भगवान शिव की सम्पूर्ण अष्टोत्तरशतनामावली — 108 पावन नाम, अर्थ सहित, जप विधि व लाभ सहित।
सनातन धर्म के आदिदेव भगवान शिव अपने अनंत रूपों और गुणों के कारण असंख्य नामों से पूजे जाते हैं। शिव अष्टोत्तरशतनामावली — भगवान शिव के "108 नाम" — हिंदू परंपरा की सबसे प्रिय स्तुतियों में से एक है। प्रत्येक नाम अपने आप में एक सम्पूर्ण ध्यान है, जो निराकार, सर्वव्यापी महादेव के किसी न किसी स्वरूप को प्रकट करता है — अज्ञान का नाश करने वाले, कैलास के तपस्वी, सृष्टि के करुणामय पिता, और ध्यानमग्न शाश्वत योगी।
रुद्राभिषेक के समय, सोमवार को, सावन के पावन मास में अथवा महाशिवरात्रि पर इन 108 नामों का जप करने से भक्तों को शांति, साहस, सुरक्षा और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है, ऐसी मान्यता है। 108 की संख्या स्वयं हिंदू परंपरा में पावन मानी जाती है — यह जप माला के 108 मनकों से मेल खाती है और सूर्य, चन्द्र व पृथ्वी को जोड़ने वाली एक ब्रह्माण्डीय पूर्णता की संख्या मानी जाती है।
शिव के 108 नामों का जप क्यों करें
शिव के प्रत्येक नाम में एक विशेष स्पंदन और अर्थ छिपा होता है। सम्पूर्ण नामावली का जप नामस्मरण का एक रूप है, जो मन को स्थिर करता है, भय को दूर करता है और भक्त को शिव की रक्षात्मक व रूपांतरकारी ऊर्जा के निकट लाता है। भक्तजन कठिनाइयों से राहत के लिए, स्वास्थ्य व दीर्घायु के लिए (मृत्युंजय स्वरूप के रूप में), कार्यों में सफलता के लिए, और केवल भोलेनाथ के प्रति प्रेम अर्पित करने के लिए भी इसका जप करते हैं — भोलेनाथ, जो देवों में सबसे सरल और शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं।
भगवान शिव के सम्पूर्ण 108 नाम (अष्टोत्तरशतनामावली)
1. शिव — मंगलकारी, कल्याणस्वरूप 2. महेश्वर — परम ईश्वर, सबके स्वामी 3. शम्भु — स्वयं आनंदस्वरूप, सुख देने वाले 4. पिनाकी — पिनाक धनुष धारण करने वाले 5. शशिशेखर — मस्तक पर चन्द्रमा धारण करने वाले 6. वामदेव — सुंदर व मनोहर स्वरूप वाले 7. विरूपाक्ष — विचित्र नेत्रों वाले, त्रिनेत्रधारी 8. कपर्दी — जटाधारी 9. नीललोहित — नीले-लाल कण्ठ वाले 10. शंकर — कल्याण करने वाले 11. शूलपाणि — त्रिशूलधारी 12. खट्वांगी — खट्वांग धारण करने वाले 13. विष्णुवल्लभ — भगवान विष्णु के प्रिय 14. शिपिविष्ट — सूर्य किरणों में निवास करने वाले 15. अम्बिकानाथ — माता अम्बिका के स्वामी 16. श्रीकण्ठ — सुंदर कण्ठ वाले 17. भक्तवत्सल — भक्तों पर वात्सल्य रखने वाले 18. भव — सम्पूर्ण सृष्टि के मूल स्रोत 19. शर्व — समस्त दुःखों का नाश करने वाले 20. त्रिलोकेश — तीनों लोकों के स्वामी 21. शितिकण्ठ — श्वेत-नील कण्ठ वाले 22. शिवाप्रिय — माता शिवा (पार्वती) के प्रिय 23. उग्र — प्रचंड स्वरूप वाले 24. कपाली — कपालों की माला धारण करने वाले 25. कामारि — कामदेव का नाश करने वाले 26. अन्धकासुरसूदन — अन्धकासुर का वध करने वाले 27. गंगाधर — गंगा को जटाओं में धारण करने वाले 28. ललाटाक्ष — मस्तक पर नेत्र वाले 29. कालकाल — काल का भी काल 30. कृपानिधि — करुणा के भण्डार 31. भीम — अत्यंत बलशाली 32. परशुहस्त — परशु धारण करने वाले 33. मृगपाणि — हाथ में मृग धारण करने वाले 34. जटाधर — जटाओं को धारण करने वाले 35. कैलासवासी — कैलास पर्वत के निवासी 36. कवची — कवच धारण करने वाले 37. कठोर — दृढ़ और अटल 38. त्रिपुरान्तक — त्रिपुर का नाश करने वाले 39. वृषांक — वृषभ चिन्ह धारण करने वाले 40. वृषभारूढ़ — नंदी पर सवार होने वाले 41. भस्मोद्धूलितविग्रह — सम्पूर्ण शरीर पर भस्म धारण करने वाले 42. सामप्रिय — सामवेद के प्रिय 43. स्वरमय — सभी स्वरों के अधिष्ठाता 44. त्रयीमूर्ति — तीनों वेदों के स्वरूप 45. अनीश्वर — जिनके ऊपर कोई नियंता नहीं 46. सर्वज्ञ — सब कुछ जानने वाले 47. परमात्मा — परम आत्मा 48. सोमसूर्याग्निलोचन — चन्द्र, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं 49. हवि — यज्ञ में अर्पित हवि स्वरूप 50. यज्ञमय — यज्ञस्वरूप 51. सोम — उमा सहित सौम्य स्वरूप 52. पंचवक्त्र — पाँच मुख वाले 53. सदाशिव — सदा कल्याणकारी 54. विश्वेश्वर — सम्पूर्ण विश्व के स्वामी 55. वीरभद्र — शिव के क्रोध से उत्पन्न वीर स्वरूप 56. गणनाथ — गणों के स्वामी 57. प्रजापति — समस्त प्रजा के पालक 58. हिरण्यरेतस् — स्वर्ण के समान तेजस्वी 59. दुर्धर्ष — जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता 60. गिरीश — पर्वतों के स्वामी 61. गिरिश — पर्वत पर निवास करने वाले 62. अनघ — निष्पाप, दोषरहित 63. भुजंगभूषण — सर्पों से आभूषित 64. भर्ग — पापों को भस्म करने वाले 65. गिरिधन्वा — मेरु पर्वत को धनुष बनाने वाले 66. गिरिप्रिय — पर्वतों के प्रिय 67. कृत्तिवास — गजचर्म/व्याघ्रचर्म धारण करने वाले 68. पुराराति — त्रिपुर के शत्रु 69. भगवान — षड्गुण ऐश्वर्यसम्पन्न 70. प्रमथाधिप — प्रमथगणों के अधिपति 71. मृत्युंजय — मृत्यु पर विजय पाने वाले 72. सूक्ष्मतनु — सूक्ष्म शरीर वाले 73. जगद्व्यापी — सम्पूर्ण जगत में व्याप्त 74. जगद्गुरु — संपूर्ण जगत के गुरु 75. व्योमकेश — आकाश के समान केश वाले 76. महासेनजनक — कार्तिकेय (महासेन) के पिता 77. चारुविक्रम — सुंदर पराक्रम वाले 78. रुद्र — दुःखों को दूर करने वाले 79. भूतपति — समस्त भूतों के स्वामी 80. स्थाणु — अचल स्तम्भस्वरूप 81. अहिर्बुध्न्य — गहन जलतत्त्व के अधिष्ठाता 82. दिगम्बर — दिशाओं को वस्त्र मानने वाले 83. अष्टमूर्ति — आठ स्वरूपों वाले 84. अनेकात्मा — अनेक रूपों वाले 85. सात्त्विक — शुद्ध सत्वगुण वाले 86. शुद्धविग्रह — निर्मल स्वरूप वाले 87. शाश्वत — सनातन, नित्य 88. खण्डपरशु — खण्डित परशु धारण करने वाले 89. अज — जन्मरहित 90. पाशविमोचक — बंधनों से मुक्त करने वाले 91. मृड — सुख प्रदान करने वाले 92. पशुपति — समस्त जीवों के स्वामी 93. देव — दिव्य, तेजस्वी 94. महादेव — देवों के देव 95. अव्यय — अविनाशी 96. हरि — पापों को हरने वाले 97. पूष्णोदन्तभिद् — पूषा के दाँत तोड़ने वाले 98. अव्यग्र — विचलित न होने वाले 99. दक्षाध्वरहर — दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने वाले 100. हर — सब कुछ हरण करने वाले 101. भगनेत्रभिद् — भग के नेत्र नष्ट करने वाले 102. अव्यक्त — अप्रकट, निराकार 103. सहस्राक्ष — सहस्र नेत्रों वाले 104. सहस्रपाद — सहस्र चरणों वाले 105. अपवर्गप्रद — मोक्ष प्रदान करने वाले 106. अनन्त — अनन्त स्वरूप 107. तारक — भवसागर से पार लगाने वाले 108. परमेश्वर — सबके परम ईश्वर
108 नामों का जप कैसे करें
अष्टोत्तरशतनामावली को पारंपरिक रूप से शिवलिंग पर प्रत्येक नाम के साथ "ॐ [नाम] नमः" कहते हुए एक फूल, बेलपत्र अथवा कुछ चावल के दाने अर्पित करके जपा जाता है, जिसे अष्टोत्तरशतनामार्चन कहा जाता है। यदि शिवलिंग उपलब्ध न हो, तो शिव के चित्र अथवा प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर भी इन नामों का जप किया जा सकता है, अथवा रुद्राक्ष की माला से एक बार में एक पूर्ण माला (108 नाम) का जप किया जा सकता है।
जप के लिए सबसे उत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त, सोमवार, प्रदोष काल (त्रयोदशी तिथि को सूर्यास्त से पूर्व की संध्या बेला), सम्पूर्ण सावन मास, और विशेष रूप से महाशिवरात्रि माना जाता है। जप करते समय उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर मुख करना शुभ माना जाता है। एक दीपक, जल और बेलपत्र ही पर्याप्त हैं — शिव किसी विस्तृत अनुष्ठान की नहीं, केवल सच्ची श्रद्धा की अपेक्षा रखते हैं।
शिव के 108 नामों के जप से लाभ
मान्यता है कि इन नामों के नियमित जप से बाधाएँ व नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है, कठिन समय में मानसिक शांति व स्पष्टता मिलती है, साहस व दृढ़ संकल्प मजबूत होता है (रुद्र स्वरूप में शिव, प्रचंड रक्षक), स्वास्थ्य में सुधार व दीर्घायु प्राप्त होती है (मृत्युंजय स्वरूप का आह्वान), और धर्म व आंतरिक अनुशासन के प्रति जुड़ाव गहरा होता है, क्योंकि शिव स्वयं परम योगी हैं। भय, व्यसन अथवा कठिन जीवन-परिस्थितियों से मुक्ति चाहने वालों के लिए भी यह विशेष लाभकारी माना जाता है, क्योंकि शिव को आशुतोष — शीघ्र प्रसन्न होने वाला — कहा गया है।
शिव नाम की महिमा
पुराणों में वर्णन है कि श्रद्धापूर्वक लिया गया शिव का एक भी नाम जन्मों के पाप नष्ट कर सकता है — जैसे अजामिल की कथा में अंतिम क्षणों में केवल अपने पुत्र "नारायण" को पुकारने मात्र से उनकी मुक्ति हुई थी; शिव के नामों की महिमा भी उतनी ही मानी जाती है, क्योंकि पुराणों में स्वयं शिव कहते हैं कि उनका नाम उनके स्वरूप से भी सहज प्राप्त होता है। इसीलिए शिव को आशुतोष कहा जाता है, और बिना किसी विस्तृत अनुष्ठान के केवल नाम-स्मरण को भी सम्पूर्ण पूजा माना गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सम्पूर्ण उत्तर नीचे प्रश्नोत्तर अनुभाग में दिए गए हैं।
संक्षिप्त मार्गदर्शिका
प्रारंभ से पहले
मंत्र
Shiva mantra
Om Namah Shivaya
Chant with a quiet mind, especially on Monday, Pradosh, or during Shiva puja.
भाव
भक्त जिन आशीर्वादों की प्रार्थना करते हैं
प्रश्न-उत्तर
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
शिव के 108 नामों में 108 संख्या का क्या महत्व है?
हिंदू परंपरा में 108 की संख्या आध्यात्मिक रूप से पूर्ण मानी जाती है — यह जप माला के मनकों से मेल खाती है और प्राचीन गणनाओं में ब्रह्माण्डीय अनुपातों से जुड़ी है। ठीक 108 नामों का जप पूजा का एक सम्पूर्ण चक्र माना जाता है।
क्या शिवलिंग के बिना 108 नामों का जप किया जा सकता है?
हाँ। शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करते हुए जप करना पारंपरिक है, परंतु आप शिव की किसी भी प्रतिमा या चित्र के सामने हाथ जोड़कर, अथवा मन ही मन श्रद्धापूर्वक कहीं भी इन नामों का जप कर सकते हैं।
शिव अष्टोत्तरशतनामावली के जप के लिए सबसे अच्छा दिन कौन सा है?
सोमवार शिव को विशेष प्रिय माना जाता है, साथ ही प्रदोष काल, सम्पूर्ण सावन मास और महाशिवरात्रि भी। परंतु श्रद्धापूर्वक किसी भी दिन शिव के नामों का जप किया जा सकता है।
108 नामों और शिव चालीसा में क्या अंतर है?
108 नाम (अष्टोत्तरशतनामावली) शिव के गुणों की संस्कृत सूची है जिसका उपयोग नाम-दर-नाम पूजा के लिए होता है, जबकि शिव चालीसा 40 चौपाइयों की हिंदी स्तुति है जो शिव की महिमा व कथाओं का वर्णन करती है। पूजा के समय दोनों का जप एक साथ किया जा सकता है।
महादेव का आशीर्वाद पाएँ
अपने जीवन में शांति, सुरक्षा और समृद्धि के लिए भगवान शिव की पूजा अर्पित करें।







