श्री साईं बाबा चालीसा का सम्पूर्ण पाठ, अर्थ, महत्व एवं पूजन विधि सहित।
शिरडी के साईं बाबा को सभी धर्मों में एक संत के रूप में पूजा जाता है, जिन्होंने अपने प्रसिद्ध उपदेश 'सबका मालिक एक' के माध्यम से ईश्वर की एकता सिखाई। उन्होंने शिरडी की द्वारकामाई मस्जिद में सरल जीवन व्यतीत किया, हर धर्म के भक्तों का समान स्वागत किया तथा उपचार, रक्षा व कृपा के अनगिनत चमत्कार दिखाए। उनके दो मार्गदर्शक सिद्धांत — श्रद्धा और सबूरी — उनकी शिक्षा का मूल आधार हैं। साईं बाबा चालीसा उनके सम्मान में रचित चालीस चौपाइयों का स्तोत्र है, जो शिरडी में उनके जीवन, गरीबों व दुखियों के प्रति करुणा तथा श्रद्धा से स्मरण करने वालों को मिलने वाले आशीर्वाद का वर्णन करता है।
सम्पूर्ण साईं बाबा चालीसा (देवनागरी)
दोहा सद्गुरु साईं दया करो, दीजो ज्ञान अपार। शिरडी वासी संत तुम, हरो जगत को भार।।
चौपाई जय जय जय जय साईं बाबा। तुम हो सबके सुख के दाता।। शिरडी धाम तुम्हारा प्यारा। दर्शन पावें भक्त हमारा।। द्वारकामाई में तुम बसते। भक्तन के दुख पल में हरते।। फकीर वेश में तुम आए। जग को सन्मारग दिखाए।। हिंदू मुस्लिम भेद मिटाया। सबको एक समान बताया।। सबका मालिक एक बताया। सत्य सनातन मार्ग दिखाया।। उदी भभूत तुम्हारी प्यारी। लगावत मिटे विपत्ति सारी।। नीम तले तुम बैठे धाम। सब जन जपते साईं नाम।। लेंडी बाग में भ्रमण करते। शीतल छाया सबको देते।। गरीब सबूरी दो गुण न्यारे। तुमने सिखाए भक्तन प्यारे।। श्रद्धा सबूरी नाम है मंत्र। जपत मिटे सब भव का तंत्र।। गरीबों के तुम मददगारा। भूखे को अन्न सदा दे प्यारा।। रोगी को तुम रोग मिटाते। दुखियारों को शांति दिलाते।। झोली फैलाओ जो भी आवे। खाली हाथ न वापस जावे।। शिरडी में जो शीश नवावे। मन वांछित फल निश्चय पावे।। गुरुवार को व्रत जो रखते। सब मनोरथ पूरन करते।। बाबा की महिमा है न्यारी। भक्तन पर करुणा है भारी।। शमा मस्जिद में अखंड जोत। जलती रहती दिन रात नित।। धूनी माई सदा है जलती। भक्तन के संकट को हरती।। चमत्कार बाबा के भारी। सुनकर होय हृदय सुखकारी।। दीपक तेल बिना जो जलाया। जल से दीप प्रज्वलित कराया।। मुर्दे को जीवन जो दीन्हा। ऐसा चमत्कार कर दीन्हा।। आग जल बन गई पल भरमे। ऐसी लीला रची अनूपम में।। भक्तन के सब कष्ट मिटाए। संकट में तुरतहि सहाए।। शेगांव वाले भी तुम्हीं हो। पंढरपुर के विट्ठल तुम्ही हो।। राम कृष्ण तुम स्वयं कहाए। भक्तन को दर्शन दे आए।। ग्यारह वचन दिए तुम प्यारे। जो पालें सुख पावें सारे।। शिरडी आवे जो नर कोई। सुख शांति उसको हो सोई।। दूर से मुझको जो भी ध्यावे। मैं सहायता तुरत पहुँचावे।। दुखी जो मुझसे सहायता मांगे। दुख उसका मैं दूर भगाऊँ।। चरणामृत तीरथ जो होई। कष्ट निवारण मेरे सोई।। सतगुरु साईं शरण जो आवे। भव बंधन से मुक्त हो जावे।। गुरु चरित्र अरु साईं सतचरित। पढ़त सुनत मिट जाए विपत्ति।। ग्यारह गुरुवार व्रत जो करते। मन इच्छित सब फल वे धरते।। दक्षिणा माँग के भक्ति सिखाई। श्रद्धा से जो भी वह पाई।। बाबा तेरी अपरम्पार कहानी। जितनी गाऊँ उतनी थोड़ी जानी।। भक्त वत्सल तुम करुणा सागर। शरणागत के तुम रखवाला।। साईं नाम है अमर सहारा। जपत मिटे भव संकट सारा।। यह चालीसा जो नित गावे। साईं कृपा अखंड सो पावे।। अंत समय साईं दर्शन दीजे। शिरडी धाम में स्थान वह दीजे।।
दोहा जय जय जय जय साईं बाबा, कृपा करो महाराज। शरण पड़ा हूँ आपकी, राखो मेरी लाज।।
अर्थ
प्रारंभिक दोहे में सद्गुरु साईं को प्रणाम किया गया है, जो असीम ज्ञान देने वाले तथा जगत का भार हरने वाले शिरडी के संत हैं।
प्रथम आठ चौपाइयों में उनके फकीर वेश में शिरडी आगमन, द्वारकामाई मस्जिद में निवास, हिंदू-मुस्लिम भेद मिटाकर 'सबका मालिक एक' का संदेश देने तथा विपत्ति हरने वाली पवित्र उदी की महिमा का वर्णन है।
नौवीं से सोलहवीं चौपाई तक नीम के वृक्ष के नीचे उनके जीवन, लेंडी बाग में भ्रमण, श्रद्धा-सबूरी के दो मार्गदर्शक सिद्धांत, गरीबों व भूखों के प्रति उदारता तथा रोगियों व दुखियों के उपचार का वर्णन है।
सत्रहवीं से चौबीसवीं चौपाई तक शमा मस्जिद की अखंड ज्योति, भक्तों के संकट हरने वाली धूनी माई तथा जल से दीप जलाने जैसे अनेक चमत्कारों का वर्णन है जो हृदय को सुख देते हैं।
पच्चीसवीं से बत्तीसवीं चौपाई में उन्हें शेगांव के साईं व पंढरपुर के विट्ठल तथा राम-कृष्ण के समान बताया गया है, उनके ग्यारह वचनों (साईं के ग्यारह वादे) का उल्लेख है तथा दूर से स्मरण करने पर भी सहायता पहुंचाने का आश्वासन दिया गया है।
तैंतीसवीं से चालीसवीं चौपाई में गुरु चरित्र व साईं सतचरित्र पढ़ने का पुण्य, ग्यारह गुरुवार व्रत तथा दक्षिणा मांगकर श्रद्धा सिखाने की उनकी सरल शिक्षा का उल्लेख है; अंत में नित्य चालीसा गाने वालों को अखंड कृपा प्राप्त होने का आश्वासन तथा अंत समय शिरडी में दर्शन व स्थान की प्रार्थना है।
समापन दोहे में साईं बाबा की जय बोली गई है तथा महाराज से कृपा व शरणागत की लाज रखने की प्रार्थना की गई है।
चालीसा पढ़ने का महत्व
साईं बाबा चालीसा का पाठ अटूट श्रद्धा व सबूरी (धैर्य) जगाता है, बाधाओं व कष्टों को दूर करता है तथा बाबा की रक्षात्मक व करुणामयी उपस्थिति जीवन में लाता है — बिना किसी धार्मिक भेदभाव के, उनकी अपनी सार्वभौमिक एकता की शिक्षा के अनुरूप।
पाठ विधि एवं समय
साईं बाबा चालीसा का पाठ प्रतिदिन करें, विशेषकर गुरुवार (उनका सर्वाधिक पवित्र दिन) को साईं बाबा की छवि अथवा मूर्ति के सम्मुख। तिल या सरसों के तेल का दीपक जलाएं, उपलब्ध हो तो श्रद्धापूर्वक उदी अर्पित करें और शांत, विश्वासपूर्ण हृदय से पाठ करें। ग्यारह गुरुवार का पारंपरिक व्रत रखते हुए चालीसा व साईं सतचरित्र का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
नियम एवं वर्जनाएं
बाबा की शिक्षाओं को विनम्रता से तथा जाति, पंथ या धर्म के भेदभाव के बिना अपनाएं, जैसा उन्होंने स्वयं सिखाया। पाठ को केवल भौतिक लाभ हेतु व्यवहार न मानें; सच्ची श्रद्धा व सबूरी विकसित करें। विशेष पूजन के दिनों में नशा व मांसाहार से दूर रहें और अपने द्वार पर आए किसी जरूरतमंद को कभी खाली हाथ न लौटाएं, बाबा की करुणा का अनुसरण करते हुए।
महिमा
साईं बाबा का शिरडी में जीवन पूजनीय साईं सतचरित्र में वर्णित है, जो हर पृष्ठभूमि के भक्तों के लिए उनके अनगिनत उपचार, रक्षा व कृपा के चमत्कारों का वर्णन करता है। उनकी सरल शिक्षा — श्रद्धा रखो और धैर्यवान बनो — आज भी विश्व भर के करोड़ों भक्तों का मार्गदर्शन करती है जो शिरडी दर्शन करते हैं अथवा घर में उनकी छवि सुख व शक्ति के स्रोत के रूप में रखते हैं।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Hanuman mantra
Om Hanumate Namah
Chant on Tuesday or Saturday for strength, protection, and devotion.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
साईं बाबा चालीसा पढ़ने का सर्वोत्तम समय क्या है?
गुरुवार साईं बाबा हेतु सर्वाधिक पवित्र माना जाता है, परंतु चालीसा प्रतिदिन प्रातः अथवा संध्या उनकी छवि या मूर्ति के सम्मुख पढ़ी जा सकती है।
साईं बाबा की पूजा कौन कर सकता है?
साईं बाबा ने 'सबका मालिक एक' की शिक्षा से हर धर्म के भक्तों का समान स्वागत किया। कोई भी, चाहे उसकी आस्था या पृष्ठभूमि कुछ भी हो, यह चालीसा पढ़ सकता है।
ग्यारह गुरुवार व्रत का क्या महत्व है?
चालीसा व साईं सतचरित्र पढ़ते हुए लगातार ग्यारह गुरुवार व्रत रखना एक परंपरागत साधना है जो सच्ची मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु मानी जाती है।
'श्रद्धा' व 'सबूरी' का क्या अर्थ है?
श्रद्धा का अर्थ है अटूट विश्वास और सबूरी का अर्थ है धैर्यपूर्ण सहनशीलता — भक्त की आध्यात्मिक यात्रा हेतु साईं बाबा की ये दो मुख्य शिक्षाएं हैं।
साईं बाबा का आशीर्वाद पाएं
साईं बाबा के नाम पर संकल्पित पूजा अर्पित करें और अपने जीवन में श्रद्धा, धैर्य व सुरक्षा की कृपा आमंत्रित करें।







