वृंदावन से कुरुक्षेत्र तक भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण कराती सम्पूर्ण कृष्ण चालीसा, अर्थ व लाभ सहित।
विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण को वृंदावन के बाल-लीलाधारी, धर्म-रक्षक और गीता के दिव्य उपदेशक के रूप में पूजा जाता है। भक्त सुंदरदास द्वारा रचित कृष्ण चालीसा में उनकी बाल-लीलाओं, वीरतापूर्ण कार्यों और प्रत्येक भक्त के प्रति उनकी करुणा का आनंदमय वर्णन है।
सम्पूर्ण कृष्ण चालीसा (देवनागरी)
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम। अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥ पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज। जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥
जय यदुनंदन जय जगवंदन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥ जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
जय नटनागर, नाग नथइया। कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥ पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥
वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥ आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥ राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥
कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥ नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
मस्तक तिलक, अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥ करि पय पान, पूतनहि तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥
मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥ सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥
लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥ लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो। कोटि कमल जब फूल मंगायो॥ नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥
करि गोपिन संग रास विलासा। सब की पूरण करी अभिलाषा॥ केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥
मात पिता की बन्दि छुड़ाई। उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥ महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहस कुमारी॥ दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥
असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥ दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥
प्रेम के साग विदुर घर माँगे। दर्योधन के मेवा त्यागे॥ लखी प्रेम की महिमा भारी। ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
भारत के पारथ रथ हाँके। लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥ निज गीता के ज्ञान सुनाए। भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥
मीरा थी ऐसी मतवाली। विष पी गई बजाकर ताली॥ राना भेजा साँप पिटारी। शालीग्राम बने बनवारी॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो। उर ते संशय सकल मिटायो॥ तब शत निन्दा करि तत्काला। जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई। दीनानाथ लाज अब जाई॥ तुरतहि वसन बने नंदलाला। बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥
अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥ सुन्दरदास आस उर धारी। दयादृष्टि कीजै बनवारी॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो। क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥ खोलो पट अब दर्शन दीजै। बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि। अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥
अर्थ
प्रारम्भिक दोहा: भक्त श्रीकृष्ण के सुंदर स्वरूप का वर्णन करता है — अधरों पर वंशी, श्याम मेघ-सा तन, बिम्बफल-सम अरुण अधर, कमल-नयन, चंद्रमुख और पीताम्बर — तथा उन्हें मनमोहन कृष्णचंद्र महाराज कहकर प्रणाम करते हुए रक्षा की प्रार्थना करता है।
चरण 1-3: कृष्ण को यदुनंदन, जगवंदन, वसुदेव-देवकी नंदन तथा नंद-यशोदा के प्रिय पुत्र कहकर नमन किया गया है, जो भक्तों की रक्षा करने वाले हैं। यमुना में कालिया-नाग का दमन करने वाले तथा गोवर्धन को कनिष्ठिका पर धारण करने वाले नटनागर के रूप में उनका स्मरण है। भक्त प्रार्थना करता है कि वे आएँ, कष्ट हरें और प्रेमपूर्वक अर्पित माखन चखें, भक्तों की लाज रखें।
चरण 4-9: उनके मनोहर रूप का विस्तृत वर्णन है — गोल कपोल, मृदु मुस्कान, विशाल राजिव नयन, मोर-मुकुट, मालाएँ, कुंडल और पीताम्बर। बाल्यकाल में उन्होंने पूतना का विषैला दूध पीकर भी उसे तार दिया, तथा कंस द्वारा भेजे अघासुर व बकासुर का वध किया। जब मधुवन दावाग्नि से जल उठा, तब उन्होंने नंदलाला की रक्षा हेतु उसे शीतल किया; जब क्रोधित इंद्र ने ब्रज पर मूसलधार वर्षा की, तब उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अंगुली पर धारण कर ग्रामवासियों की रक्षा की, तथा माता यशोदा को अपने मुख में समस्त चौदह भुवनों के दर्शन कराए।
चरण 9-13: उन्होंने यमुना में कालिया नाग का दमन कर उसे भगाया, अपने चरण-चिह्न तट पर छोड़कर रक्षा का संकेत दिया। गोपियों संग रासलीला कर उनकी भक्ति पूर्ण की, अनेक महाबली असुरों का संहार किया, तथा अंततः दुष्ट कंस को केश पकड़कर मार डाला, अपने माता-पिता को बंदीगृह से मुक्त कराया और उग्रसेन को पुनः राजगद्दी दिलाई। देवकी के मृत छह पुत्रों को पुनः जीवित लाकर माता का शोक दूर किया। भौमासुर व मुर दैत्य का संहार कर सोलह हज़ार राजकुमारियों को मुक्त किया, तथा भीम को जरासंध वध की शक्ति प्रदान की।
महत्व एवं लाभ
कृष्ण चालीसा का पाठ वे भक्त करते हैं जो आनंद, सुरक्षा, कठिन निर्णयों में मार्गदर्शन तथा भय से मुक्ति चाहते हैं। श्रद्धापूर्वक पाठ करने से माना जाता है कि:
आत्मसमर्पण व भक्ति-भाव जागृत होता है, जिससे परिणाम की चिंता कम होती है।
कठिनाइयों में सुरक्षा मिलती है, जैसा शास्त्रों में सुदामा, द्रौपदी व अनगिनत भक्तों के प्रति कृष्ण की भूमिका में देखा गया है।
गीता के ज्ञान से प्रेरित होकर जीवन-उद्देश्य में स्पष्टता आती है।
विशेषकर जन्माष्टमी पर, परिवार सहित अथवा संध्या आरती में पाठ करने से हर्ष व उल्लास बढ़ता है।
पाठ विधि व शुभ समय
शुभ दिन: जन्माष्टमी सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवसर है, साथ ही बुधवार भी परंपरागत रूप से कृष्ण-पूजन से जुड़ा है।
शुभ समय: स्नान के पश्चात प्रातःकाल, अथवा संध्या गोधूलि वेला में, जब वृंदावन-परंपरा के अनुसार कृष्ण गायों संग घर लौटते हैं।
तैयारी: तुलसी दल, यथासंभव माखन-मिश्री अर्पित करें तथा कृष्ण की मूर्ति या चित्र के समक्ष दीपक जलाएँ।
विधि: गंभीरता की अपेक्षा हर्षपूर्ण एवं भक्तिमय भाव से एक या कई बार पाठ करें — कृष्ण-भक्ति परंपरागत रूप से माधुर्य-भाव से जुड़ी है।
यथासंभव कृष्ण आरती सहित समापन करें और अर्पित प्रसाद परिवार में बाँटें।
करणीय व अकरणीय बातें
हल्के, हर्षपूर्ण हृदय से पाठ करें — कृष्ण-भक्ति में अत्यधिक औपचारिकता आवश्यक नहीं, किंतु सम्मान सदैव आवश्यक है।
यथासंभव तुलसी दल अर्पित करें, जो कृष्ण को विशेष प्रिय माने जाते हैं।
कठिन निर्णयों में गीता की इस शिक्षा को स्मरण रखते हुए साहस हेतु चालीसा का सहारा लें कि कर्म करो, फल की चिंता मत करो।
लीलाओं के अर्थ पर विचार किए बिना यांत्रिक ढंग से पाठ न करें।
केवल भक्ति के भरोसे नैतिक आचरण की उपेक्षा न करें।
महात्म्य
भक्ति-परंपरा में माना जाता है कि भक्त का सच्चा प्रेम कृष्ण को अनुष्ठानिक वैभव से अधिक प्रिय है — जैसा सुदामा के साधारण तंदुल तथा विदुर के सामान्य साग को राजसी मेवों से अधिक स्वीकार करने में दिखता है। जन्माष्टमी की रात्रि परिवार अक्सर बाल कृष्ण की मूर्ति को झूला झुलाते हुए इस चालीसा का पाठ करते हैं, जो विनम्रता, साहस व भक्ति के मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की परंपरा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कृष्ण चालीसा किसने रची? परंपरागत स्रोतों के अनुसार भक्त कवि सुंदरदास ने, जिनका नाम बाद के चरणों में आता है।
पाठ हेतु कौन-सा दिन उत्तम है? जन्माष्टमी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, साथ ही बुधवार भी वर्षभर कृष्ण-पूजन से जुड़ा माना जाता है।
क्या इसे गीता या विष्णु सहस्रनाम के साथ पढ़ा जा सकता है? हाँ, अनेक भक्त पूर्ण दैनिक साधना के भाग रूप में कृष्ण चालीसा को गीता के कुछ श्लोकों या विष्णु सहस्रनाम के साथ जोड़ते हैं।
समापन दोहा में किस लाभ का उल्लेख है? इसमें कहा गया है कि श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाले को अष्ट सिद्धि, नवनिधि तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूपी चारों पदार्थ प्राप्त होते हैं, जो सम्पूर्ण कल्याण का प्रतीक है।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Krishna mantra
Om Kleem Krishnaya Namah
Chant with love and surrender, especially before Krishna katha, aarti, or bhog.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
कृष्ण चालीसा किसने रची?
परंपरागत स्रोतों के अनुसार भक्त कवि सुंदरदास ने, जिनका नाम बाद के चरणों में आता है।
पाठ हेतु कौन-सा दिन उत्तम है?
जन्माष्टमी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, साथ ही बुधवार भी कृष्ण-पूजन से जुड़ा माना जाता है।
क्या इसे गीता के साथ पढ़ा जा सकता है?
हाँ, अनेक भक्त इसे गीता के कुछ श्लोकों या विष्णु सहस्रनाम के साथ पढ़ते हैं।
समापन दोहा में क्या वचन है?
श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाले को अष्ट सिद्धि, नवनिधि व चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है।
पवित्र पूजा द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की कृपा पाएँ
हमारे पंडितजी आपके नाम व गोत्र से संकल्पपूर्वक प्रामाणिक कृष्ण पूजा सम्पन्न करेंगे, जो जन्माष्टमी अथवा नए आरंभ के लिए विशेष उपयुक्त है।








