ब्रज की प्रियतमा राधा रानी की संपूर्ण आरती देवनागरी में अर्थ, महत्व व सही पूजन विधि सहित।
राधा रानी, कृष्ण की चिरंतन प्रियतमा, संपूर्ण ब्रज में — बरसाना, वृंदावन, राधाकुंड व मथुरा में — केवल कृष्ण की सहचरी के रूप में ही नहीं, अपितु दिव्य प्रेम, भक्ति व समर्पण की साक्षात मूर्ति के रूप में पूजी जाती हैं। राधा भक्ति के मार्ग पर चलने वाले श्रद्धालु मानते हैं कि उनकी कृपा से ही सच्चे अर्थों में कृष्ण की प्राप्ति होती है, इसीलिए ब्रज में अभिवादन "जय श्री कृष्णा" से नहीं अपितु "राधे राधे" अथवा "जय श्री राधे" से किया जाता है।
प्रतिदिन संध्या उन्हें गाई जाने वाली आरती उन्हें वृषभानु की प्रियतम पुत्री, ब्रज की रानी, चंद्रमुखी के रूप में मनाती है, जिनकी सुंदरता व कृपा से वृंदावन जगमगाता है, तथा जो यमुना के वनों में श्याम की चिरंतन संगिनी हैं। इस आरती को श्रद्धापूर्वक गाना कृष्ण भक्ति परंपरा में दिव्य स्त्रीत्व के प्रति भक्तों के प्रेम को व्यक्त करने के सर्वाधिक हृदयस्पर्शी तरीकों में से एक है।
संपूर्ण आरती (देवनागरी)
जय जय श्री राधे, जय जय वृषभानु दुलारी । श्याम प्रिया तुम, ब्रज की रानी, महिमा अपरम्पारी । जय जय श्री राधे ।
बरसाने की छवि निराली, कीरत नंदन प्यारी । सोने के महल सजे हैं तेरे, संग सखी सब भारी । जय जय श्री राधे ।
श्याम संग रास रचावत, यमुना तट की क्यारी । कुंज गलिन में रास रचावे, बाजे मुरली प्यारी । जय जय श्री राधे ।
मोर मुकुट पीतांबर सोहे, कान्हा जी की सवारी । साथ राधे के रास रचावे, प्रेम की रीत निरारी । जय जय श्री राधे ।
चंद्रमुखी तुम कमल नयनी, सुंदरता की क्यारी । भक्तन के दुःख दूर करत हो, हे वृषभानु दुलारी । जय जय श्री राधे ।
जो यह आरती राधे जी की, नित प्रति गावे प्यारी । सुख सम्पत्ति पावे नर सोई, भव सागर से तारी । जय जय श्री राधे, जय जय वृषभानु दुलारी ।
अर्थ
आरती का आरंभ एक आनंदमय अभिवादन से होता है, "जय जय श्री राधे, वृषभानु की प्रियतम पुत्री की जय," उन्हें श्याम की प्रिया व ब्रज की रानी के रूप में सराहते हुए, जिनकी महिमा अपार व असीम है। इसमें उनके जन्मस्थान बरसाना की अनुपम छवि का वर्णन है, उन्हें कीरत (माता) की प्रिय पुत्री कहते हुए, जो सखियों से घिरे स्वर्ण महलों में निवास करती हैं।
आगे के छंदों में यमुना तट पर श्याम संग दिव्य रास-रचना का वर्णन है, वृंदावन के कुंजों में उनकी मधुर बांसुरी की ध्वनि पर नृत्य करते हुए। कान्हा जी मोरमुकुट व पीतांबर धारण किए उनके साथ प्रकट होते हैं, तथा दोनों मिलकर रास-लीला रचते हैं, यह प्रेम इतना पावन है कि यह स्वयं भक्ति की एक अनूठी परंपरा स्थापित करता है। उन्हें चंद्रमुखी, कमलनयनी, सुंदरता की साक्षात क्यारी के रूप में सराहा गया है, जो वृषभानु की प्रिय पुत्री के रूप में अपने भक्तों के दुःख दूर करती हैं।
आरती का समापन एक वचन के साथ होता है: जो कोई राधा जी की इस आरती को प्रतिदिन प्रेमपूर्वक गाता है, उसे सुख-संपत्ति प्राप्त होती है, तथा वह भवसागर से सुरक्षित पार हो जाता है — यह स्मरण कराते हुए कि समर्पित प्रेम की साक्षात मूर्ति राधा की भक्ति स्वयं मोक्ष का मार्ग है।
राधा रानी की आरती कैसे करें
सर्वोत्तम समय: संध्याकाल, विशेषकर कृष्ण गोविंद आरती के साथ अथवा उससे ठीक पहले, क्योंकि अधिकांश वैष्णव घरों में राधा-कृष्ण की संयुक्त पूजा होती है; राधाष्टमी पर विशेष भक्तिभाव से भी की जाती है।
आवश्यक सामग्री: दीपक, घंटी, तथा राधा की मूर्ति अथवा चित्र (प्रायः कृष्ण संग दर्शाई गई), साथ ही यदि उपलब्ध हो तो ताज़े पुष्प, क्योंकि राधा रानी का पुष्प-उद्यानों व कुंजों से गहरा संबंध है।
विधि: दीपक जलाएँ, धीरे से घंटी बजाएँ, तथा गाते हुए दीपक को देवी के समक्ष दक्षिणावर्त घुमाएँ, चरणों से आरंभ कर ऊपर की ओर, गीत के दौरान कई चक्र पूर्ण करते हुए।
आरती के पश्चात: परिवार के सदस्यों को हाथ जोड़कर दीपक की ज्योति ग्रहण करने दें, तथा यदि राधा-कृष्ण की संयुक्त पूजा कर रहे हों तो थोड़ा प्रसाद अर्पित करें और "राधे राधे" अथवा "जय श्री राधे" के अभिवादन से समापन करें।
श्रद्धालु इस आरती को क्यों संजोते हैं
ब्रज भक्ति परंपरा में राधा को कृष्ण से पृथक नहीं अपितु उनकी साक्षात शक्ति माना जाता है, दिव्य प्रेम की वह स्त्री-ऊर्जा जिसके बिना कृष्ण की स्वयं की लीला भी अपूर्ण मानी जाती है। भक्ति आंदोलन के अनेक महान संतों, जिनमें चैतन्य महाप्रभु सम्मिलित हैं, ने राधा भक्ति को सर्वोच्च मार्ग माना, यह शिक्षा देते हुए कि उनकी कृपा के प्रति समर्पण स्वाभाविक रूप से भक्त को स्वयं कृष्ण तक ले जाता है। इसीलिए प्रतिदिन संध्या उनकी आरती गाना कोई गौण साधना नहीं, अपितु अनगिनत श्रद्धालुओं के लिए कृष्ण भक्ति का ही हृदय है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या राधा रानी की आरती कृष्ण आरती के साथ गानी चाहिए? हाँ, अधिकांश घरों व मंदिरों में दोनों साथ अथवा एक के बाद एक गाई जाती हैं, क्योंकि राधा-कृष्ण को अभिन्न दिव्य युगल के रूप में पूजा जाता है।
राधाष्टमी का क्या महत्व है? राधाष्टमी, राधा रानी का प्राकट्य दिवस (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी), संपूर्ण ब्रज व अन्यत्र श्रद्धालुओं द्वारा विशेष आरती, कीर्तन व व्रत के साथ मनाई जाती है।
श्रद्धालु "जय श्री कृष्णा" के बजाय "राधे राधे" से अभिवादन क्यों करते हैं? ब्रज परंपरा में पहले राधा का नाम लेना कृष्ण तक पहुँचने का सबसे सौम्य व निश्चित मार्ग माना जाता है, क्योंकि उनकी कृपा भक्त के हृदय को दिव्य प्रेम के लिए खोलती है।
क्या यह आरती कोई भी, बिना किसी विशेष परंपरा के, गा सकता है? हाँ, यह सभी सच्चे श्रद्धालुओं के लिए खुली है; प्रेम व सम्मान के साथ इसे गाने हेतु किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं है।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Khatu Shyam mantra
Om Shri Shyam Devaya Namah
Chant with love and surrender, especially before Shyam Baba katha, aarti, or bhog.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या यह आरती कृष्ण आरती के साथ गाई जाए?
हाँ, अधिकांश घरों में दोनों साथ गाई जाती हैं क्योंकि राधा-कृष्ण अभिन्न युगल माने जाते हैं।
राधाष्टमी क्या है?
राधा रानी का प्राकट्य दिवस (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी), विशेष आरती, कीर्तन व व्रत सहित मनाया जाता है।
श्रद्धालु राधे राधे क्यों कहते हैं?
पहले राधा का नाम लेना कृष्ण तक पहुँचने का सौम्य व निश्चित मार्ग माना जाता है।
क्या यह आरती कोई भी गा सकता है?
हाँ, प्रेम व सम्मान के साथ कोई भी श्रद्धालु इसे गा सकता है।
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