हर हिन्दू घर के लिए चार आवश्यक आरतियों का संपूर्ण पाठ: ॐ जय जगदीश हरे, जय गणेश देवा, ॐ जय शिव ओंकारा और जय अम्बे गौरी।
आरती संग्रह में चार सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिंदू आरतियों को एक साथ प्रस्तुत किया गया है, जिन्हें लगभग हर घर जानता और गाता है — ॐ जय जगदीश हरे (किसी भी देवता विशेषकर विष्णु के लिए), जय गणेश देवा (भगवान गणेश), ॐ जय शिव ओंकारा (भगवान शिव) और जय अम्बे गौरी (देवी दुर्गा)। ये चारों अधिकांश पारिवारिक आरती संग्रहों का मूल आधार हैं और भारत भर के मंदिरों में प्रतिदिन, त्योहारों पर तथा हर पूजा के समापन पर गाई जाती हैं।
ॐ जय जगदीश हरे (सार्वभौमिक आरती — किसी भी देवता / विष्णु के लिए)
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे।
जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का। सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे।
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे।
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे।
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे।
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे।
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे। अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे।
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे।
श्री जगदीश जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
जय गणेश देवा (भगवान गणेश)
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी। माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी॥ पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा। लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥ जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा॥
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया। बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥ सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥ जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा॥
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी। कामना को पूर्ण करो, जाऊं बलिहारी॥ जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा॥ माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
ॐ जय शिव ओंकारा (भगवान शिव)
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा।
एकानन चतुरानन पंचानन राजे। हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा।
दो भुज दो चतुर्भुज दस भुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा।
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी। त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा।
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा।
कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूल धरता। जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता॥ ॐ जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा।
त्रिगुण स्वामी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
जय अम्बे गौरी (देवी दुर्गा)
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशिदिन ध्यावत, हर ब्रह्मा शिवरी॥ जय अम्बे गौरी।
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को। उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥ जय अम्बे गौरी।
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे। रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजे॥ जय अम्बे गौरी।
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी। सुर-नर मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥ जय अम्बे गौरी।
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥ जय अम्बे गौरी।
शुम्भ निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती। धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥ जय अम्बे गौरी।
चंड मुंड संहारे, शोणित बीज हरे। मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भय दूर करे॥ जय अम्बे गौरी।
ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी। आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ जय अम्बे गौरी।
चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरो। बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ जय अम्बे गौरी।
भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्पर धारी। मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ जय अम्बे गौरी।
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती। श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥ जय अम्बे गौरी।
श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे॥ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
कौन-सी आरती कब गाएं
ॐ जय जगदीश हरे सबसे सार्वभौमिक आरती है, जो किसी भी देवता की पूजा के समापन के लिए उपयुक्त है, क्योंकि यह "जगदीश" — सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी — को संबोधित करती है। जय गणेश देवा प्रायः पूजा-क्रम में सबसे पहले गाई जाती है, क्योंकि किसी भी शुभ कार्य से पूर्व गणेश जी का आह्वान किया जाता है। ॐ जय शिव ओंकारा शिव पूजा के समय, सोमवार, महाशिवरात्रि तथा श्रावण मास भर गाई जाती है। जय अम्बे गौरी नवरात्रि के समय, मंगलवार व शुक्रवार को, तथा जब भी दुर्गा, काली अथवा देवी के किसी भी स्वरूप की पूजा हो, गाई जाती है।
घर पर आरती करने की विधि
एक थाली में घी या तेल का दीपक (अथवा कपूर की ज्योति) धूप के साथ जलाएं। देवता की मूर्ति या चित्र के सामने खड़े हों या बैठें। थाली को दोनों हाथों से पकड़ें और उसे धीरे-धीरे दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) घुमाएं — पहले देवता के चरणों के पास, फिर कमर के पास, फिर सम्पूर्ण स्वरूप के चारों ओर एक पूर्ण चक्र, और अंत में मुख के पास तीन बार। श्रद्धापूर्वक आरती गाएं, और अंत में थाली को परिवार के सदस्यों में घुमाएं, जो ज्योति पर हाथ रखकर उसे अपनी आंखों व मस्तक से स्पर्श करते हैं — यह दिव्य प्रकाश ग्रहण करने का भाव है।
नियमित आरती के लाभ
प्रतिदिन केवल पाँच मिनट की आरती भी मन को शुद्ध करती है, एकाग्रता व सकारात्मकता लाती है, साझा अनुष्ठान के माध्यम से पारिवारिक संबंधों को मजबूत करती है, तथा पूज्य देवता की रक्षात्मक कृपा को आमंत्रित करती है। आरती प्रायः दैनिक पूजा का सबसे सरल एवं सुलभ रूप है — इसके लिए किसी विस्तृत सामग्री की आवश्यकता नहीं, केवल जलता हुआ दीपक और श्रद्धावान हृदय चाहिए।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Devi mantra
Om Dum Durgaye Namah
Chant 11, 21, or 108 times according to your time and capacity.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
नित्य पूजा के लिए सबसे महत्वपूर्ण आरती कौन-सी है?
ॐ जय जगदीश हरे सबसे सार्वभौमिक आरती है, जो किसी भी देवता की पूजा के समापन के लिए उपयुक्त है, क्योंकि यह सीधे सृष्टि के स्वामी को संबोधित करती है।
इन आरतियों को किस क्रम में गाना चाहिए?
सामान्यतः शुभता हेतु पहले जय गणेश देवा गाई जाती है, फिर उस दिन पूज्य देवता की आरती, और अंत में प्रायः ॐ जय जगदीश हरे गाई जाती है।
क्या चारों आरतियाँ एक साथ एक ही समय में गाई जा सकती हैं?
हाँ, कई परिवार सामान्य सांध्य पूजा में चारों गाते हैं, विशेषकर त्योहारों पर, अथवा इसे विभिन्न अवसरों के लिए एक मुद्रित संग्रह के रूप में रखते हैं।
घर पर आरती करने के लिए क्या विशेष सामग्री चाहिए?
केवल थाली में जलता हुआ दीपक या कपूर की ज्योति, कुछ धूप और श्रद्धा चाहिए; किसी विस्तृत सामग्री की आवश्यकता नहीं है।
अपने घर में नित्य आरती को अपनाएं
अपने कुल देवता की पूजा बुक करें या दिव्य छढ़ावा पर और भी पवित्र ग्रंथ पढ़ें।








