तिरुपति के भगवान वेंकटेश्वर बालाजी की सम्पूर्ण आरती, अर्थ, विधि व नित्य पूजन के लाभ सहित।
भगवान वेंकटेश्वर, जिन्हें प्रेमपूर्वक बालाजी, श्रीनिवास अथवा गोविंद कहा जाता है, तिरुमला पहाड़ियों — तिरुपति — के अधिष्ठाता देव हैं, जो विश्व के सर्वाधिक श्रद्धालुओं द्वारा दर्शन किए जाने वाले तीर्थ स्थलों में से एक है। उन्हें भगवान विष्णु का साक्षात् स्वरूप माना जाता है, जो कलियुग में अपने भक्तों की रक्षा तथा उनके ऋण, दुःख और जन्म-मृत्यु के बंधन को दूर करने हेतु पृथ्वी पर अवतरित हुए। चूंकि बालाजी स्वयं विष्णु हैं, अतः उनकी आराधना में परंपरागत रूप से "ॐ जय जगदीश हरे" आरती गायी जाती है — यह वह भजन है जिसने हर क्षेत्रीय सीमा को पार कर तिरुपति के गर्भगृह से लेकर हर वैष्णव घर तक समान श्रद्धा से स्थान पाया है।
सम्पूर्ण बालाजी वेंकटेश्वर आरती (देवनागरी)
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ॐ जय जगदीश हरे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का। सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ॐ जय जगदीश हरे॥
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। मैं मूरख फलकामी, कृपा करो भर्ता॥ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ॐ जय जगदीश हरे॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे। अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ॐ जय जगदीश हरे॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ॐ जय जगदीश हरे॥
तन मन धन सब है तेरा, सब कुछ है तेरा। तेरे ही गुण गाऊं, दिन और सवेरा॥ॐ जय जगदीश हरे॥
जिस घर में तुम रहते, सब सद्गुण आवे। सब सिद्धि पावे वो घर, वो सुखी बन जावे॥ॐ जय जगदीश हरे॥
भावार्थ
हे जगत के स्वामी, हे भगवान विष्णु, आपकी जय हो। आप एक क्षण में ही अपने भक्तों के समस्त संकट दूर कर देते हैं।
जो आपका ध्यान करता है वह फल पाता है, मन का दुःख नष्ट होता है, घर में सुख-सम्पत्ति आती है और शरीर के कष्ट मिट जाते हैं।
आप ही मेरे माता-पिता हैं, आपके सिवा किसकी शरण लूं? आपके अतिरिक्त और कोई दूजा नहीं जिसकी आशा करूं।
आप ही पूर्ण परमात्मा हैं, आप ही अंतर्यामी हैं, आप ही पारब्रह्म परमेश्वर हैं, आप ही सबके स्वामी हैं।
आप करुणा के सागर हैं, सबका पालन करने वाले हैं; मैं मूर्ख फल की कामना रखता हूं, हे भर्ता, मुझ पर कृपा कीजिए।
आप एक अगोचर तत्व हैं, सबके प्राणों के स्वामी हैं; हे दयामय, मुझ जैसा कुबुद्धि किस विधि से आपको पाए?
हे दीनबंधु, दुःखहर्ता, आप ही मेरे रक्षक हैं; अपना हाथ उठाइए, मैं आपके द्वार पर पड़ा हूं।
मेरे विषय-विकार मिटाइए, हे देव मेरे पाप हर लीजिए; मेरी श्रद्धा-भक्ति बढ़ाइए और संतों की सेवा का अवसर दीजिए।
तन, मन, धन — सब कुछ आपका ही है; मैं प्रातः-सांय आपका ही गुणगान करूंगा।
जिस घर में आप निवास करते हैं वहां सब सद्गुण आते हैं, वह घर हर सिद्धि पाता है और सुखी बन जाता है।
भगवान बालाजी वेंकटेश्वर की पूजा क्यों की जाती है
बालाजी को कलियुग का साक्षात् प्रत्यक्ष देवता माना जाता है, जो सच्चे मन से शरण में आने वाले भक्त का ऋण, पाप व दुःख स्वयं दूर करते हैं। भक्तों का विश्वास है कि उनका सच्चे हृदय से दर्शन अथवा आरती-गान भी आर्थिक कठिनाई दूर कर सकता है, विवाह व करियर की बाधाओं को हटा सकता है और मन्नत पूर्ण कर सकता है। तिरुमला मंदिर का हुंडी प्रतिदिन उन भक्तों के अर्पण से भरता है जो भगवान से किए वचन पूरे करते हैं — यह सदियों से चली आ रही कृतज्ञता की जीवंत परंपरा है।
आरती की विधि व समय
बालाजी की आरती प्रातः तथा सांयकाल, विशेषकर संध्या समय, घी अथवा तिल के तेल का दीपक जलाकर भगवान की मूर्ति अथवा चित्र के समक्ष करना उत्तम माना गया है। भक्त खड़े होकर, यदि घंटी उपलब्ध हो तो उसे बजाते हुए, दीपक को धीरे-धीरे दक्षिणावर्त घुमाते हुए पूर्ण मनोयोग से समस्त पद गाते हैं। आरती के पश्चात दीपक परिवारजनों व अतिथियों को दिखाया जाता है और फल, तुलसीदल अथवा पंचामृत का प्रसाद बांटा जाता है। शुक्रवार व शनिवार विष्णु व बालाजी की आराधना हेतु विशेष शुभ माने जाते हैं, वैशाख मास तथा तिरुपति का वार्षिक ब्रह्मोत्सवम काल भी अत्यंत पावन है।
करणीय व अकरणीय
आरती आरम्भ करने से पूर्व स्वच्छ शरीर व शुद्ध मन के साथ भगवान के सम्मुख बैठें अथवा खड़े हों। यथासंभव अर्पण में तुलसीदल अवश्य रखें, क्योंकि तुलसी विष्णु को अत्यंत प्रिय है। आरती को शीघ्रता व असावधानी से न गाएं — गति नहीं, भक्ति महत्वपूर्ण है। जिस दिन विशेष संकल्प सहित बालाजी की पूजा करनी हो उस दिन प्याज़, लहसुन व मांसाहार से दूर रहें। दीपक जलते समय भगवान की ओर पीठ न करें, आदरपूर्वक पीछे हटें।
भगवान वेंकटेश्वर की महिमा
पौराणिक कथा के अनुसार स्वयं विष्णु ने वेंकटेश्वर रूप में तिरुमला की सात पहाड़ियों पर निवास कर भक्तों को कलियुग के कष्टों से बचाने का व्रत लिया तथा देवी पद्मावती से विवाह हेतु धन के देवता कुबेर से ऋण लिया — यह वह ऋण है जिसे भक्त आज भी अपने अर्पण से चुकाने में सहभागी बनते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि जो भी प्रेमपूर्वक उनका गुणगान करता व छोटा-सा अर्पण भी देता है, वह भगवान का भार हल्का करने में सहायक बनता है, और बदले में भगवान उसका भार हल्का कर देते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नीचे प्रश्नोत्तर अनुभाग में दिए गए हैं।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Vishnu mantra
Om Namo Bhagavate Vasudevaya
Chant before katha or aarti while praying for protection, dharma, and peace.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
बालाजी के लिए ॐ जय जगदीश हरे क्यों गाई जाती है?
बालाजी वेंकटेश्वर को विष्णु का साक्षात् स्वरूप माना जाता है, और ॐ जय जगदीश हरे संपूर्ण भारत में विष्णु को अर्पित पारंपरिक आरती है, इसलिए यह बालाजी की पूजा के लिए भी स्वाभाविक रूप से उपयुक्त है।
क्या यह आरती घर पर गाई जा सकती है?
हां। इस आरती को गाने के लिए तिरुपति जाना आवश्यक नहीं है — इसे प्रतिदिन प्रातः या सांय, घर पर बालाजी की मूर्ति या चित्र के समक्ष दीपक जलाकर गाया जा सकता है।
आरती के समय क्या अर्पित करें?
तुलसीदल, फल, घी अथवा तेल का दीपक और सच्ची भक्ति ही पर्याप्त है। आरती हेतु विस्तृत अनुष्ठान आवश्यक नहीं।
क्या आरती से पहले कोई विशेष मंत्र जपें?
अनेक भक्त आरती आरंभ करने से पूर्व तीन बार 'ॐ नमो वेंकटेशाय' अथवा 'ॐ नमो नारायणाय' का जाप करते हैं, यद्यपि यह ऐच्छिक है।
बालाजी का आशीर्वाद पाएं
सुख-समृद्धि, शांति व मनोकामना पूर्ति हेतु भगवान बालाजी वेंकटेश्वर के नाम पूजा अर्पित करें।







