आदि शंकराचार्य रचित संपूर्ण भज गोविन्दम (मोहमुद्गर) — क्षणभंगुर सांसारिक मोह से हटकर गोविन्द भक्ति की ओर मुड़ने का शाश्वत संदेश देने वाले श्लोक।
भज गोविन्दम, जिसे मोहमुद्गर ("मोह को चूर करने वाला मुद्गर") भी कहा जाता है, आदि शंकराचार्य की सबसे प्रसिद्ध भक्ति-दार्शनिक रचनाओं में से एक है। आदि शंकराचार्य आठवीं शताब्दी के महान आचार्य थे जिन्होंने संपूर्ण भारत में अद्वैत वेदांत की स्थापना की। एक साधारण स्तोत्र के विपरीत, भज गोविन्दम एक जागृति-आह्वान है — प्रत्येक मनुष्य, चाहे विद्वान हो या अनपढ़, युवा हो या वृद्ध, को यह सौम्य किंतु दृढ़ स्मरण कराता है कि बिना ईश्वर को स्मरण किए धन, यौवन, कुल-गौरव और सांसारिक सुखों के पीछे भागना अंततः व्यर्थ जीवन ही है।
परंपरा के अनुसार, शंकराचार्य ने काशी में एक वृद्ध, विद्वान पंडित को व्याकरण के सूत्र (डुकृञ्करणे) रटते देखकर, ईश्वर की ओर मन मोड़ने के बजाय व्याकरण में उलझे देखकर, ये मूल श्लोक स्वतः रच दिए। करुणा से भरकर उन्होंने गाया — "भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते" — "गोविन्द को भज, गोविन्द को भज, हे मूढ़ मन, गोविन्द को भज; क्योंकि जब मृत्यु का निश्चित समय आएगा तब केवल व्याकरण के नियम तुझे नहीं बचाएँगे।" उनके शिष्य इससे गहरे प्रभावित हुए और उन्होंने भी इसी भाव में आगे के श्लोक जोड़े। इस प्रकार पूर्ण भज गोविन्दम बना, जिसे शंकराचार्य के बारह मूल श्लोकों के कारण द्वादशमंजरिका स्तोत्र और शिष्यों द्वारा जोड़े गए श्लोकों को चर्पटपंजरिका स्तोत्र भी कहा जाता है।
संपूर्ण भज गोविन्दम (देवनागरी) अर्थ सहित
ध्रुव पद (प्रत्येक श्लोक के बाद दोहराया जाता है):
भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते । संप्राप्ते सन्निहिते काले नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥
अर्थ: गोविन्द को भज, गोविन्द को भज, गोविन्द को भज, हे मूढ़ मन! जब मृत्यु की निश्चित घड़ी निकट आएगी, तब केवल व्याकरण के नियम तुझे निश्चय ही नहीं बचाएँगे।
श्लोक १
मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् । यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥
अर्थ: हे मूढ़, धन कमाने की तृष्णा त्याग दे; मन में सद्बुद्धि और तृष्णारहित भाव उत्पन्न कर। अपने कर्मों से जो धन तुझे प्राप्त हो, उसी से अपने मन को संतुष्ट कर — अनंत संचय से नहीं।
श्लोक २
नारीस्तनभरनाभीदेशं दृष्ट्वा मागामोहावेशम् । एतन्मांसावसादि विकारं मनसि विचिन्तय बारं बारम् ॥
अर्थ: किसी स्त्री के सौंदर्य को देखकर मोहासक्त मत हो। बार-बार मन में यह विचार कर कि यह शरीर अंततः मांस और विकार से बना है, जो नाशवान है।
श्लोक ३
नलिनीदलगत जलमतितरलं तद्वज्जीवितमतिशयचपलम् । विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥
अर्थ: जैसे कमल के पत्ते पर पड़ी जलबूंद अत्यंत चंचल होती है, वैसे ही यह जीवन भी अत्यंत क्षणभंगुर है। जान ले कि यह संपूर्ण संसार रोग और अहंकार से ग्रस्त है, और शोक से आहत है।
श्लोक ४
यावद्वित्तोपार्जनसक्तः तावन्निजपरिवारो रक्तः । पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥
अर्थ: जब तक मनुष्य धन कमाने में सक्षम रहता है, तब तक उसका परिवार उससे प्रेम रखता है। परंतु बाद में जब वह जर्जर शरीर से जीवित रहता है, तब घर में कोई उसकी सुध तक नहीं लेता।
श्लोक ५
यावत्पवनो निवसति देहे तावत्पृच्छति कुशलं गेहे । गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥
अर्थ: जब तक शरीर में प्राण-वायु रहती है, तब तक घरवाले कुशलक्षेम पूछते हैं। जब प्राण निकल जाते हैं और शरीर गिर जाता है, तो उसी शरीर से पत्नी भी भयभीत हो उठती है।
श्लोक ६
बालस्तावत्क्रीडासक्तः तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः । वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥
अर्थ: बालक खेल में लीन रहता है, युवक प्रेयसी में लीन रहता है, वृद्ध चिंता में लीन रहता है — परंतु परब्रह्म में शायद ही कोई लीन होता है।
श्लोक ७
का ते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः । कस्य त्वं कः कुत आयातः तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥
अर्थ: कौन तेरी पत्नी है, कौन तेरा पुत्र है? यह संसार अत्यंत विचित्र है। तू किसका है, तू कौन है, कहाँ से आया है? हे भाई, इस तत्त्व पर यहीं और अभी विचार कर।
श्लोक ८
सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम् । निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥
अर्थ: सत्संग से निस्संगता आती है, निस्संगता से निर्मोहता आती है, निर्मोहता से तत्त्व में स्थिरता आती है, और तत्त्व में स्थिरता से जीवनमुक्ति प्राप्त होती है।
श्लोक ९
वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः । क्षीणे वित्ते कः परिवारः ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥
अर्थ: यौवन बीत जाने पर काम-विकार का क्या अर्थ? जल सूख जाने पर सरोवर कहाँ? धन क्षीण हो जाने पर परिवार कहाँ? और तत्त्व-ज्ञान हो जाने पर यह संसार कहाँ?
श्लोक १०
मा कुरु धनजनयौवनगर्वं हरति निमेषात्कालः सर्वम् । मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥
अर्थ: धन, परिवार और यौवन का अहंकार मत कर — काल पलक झपकते ही सब कुछ हर लेता है। इस संपूर्ण मायामय संसार को त्यागकर, तत्त्व को जानकर ब्रह्मपद में प्रवेश कर।
श्लोक ११
दिनयामिन्यौ सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः । कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥
अर्थ: दिन-रात, संध्या-प्रातः, शिशिर-वसंत बारंबार आते-जाते रहते हैं। काल अपना खेल खेलता रहता है और आयु घटती रहती है, फिर भी आशा की वायु मनुष्य को नहीं छोड़ती।
श्लोक १२
अग्रे वह्निः पृष्ठे भानुः रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः । करतलभिक्षा तरुतलवासः तदपि न मुञ्चत्याशापाशः ॥
अर्थ: आगे अग्नि, पीछे सूर्य, रात्रि में ठोड़ी को घुटनों पर टिकाए, हाथों में भिक्षा लेकर वृक्ष के नीचे निवास करने वाला तपस्वी भी आशा के पाश से मुक्त नहीं हो पाता।
शिष्यों द्वारा रचित श्लोक (उसी भाव में आगे)
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः । इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥
अर्थ: तू कौन है, मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ? कौन मेरी माता है, कौन मेरा पिता है? इस सबको असार समझ, इस विश्व को स्वप्न के समान त्यागकर इस पर विचार कर।
गेयं गीता नाम सहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम् । नेयं सज्जनसङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥
अर्थ: गीता का गान करना चाहिए, भगवान के सहस्र नामों का जप करना चाहिए, श्रीपति (विष्णु) के स्वरूप का निरंतर ध्यान करना चाहिए, मन को सज्जनों के संग में ले जाना चाहिए, और दीन-दुखियों को धन देना चाहिए।
सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः । यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ॥
अर्थ: क्षणिक सुख के लिए मनुष्य शरीर को भोग में लगाता है, और बाद में हाय! उसी शरीर में रोग घर कर लेते हैं। यद्यपि इस संसार में सबको अंततः मृत्यु की शरण लेनी है, फिर भी मनुष्य पापाचरण नहीं छोड़ता।
अर्थमनर्थं भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम् । पुत्रादपि धनभाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ॥
अर्थ: सदा यह समझ कि धन ही वास्तव में अनर्थ है, उसमें तनिक भी सच्चा सुख नहीं है। धनवान को अपने पुत्र से भी भय रहता है — संसार की यही रीति सर्वत्र है।
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् । इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुरारे ॥
अर्थ: बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु, और बार-बार माता के गर्भ में शयन — इस अत्यंत दुस्तर संसार-सागर में, हे मुरारि, अपनी अपार कृपा से मेरी रक्षा कीजिए।
जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः काषायाम्बरबहुकृतवेषः । पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः ॥
अर्थ: कोई जटाधारी, कोई मुंडितशीश, कोई केश उखाड़े हुए, कोई गेरुए वस्त्रों में अनेक वेष धारण किए — फिर भी देखते हुए भी मूढ़ व्यक्ति सत्य को नहीं देख पाता; ये अनेक वेष प्रायः केवल पेट भरने के लिए धारण किए जाते हैं।
कदा वाराणस्यां भवति वसतिः तटतरणी तीरे वारिनिधौ । गङ्गातीरे शिवसन्निधौ स्वयं कदा वा शयनं भवति ॥
अर्थ: कब मुझे काशी में निवास प्राप्त होगा, कब गंगा तट पर नौका पर बैठना होगा? कब गंगा किनारे, शिव के सामीप्य में, सांसारिक मोह त्यागकर विश्राम करना होगा?
भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गा जललवकणिका पीता । सकृदपि येन मुरारि समर्चा क्रियते तस्य यमेन न चर्चा ॥
अर्थ: जिसने भगवद्गीता का थोड़ा भी अध्ययन किया है, गंगाजल की एक बूंद भी पी है, और एक बार भी सच्ची भक्ति से मुरारि की पूजा की है — उससे यमराज कोई पूछताछ नहीं करते।
पुनरपि रजनी पुनरपि दिवसः पुनरपि पक्षः पुनरपि मासः । पुनरप्ययनं पुनरपि वर्षं तदपि न मुञ्चत्याशामर्षम् ॥
अर्थ: बार-बार रात्रि, बार-बार दिन, बार-बार पक्ष, बार-बार माह, बार-बार अयन और बार-बार वर्ष आते-जाते रहते हैं — फिर भी आशा और उसकी बेचैनी मनुष्य को नहीं छोड़ती।
भज गोविन्दम का हर श्लोक उसी ध्रुवपद "भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते" पर लौट आता है — यह पुकार पूरे स्तोत्र में बार-बार गूँजती है, और शंकराचार्य के शिष्यों ने इसी भाव में आगे भी श्लोक जोड़े (अधिकांश मुद्रित संस्करणों में यह पूर्ण पाठ लगभग इकतीस श्लोकों का है, जिन्हें साथ में द्वादशमंजरिका और चर्पटपंजरिका स्तोत्र कहा जाता है)। संदेश हर जगह एक ही रहता है — धन, यौवन, सौंदर्य और अहंकार क्षणभंगुर हैं, परंतु गोविन्द की भक्ति और आत्मज्ञान ही सच्चा और स्थायी आश्रय है।
भज गोविन्दम क्यों पढ़ा जाता है
भज गोविन्दम किसी विशेष सांसारिक कामना के लिए नहीं, बल्कि विवेक और वैराग्य जगाने के लिए पढ़ा जाता है — जीवन की दैनिक भागदौड़ के बीच यह स्मरण कराने के लिए कि हर भौतिक वस्तु अस्थायी है, और भक्ति के साथ ज्ञान ही एकमात्र स्थायी आश्रय है। यह भारत भर के विद्यालयों, आश्रमों और सत्संगों में मधुर धुनों में गाया जाता है, क्योंकि इसका संदेश किसी भी पंथ या परंपरा से परे, सार्वभौमिक और शाश्वत है।
पाठ विधि एवं समय
समय: किसी भी समय, परंतु अनेक भक्त इसे प्रातःकाल, सत्संग में, या जब भी सांसारिक चिंता से स्पष्टता व वैराग्य चाहिए तब पढ़ते हैं। आदि शंकराचार्य की स्मृति में गुरु पूर्णिमा पर, या किसी हानि, रोग अथवा जीवन के बड़े संक्रमण-काल में जब मन को दृष्टिकोण चाहिए, इसे गाना विशेष अर्थपूर्ण है।
विधि: इसे समूह में "भज गोविन्दम" के ध्रुवपद को कोरस के रूप में दोहराते हुए गाया जा सकता है, या शांतिपूर्वक पढ़ते हुए प्रत्येक पंक्ति के भाव को आत्मसात किया जा सकता है। इसके लिए कोई विशेष विधि, माला या अर्पण आवश्यक नहीं — केवल सच्चा चिंतन ही पर्याप्त है।
करें और न करें
संस्कृत को जल्दबाजी में पढ़ने के बजाय धीरे-धीरे पढ़ें और प्रत्येक श्लोक के भाव को आत्मसात होने दें। इसे आत्मचिंतन के दर्पण के रूप में प्रयोग करें, दूसरों पर निर्णय सुनाने के लिए नहीं। इसके साथ प्रतिदिन किसी न किसी रूप में ईश्वर-स्मरण — जप, पूजा, या केवल कृतज्ञता — जोड़ें। इसे केवल स्मरण करने योग्य काव्य न मानें, आंतरिक चिंतन के बिना; वैराग्य के इस संदेश को अपने वास्तविक पारिवारिक व सांसारिक कर्तव्यों की उपेक्षा का बहाना न बनाएँ — परंपरा तो यही सिखाती है कि कर्तव्य फल में अत्यधिक आसक्ति के बिना निभाए जाएँ।
महात्म्य
भज गोविन्दम का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह करुणा के एक साक्षात् क्षण से जन्मा — आदि शंकराचार्य ने एक वृद्ध विद्वान को ईश्वर-स्मरण के बजाय व्याकरण के सूत्र रटते देखकर, यह शिक्षा गाई ताकि कोई भी, चाहे कितना भी विद्वान क्यों न हो, अपना यह अमूल्य मानव-जीवन उन बातों में व्यर्थ न गँवाए जो मृत्यु के पार आत्मा के साथ नहीं जातीं। यह वेदांत परंपरा की सर्वाधिक उद्धृत और प्रिय रचनाओं में से एक बनी हुई है, क्योंकि इसका ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तेरह शताब्दियों पूर्व था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस भाग में भज गोविन्दम से जुड़े सामान्य प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Khatu Shyam mantra
Om Shri Shyam Devaya Namah
Chant with love and surrender, especially before Shyam Baba katha, aarti, or bhog.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
भज गोविन्दम की रचना किसने की?
आदि शंकराचार्य ने एक वृद्ध पंडित को ईश्वर के बजाय व्याकरण में लीन देखकर मूल बारह श्लोक (द्वादशमंजरिका स्तोत्र) रचे; उनके शिष्यों ने उसी भाव में आगे के श्लोक जोड़े, जिससे पूर्ण भज गोविन्दम बना।
'भज गोविन्दम' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'गोविन्द को भज' — गोविन्द भगवान कृष्ण/विष्णु का ही एक नाम है। यह ध्रुवपद मन को क्षणभंगुर सांसारिक विषयों से हटाकर भक्ति और आत्मज्ञान की ओर मोड़ने का आह्वान करता है।
भज गोविन्दम में कुल कितने श्लोक हैं?
मूल द्वादशमंजरिका में शंकराचार्य के बारह श्लोक हैं; शिष्यों द्वारा जोड़े गए अतिरिक्त श्लोकों (चर्पटपंजरिका आदि) सहित पूर्ण परंपरागत पाठ लगभग इकतीस श्लोकों का है।
क्या भज गोविन्दम केवल संन्यासियों के लिए है?
नहीं। इसका संदेश हर व्यक्ति के लिए है, चाहे वह गृहस्थ हो या संन्यासी — यह सभी को सांसारिक कर्तव्य और ईश्वर-स्मरण तथा जीवन की नश्वरता के बोध में संतुलन बनाए रखने का स्मरण कराता है।
अपनी आध्यात्मिक यात्रा को गहरा करें
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