संतोषी माता चालीसा का सम्पूर्ण पाठ, अर्थ, शुक्रवार व्रत विधि तथा माता की कृपा से मिलने वाले लाभ।
संतोषी माता संतोष और सुख-शांति की देवी हैं, जिनकी पूजा विशेष रूप से भारतीय गृहस्थ जीवन में अत्यंत लोकप्रिय है। शुक्रवार का व्रत रखने वाली महिलाएं तथा अन्य भक्त घर में कलह दूर करने, मन की शांति पाने और मनोकामना पूर्ण करने के लिए संतोषी माता चालीसा का पाठ करते हैं। यह चालीसा सरल किंतु अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है, विशेषकर सोलह शुक्रवार के व्रत के समय।
सम्पूर्ण संतोषी माता चालीसा (देवनागरी)
दोहा
जय संतोषी मातु भवानी। सत्य सनातन ब्रह्म समानी॥ जय जय जय संतोषी माता। ऋद्धि सिद्धि सुख सम्पति दाता॥
चौपाई
जय जय जय संतोषी माता। पूरण करो हमारी बाता॥ सत्य सनातन तुम्हरो नामा। सब जग में है पूरण कामा॥
गणपति की तुम पुत्री प्यारी। मातु तुम्हीं संकट की हारी॥ शुक्रवार तेरो दिन प्यारा। भक्तन को देती हो सहारा॥
पीत वस्त्र और पुष्प तुम्हारे। गुड़ चना भोग तुम्हें प्यारे॥ भक्त तुम्हारे द्वार पे आवें। सुख शांति संतोष सब पावें॥
क्रोध कलह से रहत निराली। शांति स्वरूपा दयालु वाली॥ जो नर तुमको ध्यान लगावे। सो सुख सम्पति सहज ही पावे॥
निर्धन को धन देत सदाई। रोगी को हो रोग मिटाई॥ पुत्रहीन को पुत्र प्रदाता। सबकी सुनती हो जगमाता॥
व्रत करने की विधि है न्यारी। सोलह शुक्रवार व्रत भारी॥ गुड़ चना से भोग लगावें। खट्टी वस्तु न मुख में लावें॥
सत्य धर्म से रहना भाई। संतोषी माँ सुनत सुनाई॥ जो यह व्रत श्रद्धा से करई। ता के सब संकट दूर टरई॥
पति पत्नी में प्रेम बढ़ावे। घर में सुख शांति बरसावे॥ संतोष रूप तुम्हारो प्यारा। जो चाहे भव सागर पारा॥
तुम बिन जग में कोई न मेरा। तुम ही करती हो भव फेरा॥ सुनो सुनो हे मातु हमारी। विनती है यह मातु तुम्हारी॥
संकट मोचन नाम तुम्हारा। संतोषी हो जगत उजियारा॥ जो यह चालीसा नित गावे। मन वांछित फल निश्चय पावे॥
निर्बल के तुम बल हो माता। निर्धन के धन सुख विधाता॥ रोग शोक सब दूर भगाओ। संतोषी माँ कृपा दिखाओ॥
तेरे भक्त तुम्हीं को ध्यावें। सदा तुम्हारे गुण को गावें॥ जो यह पाठ करे मन लाई। ता को मिले सुख शांति सदाई॥
घर में हो कलह कलेशा। संतोषी माँ हरे सब क्लेशा॥ सास बहू में प्रेम बढ़ावे। पति पत्नी को मिलन कराव॥
आलस त्यागि करो सेवा। जागृत होंय सकल देवा॥ संतोषी माँ की जय बोलो। मन के सब पट खोलो खोलो॥
जो नर तेरा ध्यान लगावे। सो नर सुख सम्पति नित पावे॥ जय जय जय संतोषी माता। पूर्ण करो सबकी सुखदाता॥
दोहा
संतोषी माँ की आरती। जो कोई नित गाय। मनवांछित फल पाय के। सुख सम्पति घर आय॥
॥इति श्री संतोषी माता चालीसा सम्पूर्णम्॥
अर्थ
आरंभिक दोहे में संतोषी माता को सनातन ब्रह्म स्वरूपा, ऋद्धि-सिद्धि तथा सुख-सम्पत्ति देने वाली देवी बताया गया है। चौपाइयों में उन्हें गणेश जी की पुत्री कहा गया है, जिन्हें शुक्रवार का दिन अत्यंत प्रिय है तथा जो गुड़-चना और पीले वस्त्र-पुष्प के सामान्य भोग से भी प्रसन्न हो जाती हैं। यह उनकी सरलता और भक्तों की श्रद्धा को महत्व देने वाले स्वभाव को दर्शाता है।
चौपाइयों में बताया गया है कि माता क्रोध और कलह से दूर रहती हैं, गरीब को धन, रोगी को आरोग्य और संतानहीन को संतान प्रदान करती हैं। सोलह शुक्रवार व्रत का सीधा उल्लेख है, जिसमें भक्त खट्टी वस्तु का त्याग करते हैं और सत्य-धर्म से आचरण करते हैं। चालीसा का केंद्रीय भाव यह है कि माता का सबसे बड़ा वरदान संतोष ही है — वह मन की शांति जो पति-पत्नी, सास-बहू के संबंधों में प्रेम और घर में सुख-शांति लाती है। अंतिम पंक्तियों में वचन दिया गया है कि जो श्रद्धापूर्वक यह चालीसा पढ़ता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।
संतोषी माता चालीसा पढ़ने का महत्व
बीसवीं शताब्दी में संतोषी माता उत्तर भारत के घर-घर में पूजी जाने वाली देवी बन गईं, विशेषकर उनके सरल शुक्रवार व्रत के कारण, जिसे बिना किसी बड़े अनुष्ठान के कोई भी कर सकता है। भक्त घर में कलह, आर्थिक तंगी, विवाह अथवा संतान में विलंब, या केवल मन की अशांति के समय माता की शरण में जाते हैं। यह चालीसा छोटी परंतु प्रभावशाली प्रार्थना है, जिसे रोज पढ़ा जा सकता है और जो श्रद्धापूर्ण भक्ति के फल का पूर्ण आश्वासन देती है।
पाठ विधि, समय और दिन
उत्तम दिन: शुक्रवार, विशेषकर सोलह शुक्रवार व्रत के दौरान, यद्यपि दैनिक पाठ भी किया जा सकता है।
समय: स्नान के पश्चात प्रातःकाल अथवा संध्या समय दीपक जलाकर।
भोग: पीले पुष्प, पीला वस्त्र तथा गुड़-चना का सामान्य भोग। व्रत के दिन भक्त स्वयं भी खट्टी वस्तु का सेवन न करें।
विधि: संतोषी माता के चित्र के समक्ष घी का दीपक जलाएं, दोहे सहित सम्पूर्ण चालीसा का पाठ करें, तत्पश्चात संक्षिप्त आरती करें। प्रारंभ में पुस्तक देखकर पाठ करें, अभ्यास होने पर कंठस्थ करके अर्थ पर ध्यान देते हुए पढ़ें, केवल शीघ्रता से नहीं।
संख्या: चालीसा के लिए कोई निश्चित माला संख्या नहीं है — श्रद्धापूर्वक एक बार का पाठ पर्याप्त माना जाता है। कुछ भक्त नए व्रत चक्र के पहले शुक्रवार को तीन या सात बार पाठ करते हैं।
व्रत के नियम
करें: व्रत के दिन सत्य बोलें, कलह से बचें। गुड़-चना का प्रसाद बांटें, विशेषकर बच्चों में। मन को शांत और कृतज्ञ रखें, फल की चिंता किए बिना।
न करें: व्रत के दिन खट्टी वस्तु (नींबू, इमली, दही-आधारित खट्टे व्यंजन, अचार) का सेवन न करें। बिना उद्यापन किए बीच में व्रत न छोड़ें — यदि किसी शुक्रवार बीमारी या यात्रा के कारण व्रत छूट जाए तो अगले शुक्रवार से श्रद्धापूर्वक पुनः आरंभ करें, व्रत त्यागें नहीं।
महात्म्य
लोक-परंपरा में संतोषी माता को शक्ति का ऐसा स्वरूप माना जाता है जो गणेश परिवार से जुड़ा है — कुछ कथाओं के अनुसार वे गणेश जी के पुत्रों शुभ और लाभ की सामूहिक प्रसन्नता (संतोष) से प्रकट हुईं, इस प्रकार वे शिव-पार्वती की पौत्री मानी जाती हैं। उनकी पूजा इसलिए व्यापक हुई क्योंकि उनका व्रत बिना पुरोहित, बिना संस्कृत मंत्र-ज्ञान और बिना महंगी सामग्री के केवल श्रद्धा, धैर्य और सरल भोग से पूर्ण होता है। यही सरलता उनके महात्म्य का केंद्र है — वे गृहस्थ भक्त से उसकी वर्तमान स्थिति में ही मिलती हैं।
संतोषी माता चालीसा के लाभ
श्रद्धापूर्वक चालीसा पढ़ने वाले भक्तों को घर में अधिक सामंजस्य और शांति, लंबे समय से चली आ रही आर्थिक अथवा पारिवारिक चिंता से राहत, विवाह-संतान जैसी लंबित इच्छाओं की पूर्ति, तथा सबसे महत्वपूर्ण — वह स्थायी संतोष प्राप्त होता है जो बाहरी परिस्थितियां बदलने से पहले ही मन की बेचैनी को शांत कर देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: क्या पुरुष भी संतोषी माता चालीसा पढ़ सकते हैं, या यह केवल महिलाओं के लिए है? उत्तर: कोई भी — पुरुष, महिला या बालक — चालीसा पढ़कर माता का आशीर्वाद पा सकता है। सोलह शुक्रवार व्रत परंपरागत रूप से महिलाओं में अधिक प्रचलित है, परन्तु चालीसा सभी श्रद्धालुओं के लिए है।
प्रश्न: यदि सोलह शुक्रवार व्रत के बीच में कोई शुक्रवार छूट जाए तो क्या करें? उत्तर: यथासंभव निरंतरता बनाए रखें, परन्तु यदि बीमारी, यात्रा या किसी अपरिहार्य कारण से कोई शुक्रवार छूट जाए तो अगले शुक्रवार से श्रद्धापूर्वक पुनः आरंभ करें और व्रत त्यागने के बजाय सोलह शुक्रवार पूर्ण करके उद्यापन करें।
प्रश्न: क्या चालीसा के साथ कोई विशेष मंत्र भी जपना चाहिए? उत्तर: चालीसा स्वयं में सम्पूर्ण प्रार्थना है। कई भक्त पाठ आरंभ करने से पहले "ॐ संतोषी माता नमः" कुछ बार जपते हैं, परन्तु यह ऐच्छिक है।
प्रश्न: प्रसाद में क्या अर्पित करना चाहिए? उत्तर: गुड़ और चना सबसे महत्वपूर्ण और परंपरागत भोग है; व्रत के दिन भोग अथवा भक्त के अपने भोजन में खट्टी वस्तु कभी शामिल न करें।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Santoshi Mata mantra
Om Shri Santoshi Matayai Namah
Chant on Friday or during the vrat with a calm and grateful heart.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या पुरुष भी संतोषी माता चालीसा पढ़ सकते हैं?
कोई भी चालीसा पढ़ सकता है; सोलह शुक्रवार व्रत परंपरागत रूप से महिलाओं में अधिक प्रचलित है, परन्तु चालीसा सभी के लिए है।
यदि व्रत के बीच में शुक्रवार छूट जाए तो क्या करें?
अगले शुक्रवार से श्रद्धापूर्वक पुनः आरंभ करें, व्रत त्यागें नहीं, सोलह शुक्रवार पूर्ण करके उद्यापन करें।
क्या चालीसा के साथ कोई विशेष मंत्र जपें?
चालीसा स्वयं सम्पूर्ण प्रार्थना है। पाठ से पहले 'ॐ संतोषी माता नमः' जपना ऐच्छिक है।
प्रसाद में क्या अर्पित करें?
गुड़-चना सबसे महत्वपूर्ण भोग है; खट्टी वस्तु कभी न अर्पित करें और न स्वयं ग्रहण करें।
संतोषी माता का आशीर्वाद चाहते हैं?
घर में शांति और संतोष के लिए संतोषी माता को समर्पित पूजा बुक करें।







