उत्तरकाण्ड के बारे में
अंतिम काण्ड राम के राज्याभिषेक और राम-राज्य के स्वर्ण-युग, रावण और हनुमान की पूर्व-कथाओं, लव-कुश के जन्म — जो स्वयं वाल्मीकि से रामायण सीखते हैं — और सीता के पृथ्वी में समाने की कथा कहता है, और इस प्रकार आदि काव्य का समापन होता है।
पाठ कैसे करें
उत्तरकाण्ड नीचे उसकी मूल संस्कृत में (देवनागरी में), सर्ग और श्लोक क्रम से दिया गया है। श्लोक-दर-श्लोक पढ़ें; विशेषकर सुन्दरकाण्ड का पाठ साहस और रक्षा हेतु किया जाता है।
मूल पाठ
श्लोक और अर्थ
प्राप्तराज्यस्य रामस्य राक्षसानां वधे कृते ।आजग्मुर्ऋषयः सर्वे राघवं प्रतिनन्दितुम् ।। ७.१.१ ॥
राम के राज्य प्राप्त करने और राक्षसों के वध हो जाने के बाद, सभी ऋषि राघव को बधाई देने के लिए आए।
कौशिको ऽथ यवक्रीतो गार्ग्यो गालव एव च ।कण्वो मेधातिथेः पुत्रः पूर्वस्यां दिशि ये श्रिताः ।। ७.१.२ ॥
कौशिक, यवक्रीत, गार्ग्य, गालव और मेधातिथि के पुत्र कण्व - ये सब पूर्व दिशा में रहने वाले ऋषि थे।
स्वस्त्यात्रेयो ऽथ भगवान्नमुचिः प्रमुचिस्तथा ।आजग्मुस्ते सहागस्त्या ये श्रिता दक्षिणां दिशम् ।। ७.१.३ ॥
स्वस्त्यात्रेय, भगवान नमुचि और प्रमुचि, अगस्त्य के साथ आए - ये दक्षिण दिशा में रहने वाले ऋषि थे।
नृषद्गुः कवषो धौम्यो रौद्रेयश्च महानृषिः ।ते ऽप्याजग्मुः सशिष्या वै ये श्रिताः पश्चिमां दिशम् ।। ७.१.४ ॥
नृषद्गु, कवष, धौम्य और महर्षि रौद्रेय - ये सब अपने शिष्यों सहित आए, जो पश्चिम दिशा में रहते थे।
वसिष्ठः कश्यपो ऽथात्रिर्विश्वामित्रः सगौतमः ।जमदग्निर्भरद्वाजस्ते ऽपि सप्तर्षयस्तथा ।। ७.१.५ ॥
वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज - ये सात महर्षि भी आए।
उदीच्यां दिशि सप्तैते नित्यमेव निवासिनः ।। ७.१.६ ॥
ये सातों सदा उत्तर दिशा में निवास करते थे।
सम्प्राप्य ते महात्मानो राघवस्य निवेशनम् ।विष्टिताः प्रतिहारार्थं हुताशनसमप्रभाः ।वेदवेदाङ्गविदुषो नानाशास्त्रविशारदाः ।। ७.१.७ ॥
अग्नि के समान तेजस्वी, वेद-वेदांगों के ज्ञाता और विविध शास्त्रों में निपुण वे महात्मा राघव के निवास पर पहुँचकर द्वारपाल से मिलने के लिए खड़े हो गए।
द्वाःस्थं प्रोवाच धर्मात्मा अगस्त्यो मुनिसत्तमः ।निवेद्यतां दाशरथेर्ऋषीनस्मान्समागतान् ।। ७.१.८ ॥
धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ने द्वारपाल से कहा - दशरथ-पुत्र को सूचित करो कि हम ऋषि यहाँ आए हैं।
प्रतीहारस्ततस्तूर्णमगस्त्यवचनाद्द्रुतम् ।समीपं राघवस्याशु प्रविवेश महात्मनः ।। ७.१.९ ॥
तब द्वारपाल अगस्त्य के वचन से तुरंत तेजी से महात्मा राघव के समीप गया।
नयेङ्गितज्ञः सद्वृत्तो दक्षो धैर्यसमन्वितः ।स रामं दृश्य सहसा पूर्णचन्द्रसमप्रभम् ।। ७.१.१० ॥
संकेतों को समझने वाला, सदाचारी, कुशल और धैर्यवान वह द्वारपाल पूर्णचंद्र के समान तेजस्वी राम को अचानक देखकर -
अगस्त्यं कथयामास सम्प्राप्तमृषिभिः सह ।। ७.१.११ ॥
- राम को बताया कि अगस्त्य ऋषियों सहित आए हैं।
श्रुत्वा प्राप्तान्मुनींस्तांस्तु बालसूर्यसमप्रभान् ।प्रत्युवाच ततो द्वास्स्थं प्रवेशय यथासुखम् ।। ७.१.१२ ॥
बाल-सूर्य के समान तेजस्वी उन मुनियों के आगमन की बात सुनकर राम ने द्वारपाल से कहा - उन्हें सुखपूर्वक भीतर लाओ।
तान् सम्प्राप्तान् मुनीन् दृष्ट्वा प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः ।पाद्यार्घ्यादिभिरानर्च गां निवेद्य च सादरम् ।। ७.१.१३ ॥
उन आए हुए मुनियों को देखकर राम हाथ जोड़कर खड़े हुए और पाद्य, अर्घ्य आदि से उनका सत्कार किया तथा आदरपूर्वक गौ भेंट की।
रामो ऽभिवाद्य प्रयत आसनान्यादिदेश ह ।तेषु काञ्चनचित्रेषु महत्सु च वरेषु च ।। ७.१.१४ ॥
राम ने विनयपूर्वक प्रणाम कर उन्हें स्वर्ण से सुसज्जित बड़े और उत्तम आसन दिए।
कुशान्तर्धानदत्तेषु मृगचर्मयुतेषु च ।यथार्हमुपविष्टास्ते आसनेष्वृषिपुङ्गवाः ।। ७.१.१५ ॥
कुशा और मृगचर्म से युक्त उन आसनों पर श्रेष्ठ ऋषि यथायोग्य बैठ गए।
रामेण कुशलं पृष्टाः सशिष्याः सपुरोगमाः ।महर्षयो वेदविदो रामं वचनमब्रुवन् ।। ७.१.१६ ॥
राम द्वारा कुशल पूछे जाने पर वेदविद् महर्षि अपने शिष्यों और अग्रणी जनों सहित राम से बोले।
कुशलं नो महाबाहो सर्वत्र रघुनन्दन ।त्वां तु दिष्ट्या कुशलिनं पश्यामो हतशात्रवम् ।। ७.१.१७ ॥
हे महाबाहु रघुनंदन, सर्वत्र हमारा कुशल है; परंतु सौभाग्य से हम आपको कुशलपूर्वक और शत्रुओं के वध के बाद देख रहे हैं।
दिष्ट्या त्वया हतो राजन्रावणो लोकरावणः ।न हि भारः स ते राम रावणः पुत्रपौत्रवान् ।। ७.१.१८ ॥
हे राजन, सौभाग्य से आपने लोकों को रुलाने वाले रावण का वध किया; हे राम, पुत्र-पौत्रों सहित रावण आपके लिए कोई भार नहीं था।
सधनुस्त्वं हि लोकांस्त्रीन्विजयेथा न संशयः ।दिष्ट्या त्वया हतो राम रावणो राक्षसेश्वरः ।। ७.१.१९ ॥
धनुष हाथ में लेकर आप निःसंदेह तीनों लोकों को जीत सकते हैं; सौभाग्य से हे राम, राक्षसराज रावण आपके द्वारा मारा गया।
दिष्ट्या विजयिनं त्वाद्य पश्यामः सह सीतया ।लक्ष्मणेन च धर्मात्मन्भ्रात्रा त्वद्धितकारिणा ।। ७.१.२० ॥
हे धर्मात्मन, सौभाग्य से आज हम आपको सीता के साथ, तथा आपके हितैषी भाई लक्ष्मण के साथ विजयी देख रहे हैं।
मातृभिर्भ्रातृसहितं पश्यामो ऽद्य वयं नृप ।दिष्ट्या प्रहस्तो विकटो विरूपाक्षो महोदरः ।अकम्पनश्च दुर्धर्षो निहतास्ते निशाचराः ।। ७.१.२१ ॥
हे राजन, आज हम आपको माताओं और भाइयों सहित देख रहे हैं; सौभाग्य से प्रहस्त, विकट, विरूपाक्ष, महोदर और दुर्जय अकम्पन जैसे निशाचर मारे गए।
यस्य प्रमाणाद्विपुलं प्रमाणं नेह विद्यते ।दिष्ट्या ते समरे राम कुम्भकर्णो निपातितः ।। ७.१.२२ ॥
जिसके शरीर के प्रमाण से बड़ा प्रमाण संसार में नहीं मिलता, हे राम, सौभाग्य से वह कुम्भकर्ण युद्ध में गिराया गया।
त्रिशिराश्चातिकायश्च देवान्तकनरान्तकौ ।दिष्ट्या ते निहता राम महावीर्या निशाचराः ।। ७.१.२३ ॥
त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक और नरान्तक - हे राम, सौभाग्य से ये महापराक्रमी निशाचर आपके द्वारा मारे गए।
कुम्भश्चैव निकुम्भश्च राक्षसौ भीमदर्शनौ ।दिष्ट्या तौ निहतौ राम कुम्भकर्णसुतौ मृधे ।। ७.१.२४ ॥
भयंकर दिखने वाले राक्षस कुम्भ और निकुम्भ, जो कुम्भकर्ण के पुत्र थे, हे राम, सौभाग्य से दोनों युद्ध में मारे गए।
युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च कालान्तकयमोपमौ ।यज्ञकोपश्च बलवान्धूम्राक्षो नाम राक्षसः ।। ७.१.२५ ॥
युद्धोन्मत्त और मत्त, जो काल और यम के समान थे, तथा बलवान यज्ञकोप और धूम्राक्ष नामक राक्षस -
कुर्वन्तः कदनं घोरमेते शस्त्रास्त्रपारगाः ।अन्तकप्रतिमैर्बाणैर्दिष्ट्या विनिहतास्त्वया ।। ७.१.२६ ॥
- शस्त्र-अस्त्र में पारंगत, भयंकर संहार करने वाले ये सब आपके द्वारा यमराज के समान बाणों से सौभाग्य से मारे गए।
दिष्ट्या त्वं राक्षसेन्द्रेण द्वन्द्वयुद्धमुपागतः ।देवतानामवध्येन विजयं प्राप्तवानसि ।। ७.१.२७ ॥
सौभाग्य से आपने देवताओं के लिए भी अवध्य रहे उस राक्षसराज के साथ द्वंद्वयुद्ध किया और विजय प्राप्त की।
सङ्ख्ये तस्य न किञ्चित्तु रावणस्य पराभवः ।द्वन्द्वयुद्धमनुप्राप्तो दिष्ट्या ते रावणिर्हतः ।। ७.१.२८ ॥
युद्ध में उसकी कभी कोई पराजय नहीं हुई थी, फिर भी द्वंद्वयुद्ध में उतरकर सौभाग्य से रावणि (इन्द्रजित) आपके द्वारा मारा गया।
दिष्ट्या तस्य महाबाहो कालस्येवाभिधावतः ।मुक्तः सुररिपोर्वीर प्राप्तश्च विजयस्त्वया ।। ७.१.२९ ॥
हे महाबाहु वीर, काल के समान दौड़ते हुए उस देव-शत्रु से आप सौभाग्य से मुक्त हुए और विजय प्राप्त की।
अभिनन्दाम ते सर्वे संश्रुत्येन्द्रजितो वधम् ।सो ऽवध्यः सर्वभूतानां महामायाधरो युधि ।। ७.१.३० ॥
इन्द्रजित के वध का समाचार सुनकर हम सब आनंदित हैं; वह युद्ध में सभी प्राणियों के लिए अवध्य था और महामाया धारण करता था।
विस्मयस्त्वेष चास्माकं तच्छ्रुत्वेन्द्रजितं हतम् ।। ७.१.३१ ॥
इन्द्रजित का वध सुनकर हमें यह अत्यंत आश्चर्य हो रहा है।
एते चान्ये च बहवो राक्षसाः कामरूपिणः ।दिष्ट्या त्वया हता वीरा रघूणां कुलवर्द्धन ।। ७.१.३२ ॥
हे रघुकुल-वर्धक, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले ये और अन्य अनेक वीर राक्षस सौभाग्य से आपके द्वारा मारे गए।
दत्त्वा पुण्यामिमां वीर सौम्यामभयदक्षिणाम् ॥
हे वीर, यह पुण्य और सौम्य अभयदान देकर -
दिष्ट्या वर्धसि काकुत्स्थ जयेनामित्रकर्शन ।। ७.१.३३ ॥
- हे काकुत्स्थ, शत्रुनाशक, सौभाग्य से आप विजय के साथ वृद्धि को प्राप्त हो रहे हैं।
श्रुत्वा तु तेषां वचनमृषीणां भावितात्मनाम् ।विस्मयं परमं गत्वा रामः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।। ७.१.३४ ॥
पवित्रात्मा ऋषियों के इन वचनों को सुनकर राम अत्यंत आश्चर्यचकित होकर हाथ जोड़कर बोले।
भगवन्तः कुम्भकर्णं रावणं च निशाचरम् ।अतिक्रम्य महावीर्यौ किं प्रशंसथ रावणिम् ।। ७.१.३५ ॥
हे भगवंतो, महापराक्रमी कुम्भकर्ण और निशाचर रावण को छोड़कर आप रावणि की प्रशंसा क्यों करते हैं?
महोदरं प्रहस्तं च विरूपाक्षं च राक्षसम् ।मत्तोन्मत्तौ च दुर्धर्षौ देवान्तकनरान्तकौ ॥
महोदर, प्रहस्त, राक्षस विरूपाक्ष, दुर्जय मत्त और उन्मत्त, देवान्तक और नरान्तक -
अतिक्रम्य महावीर्यान् किं प्रशंसथ रावणिम् ।। ७.१.३६ ॥
- इन महापराक्रमियों को छोड़कर आप रावणि की प्रशंसा क्यों करते हैं?
अतिकायं त्रिशिरसं धूम्राक्षं च निशाचरम् ।अतिक्रम्य महावीर्यान्किं प्रशंसथ रावणिम् ।। ७.१.३७ ॥
अतिकाय, त्रिशिरा और निशाचर धूम्राक्ष जैसे महापराक्रमियों को छोड़कर आप रावणि की प्रशंसा क्यों करते हैं?
कीदृशो वै प्रभावो ऽस्य किं बलं कः पराक्रमः ।केन वा कारणेनैष रावणादतिरिच्यते ।। ७.१.३८ ॥
उसका प्रभाव कैसा था, उसका बल क्या था, उसका पराक्रम क्या था? किस कारण से वह रावण से भी बढ़कर था?
शक्यं यदि मया श्रोतुं न खल्वाज्ञापयामि वः ।यदि गुह्यं न चेद्वक्तुं श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम् ।। ७.१.३९ ॥
यदि यह मेरे सुनने योग्य है - मैं आदेश नहीं दे रहा - और यदि गुप्त न हो तो मैं सुनना चाहता हूँ, कृपया बताइए।
शक्रो ऽपि विजितस्तेन कथं लब्धवरश्च सः ।कथं च बलवानन्पुत्रो न पिता तस्य रावणः ।। ७.१.४० ॥
उसने इन्द्र को भी कैसे जीता और वरदान कैसे पाए? और वह पुत्र अपने पिता रावण से भी अधिक बलवान कैसे हुआ?
कथं पितुश्चाभ्यधिको महाहवे शक्रस्य जेता हि कथं स राक्षसः ।वराश्च लब्धाः कथयस्व मे ऽद्य तत्पृच्छतश्चास्य मुनीन्द्र सर्वम् ।। ७.१.४१ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ, वह राक्षस महासमर में अपने पिता से भी बढ़कर इन्द्र का विजेता कैसे बना और उसने कौन-कौन से वरदान पाए - मुझे आज यह सब बताइए, मैं यही पूछ रहा हूँ।
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः ।कुम्भयोनिर्मिहातेजा राममेतदुवाच ह ।। ७.२.१ ॥
महात्मा राघव के ये वचन सुनकर महातेजस्वी कुम्भयोनि (अगस्त्य) ने राम से यह कहा।
शृणु राम कथावृत्तं तस्य तेजोबलं महत् ।जघान शत्रून्येनासौ न च वध्यः स शत्रुभिः ।। ७.२.२ ॥
हे राम, सुनो - उसके महान तेज और बल की कथा, जिससे उसने शत्रुओं का वध किया, पर स्वयं शत्रुओं द्वारा वध्य नहीं था।
तावत्ते रावणस्येदं कुलं जन्म च राघव ।वरप्रदानं च तथा तस्मै दत्तं ब्रवीमि ते ।। ७.२.३ ॥
हे राघव, मैं तुम्हें रावण के कुल, उसके जन्म तथा उसे दिए गए वरदानों के विषय में बताता हूँ।
पुरा कृतयुगे राम प्रजापतिसुतः प्रभुः ।पुलस्त्यो नाम ब्रह्मर्षिः साक्षादिव पितामहः ।। ७.२.४ ॥
हे राम, पूर्वकाल में सतयुग में प्रजापति के पुत्र, ब्रह्मर्षि पुलस्त्य नामक एक प्रभु थे, जो साक्षात ब्रह्मा के समान थे।
नानुकीर्त्या गुणास्तस्य धर्मतः शीलतस्तथा ।प्रजापतेः पुत्र इति वक्तुं शक्यं हि नामतः ।। ७.२.५ ॥
उनके धर्म और शील के गुणों का पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता; उन्हें केवल प्रजापति-पुत्र कहकर ही संबोधित किया जा सकता है।
प्रजापतिसुतत्वेन देवानां वल्लभो हि सः ।हृष्टः सर्वस्य लोकस्य गुणैः शुभ्रैर्महामतिः ।। ७.२.६ ॥
प्रजापति-पुत्र होने के कारण वे देवताओं के प्रिय थे; अपने उज्ज्वल गुणों से वे महामति संपूर्ण संसार को प्रसन्न करते थे।
स तु धर्मप्रसङ्गेन मेरोः पार्श्वे महागिरेः ।तृणविन्द्वाश्रमं गत्वा न्यवसन्मुनिपुङ्गवः ।। ७.२.७ ॥
धर्म के प्रसंग में वह मुनिश्रेष्ठ महान मेरु पर्वत के निकट त्रिणबिन्दु के आश्रम में जाकर रहने लगे।
तपस्तेपे स धर्मात्मा स्वाध्यायनियतेन्द्रियः ।गत्वाश्रमपदं तस्य विघ्नं कुर्वन्ति कन्यकाः ।। ७.२.८ ॥
स्वाध्याय में संयमित इंद्रियों वाला वह धर्मात्मा वहाँ तपस्या करता था, परंतु कन्याएँ उसके आश्रम में जाकर विघ्न डालती थीं।
देवपन्नगकन्याश्च राजर्षितनयाश्च याः ।क्रीडन्त्यो ऽप्सरसश्चैव तं देशमुपपेदिरे ।। ७.२.९ ॥
देवताओं और नागों की कन्याएँ, राजर्षियों की पुत्रियाँ और क्रीड़ा करती अप्सराएँ उस स्थान पर आया करती थीं।
सर्वर्तुषृपभोग्यत्वाद्रम्यत्वात्काननस्य च ।नित्यशस्तास्तु तं देशं गत्वा क्रीडन्ति कन्यकाः ।। ७.२.१० ॥
सभी ऋतुओं में भोग्य होने के कारण तथा वन के रमणीय होने के कारण कन्याएँ सदा उस स्थान पर जाकर क्रीड़ा करती थीं।
देशस्य रमणीयत्वात्पुलस्त्यो यत्र स द्विजः ।गायन्त्यो वादयन्त्यश्च लासयन्त्यस्तथैव च ।मुनेस्तपस्विनस्तस्य विघ्नं चक्रुरनिन्दिताः ।। ७.२.११ ॥
जिस स्थान पर द्विज पुलस्त्य रहते थे उसकी रमणीयता के कारण वे निर्दोष कन्याएँ गाती, वाद्य बजाती और नृत्य करती हुई उस तपस्वी मुनि के तप में विघ्न डालती थीं।
अथ क्रुद्धो महातेजा व्याजहार महामुनिः ।या मे दर्शनमागच्छेत्सा गर्भं धारयिष्यति ।। ७.२.१२ ॥
तब क्रुद्ध होकर महातेजस्वी महामुनि ने कहा - जो कोई भी मेरे दर्शन को आएगी, वह गर्भवती हो जाएगी।
तास्तु सर्वाः प्रतिश्रुत्य तस्य वाक्यं महात्मनः ।ब्रह्मशापभयाद्भीतास्तं देशं नोपचक्रमुः ।। ७.२.१३ ॥
उन सब कन्याओं ने उस महात्मा के इस वचन को सुनकर ब्रह्म-शाप के भय से भयभीत होकर उस स्थान पर जाना छोड़ दिया।
तृणबिन्दोस्तु राजर्षेस्तनया न शृणोति तत् ।। ७.२.१४ ॥
किंतु राजर्षि त्रिणबिन्दु की पुत्री ने यह बात नहीं सुनी।
गत्वाश्रमपदं तत्र विचचार सुनिर्भया ।न सापश्यत्स्थिता तत्र काञ्चिदभ्यागतां सखीम् ।। ७.२.१५ ॥
वह उस आश्रम में जाकर निडर होकर विचरण करने लगी; परंतु वहाँ खड़े होकर उसने अपनी किसी भी सखी को नहीं देखा।
तस्मिन्काले महातेजाः प्राजापत्यो महानृषिः ।स्वाध्यायमकरोत्तत्र तपसा भावितः स्वयम् ।। ७.२.१६ ॥
उस समय महातेजस्वी महर्षि, प्रजापति के पुत्र, स्वयं तपस्या से पवित्र होकर वहाँ स्वाध्याय कर रहे थे।
सा तु वेदश्रुतिं श्रुत्वा दृष्ट्वा वै तपसो निधिम् ।अभवत्पाण्डुदेहा सा सुव्यञ्जितशरीरजा ।। ७.२.१७ ॥
वेद-ध्वनि सुनकर और उस तपोनिधि को देखकर वह पीली पड़ गई और उसका शरीर स्पष्ट रूप से बदलने लगा।
वभूव च समुद्विग्ना दृष्ट्वा तद्दोषमात्मनः ।इदं मे किन्त्विति ज्ञात्वा पितुर्गत्वा ऽ ऽश्रमे स्थिता ।। ७.२.१८ ॥
अपने में यह दोष देखकर वह अत्यंत व्याकुल हो गई और 'यह मुझे क्या हो गया' यह सोचकर अपने पिता के आश्रम में जाकर रहने लगी।
तां तु दृष्ट्वा तथाभूतां तृणविन्दुरथाब्रवीत् ।किं त्वमेतत्त्वसदृशं धारयस्यात्मनो वपुः ।। ७.२.१९ ॥
उसे उस अवस्था में देखकर त्रिणबिन्दु ने कहा - तुम अपने योग्य न लगने वाला यह शरीर क्यों धारण किए हो?
सा तु कृत्वाञ्जलिं दीना कन्योवाच तपोधनम् ।न जाने कारणं तात येन मे रूपमीदृशम् ।। ७.२.२० ॥
दुखी कन्या ने हाथ जोड़कर तपोधन से कहा - हे तात, मुझे नहीं मालूम कि मेरा रूप ऐसा क्यों हो गया।
किं तु पूर्वं गतास्म्येका महर्षेर्भावितात्मनः ।पुलस्त्यस्याश्रमं दिव्यमन्वेष्टुं स्वसखीजनम् ।। ७.२.२१ ॥
किंतु पहले मैं अकेली अपनी सखियों को ढूँढने भावितात्मा महर्षि पुलस्त्य के दिव्य आश्रम में गई थी।
न च पश्याम्यहं तत्र काञ्चिदभ्यागतां सखीम् ।रूपस्य तु विपर्यासं दृष्ट्वा त्रासादिहागता ।। ७.२.२२ ॥
वहाँ मुझे अपनी कोई सखी दिखाई नहीं दी; अपने रूप में यह परिवर्तन देखकर मैं भय से यहाँ आ गई हूँ।
तृणबिन्दुस्तु राजर्षिस्तपसा द्योतितप्रभः ।ध्यानं विवेश तच्चापि ह्यपश्यदृषिकर्मजम् ।। ७.२.२३ ॥
तपस्या से देदीप्यमान राजर्षि त्रिणबिन्दु ने ध्यान में प्रवेश किया और यह जान लिया कि यह ऋषि के कर्म से हुआ है।
स तु विज्ञाय तं शापं महर्षेर्भावितात्मनः ।गृहीत्वा तनयां गत्वा पुलस्त्यमिदमब्रवीत् ।। ७.२.२४ ॥
उस भावितात्मा महर्षि के शाप को जानकर वे अपनी पुत्री को लेकर पुलस्त्य के पास गए और यह बोले।
भगवंस्तनयां मे त्वं गुणैः स्वैरेव भूषिताम् ।भिक्षां प्रतिगृहाणेमां महर्षे स्वयमुद्यताम् ।। ७.२.२५ ॥
हे भगवन, मेरी यह पुत्री जो अपने ही गुणों से सुशोभित है, इसे स्वयं आई हुई भिक्षा के रूप में हे महर्षि, स्वीकार कीजिए।
तपश्चरणयुक्तस्य श्रम्यमाणेन्द्रियस्य ते ।शुश्रूषणपरा नित्यं भविष्यति न संशयः ।। ७.२.२६ ॥
तपस्या और इंद्रिय-संयम में लगे आपकी यह निःसंदेह सदा सेवा में तत्पर रहेगी।
तं ब्रुवाणं तु तद्वाक्यं राजर्षिं धार्मिकं तदा ।जिघृक्षुरब्रवीत्कन्यां बाढमित्येव स द्विजः ।। ७.२.२७ ॥
धर्मात्मा राजर्षि के इन वचनों को सुनकर, कन्या को ग्रहण करने का इच्छुक वह द्विज बस इतना ही बोला - 'ठीक है'।
दत्त्वा स तु यथान्यायं स्वमाश्रमपदं गतः ।सापि तत्रावसत्कन्या तोषयन्ती पतिं गुणैः ।। ७.२.२८ ॥
यथाविधि उसे देकर वे अपने आश्रम को लौट गए। वह कन्या वहाँ रहकर अपने पति को अपने गुणों से प्रसन्न करने लगी।
तस्यास्तु शीलवृत्ताभ्यां तुतोष मुनिपुङ्गवः ।प्रीतः स तु महातेजा वाक्यमेतदुवाच ह ।। ७.२.२९ ॥
उसके शील और आचरण से वह मुनिश्रेष्ठ संतुष्ट हुए; प्रसन्न होकर महातेजस्वी पुलस्त्य ने यह वचन कहा।
परितुष्टो ऽस्मि सुश्रोणि गुणानां सम्पदा भृशम् ।तस्माद्देवि ददाम्यद्य पुत्रमात्मसमं तव ।। ७.२.३० ॥
हे सुश्रोणि, मैं तुम्हारे गुणों की संपदा से अत्यंत संतुष्ट हूँ; इसलिए हे देवि, मैं आज तुम्हें अपने समान पुत्र देता हूँ।
उभयोर्वंशकर्तारं पौलस्त्य इति विश्रुतम् ।यस्मात्तु विश्रुतो वेदस्त्वयैषो ऽध्ययतो मम ।। ७.२.३१ ॥
जो दोनों वंशों का संस्थापक होगा और पौलस्त्य नाम से प्रसिद्ध होगा; चूँकि मुझसे अध्ययन करते हुए तुमसे वेद प्रसिद्ध हुआ -
तस्मात्स विश्रवा नाम भविष्यति न संशयः ।एवमुक्ता तु सा देवी प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।। ७.२.३२ ॥
- इसलिए वह निःसंदेह विश्रवा नाम से जाना जाएगा। ऐसा कहे जाने पर वह देवी प्रसन्न हृदय से -
अचिरेणैव कालेनासूत विश्रवसं सुतम् ।त्रिषु लोकेषु विख्यातं यशोधर्मसमन्वितम् ।। ७.२.३३ ॥
- कुछ ही समय में विश्रवा नामक पुत्र को जन्म दिया, जो तीनों लोकों में यश और धर्म से युक्त होकर प्रसिद्ध हुआ।
श्रुतिमान्समदर्शी च व्रताचाररतस्तथा ।पितेव तपसा युक्तो ह्यभवद्विश्रवा मुनिः ।। ७.२.३४ ।।
शास्त्रों का ज्ञाता, समदर्शी, व्रत-आचार में रत मुनि विश्रवा अपने पिता के समान तपस्या से युक्त हो गया।
अथ पुत्रः पुलस्त्यस्य विश्रवा मुनिपुङ्गवः ।अचिरेणैव कालेन पितेव तपसि स्थितः ।। ७.३.१ ॥
फिर पुलस्त्य के पुत्र मुनिश्रेष्ठ विश्रवा कुछ ही समय में अपने पिता के समान तपस्या में स्थित हो गए।
सत्यवाञ्छीलवाञ्छान्तः स्वाध्यायनिरतः शुचिः ।सर्वभोगेष्वसंसक्तो नित्यं धर्मपरायणः ।। ७.३.२ ॥
सत्यवादी, शीलवान, शांत, स्वाध्याय में लीन, पवित्र, सभी भोगों से अनासक्त और सदा धर्मपरायण।
ज्ञात्वा तस्य तु तद्वृत्तं भरद्वाजो महामुनिः ।ददौ विश्रवसे भार्यां स्वसुतां देववर्णिनीम् ।। ७.३.३ ॥
उनके आचरण को जानकर महामुनि भरद्वाज ने अपनी देवतुल्य सुंदर पुत्री विश्रवा को पत्नी रूप में दी।
प्रतिगृह्य तु धर्मेण भरद्वाजसुतां तदा ।प्रजान्वेक्षिकया बुद्ध्या श्रेयो ह्यस्य विचिन्तयन् ।। ७.३.४ ॥
तब विश्रवा ने धर्मपूर्वक भरद्वाज की पुत्री को पत्नी रूप में ग्रहण किया और श्रेष्ठ संतान उत्पन्न करने की भावना से उसके कल्याण का विचार करने लगे।
मुदा परमया युक्तो विश्रवा मुनिपुङ्गवः ।स तस्यां वीर्यसम्पन्नमपत्यं परमाद्भुतम् ।। ७.३.५ ॥
अत्यंत प्रसन्न होकर मुनिश्रेष्ठ विश्रवा ने उसमें बल-पराक्रम से संपन्न एक अद्भुत संतान उत्पन्न की।
जनयामास धर्मज्ञः सर्वैर्ब्रह्मगुणैर्युतम् ।तस्मिञ्जाते तु संहृष्टः सम्बभूव पितामहः ।। ७.३.६ ॥
धर्मज्ञ विश्रवा ने ब्राह्मण के समस्त गुणों से युक्त पुत्र को जन्म दिया; उसके जन्म पर पितामह ब्रह्मा अत्यंत हर्षित हुए।
दृष्ट्वा श्रेयस्करीं बुद्धिं धनाध्यक्षो भविष्यति ।नाम तस्याकरोत्प्रीतः सार्धं देवर्षिभिस्तदा ।। ७.३.७ ॥
उसकी कल्याणकारी बुद्धि देखकर और यह जानकर कि वह धन का अधिपति बनेगा, प्रसन्न ब्रह्मा ने देवर्षियों के साथ मिलकर उसका नामकरण किया।
यस्माद्विश्रवसो ऽपत्यं सादृश्याद्विश्रवा इव ।तस्माद्वैश्रवणो नाम भविष्यत्वेष विश्रुतः ।। ७.३.८ ॥
चूँकि वह विश्रवा का पुत्र था और रूप में उन्हीं के समान था, इसलिए वह वैश्रवण नाम से विख्यात होगा।
स तु वैश्रवणस्तत्र तपोवनगतस्तदा ।अवर्धताहुतिहुतो महातेजा यथानलः ।। ७.३.९ ॥
वह वैश्रवण उस तपोवन में रहते हुए आहुति से प्रज्वलित अग्नि के समान महातेजस्वी होकर बढ़ने लगा।
तस्याश्रमपदस्थस्य बुद्धिर्जज्ञे महात्मनः ।चरिष्ये परमं धर्मं धर्मो हि परमा गतिः ।। ७.३.१० ॥
आश्रम में रहते हुए उस महात्मा के मन में विचार उठा, 'मैं परम धर्म का आचरण करूँगा, क्योंकि धर्म ही परम गति है।'
स तु वर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महावने ।यन्त्रितो नियमैरुग्रैश्चकार सुमहत्तपः ।। ७.३.११ ॥
वे उस विशाल वन में हजार वर्षों तक कठोर नियमों में बंधकर अत्यंत महान तपस्या करते रहे।
पूर्णे वर्षसहस्रान्ते तं तं विधिमकल्पयत् ।जलाशी मारुताहारो निराहारस्तथैव च ।। ७.३.१२ ॥
प्रत्येक हजार वर्ष पूर्ण होने पर वे नियम बदलते गए—कभी केवल जल पीकर, कभी वायु पीकर और कभी पूर्णतः निराहार रहकर तप करते।
एवं वर्षसहस्राणि जग्मुस्तान्येकवर्षवत् ।अथ प्रीतो महातेजाः सेन्द्रैः सुरगणैः सह ।। ७.३.१३ ॥
इस प्रकार हजारों वर्ष एक वर्ष के समान बीत गए; तब प्रसन्न होकर महातेजस्वी ब्रह्मा इंद्र सहित देवगणों के साथ...।
गत्वा तस्याश्रमपदं ब्रह्मेदं वाक्यमब्रवीत् ।परितुष्टो ऽस्मि ते वत्स कर्मणानेन सुव्रत ।वरं वृणीष्व भद्रं ते वरार्हस्त्वं महामते ।। ७.३.१४ ॥
...उसके आश्रम में जाकर ब्रह्मा ने कहा, 'हे व्रतशील पुत्र, मैं तुम्हारे इस कर्म से अत्यंत संतुष्ट हूँ। वर मांगो, तुम्हारा कल्याण हो, हे महामते, तुम वर पाने के योग्य हो।'
अथाब्रवीद्वैश्रवणः पितामहमुपस्थितम् ।भगवँल्लोकपालत्वमिच्छेयं वित्तरक्षणम् ।। ७.३.१५ ॥
तब वैश्रवण ने सामने खड़े पितामह ब्रह्मा से कहा, 'भगवन्, मैं लोकपाल और धन का रक्षक बनना चाहता हूँ।'
अथाब्रवीद्वैश्रवणं परितुष्टेन चेतसा ।ब्रह्मा सुरगणैः सार्धं बाढमित्येव हृष्टवत् ।। ७.३.१६ ॥
तब प्रसन्नचित्त ब्रह्मा ने देवगणों सहित हर्षपूर्वक वैश्रवण से कहा, 'ऐसा ही हो।'
अहं वै लोकपालानां चतुर्थं स्रष्टुमुद्यतः ।। ७.३.१७ ॥
'मैं लोकपालों में एक चौथे लोकपाल की सृष्टि करने के लिए ही उद्यत था।'
यमेन्द्रवरुणानां च पदं यत्तव चेप्सितम् ।तद्गच्छ त्वं हि धर्मज्ञ निधीशत्वमवाप्नुहि ।शक्राम्बुपयमानां च चतुर्थस्त्वं भविष्यसि ।। ७.३.१८ ॥
'हे धर्मज्ञ, जो पद तुम चाहते हो वह यम, इंद्र और वरुण के समान पद है, वहाँ जाओ, निधियों के स्वामी बनो; तुम इंद्र, वरुण और यम के साथ चौथे लोकपाल बनोगे।'
एतच्च पुष्पकं नाम विमानं सूर्यसन्निभम् ।प्रतिगृह्णीष्व यानार्थं त्रिदशैः समतां व्रज ।। ७.३.१९ ॥
'और यह सूर्य के समान तेजस्वी पुष्पक नामक विमान अपने वाहन के लिए ग्रहण करो; देवताओं के समान पद प्राप्त करो।'
स्वस्ति ते ऽस्तु गमिष्यामः सर्व एव यथागतम् ।कृतकृत्या वयं तात दत्त्वा तव वरद्वयम् ।। ७.३.२० ॥
'तुम्हारा कल्याण हो; हम सब जैसे आए थे वैसे ही लौट जाएंगे। हे तात, तुम्हें ये दो वर देकर हम कृतकृत्य हो गए।'
इत्युक्त्वा स गतो ब्रह्मा स्वस्थानं त्रिदशैः सह ।। ७.३.२१ ॥
ऐसा कहकर ब्रह्मा देवताओं सहित अपने स्थान को चले गए।
गतेषु ब्रह्मपूर्वेषु देवेष्वथ नभस्थलम् ।वने स पितरं प्राह प्राञ्जलिः प्रयतात्मवान् ।निवासनं न मे देवो विदधे स प्रजापतिः ।। ७.३.२२ ॥
ब्रह्मा तथा देवताओं के आकाश मार्ग से चले जाने पर, वन में संयतचित्त वैश्रवण ने हाथ जोड़कर अपने पिता से कहा, 'प्रजापति भगवान ने मुझे निवास स्थान नहीं दिया।'
भगवँल्लब्धवानस्मि वरमिष्टं पितामहात् ।तं पश्य भगवन्कञ्चिन्निवासं साधु मे प्रभो ।। ७.३.२३ ॥
'भगवन्, मैंने पितामह से इच्छित वर प्राप्त किया है। अब हे प्रभु, आप मेरे लिए कोई अच्छा निवास स्थान बताइए।'
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
वाल्मीकि रामायण का उत्तरकाण्ड किस विषय में है?
अंतिम काण्ड राम के राज्याभिषेक और राम-राज्य के स्वर्ण-युग, रावण और हनुमान की पूर्व-कथाओं, लव-कुश के जन्म — जो स्वयं वाल्मीकि से रामायण सीखते हैं — और सीता के पृथ्वी में समाने की कथा कहता है, और इस प्रकार आदि काव्य का समापन होता है।
वाल्मीकि रामायण क्या है?
वाल्मीकि रामायण श्री राम की मूल संस्कृत महाकाव्य है, जिसे महर्षि वाल्मीकि ने रचा और जो आदि काव्य (प्रथम काव्य) के रूप में पूजित है। इसमें सात काण्ड हैं: बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर, युद्ध और उत्तर; यही तुलसीदास की रामचरितमानस सहित अनेक परवर्ती रामायणों का स्रोत है।
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