।रीतीर्निर्वर्तयामास काञ्चनाञ्जनराजतीः ॥५-१-१५॥
उस बलशाली द्वारा दबाए जाने पर महेन्द्र पर्वत ने सोने, अंजन जैसी काली और चाँदी की धातुओं की धाराएँ बहा दीं।
मुमोच च शिलाः शैलो विशालाः समनःशिलाः ।मध्यमेनार्चिषा जुष्टो धूमराजीरिवानलः ॥५-१-१६॥
पर्वत ने मैनसिल के रंग वाली विशाल शिलाओं को उगल दिया, जो बीच की ज्वाला से युक्त धूम्र-रेखाओं वाली अग्नि के समान जल रही थीं।
गिरिणा पीड्यमानेन पीड्यमानानि सर्वशः ।गुहाविष्टानि भूतानि विनेदुर्विकृतैः स्वरैः ॥५-१-१७॥
चारों ओर से दबाए जा रहे उस पर्वत की गुफाओं में रहने वाले प्राणी भयभीत होकर विकृत स्वरों में चिल्लाने लगे।
स महासत्त्वसंनादः शैलपीडानिमित्तजः ।पृथिवीं पूरयामास दिशश्चोपवनानि च ॥५-१-१८॥
पर्वत के दबने से उत्पन्न वह प्राणियों का महान् कोलाहल समस्त पृथ्वी, दिशाओं और आस-पास के उपवनों को भर गया।
शिरोभिः पृथुभिः सर्पा व्यक्तस्वस्तिकलक्षणैः ।वमन्तः पावकं घोरं ददंशुर्दशनैः शिलाः ॥५-१-१९॥
स्पष्ट स्वस्तिक-चिह्नों वाले चौड़े फणों से भयंकर अग्नि उगलते हुए सर्प अपने दाँतों से शिलाओं को डँसने लगे।
तास्तदा सविषैर्दष्टाः कुपितैस्तैर्महाशिलाः।जज्ज्वलुः पावकोद्दीप्ता बिभिदुश्च सहस्रधा ॥५-१-२०॥
उन कुपित विषैले सर्पों द्वारा डँसी गई विशाल शिलाएँ अग्नि से प्रज्ज्वलित होकर सहस्रों टुकड़ों में फट गईं।
यानि चौषधजालानि तस्मिन् जातानि पर्वते ।विषघ्नान्यपि नागानां न शेकुः शमितुं विषम्॥५-१-२१॥
उस पर्वत पर उगी विषनाशक औषधियाँ भी उन क्रुद्ध सर्पों के विष को शान्त करने में समर्थ न हो सकीं।
भिद्यतेऽयं गिरिर्भूतैरिति मत्त्वा तपस्विनः ।त्रस्ता विद्याधरास्तस्मादुत्पेतुः स्त्रीगणैः सह॥५-१-२२॥
यह सोचकर कि पर्वत को भूतगणों द्वारा तोड़ा जा रहा है, वहाँ के भयभीत तपस्वी विद्याधरियों सहित आकाश में उड़ गए।
पानभूमिगतं हित्वा हैममासवभाजनम् ।पात्रणि च महार्हाणि करकांश्च हिरण्मयान् ॥५-१-२३॥
वे पानभूमि में छूटे हुए स्वर्ण के सुरा-पात्रों, बहुमूल्य पात्रों और सुवर्णमय करकों को छोड़कर चल दिए।
लेह्यानुच्चावचान् भक्ष्यान् मांसानि विविधानि च ।आर्षभाणि च चर्माणि खड्गांश्च कनकत्सरून् ॥५-१-२४॥
वे नाना प्रकार के चटपटे भक्ष्य पदार्थ, विविध मांस, बैल के चमड़े तथा स्वर्ण-मूठ वाली तलवारें भी वहीं छोड़ गए।
कृतक्ण्ठगुणाः क्षीबा र्क्तमाल्यानुलेपनाः ।र्क्तक्षाः पुष्कराक्षाश्च गगनं प्रतिपेदिरे ॥५-१-२५॥
कण्ठों में माला पहने, मदमस्त, लाल पुष्पों और लाल अनुलेपन से सने हुए, लाल तथा कमल के समान नेत्रों वाले वे विद्याधर आकाश में जा पहुँचे।
हारनूपुरकेयूरपारिहार्यधराः स्त्रियः ।विस्मिताः सस्मितास्तस्थुराकाशे रमणैः सह ॥५-१-२६॥
हार, नूपुर, केयूर और कंगन पहने वे विस्मित किन्तु मुस्कुराती हुई स्त्रियाँ अपने प्रियतमों के साथ आकाश में खड़ी रहीं।
दर्शयन्तो महाविद्यां विद्याधरमहर्षयः ।सहितास्तस्थुराकाशे वीक्षाञ्चक्रुश्च पर्वतम्॥५-१-२७॥
अपनी महाविद्या का प्रदर्शन करते हुए महान विद्याधर ऋषिगण एक साथ आकाश में खड़े होकर उस पर्वत को देखने लगे।
शुश्रुवुश्चतदा शब्दमृषीणां भावितात्मनाम्।चारणानां च सिद्धानां स्थितानांविमलेऽम्बरे॥५-१-२८॥
तब निर्मल आकाश में स्थित पवित्र-हृदय ऋषियों, चारणों और सिद्धों की वाणी वहाँ सुनाई देने लगी।
एष पर्वतसंकाशो हनूमान् मारुतात्मजः ।तितीर्षति महावेगः समुद्रं मकरालयम् ॥५-१-२९॥
"पर्वत के समान यह हनुमान, वायुपुत्र, महान वेग वाला होकर, मगरमच्छों के निवास स्थान समुद्र को पार करने का इच्छुक है।"
रामार्थं वानरार्थं च चिकीर्षन् कर्मदुष्करम् ।समुद्रस्य परं पारं दुष्प्रापं प्राप्तुमिच्छति॥५-१-३०॥
"राम और वानरों के हित के लिए दुष्कर कार्य करने की इच्छा से वह समुद्र के दुष्प्राप्य पार तट तक पहुँचना चाहता है।"
इति विद्याधराः श्रुत्वा वचस्तेषां महात्मनाम् ।तमप्रमेयं ददृशुः पर्वते वानरर्षभम् ॥५-१-३१॥
उन महात्माओं की यह बात सुनकर विद्याधरों ने पर्वत पर खड़े उस अनुपम वानरश्रेष्ठ को देखा।
दुधुवे च स रोमाणि चकम्पे चाचलोपमः ।ननाद सुमहानादं सुमहानिव तोयदः ॥५-१-३२॥
उसने अपने रोओं को झटका, पर्वत के समान काँप उठा और महान मेघ के समान गम्भीर गर्जना की।
आनुपूर्व्येण वृत्तं च लाङ्गूलं लोमभिश्चितम् ।उत्पतिष्यन् विचिक्षेप पक्षिराज इवोरगम् ॥५-१-३३॥
उड़ने को उद्यत होकर उसने अपनी गोल, रोओं से भरी पूँछ को इस प्रकार घुमाया जैसे गरुड़ किसी सर्प को उठा रहा हो।
तस्य लाङ्गूलमाविद्धमात्तवेगस्य पृष्ठतः ।ददृशे गरुडेनेव ह्रियमाणो महोरगः ॥५-१-३४॥
वेग पकड़ते हुए उसकी पीठ के पीछे उठी हुई पूँछ ऐसी दिखाई दी मानो गरुड़ द्वारा ले जाया जाने वाला कोई बड़ा सर्प हो।
बाहू संस्तंभयामास महापरिघसंनिभौ ।ससाद च कपिः क्ट्यां चरणौ संचुकोच च ॥५-१-३५॥
उसने बड़े परिघ के समान अपनी भुजाओं को स्थिर किया, अपनी कमर को सिकोड़ा और चरणों को समेट लिया।
संहृत्य च भुजौ श्रीमांस्तथैव च शिरोधराम् ।तेजः स्त्त्वं तथा वीर्यमाविवेश स वीर्यवान् ॥५-१-३६॥
उस पराक्रमी श्रीमान ने अपनी भुजाओं और गर्दन को भी समेट लिया तथा अपने तेज, सत्त्व और वीर्य को अपने भीतर एकत्र कर लिया।
मार्गमालोकयन्दूरादूर्ध्वं प्रणिहितेक्षणः ।रुरोध हृदये प्राणानाकाशमवलोकयन् ॥५-१-३७॥
दूर तक ऊपर के मार्ग को स्थिर दृष्टि से देखते हुए उसने आकाश को निहारते हुए अपने प्राणों को हृदय में रोक लिया।
पद्भ्यां दृढमवस्थानं कृत्वा स कपिकुञ्जरः ।निकुञ्च्य कर्णौ हनुमानुत्पतिष्यन् महाबलः ।वानरान् वानरश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत् ॥५-१-३८॥
अपने चरणों को दृढ़तापूर्वक जमाकर और कानों को समेटकर, उड़ने को उद्यत उस महाबली वानरश्रेष्ठ हनुमान ने वानरों से यह वचन कहा।
यथा राघवनिर्मुक्तः शरः श्वसनविक्रमः ।गच्चेत्तद्वद्गमिष्यामि लङ्कां रावणपालिताम् ॥५-१-३९॥
"जैसे राम द्वारा छोड़ा गया वायु के समान वेगवान बाण जाता है, वैसे ही मैं रावण द्वारा शासित लंका को जाऊँगा।"
न हि द्रक्ष्यामि यदि तां लङ्कायां जनकात्मजाम् ।अनेनैव हि वेगेन गमिष्यामि सुरालयम् ॥५-१-४०॥
"यदि मुझे लंका में जनकनन्दिनी सीता के दर्शन न हुए तो इसी वेग से मैं देवलोक को चला जाऊँगा।"
यदि वा त्रिदिवे सीतां न द्रक्ष्याम्यकृतश्रमः ।बद्ध्वा राक्षसराजानमानयिष्यामि रावणम् ॥५-१-४१॥
"यदि स्वर्ग में भी बिना श्रम व्यर्थ किए सीता के दर्शन न हुए तो मैं राक्षसराज रावण को बाँधकर ले आऊँगा।"
सर्वथा कृतकार्योऽहमेष्यामि सह सीतया ।आनयिष्यामि वा लङ्कां समुत्पाट्य सरावणाम् ॥५-१-४२॥
"हर हाल में कार्य सिद्ध करके मैं सीता के साथ ही लौटूँगा, अथवा रावण सहित लंका को ही उखाड़कर यहाँ ले आऊँगा।"
एवमुक्त्वा तु हनुमान्वानरान्वानरोत्तमः ॥५-१-४३॥
वानरों से इस प्रकार कहकर वानरश्रेष्ठ हनुमान ने आगे प्रस्थान की तैयारी की।
उत्पपाताथ वेगेन वेगवानविचारयन् ।सुपर्णमिव चात्मानं मेने स कपिकुञ्जरः ॥५-१-४४॥
वह वेगवान बिना विचार किए ही अत्यन्त वेग से उछल पड़ा और उस गजेन्द्र-सम वानर ने अपने आपको मानो गरुड़ के समान समझा।
समुत्पतति तस्मिंस्तु वेगात्ते नगरोहिणः ।संहृत्य विटपान् सर्वान् समुत्पेतुः समन्ततः ॥५-१-४५॥
जिस वेग से वह उछला, उसी वेग से उस पर्वत के सारे वृक्ष अपनी शाखाओं सहित उखड़कर चारों ओर से उसके साथ ऊपर उठ गए।
स मत्तकोयष्टिभकान् पादपान् पुष्पशालिनः ।उद्वहन्नूरुवेगेन जगाम विमलेऽम्बरे ॥५-१-४६॥
अपनी जंघाओं के वेग से मत्त कोकिलों से भरे और फूलों से लदे उन वृक्षों को लेकर वह निर्मल आकाश में चल पड़ा।
ऊरुवेगोत्थिता वृक्षा मुहूर्तं कपिमन्वयुः ।प्रस्थितं दीर्घमध्वानं स्वबन्धमिव बान्धवाः ॥५-१-४७॥
उसकी जंघाओं के वेग से उखड़े हुए वृक्ष क्षणभर के लिए उस लम्बी यात्रा पर निकले वानर के पीछे-पीछे ऐसे चले जैसे बन्धुजन अपने स्वजन के पीछे चलते हैं।
तमूरुवेगोन्मथिताःसालाश्चन्ये नगोत्तमाः।अनुजग्मुर्हनूमन्तं सैन्या इव महीपतिम् ॥५-१-४८॥
उसकी जंघाओं के वेग से उखड़े हुए साल आदि अन्य श्रेष्ठ वृक्ष हनुमान के पीछे ऐसे चले जैसे सेना अपने राजा के पीछे चलती है।
सुपुष्पिताग्रैर्बहुभिः पादपैरन्वितः कपिः ।हनुमान् पर्वताकारो बभूवाद्भुतदर्शनः ॥५-१-४९॥
अनेक पुष्पित वृक्षों से घिरा हुआ पर्वताकार हनुमान अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहा था।
सारवन्तोऽथ ये वृक्षा न्यमज्जन् लवणाम्भसि ।भयादिव महेन्द्रस्य पर्वता वरुणालये ॥५-१-५०॥
तब भारी वृक्ष खारे समुद्र में डूब गए, मानो पर्वत महेन्द्र के भय से वरुण के निवास समुद्र की शरण ले रहे हों।
स नानाकुसुमैः कीर्णः कपिः साङ्कुरकोरकैः ।शुशुभे मेघसंकाशः खद्योतैरिव पर्वतः ॥५-१-५१॥
विविध फूलों, कलियों और अंकुरों से आच्छादित वह मेघ-सा वानर जुगनुओं से जगमगाते पर्वत के समान शोभित हो रहा था।
विमुक्तास्तस्य वेगेन मुक्त्वा पुष्पाणि ते द्रुमाः ।अवशीर्यन्त सलिले निवृत्ताः सुहृदो यथा ॥५-१-५२॥
उसके वेग से छूटे हुए उन वृक्षों के पुष्प जल में इस प्रकार बिखर गए जैसे विदा देकर लौटते हुए सुहृद।
लघुत्वेनोपपन्नं तद्विचित्रं सागरेऽपतत् ।द्रुमाणां विविधं पुष्पं कपिवायुसमीरितम् ॥५-१-५३॥
हल्के होने के कारण वानर की गति से उड़े वृक्षों के नाना रंगों के फूल विचित्र रूप में समुद्र पर गिरने लगे।
ताराचितमिवाकाशं प्रबभौ च महार्णवः ।पुष्पौघेनानुबद्धेन नानावर्णेन वानरः ।बभौ मेघ इवाकाशे विद्युद्गणविभूषितः ॥५-१-५४॥
उन बहुरंगी फूलों की अविरल धारा से आच्छादित महासागर तारों-जड़ित आकाश के समान शोभित हुआ, और वानर बिजली की चमक से सुशोभित मेघ के समान आकाश में शोभित हुआ।
तस्य वेगसमाधूतैः पुष्पैस्तोयमदृश्यत ॥५-१-५५॥
उसके वेग से बिखरे हुए फूलों के कारण जल मानो तारों से भरा हुआ दिखाई दिया।
ताराभिरभिरामाभिरुदिताभिरिवाम्बरम् ।तस्याम्बरगतौ बाहू ददृशाते प्रसारितौ ॥५-१-५६॥
आकाश मानो सुन्दर उदित तारों से भरा हुआ प्रतीत हो रहा था; उसकी दोनों भुजाएँ आकाश में फैली हुई दिखाई दे रही थीं।
पर्वताग्राद्विनिष्क्रान्तौ पञ्चास्याविव पन्नगौ ।पिबन्निव बभौ चापि सोओर्मिमालं महार्णवम् ॥५-१-५७॥
पर्वत की चोटी से फैली उसकी दोनों भुजाएँ मानो पाँच फणों वाले दो सर्प जान पड़ती थीं; वह लहरों की माला वाले महासागर को मानो पी रहा हो, ऐसा प्रतीत होता था।
पिपासुरिव चाकाशं ददृशे स महाकपिः ।तस्य विद्युत्प्रभाकारे वायुमार्गानुसारिणः ॥५-१-५८॥
वह महाकपि मानो आकाश को पी लेना चाहता हो, ऐसा दीख पड़ता था; पवनमार्ग पर वेग से चलते हुए उसका रूप बिजली की चमक के समान दीप्त हो रहा था।
नयने विप्रकाशेते पर्वतस्थाविवानलौ ।पिङ्गे पिङ्गाक्षमुख्यस्य बृहती परिमण्डले ॥५-१-५९॥
पीत-पिंगल और गोलाकार उसके दोनों बड़े नेत्र पर्वत पर स्थित अग्नियों के समान दहक रहे थे; यह पिंगल-नेत्र वानरश्रेष्ठ की पहचान थी।
चक्षुषी संप्रकाशेते चन्द्रसूर्याविवोदितौ ।मुखं नासिकया तस्य ताम्रया ताम्रमाबभौ ॥५-१-६०॥
उसके दोनों नेत्र उदित सूर्य और चन्द्रमा के समान चमक रहे थे; ताम्रवर्ण नासिका वाला उसका मुख तांबे के समान लाल शोभित हो रहा था।
सन्ध्यया समभिस्पृष्टं यथा तत्सूर्यमण्डलम् ।लाङ्गूलं च समाविद्धं प्लवमानस्य शोभते ॥५-१-६१॥
उड़ते समय घुमाई गई उसकी कुंडलाकार पूँछ संध्या से स्पर्शित सूर्यमण्डल के समान सुशोभित हो रही थी।
अम्बरे वायुपुत्रस्य शक्रध्वज इवोच्छ्रितः ।लाङ्गूलचक्रेण महान् शुक्लदंष्ट्रोऽनिलात्मजः ॥५-१-६२॥
आकाश में शुक्ल दाढ़ों वाला वह महान पवनपुत्र अपनी उठी हुई पूँछ के चक्र से इन्द्रध्वज के समान दिखाई देता था।
व्यरोचत महाप्राज्ञः परिवेषीव भास्करः ।स्फिग्देशेनाभिताम्रेण रराज स महाकपिः ॥५-१-६३॥
वह महाप्राज्ञ प्रभामण्डल से घिरे सूर्य के समान शोभित था; वह महाकपि अपनी ताम्रवर्ण कटि-प्रदेश से देदीप्यमान हो रहा था।
महता दारितेनेव गिरिर्गैरिकधातुना ।तस्य वानरसिंहस्य प्लवमानस्य सागरम् ॥५-१-६४॥
उस समुद्र के ऊपर उड़ते हुए वानरसिंह की ताम्र कटि ऐसी शोभा दे रही थी मानो कोई पर्वत फटकर अपनी गैरिक धातु प्रकट कर रहा हो।
कक्षान्तरगतो वायुर्जीमूत इव गर्जति ।खे यथा निपतन्त्युल्का ह्युत्तरान्ताद्विनिःसृता ॥५-१-६५॥
उसकी काखों के बीच से निकलती वायु मेघ के समान गरजती थी, जैसे उत्तर दिशा से गिरती हुई पूँछ-सहित उल्काएँ आकाश में दिखाई देती हैं।
दृश्यते सानुबन्धा च तथा स कपिकुञ्जरः ।पतत्पतङ्गसंकाशो व्यायतः शुशुभे कपिः ॥५-१-६६॥
उसी प्रकार पूँछ सहित वह महाकपि भी दिखाई देता था; फैले हुए शरीर में उड़ता हुआ वह गिरती हुई उल्का के समान शोभित हो रहा था।
प्रवृद्ध इव मातङ्गः कक्ष्यया बध्यमानया ।उपरिष्टाच्छरीरेण छायया चावगाढया ।सागरे मारुताविष्टा नौरिवासीत्तदा कपिः ॥५-१-६७॥
रस्सी से बँधे हुए मदमस्त गजराज के समान, नीचे समुद्र में गहरी छाया डालते हुए, वायु से प्रेरित वह वानर समुद्र में जहाज़ के समान प्रतीत हो रहा था।
यं यं देशं समुद्रस्य जगाम स महाकपिः ।स स तस्योरुवेगेन सोन्माद इव लक्ष्यते ॥५-१-६८॥
वह महाकपि समुद्र के जिस-जिस भाग में से होकर गुजरता था, वह भाग उसके तीव्र वेग से मानो उन्मत्त-सा प्रतीत होने लगता था।
सागरस्योओर्मिजालानामुरसा शैलवर्ष्मणाम् ।अभिघ्नंस्तु महावेगः पुप्लुवे स महाकपिः ॥५-१-६९॥
समुद्र की पर्वताकार लहरों के समूह को अपने वक्षस्थल से टकराता हुआ वह महाकपि अत्यन्त वेग से उड़ता रहा।
कपिवातश्च बलवान् मेघवातश्च निःसृतः ।सागरं भीमनिर्घोषं कम्पयामासतुर्भृशम् ॥५-१-७०॥
वानर से उत्पन्न प्रबल वायु और मेघों से निकली वायु दोनों ने मिलकर भयंकर गर्जना करने वाले समुद्र को अत्यन्त कँपा दिया।
विकर्षन्नूर्मिजालानि बृहन्ति लवणाम्भसि ।पुप्लुवे कपिशार्दूलो विकिरन्निव रोदसी ॥५-१-७१॥
खारे समुद्र की विशाल लहर-श्रृंखलाओं को खींचता हुआ वह वानरश्रेष्ठ मानो आकाश और पृथ्वी को अलग-अलग बिखेरता हुआ उड़ता रहा।
मेरुमन्दरसंकाशानुद्धतान् स महार्णवे ।अत्यक्रामन्महावेगस्तरङ्गान् गणयन्निव ॥५-१-७२॥
वह महावेगशाली मेरु और मन्दराचल के समान ऊँची उठी लहरों को मानो गिनते हुए महासागर में पार करता चला गया।
तस्य वेगसमुद्धूतं जलं सजलदं तदा ।अम्बर्स्थं विबभ्राज शारदाभ्रमिवाततम् ॥५-१-७३॥
उसके वेग से मेघों सहित उठा हुआ जल शरद ऋतु के फैले हुए बादलों के समान आकाश में शोभित हुआ।
तिमिनक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विवृतास्तदा ।वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् ॥५-१-७४॥
उस समय व्हेल, मगरमच्छ, मछलियाँ और कछुए इस प्रकार दिखाई देने लगे मानो शरीरों के वस्त्र खींच लिए गए हों।
प्लवमानं समीक्ष्यथ भुजङ्गाः सागरालयाः ।व्योम्नि तं कपिशार्दूलं सुपर्ण इति मेनिरे ॥५-१-७५॥
आकाश में उड़ते हुए उस वानरश्रेष्ठ को देखकर समुद्र में रहने वाले सर्पों ने उसे साक्षात् गरुड़ ही समझ लिया।
दशयोजनविस्तीर्णा त्रिंशद्योजनमायता ।छाया वानरसिंहस्य जले चारुतराभवत् ॥५-१-७६॥
उस वानरसिंह की दस योजन चौड़ी और तीस योजन लम्बी छाया जल पर अत्यन्त सुन्दर दिखाई दे रही थी।
श्वेताभ्रघनराजीव वायुपुत्रानुगामिनी ।तस्य सा शुशुभे छाया वितता लवणाम्भसि ॥५-१-७७॥
खारे समुद्र पर फैली और उसका अनुसरण करती हुई पवनपुत्र की वह छाया श्वेत मेघों के समूह के समान शोभा पा रही थी।
शुशुभे स महातेजा महाकायो महाकपिः ।वायुमार्गे निरालम्बे पक्षवानिव पर्वतः ॥५-१-७८॥
वह महातेजस्वी और महाकाय वानर वायु के अवलम्बरहित मार्ग में पंखयुक्त पर्वत के समान शोभित हो रहा था।
येनासौ याति बलवान् वेगेन कपिकुञ्जरः ।तेन मार्गेण सहसा द्रोणीकृत इवार्णवः ॥५-१-७९॥
जिस मार्ग से वह बलशाली गजेन्द्र-सम वानर वेगपूर्वक गया, उससे मानो समुद्र तत्काल एक खाई के रूप में बदल गया।
आपाते पक्षिसंघानां पक्षिराज इव व्रजन् ।हनुमान् मेघजालानि प्रकर्षन् मारुतो यथा ॥५-१-८०॥
पक्षियों के झुंडों के बीच पक्षिराज गरुड़ के समान चलते हुए हनुमान वायु की भाँति मेघों के समूह को खींचते हुए आगे बढ़ते रहे।
पाण्डुरारुणवर्णानि नीलमाञ्जिष्ठकानि च ।कपिनाकृष्यमाणानि महाभ्राणि चकाशिरे ॥५-१-८१॥
श्वेत, लाल, नीले और मंजिष्ठा जैसे रंगों के विशाल बादल उस वानर की गति से खिंचते हुए चमक रहे थे।
प्रविशन्नभ्रजालानिनिष्पतंश्च पुनः पुनः ।प्रच्चन्नश्च प्रकाशश्च चन्द्रमा इव लक्ष्यते ॥५-१-८२॥
बादलों के समूहों में बार-बार प्रवेश करते और निकलते हुए वे कभी छिपे, कभी प्रकट, चंद्रमा के समान दिखाई दे रहे थे।
प्लवमानं तु तं दृष्ट्वा प्लवङ्गं त्वरितं तदा ।ववर्षुः पुष्पवर्षणि देवगन्धर्वदानवाः ॥५-१-८३॥
आकाश में उछलते उस वानर को देखकर देवताओं, गंधर्वों और दानवों ने उस पर पुष्पों की वर्षा की।
तताप न हि तं सूर्यः प्लवन्तं वानरोत्तमम् ।सिषेवे च तदा वायू रामकार्याद्थसिद्धये ॥५-१-८४॥
उछलते हुए उस श्रेष्ठ वानर को सूर्य ने नहीं तपाया, और राम के कार्य की सिद्धि के लिए वायु उस समय उसकी सेवा में लगी रही।
ऋषयस्तुष्टुवुश्चैव प्लवमानं विहायसा ।जगुश्च देवगन्धर्वाः प्रशंसन्तो महौजसम् ॥५-१-८५॥
आकाश में उड़ते हुए उस वानर की ऋषियों ने स्तुति की, और देवताओं तथा गंधर्वों ने उस महातेजस्वी की प्रशंसा करते हुए गीत गाए।
नागाश्च तुष्टुवुर्यक्षा रक्षांसि विबुधाः खगाः ॥५-१-८६॥
नाग, यक्ष, राक्षस, देवता और पक्षी सभी ने भी उसकी स्तुति की।
प्रेक्ष्य सर्वे कपिवरं सहसा विगतक्लमम् ।तस्मिन् प्लवगशार्दूले प्लवमाने हनूमति ॥५-१-८७॥
उस श्रेष्ठ वानर को देखकर सभी प्राणी अचानक अपनी थकान भूल गए, जब वानरशार्दूल हनुमान उछल रहे थे।
इक्ष्वाकुकुलमानार्थी चिन्तयामास सागरः ।साहाय्यं वानरेन्द्रस्य यदि नाहं हनूमतः ॥५-१-८८॥
इक्ष्वाकु वंश का सम्मान चाहते हुए समुद्र ने विचार किया कि यदि वह इस वानरेन्द्र हनुमान की सहायता न करे,
करिष्यामि भविष्यामि सर्ववाच्यो विवक्षताम् ।अहमिक्ष्वाकुनाथेन सगरेण विवर्धतः ॥५-१-८९॥
तो वह सभी की निंदा का पात्र बनेगा, क्योंकि वह स्वयं इक्ष्वाकुनाथ सगर के द्वारा ही विस्तृत किया गया था।
इक्ष्वाकुसचिचश्चायं नावसीदितुमर्हति ।तथा मया विधातव्यं विश्रमेत यथा कपिः ॥५-१-९०॥
वह इक्ष्वाकुओं का सचिव जैसा है, अतः इस वानर को कष्ट में नहीं पड़ने देना चाहिए; मुझे ऐसा करना चाहिए कि यह वानर विश्राम पा सके।
शेषं च मयि विश्रान्तः सुखेनातिपतिष्यति ।इति कृत्वा मतिं साध्वीं समुद्रश्चन्नमम्भसि ॥५-१-९१॥
मुझ पर विश्राम कर वह शेष मार्ग सुखपूर्वक पार कर लेगा — ऐसा शुभ संकल्प करके समुद्र ने अपने जल के साथ,
हिरण्यनाभं मैनाकमुवाच गिरिसत्तमम् ।त्वमिहासुरसंघानां पाताLअतलवासिनां ॥५-१-९२॥
स्वर्णशिखर वाले पर्वतश्रेष्ठ मैनाक से कहा।
देवराज्ञा गिरिश्रेष्ठ परिघः संनिवेशितः ।त्वमेषां जातवीर्याणां पुनरेवोत्पतिष्यताम् ॥५-१-९३॥
हे पर्वतश्रेष्ठ, तुम्हें देवराज ने पाताल में रहने वाले असुरों के समूहों के विरुद्ध एक अवरोध के रूप में यहाँ स्थापित किया था,
पाताLअस्याप्रमेयस्य द्वारमावृत्य तिष्ठसि ।तिर्यगूर्ध्वमधश्चैव शक्तिस्ते शैल वर्धितुम् ॥५-१-९४॥
ताकि जन्मजात बल वाले वे पुनः न उठ सकें; तुम उस असीम पाताल के द्वार को घेरे खड़े हो।
तस्मात्संचोदयामि त्वामुत्तिष्ठ गिरिसत्तम ।न एष कपिशार्दूलस्त्वमुपर्येति वीर्यवान् ॥५-१-९५॥
हे शैल, तुम्हें तिरछे, ऊपर और नीचे सभी दिशाओं में बढ़ने की शक्ति है — इसलिए मैं तुम्हें प्रेरित करता हूँ: हे पर्वतश्रेष्ठ, उठो।
हनूमान्रामकार्यार्थं भीमकर्मा खमाप्लुतः ।अस्य साह्यं मया कार्यमिक्ष्वाकुकुलवर्तिनः ॥५-१-९६॥
यह पराक्रमी, भीमकर्मा वानरशार्दूल हनुमान राम के कार्य हेतु आकाश में उड़ रहा है; मुझे उसकी सहायता करनी है, क्योंकि वह इक्ष्वाकु कुल की सेवा में है।
मम हीक्ष्वाकवः पूज्याः परं पूज्यतमास्तव ।कुरु साचिव्यमस्माकं न नः कार्यमतिक्रमेत् ॥५-१-९७॥
इक्ष्वाकु मेरे लिए पूज्य हैं, और तुम्हारे लिए तो और भी अधिक पूज्य हैं; हमारा सहयोग करो, हमारा कार्य बाधित न हो।
कर्तव्यमकृतं कार्यं सतां मन्युमुदीरयेत् ।सलिलादूर्ध्वमुत्तिष्ठ तिष्ठत्वेष कपिस्त्वयि ॥५-१-९८॥
न किया गया कर्तव्य सज्जनों के क्रोध को उत्पन्न करता है; जल के ऊपर उठो — यह वानर तुम पर विश्राम करे।
अस्माकमतिथिश्चैव पूज्यश्च प्लवतां वरः ।चामीकरमहानाभ देवगन्धर्व सेवित ॥५-१-९९॥
हे स्वर्णशिखर वाले, देवगंधर्वसेवित पर्वत, यह उड़ने वालों में श्रेष्ठ हमारा पूजनीय अतिथि होगा।
हनुमांस्त्वयि विश्रान्तस्ततः शेषं गमिष्यति ।काकुत्थ्सस्यानृशंस्यं च मैथिल्याश्च विवासनम् ॥५-१-१००॥
तुम पर विश्राम करके हनुमान शेष यात्रा पूरी करेंगे, राम की करुणा और सीता की मुक्ति के लिए।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
वाल्मीकि रामायण का सुन्दरकाण्ड किस विषय में है?
महाकाव्य का हृदय और सर्वाधिक मंगलकारी काण्ड, जिसके केंद्र में हनुमान हैं। वे समुद्र लाँघकर लंका पहुँचते हैं, नगरी खोजते हैं, अशोक वाटिका में सीता को पाकर राम की अँगूठी देते हैं, बंदी बनते हैं, जलती पूँछ से लंका दहन करते हैं, और सीता का संदेश लेकर लौटते हैं। सुन्दरकाण्ड का पाठ साहस, आशा और विघ्न-नाश हेतु किया जाता है।
वाल्मीकि रामायण क्या है?
वाल्मीकि रामायण श्री राम की मूल संस्कृत महाकाव्य है, जिसे महर्षि वाल्मीकि ने रचा और जो आदि काव्य (प्रथम काव्य) के रूप में पूजित है। इसमें सात काण्ड हैं: बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर, युद्ध और उत्तर; यही तुलसीदास की रामचरितमानस सहित अनेक परवर्ती रामायणों का स्रोत है।
अपने नाम से राम पाठ या सेवा अर्पित करें
रक्षा और शांति हेतु अपने नाम-गोत्र में रामायण या सुंदरकांड पाठ करवाएँ। सेवा बुक करें, या सनातन साहित्य में आगे पढ़ें।







