भैरव चालीसा का सम्पूर्ण पाठ देवनागरी में अर्थ सहित, पाठ विधि तथा काल भैरव की रक्षक एवं भयनाशक कृपा।
काल भैरव भगवान शिव का वह उग्र रक्षक स्वरूप हैं जिन्हें काशी सहित प्रत्येक शक्तिपीठ के कोतवाल (रक्षक) के रूप में पूजा जाता है। वे धर्मसंगत न्याय के देवता हैं — भय, शत्रु, बाधाओं तथा तंत्र-बाधा को शीघ्रता से दूर करने वाले, फिर भी सच्चे भक्तों के प्रति अत्यंत करुणामयी। भैरव चालीसा, जो संरचना में हनुमान चालीसा के समान है, विशेषकर रविवार तथा भैरव अष्टमी को रक्षा, साहस और अन्यायपूर्ण बाधाओं के निवारण हेतु पढ़ी जाती है।
सम्पूर्ण भैरव चालीसा (देवनागरी)
दोहा
जयति जयति भैरव बर, त्रिपुरारी के तात। सिद्ध होंय सब काज मम, आशुतोष के जात॥
चौपाई
जय जय जय भैरव भयहारी। कृपा करहु अब मोहि उबारी॥ जय महाभीम विरूप विशाला। जय भैरव देवन दिनदयाला॥
जय अष्ट भैरव जय भैरव नाथा। शरणागत हूँ मैं तुम्हारे साथा॥ काल भैरव जय दिगम्बर रूपा। तुम बिन रक्षक कौन अनूपा॥
जय बटुक भैरव अति बलधारी। महाकाल के रूप तुम्हारी॥ शिव अवतार भैरव जग जाने। तीनों लोक तुम्हें पहचाने॥
काशी के कोतवाल कहाए। बिन तुम आज्ञा कोउ न आए॥ अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता। भक्तन के तुम संकट हरता॥
चतुर्भुज तुम रूप विशाला। कर में त्रिशूल डमरू माला॥ कुत्ते पर असवार तुम्हारा। भक्तन को देते हो सहारा॥
रक्तवर्ण तुम रूप विराजो। नाग जनेऊ कंठ में साजो॥ भूत प्रेत सब भागत तेरे। जो भी आवत शरण तिहारे॥
शीश जटा शशि बिराजत सोहे। तुमको देखत त्रिभुवन मोहे॥ मद्य पान करते हो स्वामी। भक्तन के हो अंतर्यामी॥
काल के भी तुम काल कहाए। तीनों लोक तुम्हीं ठहराए॥ न्याय करत तुम काल समाना। पाप करत नहिं कोउ बच पाना॥
निर्भय होय जो शरण तुम्हारी। जाकर देत मुक्ति है भारी॥ जो नर ध्यान तुम्हारा धरई। सो नर सब बाधा से तरई॥
शत्रु नाश करो महाराजा। दुष्ट दलन करो जन काजा॥ भूत बाधा सब दूर भगावो। तंत्र मंत्र से रक्षा पावो॥
काल भैरव अष्टक जो गावे। बड़े बड़े संकट कट जावे॥ सुरा पान का भोग लगाओ। भक्तन के सब कष्ट मिटाओ॥
काशी में जो भैरव ध्यावे। बिना दर्शन काशी नहिं पावे॥ जो भैरव को शीश नवावे। सो शिव कृपा को पावे॥
रविवार को पूजा कीजै। भैरव अष्टमी विधि से कीजै॥ उड़द तेल का भोग लगाओ। काले कुत्ते को भोजन खिलाओ॥
निर्धन को धन देत सदाई। रोगी की सब पीर मिटाई॥ जो यह पाठ करे मन लाई। ताके सकल सिद्धि होय सहाई॥
राजा हो या हो रंक भिखारी। भैरव जपत सबकी हो यारी॥ जो नर भैरव चालीसा गावे। सो नर निश्चय सिद्धि पावे॥
जय जय जय भैरव भगवाना। कीजै भक्त पर कृपा निधाना॥ शरण पड़ा हूँ द्वार तुम्हारे। भव सागर से पार उतारे॥
दोहा
भैरव बाबा की जय हो, हरहु सकल संताप। शरण गहूं मैं आपकी, हरहु सकल परिताप॥
॥इति श्री भैरव चालीसा सम्पूर्णम्॥
अर्थ
आरंभिक दोहे में भैरव को त्रिपुरारी शिव के पुत्र (सान्निध्य) के रूप में नमन किया गया है, जो सच्चे भक्त का हर कार्य सिद्ध करने में समर्थ हैं। चौपाइयों में उनके रूपों का वर्णन है — बटुक भैरव (युवा, बलशाली रूप) तथा काल भैरव (काल से परे उग्र दिगम्बर रूप), तीनों लोकों में शिव अवतार के रूप में उनकी पहचान, तथा काशी के कोतवाल के रूप में उनकी भूमिका, जिनकी आज्ञा के बिना उस पवित्र नगरी में कोई प्रवेश नहीं कर सकता।
पंक्तियों में उनकी छवि का वर्णन है: चार भुजाएं त्रिशूल-डमरू सहित, वाहन कुत्ता, रक्तवर्ण शरीर, नाग का जनेऊ, तथा जटाओं में विराजमान चंद्रमा। उन्हें ऐसा देवता बताया गया है जिनके समक्ष भूत-प्रेत भाग जाते हैं, जो काल के समान न्याय करते हैं ताकि कोई भी पाप दंड से न बच सके, तथा जो शरणागत भक्त का भय हर लेते हैं। चालीसा में उनके रविवार पूजन, भैरव अष्टमी विधि, तथा उड़द, तेल एवं काले कुत्ते को भोजन कराने जैसे परंपरागत भोग का उल्लेख है। अंत में वचन है कि जो एकाग्र मन से यह चालीसा गाता है, उसे पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है और वह भवसागर से पार हो जाता है।
भैरव चालीसा पढ़ने का महत्व
काल भैरव का आह्वान तब किया जाता है जब भक्त शक्तिशाली, अन्यायपूर्ण बाधाओं का सामना कर रहा हो — न्यायालयी विवाद, द्वेषी शत्रु, तंत्र-बाधा, दीर्घकालिक भय, अथवा ऐसी परिस्थितियां जो अनुचित प्रतीत हों। चूंकि वे केवल उग्रता नहीं, बल्कि धर्मसंगत न्याय के प्रतीक हैं, भक्तों को विश्वास है कि उनका हस्तक्षेप अन्याय को दंडित करता है और सत्यनिष्ठ को सुरक्षा देता है। वे काशी (वाराणसी) से सर्वाधिक जुड़े देवता भी हैं — परंपरागत मान्यता है कि काल भैरव के दर्शन एवं आज्ञा के बिना काशी विश्वनाथ का दर्शन अधूरा माना जाता है।
पाठ विधि, समय और दिन
उत्तम दिन: रविवार, तथा विशेषकर काल भैरव अष्टमी (मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी, सामान्यतः नवंबर-दिसंबर में)।
समय: भैरव पूजा के लिए परंपरागत रूप से संध्याकाल शुभ माना जाता है, परन्तु नियमित भक्ति के लिए प्रातःकाल पाठ भी उचित है।
भोग: उड़द दाल, सरसों तेल, गुड़, तथा जहां स्थानीय परंपरा अनुमति दे, वहां काले कुत्ते को भोजन कराना — जो भैरव के वाहन तथा उनकी कृपा के जीवंत प्रतिनिधि माने जाते हैं। सिंदूर तथा काला या नीला वस्त्र भी परंपरागत भोग हैं।
विधि: भैरव के चित्र अथवा प्रतीक शिवलिंग के समक्ष सरसों तेल का दीपक जलाएं, उपरोक्त सामग्री अर्पित करें, तथा दोहे सहित सम्पूर्ण चालीसा का पाठ करें। कई भक्त आरंभ से पहले "ॐ भैरवाय नमः" अथवा भैरव मूल मंत्र कुछ बार जपते हैं।
संख्या: नियमित भक्ति के लिए दैनिक एक बार पाठ पर्याप्त है; भैरव अष्टमी को समर्पित भक्तों में 11 या 21 बार पाठ सामान्य है।
नियम
करें: स्वच्छ, सच्चे हृदय से पूजा करें — भैरव सच्ची भक्ति का शीघ्र उत्तर देते हैं और असत्यता अथवा अनुचित कार्य से रक्षा उतनी ही शीघ्रता से हटा भी लेते हैं। सत्यनिष्ठ आचरण बनाए रखें, क्योंकि भैरव न्याय के देवता हैं। उनके वाहन से जुड़े सम्मान स्वरूप आवारा कुत्तों की देखभाल अथवा भोजन कराएं।
न करें: क्रोध अथवा किसी से प्रतिशोध की भावना से भैरव पूजा न करें — उनका न्याय धर्मसंगत है, व्यक्तिगत बदले का साधन नहीं। स्वच्छता और अनुशासन की उपेक्षा न करें (उनकी पूजा स्थिर चरित्र वाले भक्तों को अधिक फलदायी होती है)। उचित मार्गदर्शन के बिना जटिल तांत्रिक भैरव साधना न करें; चालीसा स्वयं में सभी भक्तों के लिए सुरक्षित और सम्पूर्ण है।
महात्म्य
शैव पुराण परंपरा के अनुसार काल भैरव शिव के उग्र स्वरूप से ब्रह्मा के अहंकार को दंडित करने हेतु प्रकट हुए, और तत्पश्चात उन्हें स्वयं काल तथा न्याय की रक्षा का दायित्व सौंपा गया। उन्हें प्रत्येक शक्तिपीठ में निवासी देवी के साथ कोतवाल रूप में पूजा जाता है, तथा विशेष रूप से काशी के रक्षक के रूप में, जहां काल भैरव मंदिर सर्वाधिक दर्शनार्थियों वाले मंदिरों में से एक है। उनका महात्म्य इसी द्वैत स्वभाव में निहित है — अधर्म के प्रति पूर्णतः उग्र, सच्चे भक्त के प्रति पूर्णतः रक्षक — जो उन्हें उन सबके लिए सर्वाधिक शरणीय देवता बनाता है जो अन्याय, भय अथवा सामान्य उपायों से परे शक्तियों से घिरे हों।
भैरव चालीसा के लाभ
नियमित भक्त अन्यायपूर्ण न्यायालयी, आर्थिक अथवा पारस्परिक कठिनाइयों से शीघ्र राहत, शत्रु और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा, अकारण भय से मुक्ति, तथा विशेषकर साढ़ेसाती अथवा अन्य ज्योतिषीय कठिन काल में दृढ़, विश्वसनीय सुरक्षा का अनुभव करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: भगवान शिव से काल भैरव का क्या संबंध है? उत्तर: काल भैरव को भगवान शिव का उग्र अवतार अथवा स्वरूप माना जाता है, जो समय-सापेक्ष न्याय एवं धर्म के उग्र रक्षक की भूमिका निभाते हैं।
प्रश्न: भैरव पूजा में काले कुत्तों को भोजन कराने का क्या महत्व है? उत्तर: कुत्ते को परंपरागत रूप से भैरव का वाहन माना जाता है; कुत्तों, विशेषकर काले कुत्तों की देखभाल या भोजन कराना उनकी भक्ति का प्रत्यक्ष कार्य माना जाता है।
प्रश्न: काल भैरव अष्टमी कब है और इसका क्या महत्व है? उत्तर: यह मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष अष्टमी (सामान्यतः नवंबर-दिसंबर) को पड़ती है तथा भैरव के प्राकट्य का प्रतीक है; इसे उनकी पूजा एवं चालीसा पाठ के लिए सर्वाधिक शक्तिशाली दिन माना जाता है।
प्रश्न: क्या भैरव चालीसा न्यायालयी विवादों अथवा अन्याय में सहायक है? उत्तर: अनेक भक्त इसी विश्वास से पाठ करते हैं, भैरव की शीघ्र धर्मसंगत न्याय की भूमिका पर भरोसा करते हुए, साथ ही स्वयं सत्यनिष्ठ आचरण बनाए रखते हुए।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Shiva mantra
Om Namah Shivaya
Chant with a quiet mind, especially on Monday, Pradosh, or during Shiva puja.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
काल भैरव का शिव से क्या संबंध है?
उन्हें शिव का उग्र अवतार माना जाता है, जो धर्मसंगत न्याय के रक्षक हैं।
काले कुत्तों को भोजन कराने का महत्व क्या है?
कुत्ता भैरव का वाहन माना जाता है; उन्हें भोजन कराना भक्ति का प्रत्यक्ष कार्य है।
काल भैरव अष्टमी कब होती है?
मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी (नवंबर-दिसंबर) को, यह उनकी पूजा के लिए सर्वाधिक शक्तिशाली दिन है।
क्या भैरव चालीसा न्यायालयी विवादों में सहायक है?
भक्त इसी विश्वास से पाठ करते हैं, साथ ही स्वयं सत्यनिष्ठ आचरण बनाए रखते हुए।
काल भैरव की सुरक्षा चाहते हैं?
भय, अन्याय और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा हेतु काल भैरव को समर्पित पूजा बुक करें।







